भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 483, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 483

७२४ मार्क्सवाद और रामराज्य बौद्ध कहता है कि प्रत्ययोपनिबन्ध पक्षमें अस्थिरके भाव सदा संहत ही उत्पन्न होते है, संहत ही नष्ट होते हैं यह नहीं कि वे इतस्ततः बिखरे रहते हैं और किसीके द्वारा संहत किये जाते हैं । इस प्रकार समवघाटकचेतन अधिष्ठाताकी कोई आवश्यकता नहीं है । परंतु उसका यह भी कथन युक्तिसह नहीं है अतः यहाँ भी प्रश्न होता है कि - संघात संतानमें रहनेवाले धर्माधर्मरूपी संस्कार संतान सुख-दुःखको पैदा करते हुए किसी आगन्तुक हेतुकी अपेक्षा करके सुख-दुःख पैदा करेंगे या निरपेक्ष ही । यदि आगन्तुक हेतुकी अपेक्षा बिना किये ही सुख-दुःख पैदा करे तो सदा ही उन्हे सुख-दुःख जनन करना चाहिये; क्योकि जो समर्थ एवं निरपेक्ष है उसके कार्यजननमे विलम्ब क्यो होगा । यदि किसी आगन्तुक हेतुकी अपेक्षा करेगा, तब तो आगन्तुक हेतुका उपस्थापक कोई प्रज्ञावान् चेतन मानना आवश्यक हो जायगा । साथ ही यदि सघातके सदृश ही सघातान्तर उत्पन्न होगे, तो सदा ही मनुष्य-संघात मनुष्य-संघात ही होगा । फिर कर्मानुसार अनेक योनियोंमें जन्म लेनेकी बात खण्डित होगी । यदि विसदृश संघातकी उत्पत्ति मान्य होगी तो क्षणमे हस्ती, क्षणमें अश्व होना चाहिये । इत्यादि दोष अनिवार्य होगे । अविद्यादि उत्पत्तिके निमित्त भी नहीं बन सकते हैं । क्योकि क्षणभङ्गुवादमे उत्तर क्षणके उत्पद्यमान् होनेपर पूर्वक्षण नष्ट हो जाता है । वैशेषिक तो विनाश कारणके सन्निधानसे विनाश मानता है। इसके विपरीत बौद्ध अकारण ही विनाश मानता है । इस स्थितिमें- पूर्वोत्तर क्षणका कार्यभाव कारण कथमपि नहीं बन सकता; क्योकि विरुध्यमान या विरुद्ध पूर्वक्षण स्वयं अभावग्रस्त होगा । अतः वह उत्तर क्षणका हेतु नही हो सकता । कार्योत्पादके प्राक्कालमें कारणकी सत्ता सार्थक होती है। कार्यकालमें कारणकी सत्ताका कोई उपयोग नहीं होता; क्योकि कार्यकालमे तो कार्यनिष्पन्न ही होता है। भावभूत पूर्व क्षण उत्तर क्षण का हेतु हो तब तो क्षणद्वयसम्बन्ध होनेसे क्षणिकता ही न रहेगी । लोकमें कोई भी भाव सत्तावान् होकर पुनः व्यापृत होकर कार्य-सम्पादन करता है। इससे अनेक क्षण सम्बन्ध होनेसे स्थिरता ही सिद्ध होती है। बौद्ध कहता है कि - भाव ही उसका व्यापार है, जैसा कि कहा है कि :- 'भूतिर्येषां क्रिया सैव कारकं सैष चोच्यते।' अर्थात् पदार्थोंकी जो उत्पत्ति होती है वही उनकी क्रिया, कारक तथा कारण है । परंतु पदार्थोंमें इस प्रकारकी व्यापारवत्ता भले ही बन जाय तथापि वह कारण नहीं हो सकता; क्योकि लोकमे देखा जाता है कि मृत्तिकाकार्य घटादि मृत्तिकासे एवं सुवर्णका कार्य कटक-कुण्डलादि सुवर्णसे समन्वित होते हैं। यदि कार्यके समय