भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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मार्क्स और आत्मा ७१३ यदि समुदायभूत अवयवीको चेतयिता कहे तो एक भी अवयवके कट जानेपर अवयवी-समुदाय ही कट जायगा और इस तरह प्रेतत्वापत्ति होगी। इसे इष्टापत्ति भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अवयव कट जानेपर भी अवयवीमें चैतन्य उपलब्ध होता है। यदि प्रत्येक अवयवको चेतयिता माने तो बहुतोंका अन्योन्याभिमुख होकर रहना सदा सम्भव नहीं है। उन परस्पराभिमुखोंका स्वातन्त्र्य मानने या परस्पर प्रतिबद्ध सामर्थ्यवालोंका स्वातन्त्र्य अथवा विरुद्धदिशाकी ओर क्रिया करनेमे अभिमुखका स्वातन्त्र्य मानने किंवा परस्परका स्वातन्त्र्यपरस्परसे प्रतिबद्ध माननेपर या तो शरीर नष्ट हो जायगा या निष्क्रिय हो जायगा। देहके रहनेपर जीवित दशामें ज्ञान, इच्छा आदिके रहनेपर भी देहाभाव- दशामें उनकी सत्ता नहीं रहती, ऐसा नहीं कहा जा सकता। उनकी अनुपलब्धि होनेसे उनके असत्त्वका निर्णय नहीं किया जा सकता; क्योंकि विद्यमान रहनेपर भी व्यञ्जकके अभावमें उपलब्धि न होना सम्भव है। विभु ( व्यापक ) होनेके कारण जाति सर्वत्र विद्यमान रहनेपर भी व्यञ्जक व्यक्तिके अभावमे जैसे उसका उपलम्भ नहीं हुआ करता, वैसे ही व्यञ्जक देहके न रहनेपर चैतन्यका अनुपलम्भ उपपन्न हो सकता है। अथवा जैसे काष्ठ आदि अग्निके व्यञ्जक हैं, अतः उनके रहनेपर ही अग्निकी अभिव्यक्ति होती है, तथापि यह नहीं कहा जा सकता कि काष्ठके अभावमें अग्निका अभाव होता है अथवा काष्ठ तथा अग्निका धर्म-धर्मिभाव है। धर्म धर्मिभावका निर्णय अन्वय-