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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

मार्क्स और आत्मा ७१३ यदि समुदायभूत अवयवीको चेतयिता कहे तो एक भी अवयवके कट जानेपर अवयवी-समुदाय ही कट जायगा और इस तरह प्रेतत्वापत्ति होगी। इसे इष्टापत्ति भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अवयव कट जानेपर भी अवयवीमें चैतन्य उपलब्ध होता है। यदि प्रत्येक अवयवको चेतयिता माने तो बहुतोंका अन्योन्याभिमुख होकर रहना सदा सम्भव नहीं है। उन परस्पराभिमुखोंका स्वातन्त्र्य मानने या परस्पर प्रतिबद्ध सामर्थ्यवालोंका स्वातन्त्र्य अथवा विरुद्धदिशाकी ओर क्रिया करनेमे अभिमुखका स्वातन्त्र्य मानने किंवा परस्परका स्वातन्त्र्यपरस्परसे प्रतिबद्ध माननेपर या तो शरीर नष्ट हो जायगा या निष्क्रिय हो जायगा। देहके रहनेपर जीवित दशामें ज्ञान, इच्छा आदिके रहनेपर भी देहाभाव- दशामें उनकी सत्ता नहीं रहती, ऐसा नहीं कहा जा सकता। उनकी अनुपलब्धि होनेसे उनके असत्त्वका निर्णय नहीं किया जा सकता; क्योंकि विद्यमान रहनेपर भी व्यञ्जकके अभावमें उपलब्धि न होना सम्भव है। विभु ( व्यापक ) होनेके कारण जाति सर्वत्र विद्यमान रहनेपर भी व्यञ्जक व्यक्तिके अभावमे जैसे उसका उपलम्भ नहीं हुआ करता, वैसे ही व्यञ्जक देहके न रहनेपर चैतन्यका अनुपलम्भ उपपन्न हो सकता है। अथवा जैसे काष्ठ आदि अग्निके व्यञ्जक हैं, अतः उनके रहनेपर ही अग्निकी अभिव्यक्ति होती है, तथापि यह नहीं कहा जा सकता कि काष्ठके अभावमें अग्निका अभाव होता है अथवा काष्ठ तथा अग्निका धर्म-धर्मिभाव है। धर्म धर्मिभावका निर्णय अन्वय-

७१४ मार्क्सवाद और रामराज्य जा सकता, अपितु उन्हें भूतपरिणामभेद ही कहना पड़ेगा । तथाच भूतधर्म रूपादि जड़ होनेके कारण जैसे विषय हैं, विषयी नहीं, वैसे ही भूतधर्म । जड़ होनेके कारण चैतन्यको भी विषय मानना पड़ेगा, विषयी नहीं । यदि कहा जाय कि 'भूतधर्म होनेपर भी किन्हींका विषयित्व भी मान्य है, तो यह उचित नहीं, क्योंकि अपने-आपमें वृत्तिरूप विरोध होगा, जैसा कि अभी कहा गया । लोकायतिक पृथिव्यादि चार भूतोंके अतिरिक्त अन्य किसी तत्त्वका अस्तित्व अङ्गीकार नहीं करते । भूत-भौतिक पदार्थोंके अनुभवको यदि चैतन्य वस्तु कहा जाय, तो वे विषय हैं, अतः अपने-आपमें क्रियाविरोधके कारण चैतन्यको उनका धर्म कहना उचित नहीं है । अग्नि दाहक होनेपर भी अपने-आपको नही जला सकता, सुशिक्षित भी नट अपने स्कन्धपर नहीं चढ सकता । इसी प्रकार चैतन्य यदि भूत- भौतिकधर्म हो, तो वह भूत-भौतिकोको विषय नहीं कर सकता । रूप आदि अपने और दूसरेके रूपको विषय नहीं कर सकते, किंतु बाह्य, आध्यात्मिक भूत-भौतिको- को चैतन्य विषय करता है । यदि भूतादिविषयक चैतन्यरूप उपलब्धिका अस्तित्व मान लिया जाता है, तो भूतव्यतिरिक्त पदार्थका अस्तित्व भी मान लेना पड़ेगा । तथाच उपलब्धिरूप आत्मा देहादिसे अतिरिक्त सिद्ध हो जाता है । 'मैने उसे देखा था' जिस प्रकार अवस्थान्तरमें भी उपलब्धिरूपसे प्रत्यभिज्ञान होने और स्मृति आदि उत्पन्न होनेके कारण उस स्वरूपात्माकी एकरूपता स्पष्ट है, अतः उसको नित्य माननेमे कोई आपत्ति नहीं । इस प्रकार दीपक आदिके रहनेपर यद्यपि उपलब्धि होती है, उसके अभावमें नहीं, तथापि उपलब्धिको जैसे दीपकका धर्म नहीं कहा जाता, वैसे ही देहके रहनेपर उपलब्धि होती है, उसके न रहनेपर नहीं, फिर भी उपलब्धिको देहका धर्म नहीं कहा जा सकता । दीपककी तरह केवल उपकरणमात्र मान लेनेसे भी देहका उपयोग उपपन्न हो जाता है । स्वप्नावस्थामें इस देहके निश्चेष्ट पड़े रहनेपर भी अनेक प्रकारकी उपलब्धियोंका होना अनुभव सिद्ध है, अतः यह स्पष्ट है कि चैतन्य भूत-भौतिकोका धर्म नहीं है । 'एतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति' इत्यादिके अनुसार यह नहीं कहा जा सकता कि देहादिसे व्यतिरिक्त होता हुआ भी आत्मा उन देहादिको- के साथ ही उत्पन्न होता है और उनके साथ ही विनष्ट हो जाता है । जन्मान्तरीय अदृष्टको माने बिना न तो देहादिका वैलक्षण्य उपपन्न हो सकता है और न प्राक्तन संस्कारोंके अभावमें शिशुकी स्तन्यपानमें प्रवृत्ति ही बन सकती है । अतः देहादिसे अतिरिक्त नित्य आत्मा मानना अनिवार्य है । इन्द्रियोंको आत्मा माननेवालोके पक्षमे भी बहुत चेतन माननेवालोके पक्षमे बतलाये दोष उपस्थित होते हैं । 'मै देखता हूँ, सुनता हूँ, स्वाद लेता हूँ,

मार्क्स और आत्मा ७१५ सँघता हूँ, स्पर्श करता हूँ, इच्छा करता हूँ' इत्यादि रूपसे एक आत्मविषयक अनुभव होनेके कारण देखने, सुनने, सूँघने, स्पर्श आदि करनेवालोंको परस्पर भिन्न नहीं कहा जा सकता । यदि भिन्न कहें, तो उनका विरोध ध्रुव है । अतः मन तथा इन्द्रियोंकी अन्तर्बाह्यकरणता ही है, कर्तृत्व नहीं; क्योंकि 'कुठारसे छेदन करता हूँ, घोड़ेसे लाँघता हूँ इत्यादिके समान 'आँखसे देखता हूँ, कानसे सुनता हूँ' इत्यादि व्यवहार दृष्टिगोचर होते हैं । चक्षु, श्रोत्र आदि इन्द्रिय और मन, बुद्धि, अतीन्द्रिय होनेके कारण प्रत्यक्ष नहीं हैं । उपलभ्यमान नेत्र आदिको इन्द्रिय नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वे स्वयं इन्द्रिय नहीं, अपितु उनके गोलक हैं । इसलिये गोलकका उपघात न होनेपर भी इन्द्रियका उपघात होनेसे विषयका ग्रहण नहीं होता । दहनकर्ता होता हुआ भी अग्नि जैसे अपना दहन नहीं करता, अपितु काष्ठ आदिका ही दहन करता है, वैसे ही इन्द्रियाँ भी स्ववृत्तिविरोधके कारण अपने अवगममें अक्षम होती हैं । देखना, सुनना, सूँघना, चलना, सोचना, जानना आदि क्रिया होनेसे करणपूर्वक होते हैं, इत्यादि अनुमानसे इन इन्द्रियोंका ज्ञान होता है । युगपद् ज्ञानानुत्पत्तिरूप लिङ्गसे मन आदि भी उसी प्रकार अनुमानगम्य हैं, अतः बिना अनुमान-प्रमाण माने कैसे इन्द्रियादिकी सिद्धि हो सकती है और इन्द्रियादिकी सिद्धि हुए बिना इन्द्रियात्मवाद कैसे सिद्ध हो सकता है ? बल्कि अचेतनोंकी प्रवृत्ति चेतनाधिष्ठित हुआ करती है, जैसे रथ आदिकी प्रवृत्ति अश्व, सारथी आदि चेतनोंसे अधिष्ठित होती है । इस वैज्ञानिकयुगमें भी स्वयंचालित विभिन्न यन्त्रोंमें संयोजक और प्रथमप्रवर्तक चेतन ही अपेक्षित हुआ करता है। इसे चाहे स्वभाव कहा जाय, किंतु इससे कुछ अन्तर नहीं पड़ता, क्योंकि स्वभावको यदि असत् कहें तो वह कार्यकारणक्षम नहीं हो सकता । यदि सत् हो तो भी यदि वह अचेतन है तो उसकी भी वही स्थिति रहेगी । यदि स्वभाव चेतन है, तब तो नाममात्रका ही भेद हुआ । देहादिसंघात संघात होनेके कारण शय्या, प्रासाद आदिके समान परार्थ होता है । शय्या आदि पदार्थ जैसे अपनेसे विलक्षण किसी देवदत्त आदिके लिये होते हैं, वैसे ही देहादिसंघात भी अपनेसे विलक्षण आत्माके लिये ही हैं। देहादि- संघात जब कि अचेतन अनेकात्मक, अनित्य, दुःखरूप और अपूर्ण होते हैं, तब उनसे विलक्षण चेतन एक, असंहत, नित्य, पूर्ण, आनन्दरूप आत्मा सिद्ध होता है । साथ ही अचेतनोंकी प्रवृत्ति अचेतनके लिये नहीं, अपितु इष्टप्राप्ति तथा अनिष्टपरिहारके इच्छुक किसी चेतनके लिये ही होती है, यह मानना पड़ेगा । किसी भी अचेतन पदार्थमें न तो इष्टप्राप्ति तथा अनिष्ट-परिहारकी इच्छा दिखायी पड़ती है, न इष्ट अनिष्ट, सुख-दुःखकी प्राप्ति और परिहार ही ।

