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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 489

७३० मार्क्सवाद और रामराज्य निरूपण हो ही नहीं सकता। इसलिये आवरणाभावाधिकरण वस्तु ही आकाश है। साथ ही आकाश वस्तु नहीं है, यह सिद्धान्त बौद्धके स्वसिद्धान्तके विरुद्ध है। 'पृथिवी भगव. किं संन्निःश्रया' वे इस प्रकारके प्रश्न प्रतिवचन प्रवाहमें 'वायुः किं संन्नि.श्रय.' इस प्रश्नके उत्तरमे कहा गया है 'वायुराकाशसन्निश्रयः।' अर्थात् वायुका क्या आश्रय है इस प्रश्नके उत्तरमे कहा गया है कि वायुका आकाश आश्रय है। इस प्रकार आकाशको अवस्तु मानना अभ्युपगमविरुद्ध होगा। इसके साथ ही बौद्ध कहते हैं (अपि च निरोधद्वयमाकाशं च त्रयमप्येत- न्निरुपाख्यमवस्तु नित्यं च) अर्थात् दोनो निरोध और आकाश यह तीनो निरुपाख्य अवस्तु एवं नित्य है। यह बात परस्परविरुद्ध है। जो अवस्तु है उसमे नित्यता या अनित्यता कुछ भी नही हो सकती। नित्यत्वादि धर्म वस्तुके आश्रित होते हैं। जहाँ धर्म-धर्मिभाव होता है, वहाँ निरुपाख्यता हो ही नही सकती। बौद्ध सब वस्तुको क्षणिक मानता हुआ उपलब्धाको भी क्षणिक ही मानता है। परंतु यदि उपलब्धा भी क्षणिक हो तो अनुभवसे उत्पन्न होनेवाली स्मृति कैसे बन सकेगी; क्योकि वह तो तभी बन सकती है जब कि उपलब्धि और स्मृतिका कर्ता एक ही हो। अतएव पुरुषान्तरसे अनुभूत विषयमें पुरुषान्तरको स्मृति नहीं होती है। अनुभव करनेवालेको ही अनुभूतकी स्मृति होती है। जबतक पूर्वोत्तरदर्शी एक आधार न हो तबतक 'मैंने उसको देखा, अब इसे देख रहा हूँ, यह व्यवहार नहीं बन सकता। कथञ्चित् समान-सततिमें कार्य- कारणभावसे स्मृति बन भी जाय तो भी यह प्रत्यभिज्ञा तो उपलब्धाके अस्थिर होनेपर बन ही नहीं सकती। दर्शन-स्मरणके एक कर्ता होनेपर ही प्रत्यभिज्ञा-प्रत्यय होता है 'उसे देखा, इसे देख रहा हूँ, यदि यहाँ दर्शन-स्मरणका कर्ता भिन्न-भिन्न हो तो 'देखा अन्यने और स्मरण मै कर रहा हूँ' ऐसा प्रत्यय होना चाहिये, परंतु ऐसा अनुभव किसीको भी नही होता। जहाँ ऐसा प्रत्यय होता है वहाँ कर्ता अवश्य ही भिन्न-भिन्न होते हैं। मै स्मरण कर रहा हूँ, अमुकने देखा है'। 'अहं स्मरामि, असावद्राक्षीत्।' बौद्ध भी दर्शन स्मरणका एक ही कर्ता समझता है। परंतु जैसे अग्निको अनुष्ण और अप्रकाश नही कहा जा सकता, उसी प्रकार दर्शन-स्मरण-कर्ता आत्मा- को भिन्न नहीं कहा जा सकता। जब उपलब्धामें, भिन्नकारणके दर्शन-स्मरणका सम्बन्ध हुआ तो सुतरा क्षणिकत्वकी हानि अपरिहार्य हो जाती है। जन्मसे मरणतककी उत्तरोत्तर प्रतिपत्तियोंकी एककर्तृकता देखता हुआ भी वैनाशिक आत्माको किस प्रकार क्षणिक कह सकता है ? यदि कहा जाय कि सादृश्यके कारण उपलब्धामें एकताकी प्रतीति होती है, तो यह भी ठीक नहीं, कारण 'तेनेदं सदृशम्', 'उसके यह तुल्य है' इस प्रकारकी

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