भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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७०६ मार्क्सवाद और रामराज्य कार्यकारणसंघातरूप प्राणीका जाग्रत्कालमें बैठना, चलना, काम करना आदि व्यवहार, आदित्य, चन्द्रमा, अग्निरूप ज्योति या प्रकाशके द्वारा सम्पन्न होता है । यहाँ सर्वत्र कार्यकारणावयवसंघातव्यतिरिक्त आदित्यादि ज्योतिसे ही व्यवहार चलता है । इसी तरह मेघाच्छन्न अमावस्याकी रात्रिमें जहाँ कोई भी ज्योति नहीं होती, अपना हाथ भी नही भासित होता, वहाँ भी दूरस्थ श्वान तथा गर्दभ आदिके-शब्दको सुनकर मनसे निश्चित करके उसी शब्दके सहारे प्राणी वहाँतक पहुँच जाता है । ऐसे ही गन्धके सहारे भी जिधरसे गन्ध आती है, उधर प्राणी पहुँच जाता है। यहाँ सर्वत्र देहादि-संघातभिन्न ज्योतिसे ही व्यवहार होता है । ठीक इसी तरह स्वप्न एवं सुषुप्तिकालमें स्वाप्निक-वस्तुओं तथा निद्रामें सौषुप्त अज्ञान एवं सुखका प्रकाश भी किसी संघातव्यतिरिक्त संघातप्रकाशक ज्योतिसे ही मानना उचित है । स्वप्नके बन्धु-संगम, देशान्तर- गमनादि व्यवहार देहादि-संघातव्यतिरिक्त देहादिभासक आत्मज्योतिसे मानना उचित है । स्वप्नादि व्यवहार भी संघातव्यतिरिक्त ज्योतिःपूर्वक है । व्यवहार होनेसे जाग्रत्-व्यवहारके तुल्य जैसे जाग्रतका व्यवहार देहातिरिक्त आदित्यादि ज्योतिर्मूलक हैं, वैसे ही स्वाप्निक व्यवहारको भी देहादिभिन्न ज्योतिर्मूलक मानना चाहिये । स्वप्नव्यवहारमें आदित्यादि ज्योतियोंका सम्बन्ध सम्भव ही नही । अतः कोई अन्तःस्थ आदित्यादि ज्योतिसे विलक्षण अभौतिक आत्मज्योति मानना उचित है । उसीसे स्वप्नका व्यवहार सम्भव हो सकता है । आदित्यादि ज्योति चक्षुरादिसे उपलब्ध होती है । परंतु स्वप्न-व्यवहारका हेतुभूत कोई बाह्यज्योति चक्षुरादिसे उपलब्ध नहीं होती, परंतु ज्योतिका कार्य-व्यवहार स्पष्ट उपलब्ध होता है । अतः संघातभिन्न अदृश्य अन्तःस्थ आदित्यादि विलक्षण अभौतिक ज्योति मानना आवश्यक है । इस सम्बन्धमें यह अनुमान है कि 'विमतं अन्तःस्थमतीन्द्रिय- त्वाद् व्यतिरेकेणादित्यादिवत् ।' विवादास्पद स्वप्नादिव्यवहार-हेतु ज्योति अन्तःस्थ है । अतीन्द्रिय या अदृश्य होनेसे जो अदृश्य नहीं, वह अन्तःस्थ नहीं, जैसे आदित्यादि । इस सम्बन्धमें भौतिकवादीका कहना है कि "उपकारी उपकारकभाव सजातीयमें ही देखा जाता है । जाग्रत-व्यवहार कारक-हेतुभूत आदित्यादि ज्योति देहादिके समान भौतिक ही है । उसी तरह स्वाप्निकव्यवहारके हेतुभूत संघातव्यतिरिक्त ज्योतिको भी संघातके समान भौतिक ही होना चाहिये । जैसे आदित्यादि उपकारक उपक्रियमाण देहादि-संघातके सजातीय होते हैं, वैसे ही स्वाप्निकव्यवहार हेतुभूत उपकारक ज्योतिको भी उपक्रियमाणका सजातीय ही होना चाहिये । अतः जैसे आदित्यादि उपकारक ज्योति भौतिक हैं, वैसे ही स्वाप्निकव्यवहारका उपकारक ज्योति भी भौतिक ही होना चाहिये ।