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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

मार्क्स और आत्मा ७३७ नहीं होता, घटसे ही होता है, अतः वह अनिर्वाच्य ही है। फिर भी स्थिरको अकारण नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अनिर्वचनीय शक्ति विशिष्ट मृत्तिकादि उपादान रूपसे स्थिर ही कारण होता है। उसीसे अनिर्वचनीय कार्य उत्पन्न होता है। इसीलिये श्रुति भी कारणको ही सत्य और कार्यको मिथ्या कहती है (वाचा- रम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्) जैसे रज्जु सर्पभ्रममें स्थिर रज्जु उपादान है, वैसे ही स्थिर कारण ही कार्यका उपादान होता है। जो लोग सर्वतो विलक्षण स्वलक्षणको ही सत् मानते हैं उनके यहाँ यह विचारणीय है कि क्यों बीज जातियोसे अङ्कुर जातियोंकी ही उत्पत्ति होती है। क्रमेलक (उष्ट्र) जातियों- की उत्पत्ति क्यों नहीं होती ? जैसे बीजसे बीजान्तर विलक्षण है, वैसे ही क्रमेलक (उष्ट्र) भी विलक्षण है, विलक्षणतामें कोई भेद नहीं है। बीजत्व, अङ्कुरत्व, सामान्य जाति भी परमार्थ सत् नहीं है। इसीलिये इनका कार्यकारणभाव भी परमार्थ नहीं है। अतएव काल्पनिक स्वलक्षण बीजजातीय उपादानसे काल्पनिक ही अङ्कुरजातीय कार्यकी उत्पत्तिका नियम है यह मानना पड़ेगा। बौद्धसे यहाँ प्रश्न हो सकता है कि व्यक्तियोंका ही कार्य-कारणभाव होता है या सामान्य (जाति) का भी अथवा सामान्योपहित व्यक्तियोंका ? यदि व्यक्तियोंका कार्य कारणभाव हो तो व्यक्ति अनन्त होते हैं सबका ज्ञान असम्भव है। उनमें कार्य-कारणभावकी व्याप्ति गृहीत नहीं हो सकती। फिर कार्यहेतुक अनुमान ही लुप्त हो जायगा। क्योंकि अनुमान सदा ही सामान्योपाधिमें प्रवृत्त होता है। यदि सामान्योंका ही कार्य-कारणभाव माने तो भी प्रश्न होगा कि बीजत्व, अङ्कुरत्व आदि सामान्य वस्तु सत् हैं कि असत् ? पहला पक्ष बौद्धको मान्य नहीं है साथ ही वस्तुओंका कार्य-कारणभाव भी विरुद्ध है। क्योंकि बौद्ध अर्थक्रियाकारिताको ही सत्य मानता है फिर जो कारण है वह असत् कैसा ? यदि अवस्तुभूत सामान्यसे उपहित सत् स्वलक्षण वस्तुका कार्य-कारणभाव माना जाय तो जैसे काल्पनिक बीजत्व सामान्योपहित स्वलक्षण बीजसे अङ्कुरत्व जातीयकी उत्पत्ति मानी जा सकती है उसी तरह अनिर्वचनीय शक्ति उपहित कूटस्थ कारणसे अनिर्वचनीय कार्यकी उत्पत्ति होनेमें कोई भी आपत्ति नहीं हो सकती। उसी तरह काल्पनिक उपकारसे काल्पनिक कार्यकी उत्पत्ति वेदान्त सिद्धान्तमे उपपन्न होती है। यदि अभावसे भावकी उत्पत्ति मानी जाय तो सभी कार्योंको अभावान्वित होना चाहिये। परन्तु ऐसा देखा नहीं जाता। सभी कार्य अपने भावरूपसे अन्वित ही देखे जाते हैं। मृत्तिकासे अन्वित घटादिभाव मृत्तिकाके ही विकार माने जाते हैं तन्तुविकार नहीं। उसी प्रकार भावान्वित विकारोंको भी अभावका विकार नहीं माना जा सकता। यह कहना सङ्गत नहीं है कि स्वरूपो- मा० आ० ४७--

७३८ मार्क्सवाद और रामराज्य पमर्द्द बिना किसी कार्यकी उत्पत्ति ही नहीं होती । अतः कूटस्थ किसी कार्यका कारण नहीं हो सकता । इसलिये अभावसे भावकी उत्पत्तिका सिद्धान्त ही ठीक है क्योंकि स्थिर स्वभाववाले एकरूपसे प्रत्यभिज्ञात सुवर्णादि ही कटकादिके कारण देखे जाते हैं । उपमर्द तो पूर्व अवस्थाका होता है । उपमृदित पूर्वावस्था उत्तरावस्थाका कारण नहीं है । किंतु अनुपमृदित अन्वयी बीजावयव ही अङ्कुरादिके कारण होते हैं । कारणमें युगपत् अनेक अवस्था नहीं रह सकती । इसीलिये अङ्कुरावस्थाको लानेके लिये बीजावस्थाको हटना पड़ता है । घटावस्था लानेमें पिण्डावस्थाको भी हटना पड़ता है । अतएव बीजावस्था या पिण्डावस्था अङ्कुरादिके कारण नहीं है । किंतु बीजादिके अवयव ही कारण हैं । अतएव उन्हीका कार्यमें अन्वय है अवस्थाका अन्वय नहीं । शशविषाणादि असत्से उत्पत्ति नहीं होती ! सुवर्णादि सत्से ही उत्पत्ति होती देखी जाती है अतः अभावसे भावोत्पत्तिका सिद्धान्त सर्वथा असङ्गत है । यदि अभावसे भावकी उत्पत्ति हो तो प्रयत्नहीन लोगोंकी भी अभीष्ट- सिद्धिमें कठिनाई नहीं होनी चाहिये । क्योंकि अभावरूपी साधन तो सबको सुलभ है । कृषकको बिना प्रयत्न ही व्रीहि-यवादिकी प्राप्ति होनी चाहिये । कुलालको भी प्रयत्न बिना ही घटादिकी निष्पत्ति होनी चाहिये । तन्तुवायके प्रयत्न बिना ही वस्त्रकी प्राप्ति होनी चाहिये । शिल्पियोंके प्रयत्न बिना ही विविध प्रकारके यन्त्रोंका निर्माण हो जाना चाहिये । स्वर्ग-अपवर्गके लिये भी किसीको कोई चेष्टा करनेकी आवश्यकता नहीं होनी चाहिये । पर यह सब सङ्गत नहीं । विज्ञानवादी योगाचारका कहना है कि बाह्यार्थवादमें बुद्धका तात्पर्य नहीं था। कुछ शिष्योंका बाह्यार्थमें अभिनिवेश देखकर ही उन्होंने पञ्चस्कन्धका निरूपण किया है । वस्तुतः विज्ञानमात्र एक ही स्कन्ध बुद्धको अभीष्ट था । कहा जा सकता है कि प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और प्रमिति—ये चार प्रकारके तत्त्व होते हैं । इनमेंसे एकके अभावमें भी तत्त्वका व्यवस्थापन नहीं बन सकता । अतः विज्ञानमात्रको तत्त्वसिद्ध करनेके लिये प्रमात्रादितत्त्व चतुष्टय मानना ही पड़ेगा । फिर जब, चार वस्तुएँ माननी ही पड़ीं तो विज्ञानमात्र वस्तु है यह कैसे कहा जा सकता है । परंतु विज्ञानवादीका कथन है कि यद्यपि विज्ञानरूप अनुभवसे भिन्न अनुभाव्य, अनुभविता एव अनुभवन कुछ भी नहीं है । तथापि बुद्धिकल्पितरूपसे विज्ञानमें प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और प्रमिति आदिका व्यवहार बन जाता है । असत्य आकारयुक्त विज्ञानका स्वरूप प्रमेय है । प्रमेय प्रकाशन प्रमाण फल है । प्रकाशन शक्ति ही प्रमाण है । बाह्यार्थवादमें भी बुद्ध्यारोहके बिना प्रमाणादि व्यवहार नहीं बन सकता । यदि प्रमाण और फलके भिन्न अधिकरण हो तो प्रमाण फलभाव हो ही नहीं सकता ।

मार्क्स और आत्मा ७३९ इसीलिये खदिर गोचर परशु व्यापार होनेसे भी पलाशमें द्वैधीभाव ( टुकड़ा ) नहीं होता जिसमें व्यापार होता है उसीमें फल होता है। उसी तरह प्रमाण (करण) और प्रमिति फल दोनोंका एक ही अधिकरण होनेपर ही करण फलभाव हो सकता है। यद्यपि परशु स्वावयवोंमें समवेत है और द्वैधीभाव खदिरमें समवेत है तथापि व्यापाराविष्ट करणीभूत परशु संयोग सम्बन्धसे खदिरमें रहता है और द्वैधीभाव भी खदिरमें है ही। इस तरह करणफलका एकाधिकरण्य सामानाधिकरण्य ही है, इसी तरह एक ज्ञानमें ही प्रमाणफलभाव मानना ठीक है। अब यहाँ विचार करना होगा कि ज्ञानमें प्रमाण और फल कैसे सम्भव होंगे। जैसे कुण्डमें बदर ( बेर ) की अवस्थिति होती है, उसी तरह क्या ज्ञानमे प्रमाण और फलका अवस्थान हो सकता है ? कहना होगा कि ज्ञान असंयोगी वस्तु है, अतः उसमें संयोग-सम्बन्धसे प्रमाण और फल नहीं रह सकते, किंतु तादात्म्य या अभेद सम्बन्धसे ही ज्ञानमे उनकी स्थिति कहनी पड़ेगी। यदि वस्तुतः प्रमाण और फल ज्ञानसे भिन्न हों तो उनका ज्ञानके साथ एकता या तादात्म्य असम्भव ही है। अतः ज्ञानमें ही कल्पित प्रमाण फलभाव मानना ठीक है। यदि प्रमाण और फल दोनो ही ज्ञानके अश हों तभी प्रमाण और फल ज्ञानस्थ हो सकते है । परंतु ज्ञान स्वलक्षण ( सर्वविशेषरहित ) अनंश होता है, अतः उसमें वस्तु सत्प्रमाण और फल नहीं रह सकते, वही ज्ञान अज्ञान व्यावृत्ति या अज्ञानापहाररूपसे फल है वही अशक्ति व्यावृत्तिरूप आत्मस्वरूप अनात्म बाह्यार्थ प्रकाश शक्तिरूपसे प्रमाण है। ज्ञानका ही बाह्याकार बाह्य घटादि पदार्थ है। वैभाषिकोंके यहाँ बाह्य अर्थ प्रत्यक्ष होता है और सौत्रान्तिकोंके यहाँ ज्ञानगत आकारके वैचित्र्यसे बाह्यार्थका अनुमान होता है। ज्ञानमे जो बाह्य नीलादि सारूप्य भासमान होता है वह अनीलाकारका अपोहरूप ही है, वही बाह्यार्थका व्यवस्थापन करता है जैसे कि प्रतिबिम्ब बिम्बका व्यवस्थापन करता है। इस दृष्टिसे ज्ञान ही बाह्यार्थ व्यवस्थापक होनेके कारण प्रमाण है। अज्ञान ( अर्थात् ज्ञानभिन्न अन्य ) की व्यावृत्तिरूपसे ज्ञानत्व सामान्य ही प्रमाण फल है क्यो

