भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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मार्क्स और आत्मा ७२५ कारण न रहे तो कार्यमे मृत्तिका सुवर्णादिकी प्रतीति कैसे बन सकती है ? यदि कार्य-क्षणमे कारणकी सत्ता मानी जाती है तो भी क्षणिकत्वकी हानि होगी । बौद्ध कहते है कि कार्यमें कारणका तादात्म्य नही होता किंतु सादृश्य होता है, परंतु कार्यमें जब कारणके किसी रूपका अनुगम हो तभी सादृश्य भी हो सकता है । यदि किसी अनुगमका रूप मान लिया जाय तब तो वही अनुगत रूप ही कारण है फिर तो उसके साथ कार्यका तादात्म्य ( अभेद ) मानना ही ठीक है। ऐसी स्थितिमें भी क्षणिकत्वकी हानि अपरिहार्य ही है । यदि हेतुस्वभावका कार्यमें अनुगमन होनेपर भी कार्यकारणभाव स्वीकार किया जायगा, तब सर्वत्र कार्यकारणभाव ही प्रसक्त रहेगा फिर तन्तु-घटका भी कार्यकारणभाव मानना पड़ेगा । बौद्धोके सिद्धान्तमे 'तद्भावे तद्भावः' आदि अन्वय-व्यतिरेकद्वारा कार्य-कारण भावका नियम माना जाता है तथा च तन्तु-घटका कार्य कारणभाव नही होगा, क्योकि उनको अन्वय-व्यतिरेक नही है। किंतु यह भी ठीक नहीं, क्योंकि अन्वय- व्यतिरेक ग्रह एकक्षणमे नहीं हो सकता, उसके लिये वस्तुको अनेक क्षणस्थायी मानना पड़ेगा । यदि कार्य-कारण सतानो या सामान्योका कार्य-कारणभाव माने और उन सतानोको स्थायी माने तो यह भी ठीक नही। कारण-व्यक्तियोमें ही कार्य-कारणभाव होता है, सतानो या सामान्योमें नही । यदि उनमें भी कार्यकारणभाव माना जाय और उन कारणभूत सतानो या सामान्योको स्थायी माना जाय तो भी क्षणिकत्वकी हानि हुई ही । बौद्धोसे यह भी प्रश्न होता है कि उत्पाद और विनाश वस्तुस्वरूप ही है या वस्तुके अवान्तर अथवा वस्तुसे भिन्न वस्त्वन्तर हैं ? यदि वस्तुके स्वरूप ही हैं तो वस्तु और उत्पाद-विनाश परस्पर पर्याय हो जायँगे । यह लोकविरुद्ध हैं । उत्पाद-विनाश और वस्तुको कोई पर्यायवाची नहीं मानता । यदि कोई विशेषता वस्तुकी अपेक्षा उत्पादनिरोधमें है, तब तो कहना पड़ेगा कि मध्यवर्त्ति वस्तुकी उत्पाद और निरोध-आदिम एव अन्तिम अवस्था है । तब फिर आद्य मध्य तथा अन्त्यक्षण सम्बन्धी होनेके कारण वस्तुमे स्थिरता हो जायगी फिर क्षणिकत्व समाप्त हो जायगा । यदि उत्पाद-निरोध—अश्वमहिषके तुल्य वस्तुसे अत्यन्त भिन्न माने जायँ तो वस्तुके उत्पाद-विनाशसे रहित होनेके कारण उसको शाश्वतता सिद्ध हो जायगी । यदि वस्तुका दर्शन उत्पाद एव वस्तुका अदर्शन विरोध माना जाय तो भी दर्शना- दर्शन तो पुरुषके धर्म होंगे, वस्तुधर्म नहीं, इस प्रकार भी वस्तु तो शाश्वत ही ठहरेगी, इस प्रकार विवेचन करनेपर क्षणिकत्ववादमे अविद्यादि हेतूनिबन्धनदृष्टिसे भी उत्पत्ति निमित्त नही हो सकते ।