भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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अज्ञातताके तुल्य ही ब्रह्मसे भास्य होती है। बुद्धिवृत्ति, चिदाभास एव घटादि सभी सामान्य सौरालोक-तुल्य नित्यवोधसे भासित होते हैं, फिर भी घटव्याप्त वृत्तिपर ही चिदाभासरूप फल होता है। अतः एक घटका ही स्फुरण होता है। घटादि विषयपर द्विगुणित चैतन्य व्यक्त होता है। जैसे कुड्यपर एक सामान्य सौरालोक फैला होता है, दूसरे दर्पणादित्यदीप्तिके फैलनेसे द्विगुणित प्रकाश हो जाता है, उसी तरह सामान्य नित्यबोधसे व्याप्त घटादिपर चित्प्रतिविम्बयुक्त वृत्तिकी व्याप्ति होनेसे द्विगुणित चेतन्य हो जाता है। इसीलिये घटादिकी ज्ञातताका भासक ब्रह्म-चैतन्य माना जाता है। नैयायिक आदि उसे ही अनुव्यवसाय (ज्ञानविषय ज्ञान) कहते हैं। 'घटोऽयम्' यह घट है—नैयायिकोंके शब्दोंमें यह व्यवसायात्मक ज्ञान है, यह बुद्धिवृत्तिसे होता है। 'मया घटो ज्ञातः' मैंने घट जान लिया, यह अनुव्यवसायात्मक ज्ञान नित्य बोधरूप ब्रह्मसे होता है। इसी तरह अहंवृत्ति एवं काम क्रोधादि वृत्तियोंमें चिदाभास, उसी तरह व्याप्त होकर रहता है, जैसे लोहपर अग्नि व्याप्त होती है। जैसे अग्नि-व्याप्त लोह केवल अपने-आपको ही प्रकाशता है अन्यको नहीं, उसी तरह आभाससहित वृत्तियाँ अपनेको ही भासित करती हैं। क्रमसे विच्छिन्नविच्छिन्न होकर वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। सुषुप्ति, मूर्च्छा और समाधिमें सभी वृत्तियाँ लीन हो जाती हैं। सभी वृत्तियोंकी संधियाँ और अभाव जिस निर्विकार नित्य-बोधसे प्रकाशित होते हैं, उसे ही वेदान्तमतसे कूटस्थ शब्दसे कहा जाता है। जैसे बाहर वृत्ति-व्याप्त घटमें भासक चिदाभास और घटकी ज्ञातताका भासक ब्रह्मचैतन्य द्विगुण चैतन्य होता है, उसी तरह भीतर भी वृत्तियोंपर संधिकी अपेक्षा द्विगुण चैतन्यव्यक्त होता है। इसीलिये संधियोंकी अपेक्षा वृत्तियोंकी स्पष्टता अधिक होती है। भेद इतना अवश्य है कि बाहर घटादिमें ज्ञातता, अज्ञातता—दोनों ही रहती हैं, वैसे वृत्तियोंमें ज्ञातता, अज्ञा- तता—दोनों नहीं रहतीं। वृत्तियाँ स्वयं अपने-आपको ग्रहण नहीं करतीं, इसलिये ज्ञातता नहीं होती और वृत्तिके उत्पन्न होते ही वृत्तिगोचर अज्ञान नहीं रहता अतः वृत्तियोंकी अज्ञातता भी नहीं होती । वृत्तिगोचर वृत्ति माननेसे अनव- स्थादि दोष आते हैं। अतः वृत्तियाँ साक्षिभास्य कही जाती हैं। चित्प्रतिबिम्बरूप ज्ञानकी उत्पत्ति और विनाश प्रतीत होते हैं, अतः उसे विनश्वर कहा जाता है। अन्तःकरण एव तद्वृत्तियोंका साक्षी अखण्ड नित्यबोध निर्विकार होनेसे कूटस्थ कहलाता है। बुद्धिसे परिच्छिन्न कूटस्थ एव चिदाभासयुक्त बुद्धिके मिश्रणसे ही जीव- व्यवहार होता है। बुद्धि स्वच्छ है, इसलिये उसपर चित्प्रतिविम्ब होता है। प्रतिबिम्ब एव बिम्बमें कुछ तुल्यता ओर कुछ विलक्षणता होती है, इसी तरह