७४० मार्क्सवाद और रामराज्य सकता। क्योकि बाह्यार्थ असम्भव है। यहाँ यह विचारणीय है कि क्या बाह्यार्थ घटादि परमाणुरूप ही हैं या परमाणुसमूह ? परमाणुघटादि प्रत्ययके आलम्बन नही हो सकते; क्योकि व्यवहारमे एक और स्थूल घटाद्याकाराभास ज्ञान होता है परम सूक्ष्म परमाण्वाभास ज्ञान नहीं होता। अन्याभास ज्ञान अन्यको विषय नही कर सकता। अतः एक घटाद्याभास ज्ञान अनेक परम सूक्ष्म परमाणुओको विषय नहीं कर सकता। यदि ऐसा नहीं माने तो घटाभास ज्ञानके सर्वगोचर होनेसे सर्वज्ञतापत्ति हो जायेगी। इसलिये एक-एक परमाणु घटादि प्रत्ययका परिच्छेद्य नही हो सकता है। परमाणु समूह भी घटादिप्रत्यय परिच्छेद्य नहीं बन सकते, क्योकि समूहका समूहियोसे भिन्न या अभिन्नरूपसे निरूपण नहीं हो सकता। अभिन्न कहे तो पूर्वोक्त दोष ही होगा भिन्न कहे तो समूहियोके पृथक् हो जानेपर भी उसकी सत्ता रहनी चाहिये, भिन्न होनेपर भी दोनो किसी सम्बन्धसे सम्बन्धित हैं या नहीं ? यदि हैं तो कौन सम्बन्ध है समवाय सम्बन्ध कहे तो वह समवायियोसे सम्बन्धित हैं या नहीं ? यदि नही तो वह स्वयं असंबद्ध दूसरोको कैसे सम्बन्धित करेगा। यदि स्वयं सम्बन्धान्तरसे सम्बन्धित है तो वह सम्बन्ध सम्बन्धान्तर सापेक्ष होगा इस तरह अनवस्था प्रसङ्ग होगा। यह भी विचारणीय है कि घटादिगत स्थूलत्वादि प्रतिभासमान ज्ञानका धर्म हे अथवा प्रतिभासकालमे प्रतिभासित अर्थका। यदि पहली बात मान्य है तो ज्ञान- स्वांशका ही अवलम्बन करता है। अतः ज्ञानभिन्न अर्थ नही है यह पक्ष स्वीकृत हो गया, यदि कहा जाय कि रूपपरमाणु ही निरन्तर (मिलकर) एक विज्ञानके विषय होकर स्थूलरूपसे भासित होते हैं ऐसा माननेमे भ्रान्तिको भी कोई स्थान नही। वे परमाणु नहीं हैं यह तो नही कहा जा सकता। इसी तरह वे सम्मिलित नही हैं यह भी नही कहा सकता। एक विज्ञानोपारोही (एक विज्ञानके विषय) नहीं है यह भी नहीं कहा सकता, अतः भले ही नीलत्वादिके तुल्य स्थूलत्व परमाणु- का धर्म न हो क्योकि नीलत्वादिकी तरह वह प्रत्येक परमाणुमें नही है परंतु प्रतिभासदशापन्न परमाणुओका स्थूलत्वादि बहुत्वदिके समान सांवृतिक (मायिक) धर्म हो सकता है। ग्रहेऽनेकस्य चैकेन किञ्चिद्रूपं हि गृह्यते। साम्प्रतं प्रतिभासस्थ तदेकात्मन्यसंभवात् ॥ १ ॥ न च तद्दर्शनं भ्रान्तं नानावस्तुग्रहाद्यतः। सांवृतं ग्रहणं नान्यत् न च वस्तुग्रहो भ्रमः ॥ २ ॥ अर्थात् एक ज्ञानसे अनेक परमाणुओका ग्रहण होनेपर सांवृत स्थूलरूप भासित होता है। विशकलित परमाणुतत्त्वको स्थूल बुद्धि ढक देती है इसीलिये वह सांवृति है, एक-एक परमाणुओमे स्थूल बुद्धि असम्भव है, इस तरह स्थूल दर्शनको भ्रान्त नही कहा जा सकता। क्योकि नाना वस्तु परमाणु उसके विषयमे हैं ही। जो

भिन्न बुद्धिसे गृहीत होते हैं वे ही मिलित होकर एक बुद्धि गृहीत होकर स्थूलता- कारसे प्रतिभासित होते हैं । विज्ञानवादी वाह्यार्थवादीके इस पक्षका भी खण्डन करता है और कहता है कि परमाणुओमें नैरन्तर्यकी प्रतीति भ्रान्ति ही है क्योकि रूप परमाणु गन्ध, रस, स्पर्श, परमाणुओंसे व्यवहित ही हैं अव्यवहित (निरन्तर) नही, जैसे दूरसे देखने- पर व्यवधानयुक्त अनेक वृक्षोंमें भी एक सघन वन प्रत्यय होता है। उसी तरह सान्तर व्यवहित परमाणुओमे स्थूल प्रत्यय भ्रान्ति ही है। इस घटादि प्रत्यय 'पीतः शंखः, इस ज्ञानके तुल्य भ्रान्ति ही है अतः परमाणु घटादि प्रत्ययके विषय नही हो सकते । कुछ लोगोका कहना है कि स्थूल प्रत्यय स्वलक्षण विषयक है अतः निर्विकल्पक प्रत्यय होनेसे भ्रान्त नहीं है। सविकल्प प्रत्यय अवस्तुभूत सामान्यविषयक होनेसे भ्रान्त होता है । परतु यह ठीक नहीं क्योकि यद्यपि 'स्थूलम्' यह ज्ञान व्यक्ति ज्ञान है व्यक्तिमे सम्बन्ध ग्राह्य होनेसे वह शब्द वाच्य भी नहीं है तो भी पूर्वोक्त युक्तिसे स्थूल प्रत्यय भ्रान्त है। अतः वह प्रत्यय नही 'कल्पनापोढमभ्रान्त प्रत्यक्षम्' यही प्रत्यक्षका लक्षण है अभिलापादि कल्पनारहित कल्पना पाठ होनेपर भी वह अभ्रान्त नही है। इस तरह यदि परमाणुसमूह घटादि परमाणुओंसे अभिन्न है तो परमाणु स्वरूप ही होनेसे वे घटाद्याभास प्रत्ययके गोचर नहीं हो सकते । यदि भेद है तो गवाश्वादिके समान अत्यन्त विलक्षण होनेसे उनमे तादात्म्य नही बन सकता । समवायसम्बन्ध भी निराकृत ही है। इसी तरह जाति-गुण-कर्मादिका भी प्रत्याख्यान किया जा सकता है। जो जो प्रतिभासित होता है वह-वह विचारा सह है। अप्रतिभासमानके सद्भावमें कोई प्रमाण नहीं है। अतः कोई भी प्रत्यय बाह्यालम्बन नहीं होते हैं। विज्ञानवादीका यह भी कहना है कि यह नही कहा जा सकता कि विज्ञान इन्द्रियकी तरह स्वय विलीन (अज्ञात) रहकर ही अर्थका प्रकाशन करेगा । यह भी नहीं कहा जा सकता कि जैसे इन्द्रिय अर्थ विषयक ज्ञान उत्पन्न करती है वैसे ही ज्ञान भी किसी अन्य ज्ञानको उत्पन्न करेगा क्योकि इस तरह समान होनेसे वह ज्ञान भी ज्ञानान्तर जनन करेगा तो अनवस्था प्रसङ्ग होगा । यह भी नही कहा जा सकता कि ज्ञान अर्थमें प्राकट्य लक्षण फलका आधान करेगा, क्योकि अतीत अनागत विषयोमें अविद्यमानताके कारण प्राक्स्वरूप फलका आधान हो ही नहीं सकता, इसलिये यह मानना चाहिये कि ज्ञानस्वरूपकी प्रत्यक्षता ही अर्थकी प्रत्यक्षता है वह ज्ञान अनाकार होनेसे स्वभावतः भेदरहित है फिर उसके द्वारा अर्थभेद व्यवस्था कैसे हो सकती है ? अतः अर्थभेद व्यवस्थाके लिये ज्ञानमे आकारभेद भी स्वीकार करना आवश्यक है। पीछे कहा जा चुका है कि 'वित्तिसत्ता ही अर्थवेदन नहीं हो

