मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७३२ मार्क्सवाद और रामराज्य निरूपण करनेपर भी वे किसीकी बुद्धिमें आरूढ़ न होंगे। अतः जो लोकसिद्ध हो वही कहना चाहिये। अन्यथा कथन अनर्गल प्रलाप ही समझा जायगा। एक ही अधिकरणमें परस्पर विरुद्ध दो प्रकारके धर्मोंका अभ्युपगम करनेसे ही विवाद होता है। तभी कोई स्वपक्षका साधन तथा अन्य पक्षको दूषित करता है। यदि विकल्पोंके विषय लोकप्रसिद्ध बाह्य पदार्थ न हो तो यह सब नहीं बन सकता। यदि विकल्पमें भासित होनेवाले नित्यत्व-अनित्यत्वादि ज्ञानाकार ही हैं और ज्ञान भी 'इदं नित्यम्, इदमनित्यम्' इस प्रकारसे दो हैं तो एक आश्रय न होनेसे विवाद ही न उठेगा। आत्मा नित्य है और बुद्धि अनित्य, इस तरह कहनेवालोंमें कभी कोई विवाद ही नही होता। यदि कोई अनित्य शब्दका लोकप्रसिद्ध अर्थ छोड़कर विभु अर्थ माने विभुत्व अर्थमें ही अनित्य शब्दका प्रयोग आत्मामें करे और अन्य कोई लौकिकार्थ नित्यशब्दका आत्मामें प्रयोग करे तो उनका आपसमें विवाद नही हो सकता है। अतः जिसे परपक्ष खण्डन एवं स्वपक्षकी स्थापना करनी है उसे विकल्पोंका लोकप्रसिद्ध अर्थ एव बाह्य आलम्बन मानना चाहिये। यह प्रासङ्गिक विज्ञानवाद खण्डन आ गया है परन्तु वैभाषिक तथा सौत्रान्तिक बाह्यार्थ मानते हैं। उनके अनुसार यद्यपि बाह्यार्थ क्षणिक एवं निर्विकल्पज्ञानमें भासित होता है, सविकल्पक प्रत्यय तो विकल्परूप है। वही सादृश्यादिरूपसे भासित होता है, अतः बाह्यार्थवादमें विप्रतिपत्ति आदि व्यवहार बन जायगा। तथा च विकल्पोंके विषय ग्राह्य एव अवसेयरूपसे दो प्रकारके होते हैं। ज्ञानका स्वाकार तो ग्राह्य होता है और बाह्यविषय अवसेय होते हैं। उसी अवसेयरूप विषयको लेकर पक्ष-प्रतिपक्ष- परिग्रह आदि सम्पन्न हो जायँगे। तथापि यह पक्ष भी ठीक नहीं है ? क्योकि यहाँ भी विचारणीय यह है कि विकल्प विषयकी अवसेयता क्या है। यदि ग्राह्यता ही है तो विषयकी द्विविधता नहीं हुई। यदि वह अन्य है तो क्या है ? यदि कहा जाय कि ज्ञानमें उसका स्वाकार ही प्रतिभासित होता है तथापि उसी बाह्यार्थरहित भासमान ज्ञानमें बाह्यार्थ अध्यवसायसे बाह्यार्थ घटादिमें प्रवृत्ति होती है, अतः भासमान ज्ञानमें बाह्यार्थका आरोप ही विषयकी अवसेयता है, तो यह भी ठीक नहीं, क्योकि यहाँ भी विचारणीय है कि विकल्पाकारका अर्थाध्यवसाय क्या है अर्थात् आन्तर अनभिधेय ज्ञानाकारका तद्विपरीत बाह्याकाररूपसे अध्य- वसाय क्या है ? तद्रूपसे निष्पादन है या सम्बन्ध या उसके आकारसे आरोपण। पहला पक्ष ठीक नहीं, क्योकि अन्यका अन्यरूपसे निष्पादन असम्भव है। हजारो शिल्पी भी मिलकर घटको पट नहीं बना सकते, फिर आन्तर ज्ञानाकारका बाह्य- रूपमें सम्पादन कैसे होगा। निष्पादनके समान ही आन्तर- का बाह्यसे सम्बन्ध या संयोजन भी नहीं हो सकता। यदि ऐसा हो भी तो बाह्य अर्थ