भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 493

७३४ मार्क्सवाद और रामराज्य आरोप करता है, अथवा जिस समय स्वाकार ग्रहण करता है, उसी समय आरोपण भी करता है ? बौद्धमतमें ज्ञान क्षणिक है, क्रमरहित है फिर उसमें क्रमवर्ती ग्रहण और आरो- पण कैसे सम्भव हो सकता है ? इसलिये दूसरा पक्ष ही सम्भव है कि जिस समय ही अर्थशून्य आकारका ग्रहण करता है उसी समय स्वसंवेदन-स्वाकारको बाह्य अर्थरूपमे आरोपण करता है, परंतु यह भी असंगत है; क्योकि विकल्पका अपना स्वाकार स्वसंवेदन प्रत्यक्ष होनेसे अत्यन्त विशद है, बाह्य अर्थ आरोप्यमाण होनेसे अविशद है । अतः आरोप्य बाह्यको विशद स्वाकारसे भिन्न ही होना चाहिये । अतः विकल्पका स्वाकार ही बाह्यरूपमे आरोपित है यह पक्ष नही बन सकता, अर्थात् जब समकालमे ही स्वाकारग्रहण एव बाह्यत्वेन आरोपण माना जाय तो सोचना होगा कि यहाँ आरोप क्या है । स्वाकार और बाह्यका ऐक्यस्फुरण ही आरोप है अथवा— अख्यातिमतके समान विवेकाग्रहमात्र आरोप है । पहला पक्ष ठीक नहीं, क्योकि स्वाकार-स्वप्रकाश बाह्यपर प्रकाश है । अतः उनका भेदावभास स्फुट है फिर ऐक्य- स्फुरण किस तरह सम्भव है । अतः बाह्यको ज्ञानाकारसे भिन्न ही होना चाहिये । दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं; भेदाग्रहमात्रको भी समारोप नही कहा जा सकता; क्योकि वैशद्य अवैशद्यरूपसे उनका भेद स्पष्ट ही है । यदि कहा जाय कि बाह्य अगृह्यमाण है तो भी गृह्यमाण आन्तर स्वलक्षणसे उसका भेद अगृहीत है, इसीलिये बाह्यमे प्रवृत्ति होती है । फिर तो यह भी कहा जा सकता है कि त्रैलोक्यसे ही ज्ञानके स्वाकारका भेदाग्रहण होनेसे जहाँ कही भी प्रवृत्ति हो जायगी । इस तरह परमार्थ ज्ञानाकारका बाह्य वस्तुरूपसे आरोप असम्भव ही है । इसी तरह वासनापरिप्रापित कल्पित ज्ञानाकारका बाह्यरूपमें आरोप होता है यह भी नही कहा जा सकता; क्योकि वह भी स्वप्रकाशज्ञानरूप है । अतः उसका भी बाह्यसे भेद प्रसिद्ध ही है । इस तरह आन्तर एव बाह्य स्थिर पदार्थोंको बिना स्वीकार किये कोई भी व्यवहार नही बन सकता । फलतः सादृश्यमूलक भी प्रत्यभिज्ञा आदि व्यवहार नहीं बन सकते । क्योकि उनमे 'तेनेदं सदृशम्' सादृश्यका ऐसा आकार होता है और 'तदेवेद' यह वही है ऐसा प्रत्यभिज्ञाका व्यवहार होता है । यद्यपि यहाँ कहा जाता है कि जैसे दीपज्वाला या नदी प्रवाह आदिमें सादृश्यबुद्धि न होनेपर भी सादृश्यके कारण ही 'सैवेय धारा, सैवेय ज्वाला' यह वही धारा है यह वही ज्वाला है इत्यादि- रूपसे प्रत्यभिज्ञा ( पहचान ) होती है । वैसे ही विज्ञानधारामे भी सादृश्यके कारण ही 'सोऽहम्' इत्यादिरूपसे प्रत्यभिज्ञा बन जायगी । परतु यह ठीक नहीं, कारण, कदाचित् बाह्य वस्तुमे विनम्रके कारण यह उसके सदृश अन्य है या वही है इस प्रकारका सदेह हो भी जाय, परतु स्वप्रकाश-संवेदनरूप आत्मामे 'मै वही हूँ या