मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७३६ मार्क्सवाद और रामराज्य किसी उपकारका आधान करते हैं या नही । यदि नहीं तो अनुपकारक सहकारियों- की अपेक्षा ही क्यों होगी । यदि आधान करते हैं तो वह उपकार मूल कारणोंसे भिन्न होता है या अभिन्न ? यदि अभिन्न तो यह सिद्ध हुआ कि सहकारियोंद्वारा आहित उपकार मूल- कारणसे अभिन्न है, अर्थात् मूलकारणरूप ही है । इस तरह सहकारियोंद्वारा उत्पन्न उपकारस्वरूप मूलकारण टस्थ कैसे रह सकता है । उच्छूनता या उपमर्द आदि ही सहकारियोंद्वारा किया उपकार है । यदि सहकारिकृत उपकार कारणसे भिन्न है तो यह भी मानना पड़ेगा कि उपकारके होनेपर कार्य होता है उसके न होनेपर कार्य नहीं होता । भले ही कूटस्थ विद्यमान रहे तब तो उपकार ही कार्यकारी सिद्ध होता है । कूटस्थ कारण कार्यकारी सिद्ध नही होता इसीलिये कहा गया है कि:— वर्षातपाभ्यां किं व्योम्नश्चर्मण्येव तयोः फलम् । चर्मोपमश्चेत्सोऽनित्यः खतुल्यश्चेदसत्फलम् ॥ अर्थात् वर्षा एव आतपका प्रभाव चर्ममें होता है आकाशमें नहीं । यदि कारण चर्मके तुल्य है तो उसे विकारी और अनित्य मानना ही पड़ेगा । यदि आकाशके तुल्य है तब कार्यकारी ही नहीं होगा । यदि अकिञ्चित्कर कूटस्थ कारणसे कार्य उत्पन्न हो तब तो सभीसे सबकी उत्पत्ति होनी चाहिये । परंतु बौद्धका यह कथन बिना विचारे ही अच्छा जँचता है, विचार करनेपर सर्वथा निःसार है । अभावसे भावोत्पत्तिके सम्बन्धमें दूषण कहे जा चुके हैं । वस्तुतः स्थिर कारण ही सहकारीके समवधानसे क्रमेण कार्यकारी होता है । स्थिरमें ही उपकार हो सकता है । क्षणिकमें न उपकार ही होता न उसका ज्ञान ही हो सकता है । यदि क्षणिक पदार्थोंमें उपकार्योपकार्य भाव माना जाय तो प्रश्न होगा कि वह क्षणिक पदार्थ अन्यकृत उपकार का आश्रय होता है या नहीं ? पहला पक्ष असम्भव है क्योकि जो वस्तु पहले अनुपकृत होकर पीछे उपकारसे सम्बन्धित हो वही उपकृत रूपसे जानी जा सकती है । उपकृत पदार्थ एवं उसका ज्ञाता दोनो ही स्थायी हों तभी वस्तुमें उपकृतत्व एवं ज्ञाताको उसका ज्ञान हो सकता है । यदि प्रथम अनुपकृतत्वका ज्ञान न हो तो उपकार वस्तुका स्वाभाविक धर्म समझा जा सकता है । सहकारियोंद्वारा कारणमें उपकार होता है, किंतु वह उपकार मूलकारणसे न भिन्न होता है न अभिन्न, किंतु अनिर्वाच्य होता है । इसीलिये उससे उत्पन्न कार्य भी अनिर्वाच्य ही होता है । इसीलिये अनिर्वाच्य मायोपहित कूटस्थ ब्रह्म विश्वका कारण माना जाता है । घट मृत्तिकासे भिन्न नहीं है, क्योकि अन्वयव्यतिरेकसे मृत्तिकासे भिन्न घटका उपलब्ध नहीं होता । अभिन्न भी नहीं है क्योकि मृत्तिकासे जलानयनादि कार्य