७४२ मार्क्सवाद और रामराज्य सकती इत्यादि, परंतु आकार एक ही अनुभूत होता है । यदि यह विज्ञानका आकार है तो अर्थ सद्भावमें कोई प्रमाण नहीं सिद्ध होता । एक रूपसे उत्पन्न होनेवाले ज्ञानोंमेंसे घटज्ञान, पटज्ञान आदि रूपसे प्रति- विषयोमे पक्षपात प्रतीत होता है, वह ज्ञानगत विशेषके बिना उपपन्न नहीं हो सकता; अतः ज्ञानमें विषय-सारूप्य मानना चाहिये । यदि ज्ञानमे विषयसारूप्य मान लिया गया तो ज्ञानकी विषयाकारता ज्ञानसे ही अवरुद्ध है फिर बाह्यार्थ सद्भावकी कल्पना व्यर्थ ही है। इसी तरह सहोपलम्भ नियमसे भी विषय और ज्ञानका अभेद मालूम पड़ता है, इनमेसे एकके उपलम्भ हुए बिना दूसरेका उपलम्भ नही होता । यदि ज्ञान और अर्थका स्वाभाविक भेद हो तो यह नियम नही बन सकता घट-पट आदि भिन्न हैं तो उनमे सहोर्पालम्भका नियम नही होता है। मृत्तिका और घटमें सहोपलम्भका नियम होता है अतः मृत्तिकासे भिन्न घटकी सत्ता नही होती । यही स्थिति ज्ञान और ज्ञेयके सम्बन्धमें भी कही जा सकती है । जिसका जिसके साथ नियमेन सहोपलम्भ होता है वह उससे भिन्न नही होता । जैसे एक चन्द्रसे भ्रान्ति सिद्ध द्वितीय चन्द्रका भेद नही होता उसी तरह ज्ञानके साथ अर्थका सहोपा- लम्भ नियत है । भिन्न-भिन्न घट-पटको एव दो अश्विनीकुमारोका भी ऐसा सहोपलम्भ नियम नही होता, अपितु पृथक् भी उनका उपालम्भ होता है। बादलसे एकके ढके रहनेपर भी दूसरा दीखता है। इस तरह भेद व्यापक अनियमके विरुद्ध सहो- लम्भ नियम तद् व्याप्यभेदको निवृत्त कर देता है, यही विज्ञानवादियोका सिद्धान्त निम्नकारिकासे व्यक्त होता है। सहोपलम्भनियमादभेदो नीलतद्धियोः । भेदश्च भ्रान्तिविज्ञानैर्दृश्येतेन्दाविवाद्वये ॥ अर्थात् सहोपलम्भके नियमसे नीलज्ञेय और नीलज्ञानका अभेद ही है । भ्रान्तिके कारण भेद उसी तरह प्रतीत होता है जैसे अद्वितीय चन्द्रमें चन्द्रका भेद प्रतीत होता है । जैसे स्वप्न, माया, रज्जु, सर्प तथा गन्धर्व नगरादि प्रत्यय बाह्यार्थ- के बिना ही ग्राह्य-ग्राह्याकार होते हैं, वैसे ही जागरितकालके घटादि-प्रत्यय भी बाह्यार्थ बिना ही ग्राह्य-ग्राह्यकाकार होते हैं । क्योकि सभीमें प्रत्ययत्व समान है। अर्थात् जो-जो प्रत्यय है वह सभी बाह्यार्थशून्य है । किसीका भी बाह्यार्थ आलम्बन ( विषय ) नही होता है । प्रत्ययत्व स्वभाव ही इसमें हेतु है । जैसे शिंशपात्व निम्बत्त्वादिमात्रानुबन्धिनी वृक्षता होती है, उसी प्रकार प्रत्ययत्वमात्रानुबन्धिनी बाह्यानालम्बनता रहती है । जैसे शिंशपात्व निम्बत्वादि जहाँ हैं वहाँ वृक्षता होती ही है, उसी तरह प्रत्ययत्व जहाँ है वहाँ निरालम्बनता है ही । इसी तरह प्रत्ययत्व हेतुसे ही स्वप्नादि प्रत्ययोके समान ही घटादि प्रत्ययकी निरालम्बनता सिद्ध होती है ।

उस सम्बन्धमें सौत्रान्तिक कहता है कि बाह्यार्थ न रहनेसे घटादि प्रत्ययोंमें विचित्रता किसी तरह उपपन्न नहीं हो सकती है, अतः बाह्यार्थका स्वीकार करना आवश्यक है। इस विषयमें निम्न अनुमान किया जा सकता है जिसके रहनेपर भी जो कादाचित्क होते हैं वे तद्भिन्न हेतुकी अपेक्षा रखते हैं जैसे मुझमें आलय-विज्ञान जिगमिषा (गमनेच्छा) विवक्षा (भाषणेच्छा) न रहनेपर भी जब वचन, गमन प्रतिभास प्रत्यय होता है तो उन्हें मेरेसे भिन्न पुरुषान्तर संतान-सापेक्ष मानना पड़ता है। इसी तरह 'अहं अहम्' उस रूपसे उदीयमान आलय विज्ञानसे जायमान शब्द स्पर्श, रूप, रस, गन्ध और सुखादि प्रत्यय कादाचित्क होते हैं, ये छहों अर्थ प्रकृतिके हेतु होनेसे प्रवृत्ति विज्ञान कहे जाते हैं। ये आलय विज्ञानके रहनेपर भी कभी ही होते हैं, अतः ये भी ज्ञानातिरिक्त हेतुसे उत्पन्न होने चाहिये । जो आलय-विज्ञान संताना- तिरिक्तका कादाचित्क प्रवृत्ति विज्ञान विशेषका हेतु है वही बाह्यार्थ है। यहाँ विज्ञान- वादी कहता है कि वासनापरिपाक प्रत्ययके कादाचित्क होनेसे प्रवृत्ति विज्ञानका बाह्यार्थ- निरपेक्ष ही कादाचित्क उत्पाद बन जायगा । क्योंकि विज्ञानवादके अनुसार एक संतानवर्ती आलय-विज्ञानोंकी प्रवृत्ति विज्ञान जनन-शक्ति ही वासना है, उस शक्तिका स्वकार्य जननाभिमुखता ही परिपाक है। स्वसंतानवर्ती पूर्व क्षण ही उस परिपाकका प्रत्यय हेतु है। अर्थात् प्रवृत्ति-विज्ञानजनक आलय-विज्ञानसे पूर्व उसी आलय- विज्ञान संतानमें जब कभी उत्पन्न नीलादि प्रत्यय ही वासना परिपाकका हेतु (प्रत्यय) है। विज्ञानवादीके अनुसार स्वसंतानपतित नील प्रत्ययक्षण ही उत्तरवर्ती वासना परिपाकका हेतु माना जाता है। सर्वज्ञादि संतानवर्ती क्षण वासना परिपाकका कारण नहीं होता इस पर सौत्रान्तिकका कहना है कि प्रवृत्ति विज्ञानजनक आलय-विज्ञानवर्ति- वासना परिपाकके प्रति आलय विज्ञान संतानवर्ती सभी क्षणोंको हेतु कहना चाहिये अन्यथा किसी भी क्षणको हेतु नहीं कहा जा सकता, क्योंकि सभी क्षण संतानान्तःपाती हैं फिर क्या कारण है कि कोई क्षण वासना परि- पाकका हेतु बने और कोई न बने। यहाँ विज्ञानवादी कहता है कि क्षणभेदसे शक्तिमें भेद होता है। इस प्रकार आलय विज्ञान संतानवर्ती क्षणोंमें भेद है तथा प्रति- क्षणोंमें शक्ति भेद भी है। वह शक्तिविशेष कादाचित्क ही होता है। उस शक्त एक क्षणके अनन्तर उसका कार्य आलय-विज्ञान क्षणवर्तिवासना परिपाक भी कादाचित्क होगा। पुनश्च तज्जनित प्रवृत्ति विज्ञान भी कादाचित्क होगा । विज्ञानवादीके इस पक्षका खण्डन करता हुआ सौत्रान्तिक कहता है कि फिर तो आलय-विज्ञान संतानसे एक ही आलय-विज्ञानमें नीलादि प्रवृत्ति विज्ञानजनकता होगी, और उसमें प्राक्तन- आलय विज्ञानवर्ती एक नीलादि विज्ञान क्षणमें वासना परिपाक हेतुता होगी। उस तरह एक संतानमें एक ही आलय-विज्ञान प्रवृत्ति विज्ञानजनन समर्थ होगा और उससे प्राक्तन-