७१६ मार्क्सवाद और रामराज्य वैनाशिक बौद्ध (शून्यवादी) तीन प्रकारके होते हैं—(१) सर्वसत्तावादी, (२) विज्ञानमात्र सत्तावादी (३) और सर्वशून्यवादी। इनमें सर्वसत्तावादियोंके सिद्धान्तमें खरस्वभाव पार्थिव परमाणुओका सङ्घात पृथिवी, स्नेह, स्वभाव जलीय परमाणुओका सङ्घात जल, उष्णस्वभाव परमाणुओका सङ्घात तेज (अग्नि) और गतिस्वभाव वायवीय परमाणुओका सङ्घात वायु ये चार बाह्य पदार्थ हैं। इन्हें भूत भौतिकशब्दसे कहा जाता है। इसी प्रकार रूप, विज्ञान, वेदना, संज्ञा और संस्कार ये पञ्चस्कन्ध अन्तर पदार्थ हैं। विषयसहित इन्द्रियाँ रूपस्कन्ध, विषयोंका ज्ञान-विज्ञान स्कन्ध, सुख-दुःखानुभव वेदनास्कन्ध, सविकल्पज्ञान संज्ञास्कन्ध और राग-द्वेषादि क्लेश संस्कार स्कन्ध हैं। इन्हें चित्त-चैत्तिक कहा जाता है। इन्हीं पाँच स्कन्धोंका सङ्घात ही आत्मा है। यद्यपि बौद्धोका परम तात्पर्य शून्यवादमें ही है, तथापि हीन, मध्यम और उच्च आदि बुद्धिभेदसे इनके तीन भेद हो जाते हैं। यह बात बोधिचित्तविवरणमें स्पष्ट की गयी है— देशना लोकनाथानां सत्त्वाशयवशानुगा। भिद्यते बहुधा लोक उपायैर्विविधैः पुनः॥ १॥ गम्भीरोत्तानभेदेन क्वचिच्चोभयलक्षणा। भिन्नाऽपि देशनाऽभिन्ना शून्यताऽद्वयलक्षणा॥ २॥ बुद्धोंके उपदेश शिष्योके अभिप्रायके ही अनुसार होते हैं। जैसे-जैसे शिष्य बढ़ते हैं, व्याख्या भी बढ़ती जाती है। कहीं अत्यन्त गम्भीर, कही उत्तान इस तरहका उपदेश होता है, परंतु सबका तात्पर्य सर्वशून्यमे ही होता है। इस तरह बाह्यभूत भौतिक और आध्यात्मिक चित्तचैत्तिक समुदाय ही वैभाषिक और सौत्रान्तिक बौद्धोके मतमें आत्मा है। बाह्यार्थको केवल अनुमेय मानकर प्रत्यक्ष न माननेवाले बौद्ध—'सौत्रान्तिक' कहे जाते हैं। किंतु आन्तर विज्ञानके समान ही बाह्यार्थको भी प्रत्यक्ष सिद्ध माननेवाले बौद्धको वैभाषिक कहते हैं। इससे अतिरिक्त नित्यचेतन आत्मा नहीं है। विचार करनेपर इन भूतभौतिको चित्तचैत्तिकोंका समुदाय नही बन सकता। कारण इनमें समुदाय अचेतन है। चेतन (ज्ञानवान्) कुलालादि ही मृत्तिका, चक्र, चीवर, आदि कारण कलाप एकत्रित कर समुदायी घटका निर्माता देखा गया है। मृत्तिका, चक्र, चीवर आदिके सञ्चालक चेतन कुलालादिके न रहनेपर अचेतन मृत्तिका दण्डादि स्वयं व्यापारवान् होकर घटकी रचना नहीं कर सकते। चेतनके न रहनेपर अचेतन तुरी-वेमा आदि कपड़ा स्वयं नहीं बुन लेते। इसलिये कार्योत्पादन क्षमतावाली सामग्री एकत्रित होनेपर ही कार्यकी उत्पत्ति होती है। कार्योत्पादनक्षम सामग्रीका एकत्रीकरण चेतन विचाराधीन है। यदि कहा जाय कि चित्त ही चेतन

मार्क्स और आत्मा ७५७ है और इन्द्रियादि विषय सम्पर्क होनेपर स्वयं प्रदीप्त होकर यथायोग्य आवश्यकता- नुसार कारण चक्रको प्रकाशित करता हुआ अचेतन करणोंद्वारा कार्य सम्पादन करता है तो यह भी ठीक नहीं, कारण-समुदाय सिद्धिके बाद ही चित्तका अभिज्वलन सिद्ध होगा, और चित्त अभिज्वलनके बाद समुदाय-सिद्धि होगी। इस प्रकार यहाँ इतरेतराश्रय दोष दुष्परिहर हो जायगा। पहले जन्मकी चित्ताभिदीप्ति उत्तरकालिक समुदाय'का सङ्घटन करती है यह भी कहना ठीक नहीं, क्योंकि सङ्घटनके समयसे चित्तकी दीप्ति बहुत पहले ही बीत चुकी, अतः वह उत्तरकालिक सङ्घटनकी क्षमता नहीं रख सकती। कारण विन्यास-विशेषका जानकार ही कर्ता होता है। अन्वय-व्यतिरेकके बिना विन्यास- विशेष जाना नहीं जा सकता। अनवस्थायी क्षणिक चेतन अन्वय-व्यतिरेकका विज्ञाता हो नहीं सकता। भूतभौतिक-चित्त-चैत्तिक समुदायसे अतिरिक्त स्थिर सहन्ता- चेतन इस सिद्धान्तमें मान्य नहीं है। यदि माना जाय कि परस्परानपेक्ष असंनिहित कारण चेतन संनिधापयिताके बिना ही कार्योत्पादन करेंगे, तो फिर सदा ही कार्यप्रसक्ति बनी रहेगी। परंतु ऐसा है नहीं। यदि कहा जाय कि अहंकारास्पद आलयविज्ञान ही पूर्वापरका अनुसन्धान करनेवाला है वही प्रतिष्ठाता ( संनिहित करनेवाला ) हो जायगा, तो यह भी ठीक नहीं। कारण यदि आलय-विज्ञान एक और नित्य माना जाय तो वह नामान्तरसे आत्मा ही सिद्ध होगा और यदि वह क्षणिक विज्ञान रहा तो पूर्वोक्त दोष तदवस्थ रहेंगे। यदि कहे कि आलय-विज्ञान नहीं किंतु उसका संतान ( परम्परा ) कारणो- न्का संनिधापयिता होगा, तो वह भी उपेक्षणीय है; क्योंकि सतान यदि विज्ञानसे अभिन्न है तो क्षणिक होनेके कारण पूर्वोक्त दोष दुरुद्धर ही है, यदि भिन्न है तो नित्य-विज्ञान आत्मा ही सिद्ध हो गया तथा सभी पदार्थोंकी क्षणिकता माननेके कारण समुदायियोंकी प्रवृत्ति बन नहीं सकती। प्रवृत्तिके प्रथम क्षणमें तथा प्रवृत्ति- क्षणमें समुदायी रहे तभी उनकी प्रवृत्ति हो सकती है। क्षणिक होनेके कारण वे दो क्षण टिक नहीं सकते। भिन्नकालमें उनकी स्थिति मानी जाय तो आधाराधेयभाव नहीं बन सकता। इस तरह समुदायकी सिद्धि नहीं हो सकती और समुदायसिद्धि न होनेपर तदाश्रित लोकयात्रा भी न बन सकेगी। इन्हीं दुरुद्धर दोषोंके कारण आजकल बौद्धलोग एक नित्य कूटस्थ आत्मा माननेकी वात करने लगे हैं तथा क्षणिकता अनित्यताको ही मान लेते हैं। फिर भी बौद्धोंका कहना है कि यद्यपि बौद्धमतमें कोई स्थिरभोक्ता या प्रशासिता चेतन सामग्री सङ्घटन करनेवाला मान्य नहीं है, फिर भी अविद्यादि ही आपसमें एक-दूसरेके कारण होते हैं, अतः लोकयात्रा बन जाती है। लोकयात्रा उपपन्न हो जानेपर फिर और कुछ भी उपेक्षित नहीं है।

