मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 499, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ें७४० मार्क्सवाद और रामराज्य सकता। क्योकि बाह्यार्थ असम्भव है। यहाँ यह विचारणीय है कि क्या बाह्यार्थ घटादि परमाणुरूप ही हैं या परमाणुसमूह ? परमाणुघटादि प्रत्ययके आलम्बन नही हो सकते; क्योकि व्यवहारमे एक और स्थूल घटाद्याकाराभास ज्ञान होता है परम सूक्ष्म परमाण्वाभास ज्ञान नहीं होता। अन्याभास ज्ञान अन्यको विषय नही कर सकता। अतः एक घटाद्याभास ज्ञान अनेक परम सूक्ष्म परमाणुओको विषय नहीं कर सकता। यदि ऐसा नहीं माने तो घटाभास ज्ञानके सर्वगोचर होनेसे सर्वज्ञतापत्ति हो जायेगी। इसलिये एक-एक परमाणु घटादि प्रत्ययका परिच्छेद्य नही हो सकता है। परमाणु समूह भी घटादिप्रत्यय परिच्छेद्य नहीं बन सकते, क्योकि समूहका समूहियोसे भिन्न या अभिन्नरूपसे निरूपण नहीं हो सकता। अभिन्न कहे तो पूर्वोक्त दोष ही होगा भिन्न कहे तो समूहियोके पृथक् हो जानेपर भी उसकी सत्ता रहनी चाहिये, भिन्न होनेपर भी दोनो किसी सम्बन्धसे सम्बन्धित हैं या नहीं ? यदि हैं तो कौन सम्बन्ध है समवाय सम्बन्ध कहे तो वह समवायियोसे सम्बन्धित हैं या नहीं ? यदि नही तो वह स्वयं असंबद्ध दूसरोको कैसे सम्बन्धित करेगा। यदि स्वयं सम्बन्धान्तरसे सम्बन्धित है तो वह सम्बन्ध सम्बन्धान्तर सापेक्ष होगा इस तरह अनवस्था प्रसङ्ग होगा। यह भी विचारणीय है कि घटादिगत स्थूलत्वादि प्रतिभासमान ज्ञानका धर्म हे अथवा प्रतिभासकालमे प्रतिभासित अर्थका। यदि पहली बात मान्य है तो ज्ञान- स्वांशका ही अवलम्बन करता है। अतः ज्ञानभिन्न अर्थ नही है यह पक्ष स्वीकृत हो गया, यदि कहा जाय कि रूपपरमाणु ही निरन्तर (मिलकर) एक विज्ञानके विषय होकर स्थूलरूपसे भासित होते हैं ऐसा माननेमे भ्रान्तिको भी कोई स्थान नही। वे परमाणु नहीं हैं यह तो नही कहा जा सकता। इसी तरह वे सम्मिलित नही हैं यह भी नही कहा सकता। एक विज्ञानोपारोही (एक विज्ञानके विषय) नहीं है यह भी नहीं कहा सकता, अतः भले ही नीलत्वादिके तुल्य स्थूलत्व परमाणु- का धर्म न हो क्योकि नीलत्वादिकी तरह वह प्रत्येक परमाणुमें नही है परंतु प्रतिभासदशापन्न परमाणुओका स्थूलत्वादि बहुत्वदिके समान सांवृतिक (मायिक) धर्म हो सकता है। ग्रहेऽनेकस्य चैकेन किञ्चिद्रूपं हि गृह्यते। साम्प्रतं प्रतिभासस्थ तदेकात्मन्यसंभवात् ॥ १ ॥ न च तद्दर्शनं भ्रान्तं नानावस्तुग्रहाद्यतः। सांवृतं ग्रहणं नान्यत् न च वस्तुग्रहो भ्रमः ॥ २ ॥ अर्थात् एक ज्ञानसे अनेक परमाणुओका ग्रहण होनेपर सांवृत स्थूलरूप भासित होता है। विशकलित परमाणुतत्त्वको स्थूल बुद्धि ढक देती है इसीलिये वह सांवृति है, एक-एक परमाणुओमे स्थूल बुद्धि असम्भव है, इस तरह स्थूल दर्शनको भ्रान्त नही कहा जा सकता। क्योकि नाना वस्तु परमाणु उसके विषयमे हैं ही। जो