मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४२ मार्क्सवाद और रामराज्य सकती इत्यादि, परंतु आकार एक ही अनुभूत होता है । यदि यह विज्ञानका आकार है तो अर्थ सद्भावमें कोई प्रमाण नहीं सिद्ध होता । एक रूपसे उत्पन्न होनेवाले ज्ञानोंमेंसे घटज्ञान, पटज्ञान आदि रूपसे प्रति- विषयोमे पक्षपात प्रतीत होता है, वह ज्ञानगत विशेषके बिना उपपन्न नहीं हो सकता; अतः ज्ञानमें विषय-सारूप्य मानना चाहिये । यदि ज्ञानमे विषयसारूप्य मान लिया गया तो ज्ञानकी विषयाकारता ज्ञानसे ही अवरुद्ध है फिर बाह्यार्थ सद्भावकी कल्पना व्यर्थ ही है। इसी तरह सहोपलम्भ नियमसे भी विषय और ज्ञानका अभेद मालूम पड़ता है, इनमेसे एकके उपलम्भ हुए बिना दूसरेका उपलम्भ नही होता । यदि ज्ञान और अर्थका स्वाभाविक भेद हो तो यह नियम नही बन सकता घट-पट आदि भिन्न हैं तो उनमे सहोर्पालम्भका नियम नही होता है। मृत्तिका और घटमें सहोपलम्भका नियम होता है अतः मृत्तिकासे भिन्न घटकी सत्ता नही होती । यही स्थिति ज्ञान और ज्ञेयके सम्बन्धमें भी कही जा सकती है । जिसका जिसके साथ नियमेन सहोपलम्भ होता है वह उससे भिन्न नही होता । जैसे एक चन्द्रसे भ्रान्ति सिद्ध द्वितीय चन्द्रका भेद नही होता उसी तरह ज्ञानके साथ अर्थका सहोपा- लम्भ नियत है । भिन्न-भिन्न घट-पटको एव दो अश्विनीकुमारोका भी ऐसा सहोपलम्भ नियम नही होता, अपितु पृथक् भी उनका उपालम्भ होता है। बादलसे एकके ढके रहनेपर भी दूसरा दीखता है। इस तरह भेद व्यापक अनियमके विरुद्ध सहो- लम्भ नियम तद् व्याप्यभेदको निवृत्त कर देता है, यही विज्ञानवादियोका सिद्धान्त निम्नकारिकासे व्यक्त होता है। सहोपलम्भनियमादभेदो नीलतद्धियोः । भेदश्च भ्रान्तिविज्ञानैर्दृश्येतेन्दाविवाद्वये ॥ अर्थात् सहोपलम्भके नियमसे नीलज्ञेय और नीलज्ञानका अभेद ही है । भ्रान्तिके कारण भेद उसी तरह प्रतीत होता है जैसे अद्वितीय चन्द्रमें चन्द्रका भेद प्रतीत होता है । जैसे स्वप्न, माया, रज्जु, सर्प तथा गन्धर्व नगरादि प्रत्यय बाह्यार्थ- के बिना ही ग्राह्य-ग्राह्याकार होते हैं, वैसे ही जागरितकालके घटादि-प्रत्यय भी बाह्यार्थ बिना ही ग्राह्य-ग्राह्यकाकार होते हैं । क्योकि सभीमें प्रत्ययत्व समान है। अर्थात् जो-जो प्रत्यय है वह सभी बाह्यार्थशून्य है । किसीका भी बाह्यार्थ आलम्बन ( विषय ) नही होता है । प्रत्ययत्व स्वभाव ही इसमें हेतु है । जैसे शिंशपात्व निम्बत्त्वादिमात्रानुबन्धिनी वृक्षता होती है, उसी प्रकार प्रत्ययत्वमात्रानुबन्धिनी बाह्यानालम्बनता रहती है । जैसे शिंशपात्व निम्बत्वादि जहाँ हैं वहाँ वृक्षता होती ही है, उसी तरह प्रत्ययत्व जहाँ है वहाँ निरालम्बनता है ही । इसी तरह प्रत्ययत्व हेतुसे ही स्वप्नादि प्रत्ययोके समान ही घटादि प्रत्ययकी निरालम्बनता सिद्ध होती है ।