७१८ मार्क्सवाद और रामराज्य यहाँ संक्षेपमें बौद्धप्रक्रिया समझ लेनी आवश्यक है, बुद्धने प्रतीत्य-समुत्पाद- का वर्णन किया है । प्रतीत्य-समुत्पादके सूचक बुद्धसूत्र हैं—‘‘उप्पादावा तथा गतानम्, अनुप्पादावा तथागतानं ठिताव सा धातु धम्म द्वितता धम्म ( नियामकता इदप्पच्चयता इति रेवो भिक्खवे परिच्च समुप्पादोति संयुत’’ ( कल्पतरु २।१ । २६।) भामतीकार कल्पतरुकार आदिकोंने इन सूत्रोंकी स्पष्ट व्याख्या की है । सूत्रोंका संस्कृतरूप यह है--- उत्पादा तथागतानामनुत्पादाद्वा स्थितैवैषा धर्माणां धर्मता । धर्मस्थितिता धर्मनियामकता प्रतीत्य समुत्पादानुलोभता ॥’’ सार यह है कि प्रत्येक कार्यमें दो प्रकारसे कारण सम्बन्ध होता है, हेतूप- निबन्ध एवं प्रत्ययोपनिबन्ध । प्रथम एकैककारण सम्बन्ध होता है, दूसरा कारणसमुदाय सम्बन्ध होता है। एक बीजरूपी हेतुका अङ्कुररूपी कार्यसे सम्बन्ध हेतूपनिबन्ध है। पृथिवी, जल, तेज, वायु आदि अनेक कारणोंका अङ्कुरसे सम्बन्ध प्रत्ययोपनिबन्ध है। हेतुं हेतु प्रत्यन्ते इति प्रत्यया हेत्वन्तराणि मुख्य हेतुके प्रति सम्मिलित होनेवाले सहकारि कारण समूह प्रत्यय है ‘प्रत्ययाः सन्त्यस्मिन्निति प्रत्ययः’ अनेक प्रत्यय ( कारण ) जिस समवायमें हो वह प्रत्यय हेतुसमुदायका बोधक होता है ।

  • ‘‘इदं प्रत्ययफलम्—इदं कार्यं प्रत्ययस्य कारणसमुदायमात्रस्य फलं न चेतनस्य कस्यचिदित्यर्थः’’ । अर्थात् कार्य इतरसहकारियोंसे सम्मिलित मुख्य हेतुरूप प्रत्ययका फल है। सारांश यह है कि अनेक सहकारी कारणोसे युक्त मुख्य हेतु ही कार्यमात्रका कारण है । कोई चेतन या ईश्वर कारण नहीं है। हेतूपनिबन्धका सूचक है—उत्पादाद्वा तथा गतानामित्यादि’’ । ‘‘तथागतानां बुद्धानां मते धर्माणां कार्याणां कारणानाञ्च या धर्मता कार्यकारणभावरूपा एषा उत्पादाद्वा अनुत्पादाद्वा स्थिता, धत्ते इति धर्मः कारणम्, ध्रियते धर्मः कार्यम् यस्मिन्सति यदुत्पद्यते असति च नोत्पद्यते तत्तस्य कारणम् कार्यञ्च न क्वचित्कार्यसिद्धये चेतनोऽपेक्ष्यते । अर्थात् बुद्धोंके मतमें कार्य एवं कारणोंकी कार्यकारणभावरूप धर्मता उत्पाद एव अनुत्पादके अन्वय व्यतिरेकसे सिद्ध है। जिसके रहनेपर जो उत्पन्न होता है जिसके न रहनेपर जो नही उत्पन्न होता है वही कारण और कार्य है। जो उत्पन्न होता है वह कार्य है जिसके रहनेपर ही उत्पन्न होता है वही कारण है। धारण करनेवाला धर्म कारण है ध्रियमाण धर्म कार्य है। इस प्रकार यहाँ उत्पादाद्वा अनुत्पादाद्वा इन पदोंका अन्वय-व्यतिरेक अर्थ हुआ। धर्मस्थितिता कार्यता है; क्योकि कार्यरूप धर्म ही कारणको अतिक्रमण

क्रियं विना काल विशेषमे स्थिति होती हे । स्थिति शब्दसे स्वार्थमें ही तल् प्रत्यय होनेसे स्थिति अर्थमें स्थितताका प्रयोग है । धर्मनियामकता कारणता है । धर्म अर्थात् कारण कार्यके प्रति नियामक है । यदि कहा जाय कि इस प्रकारका कार्यकारणभाव विना चेतनके नहीं हो सकता है, तो इसका समाधान है कि 'प्रतीत्य समुत्पादानुलोभता कारणे सति तत्प्रतीत्य प्राप्य समुत्पादानुलोमता प्रतीत्य समुत्पादानुसारिता या सैव धर्मता सा चोत्पादा सा नु व्यादात्मा धर्माणा स्थिता । न चेतनः कश्चिदुपलभ्यते' । अर्थात् कारणके रहनेपर कारणको प्राप्त करके कार्य समुत्पादका अनुसरण करनेवाली धर्मता होती है । अन्वय-व्यतिरेकानुसारिणी कारण एव कार्यमें स्थित है । यह प्रतीत्य समुत्पाद दो कारणोंसे सिद्ध होता है । हेतूपनिवन्धसे तथा प्रत्ययोप- निवन्धसे । एक मुख्य कारणसे सम्वन्धित हेतूपनिवन्ध होता है, अनेक सहकारी कारणोसे सम्बन्धित प्रत्ययसमवाय सम्वन्धित प्रत्ययोपनिवन्ध है । उनके भी दो भेद हैं । ( १ ) बाह्य और ( २ ) आध्यात्मिक । ( १ ) बाह्य—बीजसे अङ्कुर, अङ्कुरसे पत्र, पत्रसे काण्ड, काण्डसे नाल, नालसे गर्भ, गर्भसे शूक, शूकसे पुष्प और पुष्पसे फल होता है । इसमें बीजको ज्ञान नहीं होता कि मै अङ्कुरको उत्पन्न कर रहा हूँ । इसी तरह अङ्कुर पत्र और पुष्प आदिको भी ज्ञान नहीं होता कि मै अपनेसे पश्चात् उत्पन्न होनेवालोको उत्पन्न कर रहा हूँ । इसी प्रकार अङ्कुर पुष्प फलादिको भी यह ज्ञान नहीं होता कि मुझे बीजने उत्पन्न किया है । यह बाह्य हेतूपनिवन्धका उदाहरण है । छः धातुओके समवायसे ही बीजसे अङ्कुर हो सकता है अन्यथा नहीं । इसमें पृथिवी धातु बीजका सग्रह करती है । जिससे अङ्कुर कठिन हो जाता है, जलधातु स्नेह व तेजधातु परिपाक करता है । वायुधातु बीजसे अङ्कुरको ऊपर फेकता है, और आकाश धातु बीजका अवयव अलग करता है । ऋतु भी बीजका परिपाक करता है । अविकल छः धातुओके समुदायसे ही बीज अङ्कुररूपमे परिणत होता है । इनमें न तो पृथिवी धातुको यह ज्ञान रहता है कि हमने बीजका सग्रह-कृत्य किया है और न तो ऋतुको ही ज्ञान होता हे कि हमने बीजका परिणाम किया है । साथ ही अङ्कुरको भी यह ज्ञान नहीं होता कि मुझे इन धातुओने बनाया है । यह बाह्य प्रत्ययोपनिवन्धका उदाहरण है । ( २ ) आध्यात्मिक—इसी तरह अविद्यासे संस्कार, सस्कारसे जन्म तथा जन्मसे जरा और मृत्यु होती है । अविद्याको ज्ञान नहीं होता कि मैने सस्कारको बनाया है और न सस्कारको ही ज्ञान होता है कि मुझे अविद्याने बनाया है । यह आध्यात्मिक हेतूपनिवन्धका उदाहरण है ।

७२० मार्क्सवाद और रामराज्य इसी तरह पृथिवीसे तेज, वायु, आकाश और विज्ञानधातुओके समवायसे शरीर बनता है । पृथिवी धातुसे शरीरकी कठिनता और जलसे शरीरका स्नेह होता है । तेजधातु भुक्त-पीतका परिपाक करता है, वायुधातु श्वास-प्रश्वासादि करता है, आकाश शरीरके भीतर अवकाश प्रदान करता है । विज्ञानधातु पञ्चज्ञानेन्द्रिय युक्त मनोविज्ञानको उत्पन्न करता है। यह आध्यात्मिक प्रत्ययोपनिबन्धका उदाहरण है । इन छः धातुओकी जो पिण्ड संज्ञा, पुद्गल संज्ञा ( परमाणुसंज्ञा ) मनुष्य संज्ञा, अहंकार-संज्ञा, ममकार-संज्ञा यह अविद्या है। यही अविद्या संसारका (अनर्थ सामग्रीका ) मूल कारण है। अविद्याजन्य राग-द्वेष-मोहात्मक संस्कार विषयोंमें प्रवृत्ति कराते हैं। वस्तु-विषयज्ञान ही विज्ञान है। इन सबको एक प्रकारसे नामरूप कह सकते हैं। शरीरकी कलल बुद्बुद आदि अवस्था और नामरूप मिश्रित इन्द्रियाँ षडायतन कही जाती हैं। नामरूप इन्द्रियोंका सम्बन्ध ही स्पर्श है। स्पर्शसे सुख-दुःखादि वेदना होती है। वेदनाके अनन्तर मुझे सुखप्राप्तिके लिये यह कार्य फिर करना चाहिये ऐसा निश्चय तृष्णा है । उसमें वाणी शरीरकी चेष्टा है, उसका नाम उपादान है। उससे धर्माधर्म होते हैं। उसका नाम भव है उसीसे जन्म होता है। जन्मसे ही जरा-मृत्यु होती है, उससे अन्तर्दाह शोक होता है, शोकसे विलाप, दुःख और दौर्मनस्य होता है। यह परस्परहेतुक अविद्यादि सार्वजनिक अनुभवसिद्ध हैं। इनका अपलाप नहीं किया जा सकता । ये जन्मादिहेतुक अविद्यादि और अविद्यादिहेतुक जन्मादि चक्र घटीयन्त्रके समान निरन्तर चलता रहता है, तथा यह सार्वजनिक अनुभवसिद्ध है। अतः इनका अपलाप भी नहीं हो सकता, क्योकि इनसे सङ्घातका अर्थतः आक्षेप हो जायगा । इस तरह बौद्धमतके अनुसार कोई अनुपपत्ति नहीं, परंतु बौद्धोंका यह कथन भी ठीक नहीं, कारण प्रत्ययोपनिबन्धमें नाना कारणोंका समवधान आवश्यक है । बिना किसी चेतनके अनेक कारणोंका एकत्र होना नहीं बन सकता । यदि कहा जाय अन्त्यक्षणप्राप्त क्षित्यादि अङ्कुरका उत्पादन करते हैं, उनका उपसर्पण स्वभाव है इसलिये समवधान भी हो जायगा तो फिर किसानको कृषि करनेकी क्या आवश्यकता है ? भण्डारमें रक्खे बीज अङ्कुरित हो जायेंगे और सारा कार्य बिना चेतनका ही हो जायगा, किंतु ऐसा होता नहीं । इसलिये बिना कर्ताके सङ्घातका बनना असम्भव है। जो कहते हैं कि अविद्यासे सङ्घातका अर्थात् आक्षेप हो जायगा इसका क्या तात्पर्य है ? यदि यह तात्पर्य है कि अविद्यादि बिना संघात टिक नहीं सकते—इसलिये उन्हे संघातकी अपेक्षा है; फिर तो संघातका निमित्त बतलाना चाहिये ।

