मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमार्क्स और आत्मा ७४९ अर्थ और ज्ञानका अभेद माना जाय तो और भी अनेक दोष प्रसक्त होंगे। जैसे अवयवी अवयवोंसे भिन्न हैं या अभिन्न ? यदि भिन्न है तो भी अवयवी समस्त अवयवोंमें रहता है या प्रत्येक अवयवोंमें। यदि प्रत्येक अवयवोंमें तो भी सम्पूर्णरूपसे रहता है या एक देशसे। यदि समस्त अवयवोंमें अवयवी रहता है तो अवयवीकी उपलब्धि न होनी चाहिये। कारण कि समस्त अवयवोंकी उपलब्धिसे ही अवयवोकी उपलब्धि हो सकती है। सर्वावयव सन्निकर्ष न होनेसे जब सब अवयवोंका उपलम्भ नहीं होता तो अवयवीकी उपलब्धि कैसे होगी। जैसे अनेक आश्रयोंमें रहनेवाला बहुत्व किसी एक आश्रयके ग्रहणसे नहीं गृहीत होता। इसी प्रकार सहस्र तन्तुओंमें रहनेवाला पट कुछ तन्तुओके ही ग्रहणसे कैसे गृहीत होगा। यदि कहा जाय कि पट अपने अवयवोंद्वारा आरम्भक अवयव तन्तुओमें रहता है तो आरम्भक अवयवोंसे भिन्न पटके पृथक् अवयव मानने पडेंगे। इस तरह अनवस्था भी होगी। उन अवयवोंमें भी वर्तनेके लिये पटको अन्य और अवयव अपेक्षित होंगे। यदि प्रत्येक अवयवमें अवयवी माना जाय तो एक जगह व्यापार होनेपर अन्यत्र अव्यापार प्रसङ्ग होगा। क्योकि जिस समय देवदत्त काशीमें वर्तमान रहता है उसी समय काश्मीरमें सन्निहित नहीं रहता। कोई परिच्छिन्न वस्तु अगर एक समयमें ही अनेक स्थानोमें सन्निहित हो तो उसे एक नहीं अपितु अनेक समझना चाहिये। इस स्थितिमे यदि प्रत्येक अवयवोमें अवयवी माना जाय तो अनेकत्वापत्ति होगी। फिर एक अवयववर्ती पटके व्यापृत हानेपर भी अन्यावयववर्ती पटको अव्यापृत ही रहना चाहिये। यदि कहा जाय कि जैसे गोत्व प्रत्येक गो व्यक्तिमें समाप्त होता है वैसे ही प्रत्येक अवयवा-अवयवी परिसमाप्त हो जाता है तो यह ठीक नहीं कारण कि जैसे गोत्व प्रति व्यक्तिमें प्रत्यक्ष उपलब्ध होता है वैसे ही अवयवी प्रत्येक अवयवोंमें प्रत्यक्ष उपलब्ध नहीं होता। यदि प्रत्येक अवयवमे पूरा अवयवी मान लिया जाय तो शृङ्गसे भी स्तनका कार्य होना चाहिये। परंतु ऐसा होता नहीं। इसी तरह यदि कहा जाय कि एक अणु दूसरे अणुसे सर्वात्मना संयुक्त होता है तो उपचय नहीं होगा यदि एक देशसे उनका मिलना माना जाय तो उनमें सावयवापत्ति होगी। कल्पित प्रदेश तो मिथ्या होनेसे अकिञ्चित्कर ही होंगे। जो रूपादिमान् होते ह वे परम कारणकी अपेक्षा स्थूल एव अनित्य होते हैं जैसे तन्तुकी अपेक्षा पट और अंशुओकी अपेक्षा तन्तु स्थूल होते हैं उसी तरह परमाणुओको स्थूल और अनित्य होना चाहिये। पृथिव्यादि परमाणुओमे यदि गन्धादि गुणोका उपचय माना जाय तो परमाणुओकी मूर्तियोंका उपचय होगा। गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, इन चार गुणोसे युक्त होनेके कारण पृथिवी परमाणुको स्थूल होना चाहिये साथ ही वायुमें केवल स्पर्श गुण होनेके कारण उसमे सूक्ष्मता प्राप्त होगी इस प्रकार परमाणुओमें भी तारतम्य होगा।