भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 466

“जो कहा जाता है कि 'अतीन्द्रिय एव अदृश्य होनेसे वह ज्योति अभौतिक है', यह भी ठीक नहीं; क्योंकि चक्षुरादि इन्द्रिय ज्योति भी अतीन्द्रिय तथा अदृश्य है । तो भी वे जैसे अभौतिक नहीं, भौतिक ही हैं, उसी तरह उस ज्योतिको भी भौतिक ही होना चाहिये । इसके अतिरिक्त देहादिसंघातके रहनेपर ही चैतन्यरूप अन्तःस्वज्योति रहती है । देहादिके न रहनेपर नहीं रहती । अतः उसे देहादिका ही धर्म मानना उचित है । जैसे रूपादि सघातके रहनेपर ही उपलब्ध होते हैं, अतः वे देहादिके ही धर्म हैं, वैसे ही यहाँ भी समझना चाहिये—'विमतं चैतन्यं शरीरधर्मस्तद्भावभाविन्त्वाद् रूपांदिवत् । विमतं ज्योतिः संघाताद्भिन्नं तद्भासकत्वादित्यादिवत् । विवादास्पद-चैतन्य संघातसे भिन्न है, संघातके भासक होनेसे आदित्यादिके तुल्य यह सामान्यतो दृष्ट-अनुमान व्यभिचारी होनेसे स्वयं अप्रमाण है । क्योंकि भौतिकवादीके मतानुसार देहका भासक होनेपर भी चक्षु देहसे भिन्न नहीं है, उसी तरह चैतन्य भी देहका भासक होनेपर भी देहसे भिन्न न होकर उससे अभिन्न उसका धर्म ही है । अनुमानके द्वारा प्रत्यक्षका बाध भी नहीं होता । मैं मनुष्य हूँ, मै देखता, सुनता और जानता हूँ, इस प्रकार प्रत्यक्ष ही देहादि-संघातमें द्रष्टृत्व, ज्ञातृत्वादि विदित होता है । फिर प्रत्यक्षके विरुद्ध अनुमान कैसे आदरणीय हो सकता है ? “कहा जा सकता है कि 'यदि देह ही आत्मा है और वही द्रष्टा, ज्ञाता आदि है तो अविकल रहनेपर भी वह क्यों कभी द्रष्टा, ज्ञाता होता है, कभी नहीं होता ?' किंतु यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि जो वस्तु जिस तरह प्रमाण- सिद्ध हो, उसको वैसी मानना उचित है । खद्योतमें प्रकाश, अप्रकाश दोनो ही देखा जाता है, अतः दोनों ही मान्य हैं । उसमें किसी कारणान्तरकी कल्पना नही की जाती । अग्निकी उष्णता, जलकी शीतलता जैसे स्वाभाविक है, वैसे ही देहमें कभी ज्ञातृत्व, द्रष्टृत्वादि होना, कभी न होना स्वाभाविक ही है । यदि प्राणियोके धर्माधर्मके कारण औष्ण्य, शैत्यादि माना जायगा, तब तो अनवस्था-दोष होगा ।” भौतिकवादीका उपर्युक्त कथन ठीक नहीं है, कारण कि स्वप्न एव स्मृतिके आधारपर यही सिद्ध होता है कि देहादि-संघातसे भिन्न अभौतिक आत्मा ही द्रष्टा होता है, देहादि नहीं । यह नियम है कि जाग्रत्-कालमें दृष्टका ही स्वप्नमें दर्शन होता है, इस तरह जाग्रत् और स्वप्नका द्रष्टा एक ही होता है । किंतु स्वप्नमें अनेक वस्तुओका दर्शन होता है, वहाँ देह या नेत्रादि नहीं होते । देहादि निर्व्यापार तथा नेत्र निमीलित ही रहते हैं । अतः स्वप्नके प्रपञ्चका द्रष्टा देह नहीं है । साथ ही यह भी स्पष्ट है कि अन्य दृष्टका स्वप्न-द्रष्टा अन्य नहीं