भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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है। वह प्रतिबिम्ब ही स्वोपाधिबुद्धिके व्यापारद्वारा प्रमाता बनता है । आभास भी परिणाम नहीं है, किंतु जैसे रज्जुके अज्ञानसे सर्पभ्रम होता है, जैसे दर्पणमें मुखाभासत्वकी प्रतीति होती है, उसी तरह बुद्धिमे आत्माभासत्वकी प्रतीति होती है । प्रत्यय और दृष्टिका भेद स्वप्नमें प्रसिद्ध ही है । वहाँ विषयाकाराकारित प्रत्ययका साक्षी आत्मा ही है । जिस चिद्रूप आत्माके आभाससे विषयाकार-प्रत्यय विदित होता है, वही आत्मा है । प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय—तीनोंका भासक साक्षी ही ब्रह्म है—‘त्रितयं तन्न यो वेद स भात्मा स्वाश्रयाश्रयः ।’ (श्रीमद्भा० २ । १० । ९) सम्यग्ज्ञान, संशयज्ञान, भ्रान्ति ज्ञानमें अवगति और बोध-आत्मा एक ही ढगका है । इन ज्ञानोंमें भेद केवल प्रत्ययोंका ही है । पुष्पादि उपाधिके वशसे स्फटिकादिमें भेद प्रतीत होता है, उसी तरह प्रत्ययरूप उपाधिके भेदसे अखण्डबोधमें भेद प्रतीत होता है । जाग्रत्काल, स्वप्नकालके प्रत्ययोंका स्फुरण नित्य-अपरोक्षभाव साक्षी आत्मासे ही होता है । जैसे प्रदीपसे घटादिका प्रकाश होता है, परंतु प्रदीपका भी प्रकाश द्रष्टासे ही होता है— तस्य भासा सर्वमिदं विभाति, ( कठोप० २ । १ । १५ ) अत्रायं पुरुषः स्वयञ्ज्योतिर्भवति । ( छान्दोग्योप० ) अन्य निषेधसे भी सर्वनिषेध साक्षी चेतन आत्मा प्रसिद्ध होता है । 'अज्ञा- सिषमिदं मां च' मैने इसे और अपने आपको जाना, इस प्रकारकी स्मृति प्रमाता, प्रमाण, प्रमेयके स्मरणसे तीनोका ही प्रकाश निश्चित होता है । एक प्रमाणज्ञानमें ग्राहक और ग्राह्य दोनोंका स्फुरण नहीं हो सकता । अतः बोधस्वरूप साक्षीसे ही स्फुरण होना उपपन्न होता है । बौद्ध कर्ता कर्म-विहीन प्रत्ययका स्वमहिमासे प्रकाश है ऐसा मानते हैं । परंतु फिर तो अनुभविताकी अपेक्षा ही न रहेगी । वैसे अनुभवितामें ही अनुभव इष्ट होता है । इसके अतिरिक्त अनुभविता भी तो अनुभव ही है । बुद्धि ही भ्रान्तिसे पुरुषोंको ग्राह्य-ग्राहक-भेदवान् होकर प्रतीत होती है । जिसके मतमें अनुभूति क्रिया है, वही कारक भी है । यदि इसका सत्त्व एवं क्षणिकत्व मान्य है तो दृष्टबलात् सकर्तृक भी मानना ठीक है । वस्तुतस्तु ग्राह्य नीलपीतादि वस्तु और वस्तु-प्रत्यय भासक साक्षी मान्य है, जैसे रूपादि ग्राह्य हैं उनके ग्राहक दीपादि हैं उसी तरह प्रत्यय भी ग्राह्य है, अतः उसका ग्राहक साक्षी मान्य होना चाहिये । व्यञ्जक होनेसे अवभासक अवभास्यसे अन्य होता है । जैसे घटादिका प्रकाशक दीपक होता है, उसी तरह प्रत्यय ग्राह्य है, उसका भी ग्राहक साक्षी पृथक् है । द्रष्टा और दृश्यका आध्यासिक ही सम्बन्ध होता है । जैसे घटादिपर आलोककी व्याप्ति होती है, वैसे ही घटादिपर बुद्धि-व्याप्ति होती है । जैसे आलोकस्थ घट आलोकारूढ़ कहा जाता है, वैसे ही बुद्धिस्थ घट बुद्ध्यारूढ़, कहा जाता है । बुद्धिव्याप्त घटादिपर, चित्प्रतिबिम्ब होता है, उसीसे घटादि प्रकाश होता है । मा० आ० ४५-