यदि यह अभिप्राय हो कि अविद्यादि ही सघातके निमित्त हो जायेंगे तो सघातके ही सहारे टिकनेवाले सघातके निमित्त कैसे होगे । यदि ऐसा माना जाय कि ससारमे प्रवाहरूपसे सघात चले आ रहे हैं और उनके सहारे ही अविद्यादि रहते हैं, तो फिर यह प्रश्न होगा कि एक सघातसे जो दूसरा सघात उत्पन्न होता है, वह नियमतः उसके सदृश ही होता है, अथवा अनियमित विसदृश ? यदि नियमतः सदृश होता है तो मनुष्य पुद्गल ( मनुष्यपरमाणु ) कभी देवयोनि या तिर्यग्योनि नहीं बन सकती, यदि नियम नहीं है तो मनुष्य- पुद्गल कभी क्षणमे हाथी बनकर क्षणमे सिंह और क्षणमें पुन देवता एव क्षणमें फिर मनुष्य बन सकता है, परतु ऐसा नही होता—यह दोनो ही प्रकार लोकसिद्ध न्याय-विरुद्ध है । दूसरी बात यह है कि सुगत सिद्धान्तमें सघातका भोक्ता स्थिरजीव तो कोई होता नही, फिर तो भोग भोगके लिये, मोक्ष मोक्षके लिये ही होगा । किसी दूसरे पुरुषसे प्रार्थनीय पुरुषार्थ नहीं होगा । यदि भोग और मोक्ष दूसरेमे प्रार्थनीय माने जायें तो भोग मोक्षकालमे उनकी स्थिति रहनी चाहिये । फिर तो क्षणभङ्गुरवादका सिद्धान्त ही भङ्ग हो जायगा । अतः अविद्यामें भले ही परस्पर कार्यकारणभाव हो, परतु उनसे सघातसिद्धि नही हो सकती । सार यह है कि भले ही हेतूपनिबद्ध कार्य अन्यान्यपेक्ष केवल मुख्य हेतुके अधीन उत्पन्न होनेवाला होनेसे कथञ्चित् उत्पन्न हो जाय ( यद्यपि चेतनाधिष्ठित ही बीजसे अङ्कुर उत्पन्न होता है जैसे कुलालाधिष्ठित मृत्तिकासे घट ) फिर भी पञ्चस्कन्धसमुदाय तो प्रत्ययोपनिबद्ध है, वह एक हेतुमात्रके अधीन उत्पन्न नहीं होता है । किंतु उसमें नाना हेतुओका समवधान अपेक्षित होता है । चेतनके बिना नाना हेतुओका एकत्रीकरण नही हो सकता । बीजसे अङ्कुरोत्पत्ति भी धरणी अनिल जलादि सहकारी सापेक्ष होनेसे प्रत्ययोपनिबद्ध ही है, अतः वह पक्ष कुक्षिमें निक्षिप्त है । इसलिये यह नहीं कहा जा सकता कि चेतनानधिष्ठित बीजसे अङ्कुरोत्पत्तिके समान चेतनानधिष्ठित अचेतन अविद्या आदिसे उत्तरोत्तर कार्य उत्पन्न होगे, क्योकि बीजसे अङ्कुरोत्पत्ति भी पक्ष- कोटिमें ही है । वहाँ भी चेतनानधिष्ठितत्व सिषाधयिषित है, वह दृष्टान्त नही हो सकता । कुम्भकाराधिष्ठित मृत्तिकासे घटोत्पत्ति होती है यह दृष्टान्त निर्विवाद तथा वादि-प्रतिवादि उभयसम्मत है । परतु चेतनानधिष्ठित बीजसे अङ्कुरकी उत्पत्ति तो विवादास्पद एव संदिग्ध है । इसीलिये वह संदिग्ध साध्यवान् होनेसे पक्ष है, दृष्टान्त नही हो सकता । यदि पक्षको लेकर व्यभिचारका उद्भावन किया जाय तो अनुमान मात्राका उच्छेद हो जायगा । ऐसी स्थितिमे पर्वत पक्षमें ही धूमका वह्नि व्यभिचार

मा० रा० ४६—

७२२ मार्क्सवाद और रामराज्य दिखाया जा सकता है । इस तरह अधिष्ठातारूप अर्थात् अनेक कारणोंके सन्निधायक रूपसे एक सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् चेतन कारणका मानना बौद्धोंके लिये अनिवार्य होगा । यद्यपि बौद्ध कहते हैं कि अनपेक्षित बीज एवं क्षित्यादि अन्त्यक्षणको प्राप्त होकर अङ्कुरका आरम्भ करते हैं । उपसर्पण प्रत्ययवशसे परस्पर समवधान होता है । यह नहीं कहा जा सकता कि एक ही कारणसे कार्यसिद्धि हो सकती है । यदि एक कारणसे कार्यसिद्धि हो जाय तो अन्य कारणोंकी अपेक्षा ही क्या रह जायगी । अतः कारणचक्रके अनन्तर ही कार्यकी उत्पत्ति होती है । अतः एक कारण कार्योत्पत्तिका साधक नही । जड़कारण स्वयं प्रेक्षावान् नही होते अतः वे यह नही सोच सकते कि हममेसे एक भी कार्य सम्पन्न कर सकता है फिर हम सबके सन्निधानसे क्या लाभ किंतु उपसर्पण प्रत्ययवशात् उनमें परस्पर सन्निधान उत्पन्न होता है । वे न तो असन्निहित रह सकते न अनुत्पादक रह सकते हैं । उन अनपेक्ष कारणोंको प्राप्त करके कार्य भी न उत्पन्न होनेमे असमर्थ ही रहता है । स्वमहिमासे सब कारण कार्योंका उत्पादन करते हुए भी नाना कार्योंका उत्पादन नहीं कर सकते । एक ही कार्यकी उत्पत्तिमे उनका सामर्थ्य होता है । बीजके द्वारा अङ्कुरजननमें ही मृत्तिका जलादिकी सहकारिता होती है । अतः उनके द्वारा भी उस अङ्कुरकी ही उत्पत्ति होती है,। कारणभेदसे कार्यभेद आवश्यक नहीं, क्योकि सामग्री एक होनेसे ही कार्य एक होता है । परंतु बौद्धोका यह कथन असंगत है, क्योकि यदि अन्त्यक्षणप्राप्त कारण स्वयं कार्यजननमे अनपेक्ष ही रहते हैं, अर्थात् किसीकी अपेक्षा नही रखते हैं तो इसी क्रमसे पूर्व पूर्वके कारण भी स्वक्रमजननमे अनपेक्ष ही रहेगे । कुसूलमे अङ्कुरजननोपयोगी बीजसन्ताननिर्वर्तक बीजक्षण और भक्षणादि उपयोगी बीजक्षण भी है । यद्यपि इस सम्बन्धमें यह विरोधी अनुमान नहीं किया जा सकता हे कि कुसूलगत विगतबीजक्षण ( अर्थात् अङ्कुरोपजननोपयोगी बीज- सन्ताननिर्वर्तकबीजक्षण ) अनपेक्ष होकर बीजक्षणका जनन नही करता । कुसूलस्थ होनेके कारण “जैसे तत्कालोद्धृतभक्षित बीजक्षण अनपेक्ष होकर बीजक्षण नही जनन करता है” । परंतु इस अनुमानमे अङ्गुरोपयोगि संतानानन्तःपातित्व उपाधि है । अनपेक्ष बीजक्षणाजनकत्वरूप साध्य तत्काल भक्षित बीजक्षणमे है । उसमे अङ्कुरो- पयोगि संतानानन्तः पातित्व है, कुसूलस्थत्वरूप साधन अङ्कुरोपयोगि संतान निर्वर्तक बीजक्षणमें है । परंतु वहाँ उपाधि नहीं है, अपितु अङ्कुरोत्पादनोपयोगि संतानानन्तः पातित्व ही है । अतः कुसूलस्थताकी समानता होनेपर भी जिस कुसूलस्थ बीजको स्वकार्यक्षण परम्परासे अङ्कुरोत्पत्ति समर्थ बीजक्षण जनन करता है, वह बीजक्षण स्वकार्यजननमें

