भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 482, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 482

अनपेक्ष ही रहेगा । फिर इसी तरह तदनन्तरानन्तरवर्ती सभी बीजक्षण अनपेक्ष ही रहेंगे फिर तो कुसूलनिहित बीजोंसे ही किसान कृतकार्य हो जायगा, पुनः दुःख बहुल कृषिकार्य करनेकी उसे क्या आवश्यकता ? क्योंकि जिस बीजक्षणको स्वक्षण परम्परासे अङ्कुर उत्पन्न करता है उसकी क्षण- परम्परा अनपेक्ष कुसूलमें ही अङ्कुरादि सम्पादन कर देगी, जब यह सर्वथा निरपेक्ष है तो उसे देशकालकी अपेक्षा ही क्यों होगी ? इसीलिये यह मानना आवश्यक है कि— अन्त्य मध्य या पूर्व क्षण स्वकार्य- जननमें परस्पर सापेक्ष ही रहते हैं। तदर्थ कारणोंका समवधान (एकत्रीकरण) आवश्यक है। वह प्रेक्षावान् चेतन ही हो सकता है। बौद्ध कहता है कि अविद्यादिके द्वारा ही सघातका आक्षेप होगा। यहाँपर उससे प्रश्न होता है कि आक्षेपका क्या अर्थ है ? उत्पादन या ज्ञापन ! पहला पक्ष ठीक नहीं, क्योंकि कारण स्वयं अनुपपन्न होकर कार्यका उत्पादन नहीं कर सकता किंतु वह स्वसामर्थ्यसे ही कार्यका जनन करता है, अतः दूसरा ही पक्ष कहना पड़ेगा कि कारण सघातका आक्षेप करते हैं अर्थात् ज्ञापन करते हैं। तथा च ज्ञापित सघातका उत्पादक तो अन्य ही होना चाहिये। ज्ञापक ही उत्पादक नहीं होता। यदि वैशेषिकोंके स्थिर पक्षमें स्थिर भोक्ता आत्माके रहनेपर भी अधिष्ठाता चेतनके बिना संघातोत्पादन नहीं हो सकता तो फिर क्षणिकवादमें सघात कैसे बन सकेगा ? भोक्ताका भोग भी कभी सघातका कल्पक हो सकता है, परंतु क्षणिक विज्ञान आदि तो भोक्ता भी नही हो सकते। प्रत्ययोपनिबन्ध-पक्षमें अनेक कारण-उपकार्योपकारक भावसे अवस्थित होकर ही कार्यजनन करेंगे यह बौद्धोंको मानना पड़ेगा। परंतु क्षणिक पक्षमें उपकार्योप- कारकभाव हो ही नहीं सकता। कारण इस पक्षमे कोई स्थिर भाव मान्य नहीं है जो उपकारका आस्पद बने। क्षण इतना सूक्ष्म एव अभेद्य होता है कि क्षणिक-पदार्थमें उपकारकता या उपकार्यता कुछ बन ही नहीं सकती ! यदि कालभेद मानकर उपकार्योपकारकभावका उपपादन किया जाय तो अनेक कालावस्थायी होनेसे फिर वही क्षणभङ्ग भङ्ग होगा। बौद्ध कहते हैं कि यदि प्रत्ययोपनिबन्धन प्रतीत्य समुत्पाद माना जाय तो भले ही अधिष्ठाता चेतनकी अपेक्षा हो, परंतु हेतूपनिबन्धन प्रतीत्य समुत्पादमें तो अधिष्ठाताकी कोई आवश्यकता नहीं है तथा च अविद्यादि ही सघातके निमित्त होगे। हेतुस्वभावमे ही कार्य-सम्पादन कर देंगे। परंतु उनका यह भी कथन विचार सह नहीं है, क्योकि सघातके ही आधारपर सिद्ध होनेवाले अविद्यादि उसी संघातके निमित्त कैसे बन सकेंगे ? इसके अतिरिक्त हेतूपनिबन्ध कार्यमें भी चेतनाधिष्ठित ही अचेतन कारण कार्योत्पादक होता है। यह घटोत्पत्तिके उदाहरणसे कहा जा चुका है।