७४८ मार्क्सवाद और रामराज्य आलय-विज्ञानवर्ती नील विज्ञान क्षण ही वासना परिपाकका हेतु होगा । इस तरह एक आलय संतानमें दो ही क्षण कारण होगे और कोई भी क्षण कारण नही होगा, परंतु होता है इसके विपरीत । अनेको वार नील विज्ञान होते ही हैं । यदि तदितर पूर्व ज्ञानोमें परिपाक हेतुता हो और उत्तरोत्तर आलय विज्ञानोमें प्रवृत्ति विज्ञान जनकता हो तो यह कैसे कहा जा सकता है कि क्षण भेदसे शक्तिभेद मान्य है । ऐसी स्थितिमें यदि विज्ञानवादी आलयविज्ञान संतानवर्ती सभी क्षणोका प्रवृत्ति विज्ञान जनन समर्थ तथा सभी तत्सतानवर्ती प्राक्तन नीलादि ज्ञान क्षणोको वासना परिपाकका हेतु मानता है तो समर्थमें कालक्षेप होता नहीं । अतः सदा ही नीलज्ञान होते रहना चाहिये साथ नीलज्ञानको कादाचित्क न होना चाहिये । इस प्रकार विचार करनेपर स्वसतान मात्राधीन होनेपर कादाचित्कत्वके विरुद्ध सदा सत्त्वकी प्राप्ति होती है । उससे नीलज्ञानका कादाचित्कत्व निवृत्त होगा, परंतु यह उपलब्धि विरुद्ध है । नीलज्ञानमें कादाचित्कत्व, उपलब्ध होता ही है । इसीलिये आलय विज्ञानसे अन्य वाह्यार्थ सापेक्ष होनेपर भी नीलज्ञानका कादाचित्क- त्व बन सकता है और तब जिसके रहनेपर भी जो कादाचित्क होते है वे तदतिरिक्त सापेक्ष होते हैं । इस प्रकार सौत्रान्तिकके द्वारा कथित व्याप्य व्यापकका व्याप्ति सम्बन्ध सिद्ध होता है । यदि कहा जाय कि नीलविज्ञान हेत्वन्तर अपेक्षा रख सकता है, पर वह हेत्वन्तर अन्य आश्रय-विज्ञान सतान ही हो सकता है बाह्यार्थ नहीं, परंतु यह ठीक नहीं, कारण कि विज्ञानवादी प्रवृत्ति विज्ञानोको सतानान्तर निबन्धन नही मानते । जिस समय चैत्रसतानमे गमन, वचन प्रतिभासप्रत्यय विच्छिन्न होते हैं उस समय मैत्र सतानमे रहनेवाले वचन, गमन प्रतिभास निमित्तक ही चैत्रमे गमनवचनादि गोचर प्रवृत्ति विज्ञान उत्पन्न होते हैं किंतु विवक्षु, जिगमिषु चैत्रमें होनेवाले गमन- वचन प्रतिभास चैत्र संतान हेतुक ही होते हैं । स्वसंतान हेतुक प्रवृत्ति विज्ञान माननेपर पूर्वोक्तरीतिसे नीलादिज्ञानका कादाचित्क नही बन सकता । अतः नीलादि- ज्ञानको वाह्यार्थ सापेक्ष मानना ही ठीक है । यदि प्रवृत्तिज्ञानको अन्यसतान निमित्तक माना जाय तो भी वह सत्त्वान्तर सतान भी तो सदा सन्निहित ही रहता है । अतः प्रवृत्तिविज्ञानोका कादाचित्कत्व बन नहीं सकता । क्योंकि चैत्रसंतानसे मैत्रसतानका देश तथा कालद्वारा विप्रकर्ष (दूरी) सम्भव नहीं है । इसमे यह कारण है कि विज्ञानवादीको विज्ञानसे भिन्न देशकालादि अमान्य ही होते हैं । अमूर्त होनेसे विज्ञानोको अदेशात्मक माना जाता है अतः देशकृत विप्रकर्ष नही हो सकता । इसी तरह विज्ञान संतानोंका कालकृत विप्रकर्ष भी नहीं हो सकता क्योकि सादिता दोष प्रसक्तिके डरसे विज्ञानवादी नवीन सत्त्वो (विज्ञानसतानरूप

आत्मा ) का आविर्भाव नहीं मानते हैं । जब देशकृत या कालकृत विप्रकर्ष सम्भव ही नहीं तो मनानान्तर सन्निधान भी सर्वदा रहेगा ही, फिर प्रवृत्ति विज्ञानको सदा ही उत्पन्न होते रहना चाहिये किंतु प्रवृत्ति विज्ञानकी कादाचित्कता ही प्रत्यक्ष है, अतः बाह्यार्थ मानना अत्यावश्यक है उसके बिना कादाचित्क प्रवृत्तिविज्ञान नहीं बन सकता । सौत्रान्तिकके इस मतका खण्डन करता हुआ विज्ञानवादी कहता है कि वासना वैचित्र्यसे प्रत्यय वैचित्र्य उत्पन्न हो ही सकता है । उनका अभिप्राय यह है कि स्वसंतानसे ही प्रवृत्तिविज्ञानोंकी उत्पत्ति मानी जायतो भी उसके कादाचित्कत्वकी उपपत्ति हो जायगी । अतः सौत्रान्तिकके बाह्यार्थ साधक हेतुकी विपक्ष व्यावृत्ति संदिग्ध है जिससे वह अनेकान्तिक है । नीलादि ज्ञानको बाह्यनिमित्तक मान भी लें तो भी क्यों कभी नीलज्ञान कभी पीतज्ञान होता है यदि बाह्यनील पीतके सन्निधान-असन्निधानमे यह व्यवस्था कही जाय तो भी प्रश्न होगा कि पीत सन्निधानमें भी नीलज्ञान क्यो नहीं होता, पीत ही ज्ञान क्यो होता है । यदि कहें कि पीतमें नीलज्ञानजननकी सामर्थ्य नहीं है तो भी प्रश्न होगा कि यह सामर्थ्य-असामर्थ्यका भेद कैसे होता है । यदि हेतुभेदसे कहा जाय तो इसी तरह क्षणों ( क्षणिक आलय विज्ञानों ) में भी स्वकारण भेदके कारण शक्ति भेद हो ही सकता है संतानीक्षण ही कार्य भेदके हेतु होंगे, वे प्रति कार्य भिन्न ही होते हैं । मतान नामकी कोई एक वस्तु क्षणोंकी उत्पादिका नहीं होती जिसके अभेदसे क्षण भेदमें बाधा पड सके । जो यह कहा जाता है कि आलय-विज्ञान क्षणोंमें स्वस्वहेतु वैचित्र्यसे सामर्थ्य भेद होनेपर भी एक मतानस्थ होनेके कारण सबमें एक ही प्रकारकी सामर्थ्य होगी वह इसलिये ठीक नहीं कि यह कहा ही जा चुका है कि मतानके अभेद होनेपर भी क्षणोंमें सामर्थ्यभेद है । सौत्रान्तिकका कहना है कि क्षणके भेदा-भेदसे शक्तिका भेदा-भेद नहीं हो सकता । क्योंकि भिन्न क्षणोंमें भी एक सामर्थ्यकी उपलब्धि होती है । अन्यथा यदि एक ही क्षण नीलज्ञान जनन समर्थ हो तो पुन. कभी भी नील- ज्ञानोंकी उत्पत्ति नहीं होनी चाहिये । क्योंकि इस दृष्टिमे जो समर्थ क्षण था वह व्यतीत हो चुका और क्षणान्तरोंमें नीलज्ञानजनन सामर्थ्य है ही नहीं, इसलिये क्षण भेदसे सामर्थ्य भेद होता है यह पक्ष उचित नहीं । एक ज्ञान मतानमें अनेकों बार नीलज्ञान होता ही है किंतु मनान भेदसे ही सामर्थ्य भेद होता है । अतः आलय विज्ञान संतानोंसे भिन्न बाह्य नीलादि संतानोंसे नीलादि प्रवृत्तिविज्ञानोंका उत्पन्न होना सगत होता है । इस दृष्टिसे बाह्यार्थ सिद्ध होता है परंतु यह भी ठीक नहीं । क्योंकि यदि भिन्न संतानोंमें सामर्थ्यभेद मान्य होगा तो यह भी कहना पड़ेगा कि भिन्न मनानोंमें एक सामर्थ्य नहीं है । ऐसी स्थितिमें विभिन्न नीलसंतानोंमे भी नीलाकारके

आधानकी एक सामर्थ्य होनी चाहिये । फिर तो अन्यनील सतानोंका सन्निधान रहने- पर भी नीलज्ञान न होना चाहिये, परतु यह 'सब अनुभवविरुद्ध है । अतः नील- पीतादि सतानोंके समान ही स्वकारणाधीन उत्पन्न होनेवाले क्षणान्तरोंमें भी किन्हीमे सामर्थ्य विशेष होता है किन्हीमें नही । इस प्रकार एक आलयविज्ञान सन्तति- पतित क्षणोमे किसी ही ज्ञानक्षणमें सामर्थ्य विशेष होता है किसीमे नही होता । स्वप्रत्यय ( पूर्वोत्पन्न नीलज्ञान ) से आसादित वही सामर्थ्यातिशय वासना है । किसीसे नीलाकार ही ज्ञान होता है पीताकार नही और किसीसे पीताकार ही ज्ञान होता है इस तरह वासनावैचित्र्यसे ही ज्ञानवैचित्र्य बन सकता है । विज्ञानवादीके कहनेका सार यह है कि बाह्यार्थवादमे भी नीलादि अर्थ क्षणिक होते है तथाच नीलसन्तान भी अनेको होते है । उनमे भी संतानभेदसे यदि शक्ति- भेद माना जाय तो लीलादि सतानोंमें भी एक प्रकारकी शक्ति न सिद्ध होगी । तथा च एक ही नील नीलाकार ज्ञान उत्पन्न कर सकेगा, संतानान्तरवर्ती नील नीलाकार ज्ञानका उत्पादक न हो सकेगा । अतः क्षणभेदसे सामर्थ्यभेद माननेमे जो दोष आते हैं, संतान-भेदसे सामर्थ्यभेद माननेपर भी वे ही दोष हो सकते हैं । अतः कहना पड़ेगा कि जैसे किन्ही संतानोंके परस्परभिन्न रहनेपर भी उनमें समान सामर्थ्य होता है तभी अनेक नीलसंतानोंसे समानरूपसे नीलाकारज्ञान उत्पन्न हो सकता है । अतः सौत्रान्तिकको मानना पड़ेगा कि अनेक नीलपीतादि सतानोमे स्वकारणभेदसे ही सामर्थ्यभेद होता है । तथा च कोई नीलज्ञानका जनक होता है कोई पीत ज्ञानका । इसी तरह आलयविज्ञानपतित क्षणोके सम्बन्ध भी व्यवस्था हो सकती है । किन्ही क्षणोंमें ही उस प्रकारसे आसादित वासनारूप सामर्थ्यातिशय होता है, जिससे नीलादि प्रवृत्तविज्ञान होते हैं । सबमे वह सामर्थ्य नही होता । अतः न तो यही कहा जा सकता है कि हर एक आलय विज्ञानसे नीलज्ञान होता रहेगा और न यही कहा जा सकता है कि एक ही आलयविज्ञानसे एक ही नील ज्ञान होगा । इस तरह वासनावैचित्र्यसे सज्ञानवैचित्र्य बन सकता है । अतः प्रत्ययसे अति- रिक्ति बाह्यार्थके सद्भावमे कोई प्रमाण नहीं है । इस तरह आलयविज्ञान संतान- पतित असविदित पूर्वज्ञान ही वासना है । यद्यपि पहले शक्तिको वासना कहा गया था पर यहाँ शक्ति शक्ति मानकर अभेद समझकर पूर्व विज्ञानको ही वासना कहा गया है । वर्तमान ज्ञानमे विदित होता है, अनागत असिद्ध ही है । अतः पूर्वविज्ञानको ही असविदित कहा गया है । वासनाके वैचित्र्यसे ही नीलादि अनुभवोमे भी विचित्रता बनती है । पूर्वविज्ञानमे विचित्रता कैसे हुई इस शंकाका समाधान यही है कि अनादि संसारमे पूर्व-पूर्व नीलादि अनुभवोंसे ही उत्तरोत्तर विज्ञानोंमे वासना- वैचित्र्य सम्पन्न होता है ।