अनपेक्ष ही रहेगा । फिर इसी तरह तदनन्तरानन्तरवर्ती सभी बीजक्षण अनपेक्ष ही रहेंगे फिर तो कुसूलनिहित बीजोंसे ही किसान कृतकार्य हो जायगा, पुनः दुःख बहुल कृषिकार्य करनेकी उसे क्या आवश्यकता ? क्योंकि जिस बीजक्षणको स्वक्षण परम्परासे अङ्कुर उत्पन्न करता है उसकी क्षण- परम्परा अनपेक्ष कुसूलमें ही अङ्कुरादि सम्पादन कर देगी, जब यह सर्वथा निरपेक्ष है तो उसे देशकालकी अपेक्षा ही क्यों होगी ? इसीलिये यह मानना आवश्यक है कि— अन्त्य मध्य या पूर्व क्षण स्वकार्य- जननमें परस्पर सापेक्ष ही रहते हैं। तदर्थ कारणोंका समवधान (एकत्रीकरण) आवश्यक है। वह प्रेक्षावान् चेतन ही हो सकता है। बौद्ध कहता है कि अविद्यादिके द्वारा ही सघातका आक्षेप होगा। यहाँपर उससे प्रश्न होता है कि आक्षेपका क्या अर्थ है ? उत्पादन या ज्ञापन ! पहला पक्ष ठीक नहीं, क्योंकि कारण स्वयं अनुपपन्न होकर कार्यका उत्पादन नहीं कर सकता किंतु वह स्वसामर्थ्यसे ही कार्यका जनन करता है, अतः दूसरा ही पक्ष कहना पड़ेगा कि कारण सघातका आक्षेप करते हैं अर्थात् ज्ञापन करते हैं। तथा च ज्ञापित सघातका उत्पादक तो अन्य ही होना चाहिये। ज्ञापक ही उत्पादक नहीं होता। यदि वैशेषिकोंके स्थिर पक्षमें स्थिर भोक्ता आत्माके रहनेपर भी अधिष्ठाता चेतनके बिना संघातोत्पादन नहीं हो सकता तो फिर क्षणिकवादमें सघात कैसे बन सकेगा ? भोक्ताका भोग भी कभी सघातका कल्पक हो सकता है, परंतु क्षणिक विज्ञान आदि तो भोक्ता भी नही हो सकते। प्रत्ययोपनिबन्ध-पक्षमें अनेक कारण-उपकार्योपकारक भावसे अवस्थित होकर ही कार्यजनन करेंगे यह बौद्धोंको मानना पड़ेगा। परंतु क्षणिक पक्षमें उपकार्योप- कारकभाव हो ही नहीं सकता। कारण इस पक्षमे कोई स्थिर भाव मान्य नहीं है जो उपकारका आस्पद बने। क्षण इतना सूक्ष्म एव अभेद्य होता है कि क्षणिक-पदार्थमें उपकारकता या उपकार्यता कुछ बन ही नहीं सकती ! यदि कालभेद मानकर उपकार्योपकारकभावका उपपादन किया जाय तो अनेक कालावस्थायी होनेसे फिर वही क्षणभङ्ग भङ्ग होगा। बौद्ध कहते हैं कि यदि प्रत्ययोपनिबन्धन प्रतीत्य समुत्पाद माना जाय तो भले ही अधिष्ठाता चेतनकी अपेक्षा हो, परंतु हेतूपनिबन्धन प्रतीत्य समुत्पादमें तो अधिष्ठाताकी कोई आवश्यकता नहीं है तथा च अविद्यादि ही सघातके निमित्त होगे। हेतुस्वभावमे ही कार्य-सम्पादन कर देंगे। परंतु उनका यह भी कथन विचार सह नहीं है, क्योकि सघातके ही आधारपर सिद्ध होनेवाले अविद्यादि उसी संघातके निमित्त कैसे बन सकेंगे ? इसके अतिरिक्त हेतूपनिबन्ध कार्यमें भी चेतनाधिष्ठित ही अचेतन कारण कार्योत्पादक होता है। यह घटोत्पत्तिके उदाहरणसे कहा जा चुका है।

७२४ मार्क्सवाद और रामराज्य बौद्ध कहता है कि प्रत्ययोपनिबन्ध पक्षमें अस्थिरके भाव सदा संहत ही उत्पन्न होते है, संहत ही नष्ट होते हैं यह नहीं कि वे इतस्ततः बिखरे रहते हैं और किसीके द्वारा संहत किये जाते हैं । इस प्रकार समवघाटकचेतन अधिष्ठाताकी कोई आवश्यकता नहीं है । परंतु उसका यह भी कथन युक्तिसह नहीं है अतः यहाँ भी प्रश्न होता है कि - संघात संतानमें रहनेवाले धर्माधर्मरूपी संस्कार संतान सुख-दुःखको पैदा करते हुए किसी आगन्तुक हेतुकी अपेक्षा करके सुख-दुःख पैदा करेंगे या निरपेक्ष ही । यदि आगन्तुक हेतुकी अपेक्षा बिना किये ही सुख-दुःख पैदा करे तो सदा ही उन्हे सुख-दुःख जनन करना चाहिये; क्योकि जो समर्थ एवं निरपेक्ष है उसके कार्यजननमे विलम्ब क्यो होगा । यदि किसी आगन्तुक हेतुकी अपेक्षा करेगा, तब तो आगन्तुक हेतुका उपस्थापक कोई प्रज्ञावान् चेतन मानना आवश्यक हो जायगा । साथ ही यदि सघातके सदृश ही सघातान्तर उत्पन्न होगे, तो सदा ही मनुष्य-संघात मनुष्य-संघात ही होगा । फिर कर्मानुसार अनेक योनियोंमें जन्म लेनेकी बात खण्डित होगी । यदि विसदृश संघातकी उत्पत्ति मान्य होगी तो क्षणमे हस्ती, क्षणमें अश्व होना चाहिये । इत्यादि दोष अनिवार्य होगे । अविद्यादि उत्पत्तिके निमित्त भी नहीं बन सकते हैं । क्योकि क्षणभङ्गुवादमे उत्तर क्षणके उत्पद्यमान् होनेपर पूर्वक्षण नष्ट हो जाता है । वैशेषिक तो विनाश कारणके सन्निधानसे विनाश मानता है। इसके विपरीत बौद्ध अकारण ही विनाश मानता है । इस स्थितिमें- पूर्वोत्तर क्षणका कार्यभाव कारण कथमपि नहीं बन सकता; क्योकि विरुध्यमान या विरुद्ध पूर्वक्षण स्वयं अभावग्रस्त होगा । अतः वह उत्तर क्षणका हेतु नही हो सकता । कार्योत्पादके प्राक्कालमें कारणकी सत्ता सार्थक होती है। कार्यकालमें कारणकी सत्ताका कोई उपयोग नहीं होता; क्योकि कार्यकालमे तो कार्यनिष्पन्न ही होता है। भावभूत पूर्व क्षण उत्तर क्षण का हेतु हो तब तो क्षणद्वयसम्बन्ध होनेसे क्षणिकता ही न रहेगी । लोकमें कोई भी भाव सत्तावान् होकर पुनः व्यापृत होकर कार्य-सम्पादन करता है। इससे अनेक क्षण सम्बन्ध होनेसे स्थिरता ही सिद्ध होती है। बौद्ध कहता है कि - भाव ही उसका व्यापार है, जैसा कि कहा है कि :- 'भूतिर्येषां क्रिया सैव कारकं सैष चोच्यते।' अर्थात् पदार्थोंकी जो उत्पत्ति होती है वही उनकी क्रिया, कारक तथा कारण है । परंतु पदार्थोंमें इस प्रकारकी व्यापारवत्ता भले ही बन जाय तथापि वह कारण नहीं हो सकता; क्योकि लोकमे देखा जाता है कि मृत्तिकाकार्य घटादि मृत्तिकासे एवं सुवर्णका कार्य कटक-कुण्डलादि सुवर्णसे समन्वित होते हैं। यदि कार्यके समय

मार्क्स और आत्मा ७२५ कारण न रहे तो कार्यमे मृत्तिका सुवर्णादिकी प्रतीति कैसे बन सकती है ? यदि कार्य-क्षणमे कारणकी सत्ता मानी जाती है तो भी क्षणिकत्वकी हानि होगी । बौद्ध कहते है कि कार्यमें कारणका तादात्म्य नही होता किंतु सादृश्य होता है, परंतु कार्यमें जब कारणके किसी रूपका अनुगम हो तभी सादृश्य भी हो सकता है । यदि किसी अनुगमका रूप मान लिया जाय तब तो वही अनुगत रूप ही कारण है फिर तो उसके साथ कार्यका तादात्म्य ( अभेद ) मानना ही ठीक है। ऐसी स्थितिमें भी क्षणिकत्वकी हानि अपरिहार्य ही है । यदि हेतुस्वभावका कार्यमें अनुगमन होनेपर भी कार्यकारणभाव स्वीकार किया जायगा, तब सर्वत्र कार्यकारणभाव ही प्रसक्त रहेगा फिर तन्तु-घटका भी कार्यकारणभाव मानना पड़ेगा । बौद्धोके सिद्धान्तमे 'तद्भावे तद्भावः' आदि अन्वय-व्यतिरेकद्वारा कार्य-कारण भावका नियम माना जाता है तथा च तन्तु-घटका कार्य कारणभाव नही होगा, क्योकि उनको अन्वय-व्यतिरेक नही है। किंतु यह भी ठीक नहीं, क्योंकि अन्वय- व्यतिरेक ग्रह एकक्षणमे नहीं हो सकता, उसके लिये वस्तुको अनेक क्षणस्थायी मानना पड़ेगा । यदि कार्य-कारण सतानो या सामान्योका कार्य-कारणभाव माने और उन सतानोको स्थायी माने तो यह भी ठीक नही। कारण-व्यक्तियोमें ही कार्य-कारणभाव होता है, सतानो या सामान्योमें नही । यदि उनमें भी कार्यकारणभाव माना जाय और उन कारणभूत सतानो या सामान्योको स्थायी माना जाय तो भी क्षणिकत्वकी हानि हुई ही । बौद्धोसे यह भी प्रश्न होता है कि उत्पाद और विनाश वस्तुस्वरूप ही है या वस्तुके अवान्तर अथवा वस्तुसे भिन्न वस्त्वन्तर हैं ? यदि वस्तुके स्वरूप ही हैं तो वस्तु और उत्पाद-विनाश परस्पर पर्याय हो जायँगे । यह लोकविरुद्ध हैं । उत्पाद-विनाश और वस्तुको कोई पर्यायवाची नहीं मानता । यदि कोई विशेषता वस्तुकी अपेक्षा उत्पादनिरोधमें है, तब तो कहना पड़ेगा कि मध्यवर्त्ति वस्तुकी उत्पाद और निरोध-आदिम एव अन्तिम अवस्था है । तब फिर आद्य मध्य तथा अन्त्यक्षण सम्बन्धी होनेके कारण वस्तुमे स्थिरता हो जायगी फिर क्षणिकत्व समाप्त हो जायगा । यदि उत्पाद-निरोध—अश्वमहिषके तुल्य वस्तुसे अत्यन्त भिन्न माने जायँ तो वस्तुके उत्पाद-विनाशसे रहित होनेके कारण उसको शाश्वतता सिद्ध हो जायगी । यदि वस्तुका दर्शन उत्पाद एव वस्तुका अदर्शन विरोध माना जाय तो भी दर्शना- दर्शन तो पुरुषके धर्म होंगे, वस्तुधर्म नहीं, इस प्रकार भी वस्तु तो शाश्वत ही ठहरेगी, इस प्रकार विवेचन करनेपर क्षणिकत्ववादमे अविद्यादि हेतूनिबन्धनदृष्टिसे भी उत्पत्ति निमित्त नही हो सकते ।

