भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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मार्क्स और आत्मा ७३३ है इस व्यवहारके विपरीत बाह्य आन्तरसे जुड़ा है यह व्यवहार होना चाहिये । आरोपपक्षमें भी यह विचारणीय है कि गृह्यमाण बाह्यमें आन्तर ज्ञानाकारका आरोप है या अगृह्यमाणमें। यदि गृह्यमाणमें तो भी क्या विकल्पात्मक ज्ञानसे गृह्यमाणमेंया उसी समय उत्पन्न अविकल्पक ज्ञानसे गृह्यमाणमें ? यहाँ भी यह प्रश्न उठता है कि उसमें भी गृह्यमाण बाह्य क्या है स्वलक्षण है या सामान्यरूप है ? विकल्प-प्रत्ययसे स्वलक्षण ( जात्यादिरहित स्वरूपमात्र ) ग्राह्य होता है, यह इसलिये ठीक नहीं कि विकल्प-प्रत्यय तो अभिलापसंसर्ग योग्यको ही विषय करता है जिसके साथ शब्दका शक्तिग्रह हो ही नहीं सकता, ऐसे देशकालाननुगत स्वलक्षणको वह विषय नहीं कर सकता । इसीलिये कहा गया है कि— अशक्यसमयो ह्यात्मा सुखादीनामनन्यभाक् । तेषामतः स्वसंवित्तिर्नाभिजल्पानुषङ्गिणी ॥ अर्थात् विकल्प-प्रत्यय शब्द संसर्ग ग्रह योग्य जाति विशिष्ट वस्तुको ही विषय करता है । क्योंकि शब्दका शक्तिग्रह सामान्यके ही साथ सम्भव है, स्वलक्षणके साथ नहीं, क्योकि देशकालाननुगत होनेसे स्वलक्षण अनन्त होता है । अतः उसमें सङ्गतिग्रह सम्भव नहीं । सुखादि क्षणिक भावोका स्वरूप अननुगत होनेके कारण सङ्गतिग्रहके अयोग्य है । अर्थात् उसमें शब्दका शक्तिग्रह नहीं हो सकता । अतः उनकी असाधारणाकार विषया स्वसंवित्ति अभिजल्पानुषङ्गिणी नहीं होती, किंतु निर्विकल्पक ही होती है । पहले कही हुई रीतिसे जैसे सविकल्प प्रत्ययसे स्वलक्षण-बाह्य नहीं गृहीत हो सकता, वैसे ही सामान्यात्मक बाह्य भी नहीं गृहीत हो सकता । क्योंकि व्यक्ति-ग्रह बिना जातिरूप-सामान्यका ग्रहण सम्भव है। यदि विकल्पसे अगृहीत तत्समय समुद्भूत निर्विकल्प प्रत्ययसे गृह्यमाण बाह्य पदार्थमें विकल्प-प्रत्यय स्वाकार आरोपित करेगा ऐसा कहे तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि जैसे रजतज्ञानमे भासित होनेवाले पुरोवर्तीमें रजत- ज्ञान रजतका आरोप नही कर सकता, किंतु 'इदं रजतम्' इस रूपसे रजतज्ञानमे भासित पुरोवर्तीमे ही रजतका आरोप करता है उसी तरह निर्विकल्प प्रत्यय भासित होनेपर भी बाह्य पदार्थ यदि विकल्प-प्रत्ययमे भासित नही होता तो उसमे वह स्वाकारका आरोप नहीं कर सकता । अर्थात् विकल्पसे अगृहीत एव विकल्प समयोद्भूत अविकल्पसे गृहीत बाह्यमें विकल्प साकारका आरोप नहीं कर सकता। यदि बाह्य गृह्यमाण नहीं है तो अधिष्ठानके ग्रहण बिना आरोप्यमात्र प्रतीत हो सकता है किंतु आरोप नहीं हो सकता। इस तरह अधिष्ठानका प्रतिभास असम्भव होनेसे बाह्यमे ज्ञानस्वरूपका आरोप नहीं हो सकता है। इसी तरह आरोप्यका स्फुरण भी असम्भव होनेसे आरोप नहीं बन सकेगा। यहाँ यह भी विचारणीय है कि क्या यह विकल्प जब स्वसंवेदन सत् विकल्पको बाह्यरूपसे आरोप करता है तब पहले वस्तु सत्-स्वाकारको ग्रहण करके पश्चात्