इस प्रकार पूर्व नीलादि अनुभवोंके वैचित्र्यसे वासनावैचित्र्य होता है और वासनावैचित्र्यसे अनुभवोंमें भी विचित्रता आती है। बीजाङ्कुरके समान यह परम्परा भी अनादि ही है। अन्वय-व्यतिरेकसे भी यही मालूम पड़ता है कि वासना- वैचित्र्य ही ज्ञान-वैचित्र्यका हेतु है, क्योकि स्वप्नादिमे स्पष्ट है कि बाह्यार्थके बिना भी वासनाके कारण ही विचित्र ज्ञान उत्पन्न होते हैं। यह उभयसम्मत है। परंतु वासनाके बिना अर्थनिमित्तक ज्ञान-वैचित्र्य उभयसम्मत नहीं है। अतः बाह्यार्थका अस्तित्व नही सिद्ध होता । इस प्रकार विज्ञानवादीके बाह्यार्थापलापका श्रीव्यास- शङ्कराचार्यादि वैदिक आचायोंने निराकरण किया है । 'नाभाव उपलब्धे' अर्थात् बाह्यार्थका अभाव नहीं कहा जा सकता क्योकि उसका उपलब्ध होता है। यहाँ विज्ञानवादीसे प्रश्न हो सकता है कि क्या उपलब्ध न होनेसे बाह्यार्थका असत्त्व होता है या वह उपलब्ध ही बाह्यविषयक नही है। बाच्यार्थविषयक होनेपर भी बाधक प्रमाणके सद्भावसे बाह्यार्थाभाव है। प्रथम पक्ष तो ठीक नहीं क्योकि घटादि- का उपलब्ध सर्वजनप्रसिद्ध है। खम्भ, कुड्य, घट पटादि बाह्यविषयक प्रत्येक ज्ञानोसे स्पष्टतया बाह्यार्थ भासित होते हैं। यदि कहा जाय कि उपलब्ध तो अवश्य है किंतु उपलब्धका विषय बाह्य घटादि असत् है तो यह भी ठीक नहीं, कारण कि जैसे कोई भोजन तथा भोजनसाध्य तृप्तिका अनुभव करता हुआ भी कहे कि 'न मैं भोजन करता हूँ न तृप्त ही होता हूँ' तो उसका कहना अनर्गल है। इसी तरह इन्द्रिय-सन्निकर्षसे बाह्यार्थका उपलब्ध करते हुए भी विज्ञानवादीका यह कथन कि मै बाह्यार्थका अनुभव नहीं कर रहा हूँ सर्वथा अनर्गल है। यदि वह कहे कि मै यह नही कहता कि मै बाह्यार्थका अनुभव नहीं करता हूँ अपितु यह कहता हूँ कि उपलब्धिसे भिन्न बाह्यार्थ नही है। परतु यह भी उसका कथन ठीक नहीं यतः उपलब्धिवलसे ही बाह्यार्थ स्वीकृत होता है। उपलब्धिग्राहक साक्षीसे जैसे उपलब्धि गृहीत होती है वैसे ही उसकी बाह्यविषयता भी गृहीत होती है। घटादिके ज्ञानके साथ घटादि बाह्यविषय भी गृहीत होते हैं इसीलिये बाह्यार्थका प्रत्याख्यान करने- वाला भी कहता है कि अन्तर्ज्ञेयरूप है। वही बाह्यवत् प्रतीत होता है। वे लोग भी लोकप्रसिद्ध बाह्यार्थविषयीणी संवित्‌को समझते हुए ही उसके प्रत्याख्यानके लिये बाह्यार्थको वहिर्वत् ( बाह्यतुल्य ) कहते हैं। अन्यथा वहिर्वत् कहनेका कुछ भी अर्थ नही रह जाता । अत्यन्त असत्‌के साथ उपमा उपमेयभाव भी नही बन सकता कोई यह नहीं कहता है कि विष्णुमित्र वन्ध्यापुत्रके तुल्य भासित होता है। इन सब दृष्टियोसे अनुभवके अनुसार तत्त्व स्वीकार करनेवाले स्पष्टरूपसे कहते हैं कि घट पटादि बाह्य अर्थ ही भासित होता है बहिर्वत् नही।

७४८ मार्क्सवाद और रामराज्य यदि तीसरा पक्ष कहा जाय अर्थात् बाह्यमें अर्थ असम्भव है अतः बाह्यवत् कहा जाता है। परन्तु यह भी ठीक नहीं, क्योकि सम्भवासम्भवका निर्णय प्रमाणकी प्रवृत्ति अप्रवृत्तिसे ही होता है। सम्भवासम्भवके आधारपर प्रमाणकी प्रवृत्ति अप्रवृत्ति नहीं होती। जो वस्तु प्रत्यक्षादि किसी प्रमाणसे उपलब्ध होती है, वह सम्भव है। जो किसी प्रमाणसे भी विदित न हो वह असम्भव है। यहाँ तो यथा- योग्य प्रत्यक्षानुमान आगमादि सभी प्रमाणोंसे बाह्यार्थ उपलब्ध होता है। ऐसी स्थितिमें उसमें सम्भवासम्भव आदि विकल्पोको स्थान ही नहीं है। जो कहा जाता है कि ज्ञानमें विषय सारूप्य होनेसे बाह्यार्थका भान होता है यह भी ठीक नहीं कारण कि यदि बाह्यार्थ विषय ही न हो तो ज्ञानसे विषय सारूप्य भी क्या होगा ? विषय तो 'इदन्ता एव बाह्यरूपसे ही उपलब्ध होता है फिर उसका अपलाप कैसे किया जा सकता है। मार यह है कि यद्यपि घट-पटादि स्थूलरूपमें भासित होते हैं परम् सूक्ष्ममें नहीं। नाना दिशाओं एवं

मार्क्स और आत्मा ७४९ अर्थ और ज्ञानका अभेद माना जाय तो और भी अनेक दोष प्रसक्त होंगे। जैसे अवयवी अवयवोंसे भिन्न हैं या अभिन्न ? यदि भिन्न है तो भी अवयवी समस्त अवयवोंमें रहता है या प्रत्येक अवयवोंमें। यदि प्रत्येक अवयवोंमें तो भी सम्पूर्णरूपसे रहता है या एक देशसे। यदि समस्त अवयवोंमें अवयवी रहता है तो अवयवीकी उपलब्धि न होनी चाहिये। कारण कि समस्त अवयवोंकी उपलब्धिसे ही अवयवोकी उपलब्धि हो सकती है। सर्वावयव सन्निकर्ष न होनेसे जब सब अवयवोंका उपलम्भ नहीं होता तो अवयवीकी उपलब्धि कैसे होगी। जैसे अनेक आश्रयोंमें रहनेवाला बहुत्व किसी एक आश्रयके ग्रहणसे नहीं गृहीत होता। इसी प्रकार सहस्र तन्तुओंमें रहनेवाला पट कुछ तन्तुओके ही ग्रहणसे कैसे गृहीत होगा। यदि कहा जाय कि पट अपने अवयवोंद्वारा आरम्भक अवयव तन्तुओमें रहता है तो आरम्भक अवयवोंसे भिन्न पटके पृथक् अवयव मानने पडेंगे। इस तरह अनवस्था भी होगी। उन अवयवोंमें भी वर्तनेके लिये पटको अन्य और अवयव अपेक्षित होंगे। यदि प्रत्येक अवयवमें अवयवी माना जाय तो एक जगह व्यापार होनेपर अन्यत्र अव्यापार प्रसङ्ग होगा। क्योकि जिस समय देवदत्त काशीमें वर्तमान रहता है उसी समय काश्मीरमें सन्निहित नहीं रहता। कोई परिच्छिन्न वस्तु अगर एक समयमें ही अनेक स्थानोमें सन्निहित हो तो उसे एक नहीं अपितु अनेक समझना चाहिये। इस स्थितिमे यदि प्रत्येक अवयवोमें अवयवी माना जाय तो अनेकत्वापत्ति होगी। फिर एक अवयववर्ती पटके व्यापृत हानेपर भी अन्यावयववर्ती पटको अव्यापृत ही रहना चाहिये। यदि कहा जाय कि जैसे गोत्व प्रत्येक गो व्यक्तिमें समाप्त होता है वैसे ही प्रत्येक अवयवा-अवयवी परिसमाप्त हो जाता है तो यह ठीक नहीं कारण कि जैसे गोत्व प्रति व्यक्तिमें प्रत्यक्ष उपलब्ध होता है वैसे ही अवयवी प्रत्येक अवयवोंमें प्रत्यक्ष उपलब्ध नहीं होता। यदि प्रत्येक अवयवमे पूरा अवयवी मान लिया जाय तो शृङ्गसे भी स्तनका कार्य होना चाहिये। परंतु ऐसा होता नहीं। इसी तरह यदि कहा जाय कि एक अणु दूसरे अणुसे सर्वात्मना संयुक्त होता है तो उपचय नहीं होगा यदि एक देशसे उनका मिलना माना जाय तो उनमें सावयवापत्ति होगी। कल्पित प्रदेश तो मिथ्या होनेसे अकिञ्चित्कर ही होंगे। जो रूपादिमान् होते ह वे परम कारणकी अपेक्षा स्थूल एव अनित्य होते हैं जैसे तन्तुकी अपेक्षा पट और अंशुओकी अपेक्षा तन्तु स्थूल होते हैं उसी तरह परमाणुओको स्थूल और अनित्य होना चाहिये। पृथिव्यादि परमाणुओमे यदि गन्धादि गुणोका उपचय माना जाय तो परमाणुओकी मूर्तियोंका उपचय होगा। गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, इन चार गुणोसे युक्त होनेके कारण पृथिवी परमाणुको स्थूल होना चाहिये साथ ही वायुमें केवल स्पर्श गुण होनेके कारण उसमे सूक्ष्मता प्राप्त होगी इस प्रकार परमाणुओमें भी तारतम्य होगा।

