भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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७२६ मार्क्सवाद और रामराज्य यदि बिना हेतुके ही कार्योत्पत्ति मानी जाय तो बौद्धकी प्रतिज्ञा-हानि होगी; क्योंकि— 'चतुर्विधान् हेतून् प्रतीत्यचित्तचैत्ता उत्पद्यन्ते' अर्थात् चतुर्विध हेतुओंको प्राप्त करके चित्त-चैत्त उत्पन्न होते हैं। नीलाभास चित्तमे नीलालम्बन-प्रत्ययसे नीला कारता समनन्तर-प्रत्ययरूप पूर्व विज्ञानसे बोधरूपता, चक्षुरूप अधिपतिप्रत्ययसे रूप- ग्रहणका नियम और आलोकरूप सहकारी प्रत्ययसे स्पष्टार्थता होती है। चित्त-चैत्तोंकी उत्पत्तिमें इस प्रकार चतुर्विध हेतुओकी प्राप्ति मानी जाती है। सुखादि चैत्तोंमें भी इसी प्रकारका कार्यकारणभाव माना जाना चाहिये । परंतु वहाँ विज्ञानसे अतिरिक्त दूसरे अन्य तीन कारणोंकी सिद्धि नही होती । यदि निर्हेतुक उत्पत्ति मानी जायगी तब तो कोई प्रतिबन्ध न होनेके कारण सभी वस्तु सर्वत्र उत्पन्न होती रहेगी। बौद्ध यह भी कहते हैं कि उत्तरक्षणकी उत्पत्तितक पूर्वक्षण अवस्थित रहता है। पर ऐसा माननेसे हेतुफल दोनोका यौगपद्य (समकालत्व) होगा । उत्पत्ति उत्पद्यमानसे अभिन्न होती है तथा च एक क्षण दूसरे क्षणतक रह गया फिर तो क्षणिक कैसे ? ऐसी स्थितिमें सभी पदार्थ संस्कृत एवं क्षणिक हैं यह बौद्धोकी प्रतिज्ञा भंग हो जायगी। बौद्ध यह भी कहते हैं कि प्रतिसंख्यानिरोध, अप्रतिसंख्यानिरोध और आकाश इन तीनोसे अन्य जो कुछ भी है वह सब बुद्धि बौद्ध है, संस्कृत है, क्षणिक है। यह तीनो अवस्तु स्वभाव (निरुपाख्य) है। बुद्धिपूर्वक भावोका विनाश प्रतिसंख्या-निरोध तद्विपरीत अप्रतिसंख्यानिरोध होता है। एवं आवरण- भावमात्र आकाश है। आकाशपर विचार आगे किया जायगा । ये दोनो निरोध सर्वथा असम्भव हैं। यहाँ प्रश्न उठता है कि ये दोनो निरोध संतानके होगे या भावरूप संतानीके ? पहला पक्ष ठीक नहीं। कारण, सभी संतानोंमें संतानियोका अविच्छिन्न कार्यकारणभाव विद्यमान ही है फिर संतानविच्छेद कैसे होगा ? दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं; क्योकि किसी भी भावोका निरन्वय नाश नही होता, सभी अवस्थाओमें प्रत्यभिज्ञाबलसे अन्वयीकारणका अविच्छेद ही रहता है। घट, कपाल, कपालिका, चूर्ण, रज आदि सर्वत्र मूल कारण मृत्तिका अन्वित ही रहती है। जहाँ अन्वयीकी पहचान नही होती वहाँ भी अन्यत्रकी तरह अनुमान किया जा सकता है। अतः दोनो ही निरोध असम्भव है। अभिप्राय यह है कि भावप्रतीपा 'बाधिका' बुद्धि प्रतिसंख्या कहलाती है, उसके द्वारा निरोध ही प्रतिसंख्यानिरोध है। सत्को असत् बनानेकी बुद्धि ही भावप्रतीप बुद्धि है। तत्कृतनिरोध प्रतिसंख्यानिरोध है। उससे भिन्न निरोधको अप्रति- संख्यानिरोध कहते हैं। परंतु यहाँ विचार यह करना है कि यह निरोधसंतानका होगा या संतानीक्षणका । संताननिरोध तो हो नहीं सकता, क्योंकि हेतुफलभावसे व्यवस्थित