भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 494, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 494

तत्सदृश अन्य हूँ' इस प्रकारका संशय सर्वथा असम्भव है । जिसे मैंने कल देखा था वही मैं आज स्मरण कर रहा हूँ यहाँ निश्चित ही आत्माकी एकता प्रत्यभिज्ञात होती है । जो अपनेको पहचाननेके लिये अपने आपको विशिष्ट प्रकारके चिह्नसे अङ्कित करता है जनसाधारण भी उसकी बुद्धिपर तरस खाते हैं । बौद्ध स्थिर-अन्वित कारण नहीं मानते सुतरा उनके यहाँ अभावसे ही भावोत्पत्तिका प्रसङ्ग आ जाता है । क्षणिक कारणवादी बौद्धसे यह प्रश्न होता है कि वह कारण सापेक्ष है या निरपेक्ष ? पहले पक्षकी असङ्गति पीछे कही जा चुकी, दूसरा पक्ष भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि निरपेक्ष क्षणिक बीजादिसे यदि अङ्कुरादि उत्पन्न हो तब तो किसान आदिका प्रयत्न व्यर्थ ही होगा । क्षणिक कारणोंमें उपकार भी सम्भव नहीं होता । निरपेक्षताका निषेध होनेसे सापेक्षता ही आयगी । क्योंकि कोई प्रकारान्तरसम्भव नहीं । अस्थिर भावसे भावकी उत्पत्ति हो नहीं सकती, इसलिये क्षणवादमें अर्थतः— अभावसे ही भावकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग होता है । बौद्ध स्पष्टरूपसे अभावसे भावकी उत्पत्ति सिद्ध करनेका प्रयत्न करते हैं । 'नानुपमृद्य प्रादुर्भावात्' बीजका उपमर्द (विनाश) हुए बिना अङ्कुरकी उत्पत्ति नहीं देखी जाती । किंतु विनष्ट बीजसे ही अङ्कुरकी उत्पत्ति होती है । विनष्ट क्षीरसे दधि एव विनष्ट मृत्पिण्डसे घटादिकी उत्पत्ति होती है । यदि कूटस्थ स्थिर कारणसे कार्यकी उत्पत्ति हो तो अविशेषात् सभीसे सबकी उत्पत्ति होनी चाहिये । अत अभावसे ही भावकी उत्पत्ति होती है इस पक्षका खण्डन करते हुए भगवान् व्यासने कहा है 'नासतोजदृष्टत्वात्' अर्थात् अभावसे भावकी उत्पत्ति नहीं होती । यदि अभावसे भावकी उत्पत्ति हो तो अभावत्वाविशेषात् कारणविशेषमे कार्यविशेषकी उत्पत्तिका सिद्धान्त व्यर्थ होगा । उपमृदित बीजोंके अभावमे और शशविषाणादिमें यदि निःस्वभावता समान ही है तो भेद क्या है ? फिर क्या कारण है कि बीजसे ही अङ्कुर उत्पन्न हो, क्षीरसे ही दधि हो । यदि निर्विशेष अभावसे कार्य उत्पन्न होता तो शशविषाण आदिसे भी अङ्कुरादिकी उत्पत्ति होनी चाहिये । पर ऐसा देखा नहीं जाता । यदि कमलादिमें नीलत्वादिके तुल्य अभावमे कोई विशेष माना जाय तो कमलादिके ही तुल्य अभाव भी भाव ही ठहरेगा । इस प्रकार अभाव किसी भावकी उत्पत्तिका कारण नहीं सिद्ध होता । बौद्धोंके अभावकारणवादका सार यह है कि यदि कूटस्थ कारणका कार्यो- त्पादन स्वभाव है तब तो जितना कार्य करता है उसे सहसा एक क्षणमे ही सब कार्य उत्पन्न कर देना चाहिये । क्योंकि समर्थकालक्षेप नहीं कर सकता है । यदि कहा जाय कि समर्थ भी क्रमयुक्त सहकारियोंकी अपेक्षासे ही क्रमेण कार्य उत्पन्न करना है तो वह भी ठीक नहीं, क्योकि यहाँ प्रश्न होगा कि क्या सहकारीमूलकारणमें