७५० मार्क्सवाद और रामराज्य यदि परमाणुओमें गुणोपचय न माना जाय तो परमाणुकार्य पृथिव्यादिमें भी गुणोपचय नही दीखना चाहिये। यदि परमाणुको निरंश माना जाय तो द्वयणुकादिमें स्थूलता न बन सकेगी। यदि वह सांश हो गया तो उसमें अनित्यता आदि भी होगी इत्यादि जो दोष वैशेषिकोंके मतमे लागू होते हैं वे सब सौत्रान्तिक एव विज्ञानवादी बौद्धोंके यहाँ भी लागू होगे। जगत्को अनिर्वचनीय माननेवाले वेदान्तीके लिये तो वस्तुओका विचारासहत्व भूषण ही है। किन्तु बौद्धोके यहाँ यह नही कहा जा सकता। बाह्य अस्तित्त्ववादी जैसे पदार्थोंको बाह्य मानता है उसी तरह विज्ञानवादी उन सभी पदार्थोंको अन्तःसत्य मानता है। यदि आन्तर पदार्थ सत्य हैं तो जैसे बाह्यपदार्थोंमे स्थौल्य आदि असम्भव है वैसे ही आन्तर पदार्थोंमे भी स्थौल्य आदि असम्भव ही होगे ऐसी स्थितिमें वैशेषिकोंके पक्षमें कहे गये सभी दोष विज्ञानवादमें भी लागू होगे। यदि कहा जाय कि ज्ञानसे अभिन्न अर्थ माननेपर एक बुद्धिभासित पटमें तद्देशत्व अतद्देशत्वादि विरुद्धधर्म संसर्ग प्रसक्त न होगे; क्योकि ज्ञानके विषय परमाणु ही होगे उनमें तद्देशत्व-अतद्देशत्वादिका कोई प्रसङ्ग ही नही होगा। परंतु वह भी कथन ठीक नही है, कारण कि यहाँ विचारना होगा कि ज्ञान-ज्ञेयका अभेद क्या है। ज्ञान ज्ञेयमात्र है या ज्ञेय ज्ञानमात्र है। पहला पक्ष ठीक नही; क्योकि यदि अनेक नीलपरमाणुओका आलम्बन करनेवाला ज्ञानज्ञेयमात्र है तो ज्ञेय नानात्वके समान ही एक नीलज्ञानमें भी नानात्वापत्ति होगी। यदि ज्ञेय ज्ञानमात्र माना जाय तो आकारोका ज्ञानसे अभेद होनेसे अनेक आकारोंमे एकत्वापत्ति- दोष होगा। यह भी नही कहा जा सकता है कि जितने आकार हैं उतने ही ज्ञान हैं; क्योकि इस तरह नानापरमाणुओको आलम्बन करनेवाले अनेक ज्ञानोके परस्पर वार्तानभिज्ञ होनेसे उनमें स्थूल वस्तुका अनुभव असम्भव ही होगा। यह भी नहीं कहा जा सकता कि एक-एक ज्ञानसे संगृहीत नाना परमाणुओका परामर्शरूप एक विकल्प ज्ञान ही स्थूलालम्बन है। क्योकि वह ज्ञान भी साकार ही होगा। उसके आकार नाना परमाणुओका भी ज्ञानसे अभेद ही होगा। यदि ज्ञान ज्ञेयमात्र होगा तो ज्ञेयभेदसे ज्ञानमें भेदापत्ति होगी। यदि आकार ज्ञानमात्र होगा तो भी आकारोमें एकत्वापत्ति होगी, इसलिये स्थूलालम्बन एक ज्ञान असम्भव ही होगा। जैसा कि धर्मकीर्तिका कहना है कि--- “तस्मान्नार्थे न च ज्ञाने स्थूलाभासस्तदात्मनः । एकत्त्वं प्रतिषिद्धत्वाद्वहुष्वपि न सम्भवः ॥”

अर्थात् वृत्ति विकल्पादि पूर्वोक्त तर्कोंसे बाह्य परमाणु समूहात्मक तथा ज्ञानात्मक आन्तरविषय माना जाय तब भी स्थूलाभास प्रत्यय नहीं बन सकता, क्योकि पूर्ववर्णित पद्धतिसे ही नाना परमाणुओंका आलम्बन करनेवाले एक ज्ञानमें जैसे स्थूलविषयता नहीं बन सकती उसी तरह परमाणुगोचर नाना ज्ञान हो तो परस्पर वार्तानभिज्ञ होनेके कारण स्थूलाभास प्रत्यय नहीं हो सकता । अतः ज्ञानाकार स्थूलताके समर्थन करनेवाले विज्ञानवादीको भी प्रमाणकी प्रवृत्ति एवं अप्रवृत्तिके आधारपर ही सम्भव-असम्भवकी व्यवस्था माननी पड़ेगी । तथाच प्रमाण- प्रवृत्तिबलसे ही ज्ञानभिन्न इदन्तास्पद बाह्यार्थका अपह्नव नहीं किया जा सकता । जो ज्ञानकी प्रतिविषय व्यवस्थाके लिये ज्ञानमें विषयसारूप्य माना जाता है उससे भी विषयका अपलाप नहीं हो सकता । क्योंकि यदि अर्थ है ही नहीं तो ज्ञानमें किसकी सरूपता होगी ? और विषय न होनेपर प्रतिविषय-ज्ञानव्यवस्थाका भी क्या अर्थ रह जाता है । सुस्पष्टरूपसे बाह्यार्थका उपलम्भ होता है अतः उसका अस्तित्व मानना अनिवार्य है । सहोपलम्भ नियमपर भी यह विचारणीय है कि क्या ज्ञान और अर्थ- का साहित्येन ( साथ-साथ ) उपलम्भ ही होना सहोपलम्भ है ? यदि हाँ, तो सहोपा- लम्भ हेतु विरुद्ध हैं इसके द्वारा अभेदकी सिद्धि नहीं हो सकेगी। साहित्येन उपलम्भ तभी बन सकता है जब ज्ञान और अर्थ दो वस्तु हो । अतः भेदगर्भित हेतुसे अभेदसिद्धि असम्भव है । साहित्य अभेदविरुद्ध भेदव्याप्य होता है । जहाँ साहित्य होगा वहाँ भेदका होना अनिवार्य होता है । यदि एकोपलम्भ नियम अर्थात् एक उपलम्भसे ज्ञान और अर्थका ग्रहण होना ही सहो- पलम्भ है तो यह भी असंगत है । क्योंकि सहोपलम्भमें सहशब्द एकत्वका वाचक नहीं है फिर सहोपलम्भका एकोपलम्भ कैसे हो जायगा। यदि कहा जाय कि अर्थैको- पलम्भ ही हेतु समझ लेना चाहिये फिर भी यह विचारणीय होगा कि एकत्वेन उपलम्भ एकोपलम्भ है अथवा ज्ञान और अर्थका एक उपलम्भ होना ही एकोपलम्भ है ? पहला पक्ष ठीक नही क्योकि ज्ञान और अर्थका एकत्वेन ग्रहण नहीं होता, ज्ञान आन्तररूपसे गृहीत होता है ओर अर्थ बाह्यरूपसे । आगे बताया जायगा कि कही ज्ञानका नानात्व होनेपर भी विषयका एकत्व रहता है, कहीं विषय नानात्व रहनेपर भी ज्ञानका एकत्व रहता है, एकत्वेन उपलम्भ कहाँ है ! दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं क्योंकि वह तो उपायोपेयभावके कारण उत्पन्न हो जाता है उससे अभेदकी सिद्धि नही हो सकती । अतएव सहोपलम्भ नियम भी ज्ञान और विषयके उपायोपेयभावके कारण उपपन्न है, अभेदके कारण नहीं । जिस प्रकार मनुष्योंको सभी बुद्धि बोध्य चाक्षुषरूपादि पदार्थ प्रभाके रूपसे अनुबुद्धि ही गृहीत होते हैं प्रभाके साथ ही नील-पीतादिरूपका उपलम्भ होता है तो भी इस सहोपलम्भसे यह नहीं कहा जा सकता कि प्रभा और रूप अभिन्न हैं किंतु यही

