मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६९२ मार्क्सवाद और रामराज्य स्फूर्तिरूपतामें तुल्यता होनेपर भी सङ्गिता विकारितारूप विलक्षणता भी बिम्बकी अपेक्षा प्रतिबिम्बमें रहती है । कहा जा सकता है कि जैसे मृत्तिका रहनेपर ही घट रहता है, वैसे ही बुद्धिके रहनेपर ही चिदाभास रहता है, बुद्धिके न रहनेपर नहीं रहता । फिर उसे बुद्धिसे भिन्न क्यो माना जाय ? यदि शास्त्र प्रमाणसे देहके मरनेपर भी बुद्धिका अस्तित्व माना जा सकता है तो बुद्धिसे भिन्न चिदाभास भी शास्त्रोंसे सिद्ध होता ही है । बुद्धिकी विभिन्न वृत्तियो एव अज्ञानके साक्षीरूपसे सर्वावभासक सर्वाधिष्ठान अखण्ड बोधरूप ब्रह्म सिद्ध होता है । अखण्ड बोध-स्वरूप ब्रह्म ही अहंवृत्तिसे युक्त होकर कर्ता कहलाता है, इदंवृत्तियुक्त हो प्रपञ्चाकार प्रतीत होता है, वही आन्तर-बाह्य सभी विषयोको साक्षीरूपसे प्रकाशित करता है । नृत्यशालास्थित दीप जैसे प्रभु, सभ्य एवं नर्तकी सभीको प्रकाशित करता है, उसी तरह साक्षी आत्मा ही अहंकार बुद्धि एव सभी विषयोको प्रकाशित करता है । जैसे प्रभु, सभ्य आदिके न रहनेपर दीप सबके अभावका भी भासक होता है, उसी तरह अहंकार बुद्धिके सुषुप्ति दशामें न रहनेपर भी साक्षी ही सबके अभावका भी प्रकाशन करता है । अखण्ड बोधरूप आत्मा नित्य ही स्वप्रकाशरूपसे विराजमान रहता है ।'उसीके प्रकाशसे प्रकाशित होकर बुद्धि आदि व्यावृत्त होती हैं । जैसे दीप स्वस्थानस्थित रहकर ही आन्तर-बाह्य सभी वस्तुओको प्रकाशित करता है, उसी तरह कूटस्थसाक्षी आन्तर-बाह्य सभी विषयोको प्रकाशित करता है। देहकी अपेक्षासे ही उसमें आन्तरत्व एवं बाह्यत्व प्रतीत होता है । अन्तःस्थ बुद्धि ही इन्द्रियोंके द्वारा बार-बार बाह्य विषयोकी ओर जाती है । उसीकी चञ्चलता- से तद्भासक साक्षीमें भी चञ्चलता प्रतीत होती है । सर्वदेश, काल, वस्तु बुद्धिकृत ही हैं । सर्वभासक अखण्ड बोधकी दृष्टिसे कुछ भी नही है । जैसे अग्निमें उष्णता एवं प्रकाश रहता है, वैसे ही आत्माका चैतन्य स्वभाव है। शब्दादि अचेतन होनेसे स्वतः सिद्ध नहीं हो सकते, किंतु शब्दाद्याकार- वृत्तियोसे ही उनकी सिद्धि होती है । वह वृत्तियाँ परस्पर भिन्न शब्दादि विषय विशेषणवाली होती हैं, अतः नीलपीताद्याकारवाली वृत्तियो या ज्ञानोंकी भी स्वतः सिद्धि नहीं हो सकती । जबतक नीलपीतादि बाह्याकार न होगे तबतक बाह्याकार- प्रत्यय उत्पन्न ही नहीं हो सकते । इस तरह प्रत्यय भी संहत होनेसे अचेतन ही ठहरते हैं। इस दृष्टिसे स्वरूपभिन्न ग्राहकसे ही प्रत्यय भी ग्राह्य होगे । जो असहत होकर चैतन्यात्मक है, वही स्वार्थ हो सकता है । अन्य संहत अचेतन वस्तु परार्थ ही होते हैं । नील-पीताद्याकार ज्ञानोंका उपलब्ध्वा आत्मा विक्षेपवान् है, ऐसा सशय होता है । परतु इसका समाधान यह है कि परिणामी चित्तादि क्रमसे ही स्वविषयोके ग्राहक होते हैं, परंतु कूटस्थ आत्मा अक्रमेण सभी प्रत्ययोका