७२६ मार्क्सवाद और रामराज्य यदि बिना हेतुके ही कार्योत्पत्ति मानी जाय तो बौद्धकी प्रतिज्ञा-हानि होगी; क्योंकि— 'चतुर्विधान् हेतून् प्रतीत्यचित्तचैत्ता उत्पद्यन्ते' अर्थात् चतुर्विध हेतुओंको प्राप्त करके चित्त-चैत्त उत्पन्न होते हैं। नीलाभास चित्तमे नीलालम्बन-प्रत्ययसे नीला कारता समनन्तर-प्रत्ययरूप पूर्व विज्ञानसे बोधरूपता, चक्षुरूप अधिपतिप्रत्ययसे रूप- ग्रहणका नियम और आलोकरूप सहकारी प्रत्ययसे स्पष्टार्थता होती है। चित्त-चैत्तोंकी उत्पत्तिमें इस प्रकार चतुर्विध हेतुओकी प्राप्ति मानी जाती है। सुखादि चैत्तोंमें भी इसी प्रकारका कार्यकारणभाव माना जाना चाहिये । परंतु वहाँ विज्ञानसे अतिरिक्त दूसरे अन्य तीन कारणोंकी सिद्धि नही होती । यदि निर्हेतुक उत्पत्ति मानी जायगी तब तो कोई प्रतिबन्ध न होनेके कारण सभी वस्तु सर्वत्र उत्पन्न होती रहेगी। बौद्ध यह भी कहते हैं कि उत्तरक्षणकी उत्पत्तितक पूर्वक्षण अवस्थित रहता है। पर ऐसा माननेसे हेतुफल दोनोका यौगपद्य (समकालत्व) होगा । उत्पत्ति उत्पद्यमानसे अभिन्न होती है तथा च एक क्षण दूसरे क्षणतक रह गया फिर तो क्षणिक कैसे ? ऐसी स्थितिमें सभी पदार्थ संस्कृत एवं क्षणिक हैं यह बौद्धोकी प्रतिज्ञा भंग हो जायगी। बौद्ध यह भी कहते हैं कि प्रतिसंख्यानिरोध, अप्रतिसंख्यानिरोध और आकाश इन तीनोसे अन्य जो कुछ भी है वह सब बुद्धि बौद्ध है, संस्कृत है, क्षणिक है। यह तीनो अवस्तु स्वभाव (निरुपाख्य) है। बुद्धिपूर्वक भावोका विनाश प्रतिसंख्या-निरोध तद्विपरीत अप्रतिसंख्यानिरोध होता है। एवं आवरण- भावमात्र आकाश है। आकाशपर विचार आगे किया जायगा । ये दोनो निरोध सर्वथा असम्भव हैं। यहाँ प्रश्न उठता है कि ये दोनो निरोध संतानके होगे या भावरूप संतानीके ? पहला पक्ष ठीक नहीं। कारण, सभी संतानोंमें संतानियोका अविच्छिन्न कार्यकारणभाव विद्यमान ही है फिर संतानविच्छेद कैसे होगा ? दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं; क्योकि किसी भी भावोका निरन्वय नाश नही होता, सभी अवस्थाओमें प्रत्यभिज्ञाबलसे अन्वयीकारणका अविच्छेद ही रहता है। घट, कपाल, कपालिका, चूर्ण, रज आदि सर्वत्र मूल कारण मृत्तिका अन्वित ही रहती है। जहाँ अन्वयीकी पहचान नही होती वहाँ भी अन्यत्रकी तरह अनुमान किया जा सकता है। अतः दोनो ही निरोध असम्भव है। अभिप्राय यह है कि भावप्रतीपा 'बाधिका' बुद्धि प्रतिसंख्या कहलाती है, उसके द्वारा निरोध ही प्रतिसंख्यानिरोध है। सत्को असत् बनानेकी बुद्धि ही भावप्रतीप बुद्धि है। तत्कृतनिरोध प्रतिसंख्यानिरोध है। उससे भिन्न निरोधको अप्रति- संख्यानिरोध कहते हैं। परंतु यहाँ विचार यह करना है कि यह निरोधसंतानका होगा या संतानीक्षणका । संताननिरोध तो हो नहीं सकता, क्योंकि हेतुफलभावसे व्यवस्थित

सतानी ही उपक्रम्य धर्मवाले होते हैं संतान नहीं अतः उसका निरोध असम्भव है। अन्तिम सतानीके निरोधसे ही संताननिरोध हो सकता है । पर क्या वह अन्तिम सतानी किसी कार्यका आरम्भ करता है या नहीं । यदि आरम्भ करता है तो उसमें है । अन्तिमत्व ही कहाँ रहा ? तथा च संतान विच्छेद भी नहीं हुआ, यदि वह कार्यका आरम्भक नहीं होता तब वह अन्त्य तो हो सकता है, परंतु वह तो अर्थ- क्रियाकारितारहित होनेसे असत् ही ठहरेगा । अर्थ क्रियाकारिता ही बौद्धोकी सत्ता है । इस तरह जब कार्यानारम्भक अन्त्यक्षण अर्थक्रियाशून्य होनेसे असत् है तब उसका जनक भी असत्का जनक होनेसे असत् ही होगा । इसी क्रमसे सभी संतानी और संतान असत् ही ठहरेंगे, ऐसी स्थितिमें प्रति संख्यासे किसका विनाश होगा ? बौद्ध कहते हैं कि सजातीय संतानियोका कार्यकारण-भाव ही संतान है, केवल कार्यकारण-भाव ही सन्तान नहीं तथाच विशुद्ध जातीयक्षण (यहाँ क्षण शब्दका क्षणवर्ती पदार्थरूप अर्थ विवक्षित है) की उत्पत्ति होनेपर सजातीय हेतुक्षणभाव की निवृत्ति हो जाती है । इस तरह सजातीय कार्यानारम्भक होनेसे संतानका अन्तिम क्षण अन्त्य भी है। विशुद्ध विजातीय क्षणका आरम्भक होने तथा अर्थक्रियाशून्य न होनेसे असत् भी नहीं हुआ । परंतु यह ठीक नहीं है, क्योकि इस तरह तो रूपविज्ञानके प्रवाहमे रसादिविज्ञानकी उत्पत्तिसे भी संतानोच्छेद समझा जायगा । कारण कि यहाँ भी विजातीय क्षणका आरम्भ हुआ है । यदि कहा जाय कि रूपविज्ञान रसविज्ञानका सजातीय ही है तो विजातीयोंमें भी कुछ-कुछ सादृश्य रहता ही है । अन्ततः सत्तारूपसे तो साजात्य रहेगा ही जिससे कहीं भी संतानोच्छेद सम्भव नही । सतानी ज्ञानोंका सादृश्यतुल्य जातीय विषयत्व ही है । विषयोकी तुल्यजातीयता क्या रूपत्व आदि अपरजातिसे माना जाय ? या सत्ता सामान्यरूप परजातिसे माना जाय ? पहली बात ठीक नहीं, क्योकि संतानके अनुवर्तमान रहनेपर भी रूपज्ञान संतानके विरत होनेके पश्चात् रसज्ञान उदित होगा, इसके बाद संतानोच्छेदका प्रसङ्ग होगा । यदि परजातिसे विषयोकी तुल्यजातीयता माने तो सोपप्लव संतानके उपरम होने तथा विशुद्ध संतानोदयमें भी संतानोच्छेद नही होगा, क्योकि परजातीयसत्ता मात्रको लेकर सोपप्लव ज्ञान सन्तान और विशुद्ध ज्ञान सन्तानमें सादृश्य है ही । यदि कहा जाय कि विषय विशेषोपरागकृतसादृश्य नही विवक्षित है, अतः रूपज्ञानप्रवाहमें रसज्ञान उत्पत्ति मात्रसे संतानोच्छेदप्रसङ्ग न होगा सत्तासामान्यकृतसादृश्य भी नहीं विवक्षित है, अतः सोपप्लव चित्तसंतान उपरम होनेपर मुक्तिदशामे निरुपप्लव चित्तसंतानके उदय होनेपर पूर्वसंतानोच्छेदका भी प्रसङ्ग न होगा । किंतु यहाँ विषयोपप्लवकृत-

