मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसादृश्यबुद्धि तभी हो सकती है जब भिन्नकालवर्ती दो वस्तुका ग्राहक एक हो, यदि पूर्वोत्तर क्षण और सादृश्यका ग्राहक एक स्थिर आत्मा है तो एककी अनेक- क्षणवर्तिता सिद्ध हो गयी फिर क्षणिकत्व-प्रतिज्ञा भङ्ग ही हो गयी । बौद्ध कहता है कि ‘तेनेदं सदृशम्’ यह स्वतन्त्र ही एक विकल्प-प्रत्यय है । विकल्प स्वाकारको ही बाह्यरूपसे निश्चित करता है, वह तत्त्वतः पूर्वोत्तरक्षण तथा उसके सादृश्यका ग्रहण नहीं करता । अतः पूर्वोत्तरक्षणग्रहणनिमित्तक ‘तेनेदं सदृशम्’ यह प्रत्यय नहीं है । इस प्रत्ययसे स्थिर आत्मा नहीं सिद्ध होता, परन्तु यह ठीक नहीं; क्योंकि ‘तेन, इदं’ इन दोनों पदोंका उपादान होनेके कारण इसे पूर्वोत्तर क्षणग्रहणनिरपेक्ष प्रत्यय नहीं कहा जा सकता । सादृश्य-ज्ञान स्वतन्त्र-ज्ञान होता तो ‘सदृशम्’ इस ढंगसे उल्लेख होना चाहिये था । ‘तेन इदं सदृशम्’ इस प्रकारका उल्लेख तथा वाक्यका प्रयोग नहीं होना चाहिये । यदि बौद्ध नानापदार्थ सम्पृक्त वाक्यार्थबोधक ‘तेनेदं सदृशम्’ इस विकल्पकी प्रथा या प्रतीति मानता है, तो फिर कैसे कह सकता है कि उसमें ‘तेनेदं सदृशम्’ ये नाना पदार्थ नहीं भासित होते हैं । ऐसा कहना तो अपने संवेदनके ही विरुद्ध है । इसके सिवा यदि उसके यह सदृश है, यह एक विकल्प ज्ञान हो तो इसमें ‘तेन इदम्’ इत्यादि नाना आकार नहीं हो सकते थे । क्योंकि एकका नानात्व व्याहत होता है । जब ज्ञानसे अतिरिक्त आकार नहीं है तो आकार नानात्व-ज्ञान नानात्व ही ठहरेगा । यह भी नहीं कहा जा सकता कि जितने आकार हैं उतने ही ज्ञान हैं, क्योंकि तब तो प्रत्येक आकारमें ज्ञानकी समाप्ति होगी और वे सभी परस्पर वार्तान- भिज्ञ होंगे, फिर ‘नाना’ यह व्यवहार भी न होगा, क्योंकि जब एक ज्ञानसे नाना पदार्थोंकी प्रतीति होती है, तभी नाना यह उल्लेख होता है । इसीलिये ज्ञानसे भिन्न अर्थ मानना चाहिये । तथा च ‘तेन इदं’ इत्यादि नाना आकारवाले ज्ञानकी उपपत्ति स्थायी एक आत्मा माननेसे ही सम्भव है । बौद्ध कहता है कि ज्ञानमें अर्थाकार कल्पित है, अर्थ बाह्य नहीं है और प्रतीतिमात्र भी नहीं है, तथा च उसी कल्पित आकारभेदसे व्यवहार भी उपपन्न होगा । पर यहाँ यह प्रश्न होगा कि वह कल्पित अर्थ ज्ञानसे अभिन्न हैं या भिन्न । तीसरा पक्ष अनिर्वाच्यताका है वह बौद्धको मान्य ही नहीं । यदि भिन्न है तो जैसे ज्ञानसे भिन्न दूसरा ज्ञान अकल्पित होता है, वैसे ही ज्ञानसे भिन्न अर्थाकार भी अकल्पित ही होगा । यदि आकारोंका ज्ञानसे अभेद माना जाय तो उसके समान ही ( ‘तेन इदम्’ इत्यादि पदार्थोंका भी परस्पर अभेद ही हो जायगा । क्योंकि ज्ञानसे अभिन्न सभी आकारोंका परस्पर भी अभेद ही होना है, तथा च इतरेतररूपने प्रसिद्ध पदार्थोंका और ज्ञानसे ज्ञेयके प्रसिद्ध भेदका भी अपलाप हो जायगा । यदि लोकप्रसिद्ध पदार्थोंको परीक्षक स्वीकार न करेंगे तो स्वपक्ष साधन परपक्ष-दूषणके