भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 495, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 495

७३६ मार्क्सवाद और रामराज्य किसी उपकारका आधान करते हैं या नही । यदि नहीं तो अनुपकारक सहकारियों- की अपेक्षा ही क्यों होगी । यदि आधान करते हैं तो वह उपकार मूल कारणोंसे भिन्न होता है या अभिन्न ? यदि अभिन्न तो यह सिद्ध हुआ कि सहकारियोंद्वारा आहित उपकार मूल- कारणसे अभिन्न है, अर्थात् मूलकारणरूप ही है । इस तरह सहकारियोंद्वारा उत्पन्न उपकारस्वरूप मूलकारण टस्थ कैसे रह सकता है । उच्छूनता या उपमर्द आदि ही सहकारियोंद्वारा किया उपकार है । यदि सहकारिकृत उपकार कारणसे भिन्न है तो यह भी मानना पड़ेगा कि उपकारके होनेपर कार्य होता है उसके न होनेपर कार्य नहीं होता । भले ही कूटस्थ विद्यमान रहे तब तो उपकार ही कार्यकारी सिद्ध होता है । कूटस्थ कारण कार्यकारी सिद्ध नही होता इसीलिये कहा गया है कि:— वर्षातपाभ्यां किं व्योम्नश्चर्मण्येव तयोः फलम् । चर्मोपमश्चेत्सोऽनित्यः खतुल्यश्चेदसत्फलम् ॥ अर्थात् वर्षा एव आतपका प्रभाव चर्ममें होता है आकाशमें नहीं । यदि कारण चर्मके तुल्य है तो उसे विकारी और अनित्य मानना ही पड़ेगा । यदि आकाशके तुल्य है तब कार्यकारी ही नहीं होगा । यदि अकिञ्चित्कर कूटस्थ कारणसे कार्य उत्पन्न हो तब तो सभीसे सबकी उत्पत्ति होनी चाहिये । परंतु बौद्धका यह कथन बिना विचारे ही अच्छा जँचता है, विचार करनेपर सर्वथा निःसार है । अभावसे भावोत्पत्तिके सम्बन्धमें दूषण कहे जा चुके हैं । वस्तुतः स्थिर कारण ही सहकारीके समवधानसे क्रमेण कार्यकारी होता है । स्थिरमें ही उपकार हो सकता है । क्षणिकमें न उपकार ही होता न उसका ज्ञान ही हो सकता है । यदि क्षणिक पदार्थोंमें उपकार्योपकार्य भाव माना जाय तो प्रश्न होगा कि वह क्षणिक पदार्थ अन्यकृत उपकार का आश्रय होता है या नहीं ? पहला पक्ष असम्भव है क्योकि जो वस्तु पहले अनुपकृत होकर पीछे उपकारसे सम्बन्धित हो वही उपकृत रूपसे जानी जा सकती है । उपकृत पदार्थ एवं उसका ज्ञाता दोनो ही स्थायी हों तभी वस्तुमें उपकृतत्व एवं ज्ञाताको उसका ज्ञान हो सकता है । यदि प्रथम अनुपकृतत्वका ज्ञान न हो तो उपकार वस्तुका स्वाभाविक धर्म समझा जा सकता है । सहकारियोंद्वारा कारणमें उपकार होता है, किंतु वह उपकार मूलकारणसे न भिन्न होता है न अभिन्न, किंतु अनिर्वाच्य होता है । इसीलिये उससे उत्पन्न कार्य भी अनिर्वाच्य ही होता है । इसीलिये अनिर्वाच्य मायोपहित कूटस्थ ब्रह्म विश्वका कारण माना जाता है । घट मृत्तिकासे भिन्न नहीं है, क्योकि अन्वयव्यतिरेकसे मृत्तिकासे भिन्न घटका उपलब्ध नहीं होता । अभिन्न भी नहीं है क्योकि मृत्तिकासे जलानयनादि कार्य