मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतत्सदृश अन्य हूँ' इस प्रकारका संशय सर्वथा असम्भव है । जिसे मैंने कल देखा था वही मैं आज स्मरण कर रहा हूँ यहाँ निश्चित ही आत्माकी एकता प्रत्यभिज्ञात होती है । जो अपनेको पहचाननेके लिये अपने आपको विशिष्ट प्रकारके चिह्नसे अङ्कित करता है जनसाधारण भी उसकी बुद्धिपर तरस खाते हैं । बौद्ध स्थिर-अन्वित कारण नहीं मानते सुतरा उनके यहाँ अभावसे ही भावोत्पत्तिका प्रसङ्ग आ जाता है । क्षणिक कारणवादी बौद्धसे यह प्रश्न होता है कि वह कारण सापेक्ष है या निरपेक्ष ? पहले पक्षकी असङ्गति पीछे कही जा चुकी, दूसरा पक्ष भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि निरपेक्ष क्षणिक बीजादिसे यदि अङ्कुरादि उत्पन्न हो तब तो किसान आदिका प्रयत्न व्यर्थ ही होगा । क्षणिक कारणोंमें उपकार भी सम्भव नहीं होता । निरपेक्षताका निषेध होनेसे सापेक्षता ही आयगी । क्योंकि कोई प्रकारान्तरसम्भव नहीं । अस्थिर भावसे भावकी उत्पत्ति हो नहीं सकती, इसलिये क्षणवादमें अर्थतः— अभावसे ही भावकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग होता है । बौद्ध स्पष्टरूपसे अभावसे भावकी उत्पत्ति सिद्ध करनेका प्रयत्न करते हैं । 'नानुपमृद्य प्रादुर्भावात्' बीजका उपमर्द (विनाश) हुए बिना अङ्कुरकी उत्पत्ति नहीं देखी जाती । किंतु विनष्ट बीजसे ही अङ्कुरकी उत्पत्ति होती है । विनष्ट क्षीरसे दधि एव विनष्ट मृत्पिण्डसे घटादिकी उत्पत्ति होती है । यदि कूटस्थ स्थिर कारणसे कार्यकी उत्पत्ति हो तो अविशेषात् सभीसे सबकी उत्पत्ति होनी चाहिये । अत अभावसे ही भावकी उत्पत्ति होती है इस पक्षका खण्डन करते हुए भगवान् व्यासने कहा है 'नासतोजदृष्टत्वात्' अर्थात् अभावसे भावकी उत्पत्ति नहीं होती । यदि अभावसे भावकी उत्पत्ति हो तो अभावत्वाविशेषात् कारणविशेषमे कार्यविशेषकी उत्पत्तिका सिद्धान्त व्यर्थ होगा । उपमृदित बीजोंके अभावमे और शशविषाणादिमें यदि निःस्वभावता समान ही है तो भेद क्या है ? फिर क्या कारण है कि बीजसे ही अङ्कुर उत्पन्न हो, क्षीरसे ही दधि हो । यदि निर्विशेष अभावसे कार्य उत्पन्न होता तो शशविषाण आदिसे भी अङ्कुरादिकी उत्पत्ति होनी चाहिये । पर ऐसा देखा नहीं जाता । यदि कमलादिमें नीलत्वादिके तुल्य अभावमे कोई विशेष माना जाय तो कमलादिके ही तुल्य अभाव भी भाव ही ठहरेगा । इस प्रकार अभाव किसी भावकी उत्पत्तिका कारण नहीं सिद्ध होता । बौद्धोंके अभावकारणवादका सार यह है कि यदि कूटस्थ कारणका कार्यो- त्पादन स्वभाव है तब तो जितना कार्य करता है उसे सहसा एक क्षणमे ही सब कार्य उत्पन्न कर देना चाहिये । क्योंकि समर्थकालक्षेप नहीं कर सकता है । यदि कहा जाय कि समर्थ भी क्रमयुक्त सहकारियोंकी अपेक्षासे ही क्रमेण कार्य उत्पन्न करना है तो वह भी ठीक नहीं, क्योकि यहाँ प्रश्न होगा कि क्या सहकारीमूलकारणमें