भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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७४८ मार्क्सवाद और रामराज्य यदि तीसरा पक्ष कहा जाय अर्थात् बाह्यमें अर्थ असम्भव है अतः बाह्यवत् कहा जाता है। परन्तु यह भी ठीक नहीं, क्योकि सम्भवासम्भवका निर्णय प्रमाणकी प्रवृत्ति अप्रवृत्तिसे ही होता है। सम्भवासम्भवके आधारपर प्रमाणकी प्रवृत्ति अप्रवृत्ति नहीं होती। जो वस्तु प्रत्यक्षादि किसी प्रमाणसे उपलब्ध होती है, वह सम्भव है। जो किसी प्रमाणसे भी विदित न हो वह असम्भव है। यहाँ तो यथा- योग्य प्रत्यक्षानुमान आगमादि सभी प्रमाणोंसे बाह्यार्थ उपलब्ध होता है। ऐसी स्थितिमें उसमें सम्भवासम्भव आदि विकल्पोको स्थान ही नहीं है। जो कहा जाता है कि ज्ञानमें विषय सारूप्य होनेसे बाह्यार्थका भान होता है यह भी ठीक नहीं कारण कि यदि बाह्यार्थ विषय ही न हो तो ज्ञानसे विषय सारूप्य भी क्या होगा ? विषय तो 'इदन्ता एव बाह्यरूपसे ही उपलब्ध होता है फिर उसका अपलाप कैसे किया जा सकता है। मार यह है कि यद्यपि घट-पटादि स्थूलरूपमें भासित होते हैं परम् सूक्ष्ममें नहीं। नाना दिशाओं एवं