मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभिन्न बुद्धिसे गृहीत होते हैं वे ही मिलित होकर एक बुद्धि गृहीत होकर स्थूलता- कारसे प्रतिभासित होते हैं । विज्ञानवादी वाह्यार्थवादीके इस पक्षका भी खण्डन करता है और कहता है कि परमाणुओमें नैरन्तर्यकी प्रतीति भ्रान्ति ही है क्योकि रूप परमाणु गन्ध, रस, स्पर्श, परमाणुओंसे व्यवहित ही हैं अव्यवहित (निरन्तर) नही, जैसे दूरसे देखने- पर व्यवधानयुक्त अनेक वृक्षोंमें भी एक सघन वन प्रत्यय होता है। उसी तरह सान्तर व्यवहित परमाणुओमे स्थूल प्रत्यय भ्रान्ति ही है। इस घटादि प्रत्यय 'पीतः शंखः, इस ज्ञानके तुल्य भ्रान्ति ही है अतः परमाणु घटादि प्रत्ययके विषय नही हो सकते । कुछ लोगोका कहना है कि स्थूल प्रत्यय स्वलक्षण विषयक है अतः निर्विकल्पक प्रत्यय होनेसे भ्रान्त नहीं है। सविकल्प प्रत्यय अवस्तुभूत सामान्यविषयक होनेसे भ्रान्त होता है । परतु यह ठीक नहीं क्योकि यद्यपि 'स्थूलम्' यह ज्ञान व्यक्ति ज्ञान है व्यक्तिमे सम्बन्ध ग्राह्य होनेसे वह शब्द वाच्य भी नहीं है तो भी पूर्वोक्त युक्तिसे स्थूल प्रत्यय भ्रान्त है। अतः वह प्रत्यय नही 'कल्पनापोढमभ्रान्त प्रत्यक्षम्' यही प्रत्यक्षका लक्षण है अभिलापादि कल्पनारहित कल्पना पाठ होनेपर भी वह अभ्रान्त नही है। इस तरह यदि परमाणुसमूह घटादि परमाणुओंसे अभिन्न है तो परमाणु स्वरूप ही होनेसे वे घटाद्याभास प्रत्ययके गोचर नहीं हो सकते । यदि भेद है तो गवाश्वादिके समान अत्यन्त विलक्षण होनेसे उनमे तादात्म्य नही बन सकता । समवायसम्बन्ध भी निराकृत ही है। इसी तरह जाति-गुण-कर्मादिका भी प्रत्याख्यान किया जा सकता है। जो जो प्रतिभासित होता है वह-वह विचारा सह है। अप्रतिभासमानके सद्भावमें कोई प्रमाण नहीं है। अतः कोई भी प्रत्यय बाह्यालम्बन नहीं होते हैं। विज्ञानवादीका यह भी कहना है कि यह नही कहा जा सकता कि विज्ञान इन्द्रियकी तरह स्वय विलीन (अज्ञात) रहकर ही अर्थका प्रकाशन करेगा । यह भी नहीं कहा जा सकता कि जैसे इन्द्रिय अर्थ विषयक ज्ञान उत्पन्न करती है वैसे ही ज्ञान भी किसी अन्य ज्ञानको उत्पन्न करेगा क्योकि इस तरह समान होनेसे वह ज्ञान भी ज्ञानान्तर जनन करेगा तो अनवस्था प्रसङ्ग होगा । यह भी नही कहा जा सकता कि ज्ञान अर्थमें प्राकट्य लक्षण फलका आधान करेगा, क्योकि अतीत अनागत विषयोमें अविद्यमानताके कारण प्राक्स्वरूप फलका आधान हो ही नहीं सकता, इसलिये यह मानना चाहिये कि ज्ञानस्वरूपकी प्रत्यक्षता ही अर्थकी प्रत्यक्षता है वह ज्ञान अनाकार होनेसे स्वभावतः भेदरहित है फिर उसके द्वारा अर्थभेद व्यवस्था कैसे हो सकती है ? अतः अर्थभेद व्यवस्थाके लिये ज्ञानमे आकारभेद भी स्वीकार करना आवश्यक है। पीछे कहा जा चुका है कि 'वित्तिसत्ता ही अर्थवेदन नहीं हो