भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 473

७१४ मार्क्सवाद और रामराज्य जा सकता, अपितु उन्हें भूतपरिणामभेद ही कहना पड़ेगा । तथाच भूतधर्म रूपादि जड़ होनेके कारण जैसे विषय हैं, विषयी नहीं, वैसे ही भूतधर्म । जड़ होनेके कारण चैतन्यको भी विषय मानना पड़ेगा, विषयी नहीं । यदि कहा जाय कि 'भूतधर्म होनेपर भी किन्हींका विषयित्व भी मान्य है, तो यह उचित नहीं, क्योंकि अपने-आपमें वृत्तिरूप विरोध होगा, जैसा कि अभी कहा गया । लोकायतिक पृथिव्यादि चार भूतोंके अतिरिक्त अन्य किसी तत्त्वका अस्तित्व अङ्गीकार नहीं करते । भूत-भौतिक पदार्थोंके अनुभवको यदि चैतन्य वस्तु कहा जाय, तो वे विषय हैं, अतः अपने-आपमें क्रियाविरोधके कारण चैतन्यको उनका धर्म कहना उचित नहीं है । अग्नि दाहक होनेपर भी अपने-आपको नही जला सकता, सुशिक्षित भी नट अपने स्कन्धपर नहीं चढ सकता । इसी प्रकार चैतन्य यदि भूत- भौतिकधर्म हो, तो वह भूत-भौतिकोको विषय नहीं कर सकता । रूप आदि अपने और दूसरेके रूपको विषय नहीं कर सकते, किंतु बाह्य, आध्यात्मिक भूत-भौतिको- को चैतन्य विषय करता है । यदि भूतादिविषयक चैतन्यरूप उपलब्धिका अस्तित्व मान लिया जाता है, तो भूतव्यतिरिक्त पदार्थका अस्तित्व भी मान लेना पड़ेगा । तथाच उपलब्धिरूप आत्मा देहादिसे अतिरिक्त सिद्ध हो जाता है । 'मैने उसे देखा था' जिस प्रकार अवस्थान्तरमें भी उपलब्धिरूपसे प्रत्यभिज्ञान होने और स्मृति आदि उत्पन्न होनेके कारण उस स्वरूपात्माकी एकरूपता स्पष्ट है, अतः उसको नित्य माननेमे कोई आपत्ति नहीं । इस प्रकार दीपक आदिके रहनेपर यद्यपि उपलब्धि होती है, उसके अभावमें नहीं, तथापि उपलब्धिको जैसे दीपकका धर्म नहीं कहा जाता, वैसे ही देहके रहनेपर उपलब्धि होती है, उसके न रहनेपर नहीं, फिर भी उपलब्धिको देहका धर्म नहीं कहा जा सकता । दीपककी तरह केवल उपकरणमात्र मान लेनेसे भी देहका उपयोग उपपन्न हो जाता है । स्वप्नावस्थामें इस देहके निश्चेष्ट पड़े रहनेपर भी अनेक प्रकारकी उपलब्धियोंका होना अनुभव सिद्ध है, अतः यह स्पष्ट है कि चैतन्य भूत-भौतिकोका धर्म नहीं है । 'एतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति' इत्यादिके अनुसार यह नहीं कहा जा सकता कि देहादिसे व्यतिरिक्त होता हुआ भी आत्मा उन देहादिको- के साथ ही उत्पन्न होता है और उनके साथ ही विनष्ट हो जाता है । जन्मान्तरीय अदृष्टको माने बिना न तो देहादिका वैलक्षण्य उपपन्न हो सकता है और न प्राक्तन संस्कारोंके अभावमें शिशुकी स्तन्यपानमें प्रवृत्ति ही बन सकती है । अतः देहादिसे अतिरिक्त नित्य आत्मा मानना अनिवार्य है । इन्द्रियोंको आत्मा माननेवालोके पक्षमे भी बहुत चेतन माननेवालोके पक्षमे बतलाये दोष उपस्थित होते हैं । 'मै देखता हूँ, सुनता हूँ, स्वाद लेता हूँ,