भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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७२८ मार्क्सवाद और रामराज्य -सादृश्य ही विवक्षित है, तथाच निरुपप्लवज्ञान संतानोदय होनेपर सजातीय कार्य -कारणभावरूप सतानावाच्छिन्न हो जाता है। फिर भी निरन्वय नाश कही भी सम्भव नहीं है, यह दोष यहाँ भी है ही। क्षणिकवादमे पदार्थ उत्पन्न होते ही नष्ट हो जाता है फिर उसका प्रतिसंख्या निरोध क्या होगा ? उसमें पुरुष-प्रयत्नकी तो अपेक्षा ही नहीं है। पहले तो उत्पन्न होते ही सर्वपदार्थ ज्ञात नहीं हो जाते हैं। कितने ही पदार्थ तो जीवनभर अज्ञात ही रहते हैं। कितने ही अबतक भी जाने नही जा सके हैं। अस्तु, उत्पन्न पदार्थका ज्ञान, फिर उसको नष्ट करनेकी बुद्धि, फिर इच्छा, फिर कृत्तिद्वारा विनाश आदि करनेमे अनेक क्षण आवश्यक होते हैं। तबतक क्षणिक पदार्थ नष्ट ही हो जायगा पुनः प्रतिसख्या प्रतिरोध कैसे होगा । साथ ही निरन्वय -नाश नही होता है। अवश्य ही उसमे कारणांश अन्वित रहता है। अतः निरुपाख्या निरोध नही हो सकता । नष्ट पदार्थ भी अन्वयीरूपसे उपाख्येय ही होता है। जो अन्वयीरूप होता है, उसका ही परमार्थ सद्भाव होता है। अवस्थाविशेष ही उत्पन्न- विनष्ट होनेवाली होती है। अवस्थाएँ सभी अनिर्वचनीय हैं; उनका स्वतः परमार्थ- सत्त्व ही नहीं होता। अन्वयीरूप ही उनका तत्त्व है, क्योकि वही सर्वत्र प्रत्यभिज्ञात होता है और उसका विनाश नही होता। इस तरह अवस्थाओके भी तत्त्वका अविनाश होनेसे अवस्थाओका निरन्वय नाश नही होता; क्योकि उनके तत्त्व अन्वयीका सर्वत्र ही अविच्छेद है। घट, कपाल, चूर्ण, रज, सबमे मृत्तिका ही अन्वयी है। कहा जा सकता है कि 'मृत्पिण्डः, मृद्घटः, मृत्कपालः' आदिरूप पिण्डघटादि मृत्तिकाका अन्वय दृष्ट होता है, अतः घटादिमें मृत्तिकाका अन्वय भले ही माना जाय; किंतु तप्तपाषाणतलपर निपतित होकर नष्ट होनेवाले जलबिन्दु का तो कोई भी अन्वयीरूप उपलब्ध नहीं

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