७५२ मार्क्सवाद और रामराज्य कहना पड़ेगा कि प्रभा रूपोपलम्भका उपाय है। इसलिये सहोपलम्भ नियम होता है, इसी तरह अर्थोपलम्भका आत्मसाक्षिक अनुभव ही उपाय है। इसलिये ज्ञेयज्ञात- का सहोपलम्भ नियम होता है इस तरह सहोपलम्भ नियम अभेदका साधक नहीं होता । जहाँपर घट-पटादि अनेक पदार्थ एक ज्ञानगोचर होते हैं वहाँ सभी समझदार समझते हैं कि ज्ञेय अर्थका भेद है और ज्ञानका अभेद होता है। यदि ज्ञान और ज्ञेयका अभेद ही हो तो ज्ञानके एक होनेसे विषयको भी एक होना चाहिये । वैसे भी घटज्ञान, पटज्ञान आदिमें घट-पट आदि विशेषणोंका ही भेद है, विशेष ज्ञान तो एक ही है। जैसे "शुक्ल गौ कृष्ण गौ" इत्यादि स्थलोंमें गोत्वका अभेद रहनेपर भी कृष्णता-गौरता आदिका ही भेद रहता है। दोसे एकका एकसे दोका भेद प्रसिद्ध ही है। इस तरह जैसे अनेक शुक्लता कृष्णतासे एक गोत्वका भेद होता है उसी तरह अनेक घट-पटादि विषयोंसे एक ज्ञानका भी भेद ही समझना चाहिये। इसलिये ज्ञान और ज्ञेयका भेद ही सम्यक् है। इसी तरह अर्थ अभेद रहनेपर भी ज्ञानमें भेद होता है। घटका दर्शन घट स्मरण आदि स्थलोंमें विशेष्य दर्शन एव स्मरणमें भेद है, घट विशेषणका अभेद है। जैसे क्षीरगन्ध क्षीररस यहाँ विशेष्य गन्धरसका भेद है, विशेषण क्षीरका अभेद होता है इस तरह भी ज्ञान-ज्ञेयका भेद सिद्ध होता है। पूर्वोत्तरवर्ती दो विज्ञान स्वसंवेदनसे ही उपक्षीण हो जाते हैं। उनमें परस्पर ग्राह्य-ग्राहकभाव नहीं बन सकता। फिर भेद ही कैसे सिद्ध होगा अर्थात् स्वरूप- मात्रमें पर्यवसित ज्ञान एक दूसरे ज्ञानको जान ही नहीं सकता फिर जिन दोनोंका भेद होता है वे ही जब अगृहीत हैं तो तद्गतभेद सुतरां असिद्ध ही होगा। क्योंकि भेदज्ञानके लिये अनुयोगी—प्रतियोगीका ज्ञान अपेक्षित होता है। इसी तरह सब क्षणिक हैं, सब शून्य हैं तथा सब अनात्मा हैं इत्यादि अनेक प्रतिज्ञाएँ हेतु- दृष्टान्त ये सभी ज्ञानभेदसे ही साध्य हैं। यही दशा स्वलक्षण, सामान्यलक्षण, वास्य वासक, अविद्योपप्लव, सद्- सद्धर्म, बन्ध-मोक्षादि प्रतिज्ञाओका भी है। अन्यसे व्यावृत्त अपना असाधारणरूप ही स्वलक्षण होता है। जो व्यावृत्त होता है और जिनसे व्यावृत्त होता है, उन सबका अनेक ज्ञानोंसे ही बोध सम्भव है। इसी तरह विधिरूप या अन्यापोह रूप सामान्य लक्षण भी अनेक ज्ञान गम्य ही होता है। वास्य-वासक भाव भी अनेक ज्ञान साध्य है। उत्तर ज्ञानमें नीलाद्याकार समर्पण करनेकी उपयुक्त शक्ति पूर्वज्ञानमें होती है। अतः पूर्व ज्ञान गमक है और उत्तरज्ञान वास्य होता है। अविद्योपप्लवमें वास्य- वासकत्व हेतु है। अविद्योपप्लव सदसद्धर्मोंमें हेतु होता है। जैसे नीलादिसद्धर्म है नर-विषाणादि असद्धर्म है।

अमूर्त सदसद्धर्म है, क्योकि शशविषाणको भी अमूर्त कह सकते हैं। यही बात बौद्धकारिकामें कही गयी है— अनादिवासनोद्भूतविकल्पपरिनिष्ठितः । शब्दार्थस्त्रिविधो धर्मो भावाभावोभयाश्रयः ॥ भाव यह है कि अनादिवासनाजन्य सविकल्प प्रत्यय स्वरूपज्ञानसे परिनिष्ठित अर्थात् विषयीकृत शब्दार्थ तीन प्रकारका होता है। जैसे भाव—नीलत्वादि, अभाव—नर- विषाणत्वादिरुभया भय, अमूर्तत्वादि। इसी तरह मोक्षप्रतिज्ञा भी भेदसाध्य ही है। जो मुक्त होता है, जिससे मुक्त होता है, जिस साधनसे मुक्त होता है और जो प्रतिपादन करता है, ये सब अनेक ज्ञान-साध्य हैं। पूर्वोक्त युक्तिसे जब ज्ञानभेद ही असिद्ध है, तब इन सबमें अपेक्षित भेद कैसे सिद्ध होगा ! अतः अनेक अर्थोका प्रति संधान करनेवाले एक प्रतिसन्धाता, प्रत्यभिज्ञाताके बिना यह असम्भव है। विज्ञानसे भिन्न उसका आलम्बन न होकर अगर स्वांश ही विज्ञानका आलम्बन हो तो उक्त व्यवस्था कथमपि न बन सकेगी। कर्म फलभाव एवं ज्ञान-ज्ञेयभाव भी भेदमें ही सम्भव होता है। अभिन्न ज्ञानमें ही ग्राह्य-ग्राहक भाव कैसे सम्भव होगा ? छिदि क्रियाके द्वारा तद्भिन्न काष्ठ आदि छिन्न होता है, स्वयं छिदि ही छिदिसे छिन्न होती नहीं देखी जाती । इसी तरह पाक क्रिया ही नहीं पकती, अपितु पाक क्रियासे तण्डुल पकते हैं। उसी तरह यहाँ भी ज्ञान ही स्वांशसे ज्ञेय नहीं होता है, क्योकि अपनेमें ही अपनी वृत्ति विरुद्ध है। जैसे पाकसे अतिरिक्त तण्डुल, छिदिसे पृथक् छेद्य काष्ठ होता है, वैसे ज्ञानसे अति- रिक्त ज्ञेय होता है। अतः ज्ञानज्ञेयका भेद ही है। इसके अतिरिक्त यह बात भी विचारणीय है कि जब घटविज्ञान, पटविज्ञान आदि अनुभवोंके अनुसार जैसे विज्ञानको स्वीकार किया जाता है वैसे घट-पटादि बाह्यार्थोंको अङ्गीकार क्यों न किया जाय ? यदि कहा जाय कि विज्ञानका अनुभव होता है, तो उसी तरह बाह्यार्थ घटादिका भी अनुभव होता ही है। यदि कहा जाय कि विज्ञान प्रकाशात्मक होनेसे प्रदीपवत् स्वयं अनुभूत होता है। बाह्यार्थ इस प्रकार नहीं अनुभूत होता तो यह भी ठीक नहीं । क्योकि जैसे 'अग्नि अपनेको जलाता है', यह कहना अत्यन्त विरुद्ध है, वैसे विज्ञान अपनेको जानता है, प्रकाशित करता है। यह कहना भी अत्यन्त विरुद्ध है। यह कहा ही जा चुका है कि पाक अपनेको नहीं पकाता है । फिर बाह्यार्थ स्वव्यतिरिक्त विज्ञानसे प्रकाशित होता है यह लोकप्रसिद्ध तथा अविरुद्ध ही है । अप्रसिद्ध एव विरुद्ध बातको मानना और अविरुद्ध एव लोकप्रसिद्ध बातको न मानना यह विज्ञानवादी बौद्धोका कैसा पाण्डित्य है ? अतः यह कहना सर्वथा निराधार है कि विज्ञेयसे अभिन्न विज्ञान स्वयं ही अनुभूत होता है। क्योकि स्वसे स्वक्रियाका होना विरुद्ध है। गा० रा० ४८-

फिर भी विज्ञानवादी बौद्ध कहते हैं कि 'यदि विज्ञान स्वभिन्न विज्ञानसे ग्राह्य होगा तो वह विज्ञान भी अन्य विज्ञानसे ग्राह्य होगा और इसी तरह अन्य ज्ञान भी इस प्रकार अनवस्था दोष होगा। साथ ही प्रदीपके समान ही विज्ञान भी अवभासात्मक ही है । जैसे प्रदीपका प्रदीपान्तरसे प्रकाश नहीं होता, क्योकि दोनो ही समानरूपसे अवभासात्मक हैं, वैसे एक ज्ञानका ज्ञानान्तर मानना भी व्यर्थ होगा । क्योकि समान होनेसे उनमें ग्राह्य-ग्राहकभाव सम्भव नहीं होगा । इसी दृष्टिसे यदि ज्ञान स्वातिरिक्त अर्थको ग्रहण करेगा तो वह स्वयं अप्रत्यक्ष रहकर अर्थको प्रत्यक्ष न करा सकेगा। चक्षु इन्द्रियके समान स्वयं विलीन, अतएव अप्रत्यक्ष ज्ञान अर्थभेदमें प्राकट्य आदि किसी भी विशेषताका आधान करनेमें समर्थ नहीं हो सकता । यदि चक्षुके समान अप्रकाशमान ही ज्ञान अर्थका बोधक होगा तो जैसे चक्षु ज्ञानोत्पादन- द्वारा अर्थ प्रकाशक होता है वैसे ही ज्ञान भी ज्ञानान्तरोत्पादनद्वारा वस्तुज्ञापक होगा । फिर इसी तरह ज्ञानजन्य ज्ञानकी भी ज्ञानान्तरोत्पादनद्वारा ही ज्ञापकता माननी होगी तथा च अनवस्था दोष होगा । अतः कहना पड़ेगा कि ज्ञानकी प्रत्यक्षता ही अर्थप्रत्यक्षता है । ज्ञानको ज्ञानान्तरोत्पादनकी आवश्यकता नहीं होती । वह ज्ञान भी यदि अन्य ज्ञानसे प्रत्यक्ष होगा तो अनवस्था दोष होगा । यदि वह स्वयं अप्रत्यक्ष होगा तो उससे अर्थका प्रत्यक्ष कैसे होगा ? इसीलिये कहा गया है कि— "अप्रत्यक्षोपलम्भस्यनार्थदृष्टिः प्रसिद्ध्यति" अर्थात् ज्ञानके अप्रत्यक्ष होनेपर अर्थज्ञान ही नही हो सकता है। यदि चक्षुके समान अप्रत्यक्ष ज्ञानसे ही अर्थ प्रत्यक्ष माना जायगा तब तो चक्षुके समान ज्ञानको अजन्य कहना पड़ेगा ? इसलिये अनावस्था दोषकी अपेक्षा स्वात्मवृत्तिका मान लेना अच्छा है। जैसे प्रदीप प्रदीपान्तरकी अपेक्षा नहीं करता वैसे ही ज्ञान भी ज्ञानान्तरकी अपेक्षा नहीं करता है" । उपर्युक्त विज्ञानवादी बौद्धका मत असंगत है । क्योकि विज्ञानग्राहक साक्षीको स्वीकार कर लेनेपर अनवस्था, आत्मवृत्तित्ता आदि समस्त दोषोका निराकरण हो जाता है । साक्षी और ज्ञान दोनोका चेतनत्व और जडत्वरूप स्वभाव विषम है। अतः उनमे उपलब्धृत्व तथा उपलभ्यत्व बन सकता है। साक्षी स्वयं सिद्ध होनेसे सर्वथा अप्रत्याख्येय है । ठीक है कि अप्रत्यक्ष ज्ञानसे अर्थप्रकाश नहीं बन सकता, परन्तु अन्तःकरण वृत्तिरूप ज्ञानका साक्षीके द्वारा प्रकाश मान्य है। तथा च आत्मचैतन्य साक्षीके द्वारा प्रकाशित वृत्तिरूप ज्ञानसे विषय प्रकाश सम्भव है । अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य ही उपलब्धा होता है । अन्तःकरण और विषयाकार वृत्ति तथा विषय सभी उसीसे प्रकाशित होते हैं । उपलब्धा उपलब्धिके द्वारा विषयका उपलम्भ या प्रकाश करता है । इन्द्रिय सन्निकर्षसे अन्तःकरणविकार विशेष वृत्ति उत्पन्न होती है । वृत्तिके उत्पन्न होते ही वृत्ति और उसका विषय दोनों ही उपलब्धाको प्रत्यक्ष होते हैं । विषय अप्रकाश स्वभाव होनेके कारण प्रमाताके