७२८ मार्क्सवाद और रामराज्य -सादृश्य ही विवक्षित है, तथाच निरुपप्लवज्ञान संतानोदय होनेपर सजातीय कार्य -कारणभावरूप सतानावाच्छिन्न हो जाता है। फिर भी निरन्वय नाश कही भी सम्भव नहीं है, यह दोष यहाँ भी है ही। क्षणिकवादमे पदार्थ उत्पन्न होते ही नष्ट हो जाता है फिर उसका प्रतिसंख्या निरोध क्या होगा ? उसमें पुरुष-प्रयत्नकी तो अपेक्षा ही नहीं है। पहले तो उत्पन्न होते ही सर्वपदार्थ ज्ञात नहीं हो जाते हैं। कितने ही पदार्थ तो जीवनभर अज्ञात ही रहते हैं। कितने ही अबतक भी जाने नही जा सके हैं। अस्तु, उत्पन्न पदार्थका ज्ञान, फिर उसको नष्ट करनेकी बुद्धि, फिर इच्छा, फिर कृत्तिद्वारा विनाश आदि करनेमे अनेक क्षण आवश्यक होते हैं। तबतक क्षणिक पदार्थ नष्ट ही हो जायगा पुनः प्रतिसख्या प्रतिरोध कैसे होगा । साथ ही निरन्वय -नाश नही होता है। अवश्य ही उसमे कारणांश अन्वित रहता है। अतः निरुपाख्या निरोध नही हो सकता । नष्ट पदार्थ भी अन्वयीरूपसे उपाख्येय ही होता है। जो अन्वयीरूप होता है, उसका ही परमार्थ सद्भाव होता है। अवस्थाविशेष ही उत्पन्न- विनष्ट होनेवाली होती है। अवस्थाएँ सभी अनिर्वचनीय हैं; उनका स्वतः परमार्थ- सत्त्व ही नहीं होता। अन्वयीरूप ही उनका तत्त्व है, क्योकि वही सर्वत्र प्रत्यभिज्ञात होता है और उसका विनाश नही होता। इस तरह अवस्थाओके भी तत्त्वका अविनाश होनेसे अवस्थाओका निरन्वय नाश नही होता; क्योकि उनके तत्त्व अन्वयीका सर्वत्र ही अविच्छेद है। घट, कपाल, चूर्ण, रज, सबमे मृत्तिका ही अन्वयी है। कहा जा सकता है कि 'मृत्पिण्डः, मृद्घटः, मृत्कपालः' आदिरूप पिण्डघटादि मृत्तिकाका अन्वय दृष्ट होता है, अतः घटादिमें मृत्तिकाका अन्वय भले ही माना जाय; किंतु तप्तपाषाणतलपर निपतित होकर नष्ट होनेवाले जलबिन्दु का तो कोई भी अन्वयीरूप उपलब्ध नहीं

बौद्ध अविद्यादिनिरोधको प्रतिसंख्यानिरोध मानते हैं, इस सम्बन्धमें प्रश्न होता है कि यह निरोध साधनसहित सम्यग्ज्ञानसे होता है या स्वतः। यदि प्रथम पक्ष मान्य है तो निर्हेतुक विनाश स्वीकारका सिद्धान्त खण्डित हो जाता है। यदि निरोध स्वतः माने तो क्षणिक नैरात्म्यादि भावनादिरूप मार्गोपदेश, धर्मदर्शनादि प्रवर्तन, साधनाभ्यासादि व्यर्थ ही होंगे। इसी तरह आकाशको भी निरुपाख्य नहीं कहा जा सकता। वेदादिशास्त्रोंसे आकाशकी उत्पत्ति और वस्तुत्व ज्ञात होता है। शब्दगुणके द्वारा उसका अनुमान भी हो सकता है। जैसे गन्धादिगुण पृथिवी आदिके आश्रित रहते हैं वैसे ही शब्द आकाशके। 'शब्द गुण है जातिमान् होकर स्पर्शरहित होकर बाह्य एक इन्द्रियसे ग्राह्य होनेके कारण गन्धके समान' इस अनुमानके आधारपर सिद्ध होता है कि शब्द गुण है। सामान्यविशेषतया समवायमे शब्दका अन्तर्भाव नही है, क्योकि वे जातिहीन होते हैं। किंतु शब्दके शब्दत्व जाति होनेसे वह जातिमान् है। हेतुका वायुमे व्यभिचार नहीं है। वायु स्पर्शवान् है और यह स्पर्शरहित है। हेतुका दिक्काल आदिसे व्यभिचार नही है, क्योकि वह इन्द्रियग्राह्य नहीं है। इन्द्रियग्राह्य द्रव्यमें व्यभिचार नहीं है क्योकि हेतुमें एकेन्द्रियग्राह्यत्व विशेषण है, ऐसा हेतु शब्दमे ही है। इन्द्रियग्राह्य द्रव्यमें नहीं, गन्धत्वजातिमे भी व्यभिचार नही है, यतः यह जातिमान् है और गन्धत्वादि जातिहीन है। गुणत्वसिद्धिके बाद यह भी विचार ठीक है कि शब्द किस द्रव्यका गुण है। वह आत्माका गुण नहीं हो सकता। कारण बाह्येन्द्रिय ग्राह्य है। आत्मगुण इच्छादि बाह्येन्द्रिय ग्राह्य नहीं होते। वह मनका भी गुण नही है, क्योकि मनके भी गुण प्रत्यक्ष नहीं होते। यद्यपि वेदान्तमतमें सुखादि मनके ही गुण होते हैं तथापि वे साक्षिग्राह्य हैं इन्द्रियग्राह्य नहीं। शब्द पृथिव्यादिका भी गुण नहीं है। क्योंकि गन्धादिके साथ शब्दका नियत साहचर्य उपलब्ध नहीं होता। गन्धादिके समान असाधारण इन्द्रियग्राह्य शब्दगुण जिस द्रव्यके आश्रित है वह पञ्चमभूत आकाश ही मान्य होना चाहिये। बौद्ध कहते हैं कि आवरणाभाव आकाश है। परंतु उनका यह कथन ठीक नहीं। एक पक्षीके भी उड़ते समय आवरण हो ही जायगा फिर उड़नेकी इच्छा रखने- वाले दूसरे पक्षीको अवकाश नहीं होना चाहिये। यदि कहा जाय कि जहाँ आवरण नहीं होगा वहाँ दूसरा पक्षी उड़ेगा ? तो यह भी ठीक नहीं, यतः आवरणाभावको जिससे विशेषित किया जायगा वह वस्तुभूत ही रहेगा। अतः आवरणाभावमात्र आवश्यक नहीं। सार यह है कि निषेध्यके निषेधाधिकरणका निरूपण किये बिना निषेधका

७३० मार्क्सवाद और रामराज्य निरूपण हो ही नहीं सकता। इसलिये आवरणाभावाधिकरण वस्तु ही आकाश है। साथ ही आकाश वस्तु नहीं है, यह सिद्धान्त बौद्धके स्वसिद्धान्तके विरुद्ध है। 'पृथिवी भगव. किं संन्निःश्रया' वे इस प्रकारके प्रश्न प्रतिवचन प्रवाहमें 'वायुः किं संन्नि.श्रय.' इस प्रश्नके उत्तरमे कहा गया है 'वायुराकाशसन्निश्रयः।' अर्थात् वायुका क्या आश्रय है इस प्रश्नके उत्तरमे कहा गया है कि वायुका आकाश आश्रय है। इस प्रकार आकाशको अवस्तु मानना अभ्युपगमविरुद्ध होगा। इसके साथ ही बौद्ध कहते हैं (अपि च निरोधद्वयमाकाशं च त्रयमप्येत- न्निरुपाख्यमवस्तु नित्यं च) अर्थात् दोनो निरोध और आकाश यह तीनो निरुपाख्य अवस्तु एवं नित्य है। यह बात परस्परविरुद्ध है। जो अवस्तु है उसमे नित्यता या अनित्यता कुछ भी नही हो सकती। नित्यत्वादि धर्म वस्तुके आश्रित होते हैं। जहाँ धर्म-धर्मिभाव होता है, वहाँ निरुपाख्यता हो ही नही सकती। बौद्ध सब वस्तुको क्षणिक मानता हुआ उपलब्धाको भी क्षणिक ही मानता है। परंतु यदि उपलब्धा भी क्षणिक हो तो अनुभवसे उत्पन्न होनेवाली स्मृति कैसे बन सकेगी; क्योकि वह तो तभी बन सकती है जब कि उपलब्धि और स्मृतिका कर्ता एक ही हो। अतएव पुरुषान्तरसे अनुभूत विषयमें पुरुषान्तरको स्मृति नहीं होती है। अनुभव करनेवालेको ही अनुभूतकी स्मृति होती है। जबतक पूर्वोत्तरदर्शी एक आधार न हो तबतक 'मैंने उसको देखा, अब इसे देख रहा हूँ, यह व्यवहार नहीं बन सकता। कथञ्चित् समान-सततिमें कार्य- कारणभावसे स्मृति बन भी जाय तो भी यह प्रत्यभिज्ञा तो उपलब्धाके अस्थिर होनेपर बन ही नहीं सकती। दर्शन-स्मरणके एक कर्ता होनेपर ही प्रत्यभिज्ञा-प्रत्यय होता है 'उसे देखा, इसे देख रहा हूँ, यदि यहाँ दर्शन-स्मरणका कर्ता भिन्न-भिन्न हो तो 'देखा अन्यने और स्मरण मै कर रहा हूँ' ऐसा प्रत्यय होना चाहिये, परंतु ऐसा अनुभव किसीको भी नही होता। जहाँ ऐसा प्रत्यय होता है वहाँ कर्ता अवश्य ही भिन्न-भिन्न होते हैं। मै स्मरण कर रहा हूँ, अमुकने देखा है'। 'अहं स्मरामि, असावद्राक्षीत्।' बौद्ध भी दर्शन स्मरणका एक ही कर्ता समझता है। परंतु जैसे अग्निको अनुष्ण और अप्रकाश नही कहा जा सकता, उसी प्रकार दर्शन-स्मरण-कर्ता आत्मा- को भिन्न नहीं कहा जा सकता। जब उपलब्धामें, भिन्नकारणके दर्शन-स्मरणका सम्बन्ध हुआ तो सुतरा क्षणिकत्वकी हानि अपरिहार्य हो जाती है। जन्मसे मरणतककी उत्तरोत्तर प्रतिपत्तियोंकी एककर्तृकता देखता हुआ भी वैनाशिक आत्माको किस प्रकार क्षणिक कह सकता है ? यदि कहा जाय कि सादृश्यके कारण उपलब्धामें एकताकी प्रतीति होती है, तो यह भी ठीक नहीं, कारण 'तेनेदं सदृशम्', 'उसके यह तुल्य है' इस प्रकारकी

