मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसतानी ही उपक्रम्य धर्मवाले होते हैं संतान नहीं अतः उसका निरोध असम्भव है। अन्तिम सतानीके निरोधसे ही संताननिरोध हो सकता है । पर क्या वह अन्तिम सतानी किसी कार्यका आरम्भ करता है या नहीं । यदि आरम्भ करता है तो उसमें है । अन्तिमत्व ही कहाँ रहा ? तथा च संतान विच्छेद भी नहीं हुआ, यदि वह कार्यका आरम्भक नहीं होता तब वह अन्त्य तो हो सकता है, परंतु वह तो अर्थ- क्रियाकारितारहित होनेसे असत् ही ठहरेगा । अर्थ क्रियाकारिता ही बौद्धोकी सत्ता है । इस तरह जब कार्यानारम्भक अन्त्यक्षण अर्थक्रियाशून्य होनेसे असत् है तब उसका जनक भी असत्का जनक होनेसे असत् ही होगा । इसी क्रमसे सभी संतानी और संतान असत् ही ठहरेंगे, ऐसी स्थितिमें प्रति संख्यासे किसका विनाश होगा ? बौद्ध कहते हैं कि सजातीय संतानियोका कार्यकारण-भाव ही संतान है, केवल कार्यकारण-भाव ही सन्तान नहीं तथाच विशुद्ध जातीयक्षण (यहाँ क्षण शब्दका क्षणवर्ती पदार्थरूप अर्थ विवक्षित है) की उत्पत्ति होनेपर सजातीय हेतुक्षणभाव की निवृत्ति हो जाती है । इस तरह सजातीय कार्यानारम्भक होनेसे संतानका अन्तिम क्षण अन्त्य भी है। विशुद्ध विजातीय क्षणका आरम्भक होने तथा अर्थक्रियाशून्य न होनेसे असत् भी नहीं हुआ । परंतु यह ठीक नहीं है, क्योकि इस तरह तो रूपविज्ञानके प्रवाहमे रसादिविज्ञानकी उत्पत्तिसे भी संतानोच्छेद समझा जायगा । कारण कि यहाँ भी विजातीय क्षणका आरम्भ हुआ है । यदि कहा जाय कि रूपविज्ञान रसविज्ञानका सजातीय ही है तो विजातीयोंमें भी कुछ-कुछ सादृश्य रहता ही है । अन्ततः सत्तारूपसे तो साजात्य रहेगा ही जिससे कहीं भी संतानोच्छेद सम्भव नही । सतानी ज्ञानोंका सादृश्यतुल्य जातीय विषयत्व ही है । विषयोकी तुल्यजातीयता क्या रूपत्व आदि अपरजातिसे माना जाय ? या सत्ता सामान्यरूप परजातिसे माना जाय ? पहली बात ठीक नहीं, क्योकि संतानके अनुवर्तमान रहनेपर भी रूपज्ञान संतानके विरत होनेके पश्चात् रसज्ञान उदित होगा, इसके बाद संतानोच्छेदका प्रसङ्ग होगा । यदि परजातिसे विषयोकी तुल्यजातीयता माने तो सोपप्लव संतानके उपरम होने तथा विशुद्ध संतानोदयमें भी संतानोच्छेद नही होगा, क्योकि परजातीयसत्ता मात्रको लेकर सोपप्लव ज्ञान सन्तान और विशुद्ध ज्ञान सन्तानमें सादृश्य है ही । यदि कहा जाय कि विषय विशेषोपरागकृतसादृश्य नही विवक्षित है, अतः रूपज्ञानप्रवाहमें रसज्ञान उत्पत्ति मात्रसे संतानोच्छेदप्रसङ्ग न होगा सत्तासामान्यकृतसादृश्य भी नहीं विवक्षित है, अतः सोपप्लव चित्तसंतान उपरम होनेपर मुक्तिदशामे निरुपप्लव चित्तसंतानके उदय होनेपर पूर्वसंतानोच्छेदका भी प्रसङ्ग न होगा । किंतु यहाँ विषयोपप्लवकृत-