मार्क्स और आत्मा ७७५ प्रति स्वप्रत्यक्षताके लिये अन्तःकरण वृत्तिरूप अनुभवकी अपेक्षा रखता है। परन्तु वह अनुभव स्वयं जड़ होते हुए भी स्वच्छ होनेके कारण चैतन्य प्रतिबिम्ब ग्रहण करनेके लिये दूसरे अनुभवकी अपेक्षा नहीं रखता। किन्तु स्वच्छ होनेसे स्वयं चैतन्यके प्रतिबिम्बको ग्रहण कर लेता है और उसीसे स्वयं भी प्रकाशित हो जाता है। अतएव अनवस्था भी न होगी। ऐसा कभी नहीं होता कि अनुभव उत्पन्न हो और प्रमाताको उसका प्रत्यक्ष न हो। किन्तु नीलादि अर्थ ऐसे नहीं होते। वे तो रहते हुए भी जबतक वृत्तिरूप अनुभव न हो तबतक प्रमाताके लिये प्रत्यक्ष नहीं होते। अतः जैसे छेत्ता छिदि क्रियाके द्वारा छेद्य वृक्षादिपर व्याप्त होता है। अन्य छिदिद्वारा छिदिपर ही नहीं व्याप्त होता और यह भी नहीं कि छिदि ही छेत्री हो जाती हो, किन्तु देवदत्तादि छेत्ता ही छिदिक्रियाके द्वारा छेद्यवृक्षादिपर व्याप्त होता है। इसी तरह पक्ता (पाचक) पाकके द्वारा पाक्य तण्डुलादिपर व्याप्त होता है, न कि पाकान्तरसे पाकपर व्याप्त होता है और न पाक ही पक्ता होता है। वैसे प्रमाता प्रमेय नीलादि पदार्थोंपर प्रमाद्वारा व्याप्त होता है न कि प्रमान्तरसे प्रमाण- पर व्याप्त होता है और न प्रमा प्रमात्री होती है। किन्तु स्वतः ही प्रमाता प्रमापर व्यापक होता है। कूटस्थ नित्य चैतन्य स्वरूप प्रमाताके लिये दूसरी प्रमा अपेक्षित नहीं होती है, क्योंकि प्रमाताको अपनी प्रमाके लिये यदि अन्य प्रमाताकी अपेक्षा होगी तब तो अनवस्था दोष अनिवार्य ही रहेगा। अतः यही ठीक है कि विज्ञान ग्रहणमात्रके लिये विज्ञान साक्षी प्रमाता आवश्यक है। कूटस्थ नित्य चैतन्यरूप प्रमाताके ग्रहणकी आकाङ्क्षा ही नहीं उठती। क्योंकि उसमें संशय-विपर्यय अज्ञान है ही नहीं, फिर इनके निवर्तक ज्ञानान्तरोंकी आवश्यकता ही क्या है ? अन्यत्र संशय, विपर्यय करता हुआ भी प्रमाता अपने सम्बन्धमें संशयादि नहीं करता है। जैसे प्रकाशस्वरूप दीपक आदिमें "प्रकाशते" यह व्यवहार स्वतः होता है। अप्रकाशरूप घटादिमें प्रकाश संसर्गसे 'प्रकाशते' यह व्यवहार होता है, वैसे नित्य चैतन्य परम प्रकाश- स्वरूप आत्मामें 'प्रकाशते' यह व्यवहार स्वतः होता है। तद्भिन्न जड़ोंमें आत्माके सम्बन्धसे 'प्रकाशते' ऐसा व्यवहार होता है। आत्मा और अनात्माका आध्यासिक ही सम्बन्ध होता है। उसी सम्बन्धके लिये वृत्तिकी आवश्यकता होती है। कारण साक्षी और वृत्तिरूप साक्षी सम नहीं। जो कहा जाता है—ज्ञान-ज्ञान सम होनेसे दो दीपकोंके समान दो ज्ञानोंमें प्रकाश्य-प्रकाशकभाव नहीं बन सकेगा, उसका भी समाधान इसीसे हो जाता है। कारण साक्षी और वृत्तिरूप प्रत्यय सम नहीं है, किंतु एक जड़ है, दूसरा चित् है। अतः अवभास्य-अवभासक बननेमें कोई बाधा नहीं है। भले ही सम होनेसे ज्ञानोंमें परस्पर ग्राह्य-ग्राहकभाव न बनें परन्तु ज्ञाता और

७५६ मार्क्सवाद और रामराज्य ज्ञानमें वैधर्म्य होनेसे ग्राह्य-ग्राहकभाव संभव है ही । हाँ, ज्ञानमें ग्राह्यता इसलिये नहीं है कि वह ग्राहकनिष्ठ क्रियाजन्य फलशाली नहीं है । ऐसी ग्राह्यता तो बाह्यार्थमें ही होती है । वही प्रमाताकी प्रमाक्रियासे जनितफल ( प्राकट्य ) शाली होता है । क्योकि बाह्यार्थ जड़ होता है । अतएव वह स्वाकार वृत्ति प्रतिबिम्बित चैतन्यसे प्रकाशित होता है । यद्यपि वृत्ति भी जड़ ही है तथापि वृत्ति तो उत्पन्न होते ही चैतन्य प्रति- बिम्बसे युक्त ही रहती है । अतः वहाँ प्रतिबिम्बरूप फलान्तर व्यर्थ ही है । यही वार्तिककारका कहना है कि जैसे आकाश वस्तुके स्वभावानुसार कुम्भ उत्पन्न होते ही आकाशसे पूर्ण होता है, वैसे वृत्तिरूप ज्ञान उत्पन्न होते ही स्वाभाविक आकाशकल्प साक्षी चैतन्यसे पूर्ण रहता है । इसीलिये ज्ञानबुद्धि परिणाम भूतज्ञानसे नही ज्ञात होता है । किंतु उसमें प्रमाताके प्रति स्वतः सिद्ध चित्प्रतिविम्बरूप प्राकट्य होता है । इसलिये उनकी ग्राह्यता बन जाती है । इसीलिये कहा गया है— ‘न संविदर्यते फलत्वात्’ अर्थात् संविद् स्वयं फल है, अतः वह अन्तःकरण वृत्ति- रूपज्ञानसे नही जानी जाती है । यद्यपि बाह्यार्थ भी प्रमाताके प्रतिग्राह्य हैं तथापि वृत्तिरूप संविद्के रहनेपर ही बाह्यार्थ प्रकट होता है । साथ ही संविद् भी प्रकट होती है । अर्थात् अविद्यावच्छिन्न जीव ही साक्षी है, वह व्यापक होनेसे विषय प्रदेशमे भी रहता है । अतः साक्षीका जैसे ज्ञानसे सम्बन्ध है वैसे ही विषयसे भी सम्बन्ध है ही । तथापि अन्तःकरणावच्छिन्न साक्षी अनावृत रहता है । परंतु विषयावच्छिन्न साक्षी आवृत रहता है । इसीलिये उसमें आवरण-भङ्गके लिये वृत्तिकी अपेक्षा रहती है । अतएव बाह्यार्थ तभी साक्षिरूप अनुभवसे प्रकट होता है जब कि विषयाकारान्तः करण वृत्तिरूप संविद् उत्पन्न होती है । क्योकि उसी वृत्तिसे आवरणभङ्गद्वारा साक्षीका प्राकट्य होता है । परंतु वह वृत्ति तो स्वप्रतिबिम्बित साक्षिस्वरूप अनुभवसे ही प्रकट होती है । निष्कर्ष यह है कि-साक्षिस्वरूप अनुभव यद्यपि सर्वव्यापी है तो भी अविद्यासे आवृत होनेके कारण वह प्रकट नही होता । जैसे निर्मल दर्पणमें मुख प्रतिबिम्बित होता है वैसे भास्वर स्वभाववाले अन्तःकरणमें ही उसकी अभिव्यक्ति होती है । अन्तःकरण वृत्ति भी भास्वर ही है, अतः विषयाकार वृत्तिपर भी स्वभावसे ही अभिव्यक्त होता है । इसीलिये वृत्ति भी स्वभावतः प्रकट होती है । परंतु बाह्यार्थ अन्तःकरणसे व्यवहित रहता है अतः स्वभावसे ही उसमें चैतन्यके अभिव्यञ्जन करनेकी क्षमता नहीं रहती है । यह देखा ही जाता है कि सम्बन्ध समान रहनेपर भी कोई व्यञ्जक होता है और कोई नहीं होता है । जैसे चाक्षुषी प्रमाके साथ समान सम्बन्ध रहनेपर भी वह रूपांदिका प्रकाश करती है, वायु आदिका प्रकाश नहीं करती । घट और दर्पणका मुखसन्निधान समानरूपसे रहनेपर भी घटपर मुखका प्रतिबिम्ब व्यक्त नहीं