मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमार्क्स और आत्मा ७३७ नहीं होता, घटसे ही होता है, अतः वह अनिर्वाच्य ही है। फिर भी स्थिरको अकारण नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अनिर्वचनीय शक्ति विशिष्ट मृत्तिकादि उपादान रूपसे स्थिर ही कारण होता है। उसीसे अनिर्वचनीय कार्य उत्पन्न होता है। इसीलिये श्रुति भी कारणको ही सत्य और कार्यको मिथ्या कहती है (वाचा- रम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्) जैसे रज्जु सर्पभ्रममें स्थिर रज्जु उपादान है, वैसे ही स्थिर कारण ही कार्यका उपादान होता है। जो लोग सर्वतो विलक्षण स्वलक्षणको ही सत् मानते हैं उनके यहाँ यह विचारणीय है कि क्यों बीज जातियोसे अङ्कुर जातियोंकी ही उत्पत्ति होती है। क्रमेलक (उष्ट्र) जातियों- की उत्पत्ति क्यों नहीं होती ? जैसे बीजसे बीजान्तर विलक्षण है, वैसे ही क्रमेलक (उष्ट्र) भी विलक्षण है, विलक्षणतामें कोई भेद नहीं है। बीजत्व, अङ्कुरत्व, सामान्य जाति भी परमार्थ सत् नहीं है। इसीलिये इनका कार्यकारणभाव भी परमार्थ नहीं है। अतएव काल्पनिक स्वलक्षण बीजजातीय उपादानसे काल्पनिक ही अङ्कुरजातीय कार्यकी उत्पत्तिका नियम है यह मानना पड़ेगा। बौद्धसे यहाँ प्रश्न हो सकता है कि व्यक्तियोंका ही कार्य-कारणभाव होता है या सामान्य (जाति) का भी अथवा सामान्योपहित व्यक्तियोंका ? यदि व्यक्तियोंका कार्य कारणभाव हो तो व्यक्ति अनन्त होते हैं सबका ज्ञान असम्भव है। उनमें कार्य-कारणभावकी व्याप्ति गृहीत नहीं हो सकती। फिर कार्यहेतुक अनुमान ही लुप्त हो जायगा। क्योंकि अनुमान सदा ही सामान्योपाधिमें प्रवृत्त होता है। यदि सामान्योंका ही कार्य-कारणभाव माने तो भी प्रश्न होगा कि बीजत्व, अङ्कुरत्व आदि सामान्य वस्तु सत् हैं कि असत् ? पहला पक्ष बौद्धको मान्य नहीं है साथ ही वस्तुओंका कार्य-कारणभाव भी विरुद्ध है। क्योंकि बौद्ध अर्थक्रियाकारिताको ही सत्य मानता है फिर जो कारण है वह असत् कैसा ? यदि अवस्तुभूत सामान्यसे उपहित सत् स्वलक्षण वस्तुका कार्य-कारणभाव माना जाय तो जैसे काल्पनिक बीजत्व सामान्योपहित स्वलक्षण बीजसे अङ्कुरत्व जातीयकी उत्पत्ति मानी जा सकती है उसी तरह अनिर्वचनीय शक्ति उपहित कूटस्थ कारणसे अनिर्वचनीय कार्यकी उत्पत्ति होनेमें कोई भी आपत्ति नहीं हो सकती। उसी तरह काल्पनिक उपकारसे काल्पनिक कार्यकी उत्पत्ति वेदान्त सिद्धान्तमे उपपन्न होती है। यदि अभावसे भावकी उत्पत्ति मानी जाय तो सभी कार्योंको अभावान्वित होना चाहिये। परन्तु ऐसा देखा नहीं जाता। सभी कार्य अपने भावरूपसे अन्वित ही देखे जाते हैं। मृत्तिकासे अन्वित घटादिभाव मृत्तिकाके ही विकार माने जाते हैं तन्तुविकार नहीं। उसी प्रकार भावान्वित विकारोंको भी अभावका विकार नहीं माना जा सकता। यह कहना सङ्गत नहीं है कि स्वरूपो- मा० आ० ४७--