सादृश्यबुद्धि तभी हो सकती है जब भिन्नकालवर्ती दो वस्तुका ग्राहक एक हो, यदि पूर्वोत्तर क्षण और सादृश्यका ग्राहक एक स्थिर आत्मा है तो एककी अनेक- क्षणवर्तिता सिद्ध हो गयी फिर क्षणिकत्व-प्रतिज्ञा भङ्ग ही हो गयी । बौद्ध कहता है कि ‘तेनेदं सदृशम्’ यह स्वतन्त्र ही एक विकल्प-प्रत्यय है । विकल्प स्वाकारको ही बाह्यरूपसे निश्चित करता है, वह तत्त्वतः पूर्वोत्तरक्षण तथा उसके सादृश्यका ग्रहण नहीं करता । अतः पूर्वोत्तरक्षणग्रहणनिमित्तक ‘तेनेदं सदृशम्’ यह प्रत्यय नहीं है । इस प्रत्ययसे स्थिर आत्मा नहीं सिद्ध होता, परन्तु यह ठीक नहीं; क्योंकि ‘तेन, इदं’ इन दोनों पदोंका उपादान होनेके कारण इसे पूर्वोत्तर क्षणग्रहणनिरपेक्ष प्रत्यय नहीं कहा जा सकता । सादृश्य-ज्ञान स्वतन्त्र-ज्ञान होता तो ‘सदृशम्’ इस ढंगसे उल्लेख होना चाहिये था । ‘तेन इदं सदृशम्’ इस प्रकारका उल्लेख तथा वाक्यका प्रयोग नहीं होना चाहिये । यदि बौद्ध नानापदार्थ सम्पृक्त वाक्यार्थबोधक ‘तेनेदं सदृशम्’ इस विकल्पकी प्रथा या प्रतीति मानता है, तो फिर कैसे कह सकता है कि उसमें ‘तेनेदं सदृशम्’ ये नाना पदार्थ नहीं भासित होते हैं । ऐसा कहना तो अपने संवेदनके ही विरुद्ध है । इसके सिवा यदि उसके यह सदृश है, यह एक विकल्प ज्ञान हो तो इसमें ‘तेन इदम्’ इत्यादि नाना आकार नहीं हो सकते थे । क्योंकि एकका नानात्व व्याहत होता है । जब ज्ञानसे अतिरिक्त आकार नहीं है तो आकार नानात्व-ज्ञान नानात्व ही ठहरेगा । यह भी नहीं कहा जा सकता कि जितने आकार हैं उतने ही ज्ञान हैं, क्योंकि तब तो प्रत्येक आकारमें ज्ञानकी समाप्ति होगी और वे सभी परस्पर वार्तान- भिज्ञ होंगे, फिर ‘नाना’ यह व्यवहार भी न होगा, क्योंकि जब एक ज्ञानसे नाना पदार्थोंकी प्रतीति होती है, तभी नाना यह उल्लेख होता है । इसीलिये ज्ञानसे भिन्न अर्थ मानना चाहिये । तथा च ‘तेन इदं’ इत्यादि नाना आकारवाले ज्ञानकी उपपत्ति स्थायी एक आत्मा माननेसे ही सम्भव है । बौद्ध कहता है कि ज्ञानमें अर्थाकार कल्पित है, अर्थ बाह्य नहीं है और प्रतीतिमात्र भी नहीं है, तथा च उसी कल्पित आकारभेदसे व्यवहार भी उपपन्न होगा । पर यहाँ यह प्रश्न होगा कि वह कल्पित अर्थ ज्ञानसे अभिन्न हैं या भिन्न । तीसरा पक्ष अनिर्वाच्यताका है वह बौद्धको मान्य ही नहीं । यदि भिन्न है तो जैसे ज्ञानसे भिन्न दूसरा ज्ञान अकल्पित होता है, वैसे ही ज्ञानसे भिन्न अर्थाकार भी अकल्पित ही होगा । यदि आकारोंका ज्ञानसे अभेद माना जाय तो उसके समान ही ( ‘तेन इदम्’ इत्यादि पदार्थोंका भी परस्पर अभेद ही हो जायगा । क्योंकि ज्ञानसे अभिन्न सभी आकारोंका परस्पर भी अभेद ही होना है, तथा च इतरेतररूपने प्रसिद्ध पदार्थोंका और ज्ञानसे ज्ञेयके प्रसिद्ध भेदका भी अपलाप हो जायगा । यदि लोकप्रसिद्ध पदार्थोंको परीक्षक स्वीकार न करेंगे तो स्वपक्ष साधन परपक्ष-दूषणके

७३२ मार्क्सवाद और रामराज्य निरूपण करनेपर भी वे किसीकी बुद्धिमें आरूढ़ न होंगे। अतः जो लोकसिद्ध हो वही कहना चाहिये। अन्यथा कथन अनर्गल प्रलाप ही समझा जायगा। एक ही अधिकरणमें परस्पर विरुद्ध दो प्रकारके धर्मोंका अभ्युपगम करनेसे ही विवाद होता है। तभी कोई स्वपक्षका साधन तथा अन्य पक्षको दूषित करता है। यदि विकल्पोंके विषय लोकप्रसिद्ध बाह्य पदार्थ न हो तो यह सब नहीं बन सकता। यदि विकल्पमें भासित होनेवाले नित्यत्व-अनित्यत्वादि ज्ञानाकार ही हैं और ज्ञान भी 'इदं नित्यम्, इदमनित्यम्' इस प्रकारसे दो हैं तो एक आश्रय न होनेसे विवाद ही न उठेगा। आत्मा नित्य है और बुद्धि अनित्य, इस तरह कहनेवालोंमें कभी कोई विवाद ही नही होता। यदि कोई अनित्य शब्दका लोकप्रसिद्ध अर्थ छोड़कर विभु अर्थ माने विभुत्व अर्थमें ही अनित्य शब्दका प्रयोग आत्मामें करे और अन्य कोई लौकिकार्थ नित्यशब्दका आत्मामें प्रयोग करे तो उनका आपसमें विवाद नही हो सकता है। अतः जिसे परपक्ष खण्डन एवं स्वपक्षकी स्थापना करनी है उसे विकल्पोंका लोकप्रसिद्ध अर्थ एव बाह्य आलम्बन मानना चाहिये। यह प्रासङ्गिक विज्ञानवाद खण्डन आ गया है परन्तु वैभाषिक तथा सौत्रान्तिक बाह्यार्थ मानते हैं। उनके अनुसार यद्यपि बाह्यार्थ क्षणिक एवं निर्विकल्पज्ञानमें भासित होता है, सविकल्पक प्रत्यय तो विकल्परूप है। वही सादृश्यादिरूपसे भासित होता है, अतः बाह्यार्थवादमें विप्रतिपत्ति आदि व्यवहार बन जायगा। तथा च विकल्पोंके विषय ग्राह्य एव अवसेयरूपसे दो प्रकारके होते हैं। ज्ञानका स्वाकार तो ग्राह्य होता है और बाह्यविषय अवसेय होते हैं। उसी अवसेयरूप विषयको लेकर पक्ष-प्रतिपक्ष- परिग्रह आदि सम्पन्न हो जायँगे। तथापि यह पक्ष भी ठीक नहीं है ? क्योकि यहाँ भी विचारणीय यह है कि विकल्प विषयकी अवसेयता क्या है। यदि ग्राह्यता ही है तो विषयकी द्विविधता नहीं हुई। यदि वह अन्य है तो क्या है ? यदि कहा जाय कि ज्ञानमें उसका स्वाकार ही प्रतिभासित होता है तथापि उसी बाह्यार्थरहित भासमान ज्ञानमें बाह्यार्थ अध्यवसायसे बाह्यार्थ घटादिमें प्रवृत्ति होती है, अतः भासमान ज्ञानमें बाह्यार्थका आरोप ही विषयकी अवसेयता है, तो यह भी ठीक नहीं, क्योकि यहाँ भी विचारणीय है कि विकल्पाकारका अर्थाध्यवसाय क्या है अर्थात् आन्तर अनभिधेय ज्ञानाकारका तद्विपरीत बाह्याकाररूपसे अध्य- वसाय क्या है ? तद्रूपसे निष्पादन है या सम्बन्ध या उसके आकारसे आरोपण। पहला पक्ष ठीक नहीं, क्योकि अन्यका अन्यरूपसे निष्पादन असम्भव है। हजारो शिल्पी भी मिलकर घटको पट नहीं बना सकते, फिर आन्तर ज्ञानाकारका बाह्य- रूपमें सम्पादन कैसे होगा। निष्पादनके समान ही आन्तर- का बाह्यसे सम्बन्ध या संयोजन भी नहीं हो सकता। यदि ऐसा हो भी तो बाह्य अर्थ