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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

७४८ मार्क्सवाद और रामराज्य यदि तीसरा पक्ष कहा जाय अर्थात् बाह्यमें अर्थ असम्भव है अतः बाह्यवत् कहा जाता है। परन्तु यह भी ठीक नहीं, क्योकि सम्भवासम्भवका निर्णय प्रमाणकी प्रवृत्ति अप्रवृत्तिसे ही होता है। सम्भवासम्भवके आधारपर प्रमाणकी प्रवृत्ति अप्रवृत्ति नहीं होती। जो वस्तु प्रत्यक्षादि किसी प्रमाणसे उपलब्ध होती है, वह सम्भव है। जो किसी प्रमाणसे भी विदित न हो वह असम्भव है। यहाँ तो यथा- योग्य प्रत्यक्षानुमान आगमादि सभी प्रमाणोंसे बाह्यार्थ उपलब्ध होता है। ऐसी स्थितिमें उसमें सम्भवासम्भव आदि विकल्पोको स्थान ही नहीं है। जो कहा जाता है कि ज्ञानमें विषय सारूप्य होनेसे बाह्यार्थका भान होता है यह भी ठीक नहीं कारण कि यदि बाह्यार्थ विषय ही न हो तो ज्ञानसे विषय सारूप्य भी क्या होगा ? विषय तो 'इदन्ता एव बाह्यरूपसे ही उपलब्ध होता है फिर उसका अपलाप कैसे किया जा सकता है। मार यह है कि यद्यपि घट-पटादि स्थूलरूपमें भासित होते हैं परम् सूक्ष्ममें नहीं। नाना दिशाओं एवं

मार्क्स और आत्मा ७४९ अर्थ और ज्ञानका अभेद माना जाय तो और भी अनेक दोष प्रसक्त होंगे। जैसे अवयवी अवयवोंसे भिन्न हैं या अभिन्न ? यदि भिन्न है तो भी अवयवी समस्त अवयवोंमें रहता है या प्रत्येक अवयवोंमें। यदि प्रत्येक अवयवोंमें तो भी सम्पूर्णरूपसे रहता है या एक देशसे। यदि समस्त अवयवोंमें अवयवी रहता है तो अवयवीकी उपलब्धि न होनी चाहिये। कारण कि समस्त अवयवोंकी उपलब्धिसे ही अवयवोकी उपलब्धि हो सकती है। सर्वावयव सन्निकर्ष न होनेसे जब सब अवयवोंका उपलम्भ नहीं होता तो अवयवीकी उपलब्धि कैसे होगी। जैसे अनेक आश्रयोंमें रहनेवाला बहुत्व किसी एक आश्रयके ग्रहणसे नहीं गृहीत होता। इसी प्रकार सहस्र तन्तुओंमें रहनेवाला पट कुछ तन्तुओके ही ग्रहणसे कैसे गृहीत होगा। यदि कहा जाय कि पट अपने अवयवोंद्वारा आरम्भक अवयव तन्तुओमें रहता है तो आरम्भक अवयवोंसे भिन्न पटके पृथक् अवयव मानने पडेंगे। इस तरह अनवस्था भी होगी। उन अवयवोंमें भी वर्तनेके लिये पटको अन्य और अवयव अपेक्षित होंगे। यदि प्रत्येक अवयवमें अवयवी माना जाय तो एक जगह व्यापार होनेपर अन्यत्र अव्यापार प्रसङ्ग होगा। क्योकि जिस समय देवदत्त काशीमें वर्तमान रहता है उसी समय काश्मीरमें सन्निहित नहीं रहता। कोई परिच्छिन्न वस्तु अगर एक समयमें ही अनेक स्थानोमें सन्निहित हो तो उसे एक नहीं अपितु अनेक समझना चाहिये। इस स्थितिमे यदि प्रत्येक अवयवोमें अवयवी माना जाय तो अनेकत्वापत्ति होगी। फिर एक अवयववर्ती पटके व्यापृत हानेपर भी अन्यावयववर्ती पटको अव्यापृत ही रहना चाहिये। यदि कहा जाय कि जैसे गोत्व प्रत्येक गो व्यक्तिमें समाप्त होता है वैसे ही प्रत्येक अवयवा-अवयवी परिसमाप्त हो जाता है तो यह ठीक नहीं कारण कि जैसे गोत्व प्रति व्यक्तिमें प्रत्यक्ष उपलब्ध होता है वैसे ही अवयवी प्रत्येक अवयवोंमें प्रत्यक्ष उपलब्ध नहीं होता। यदि प्रत्येक अवयवमे पूरा अवयवी मान लिया जाय तो शृङ्गसे भी स्तनका कार्य होना चाहिये। परंतु ऐसा होता नहीं। इसी तरह यदि कहा जाय कि एक अणु दूसरे अणुसे सर्वात्मना संयुक्त होता है तो उपचय नहीं होगा यदि एक देशसे उनका मिलना माना जाय तो उनमें सावयवापत्ति होगी। कल्पित प्रदेश तो मिथ्या होनेसे अकिञ्चित्कर ही होंगे। जो रूपादिमान् होते ह वे परम कारणकी अपेक्षा स्थूल एव अनित्य होते हैं जैसे तन्तुकी अपेक्षा पट और अंशुओकी अपेक्षा तन्तु स्थूल होते हैं उसी तरह परमाणुओको स्थूल और अनित्य होना चाहिये। पृथिव्यादि परमाणुओमे यदि गन्धादि गुणोका उपचय माना जाय तो परमाणुओकी मूर्तियोंका उपचय होगा। गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, इन चार गुणोसे युक्त होनेके कारण पृथिवी परमाणुको स्थूल होना चाहिये साथ ही वायुमें केवल स्पर्श गुण होनेके कारण उसमे सूक्ष्मता प्राप्त होगी इस प्रकार परमाणुओमें भी तारतम्य होगा।

७५० मार्क्सवाद और रामराज्य यदि परमाणुओमें गुणोपचय न माना जाय तो परमाणुकार्य पृथिव्यादिमें भी गुणोपचय नही दीखना चाहिये। यदि परमाणुको निरंश माना जाय तो द्वयणुकादिमें स्थूलता न बन सकेगी। यदि वह सांश हो गया तो उसमें अनित्यता आदि भी होगी इत्यादि जो दोष वैशेषिकोंके मतमे लागू होते हैं वे सब सौत्रान्तिक एव विज्ञानवादी बौद्धोंके यहाँ भी लागू होगे। जगत्को अनिर्वचनीय माननेवाले वेदान्तीके लिये तो वस्तुओका विचारासहत्व भूषण ही है। किन्तु बौद्धोके यहाँ यह नही कहा जा सकता। बाह्य अस्तित्त्ववादी जैसे पदार्थोंको बाह्य मानता है उसी तरह विज्ञानवादी उन सभी पदार्थोंको अन्तःसत्य मानता है। यदि आन्तर पदार्थ सत्य हैं तो जैसे बाह्यपदार्थोंमे स्थौल्य आदि असम्भव है वैसे ही आन्तर पदार्थोंमे भी स्थौल्य आदि असम्भव ही होगे ऐसी स्थितिमें वैशेषिकोंके पक्षमें कहे गये सभी दोष विज्ञानवादमें भी लागू होगे। यदि कहा जाय कि ज्ञानसे अभिन्न अर्थ माननेपर एक बुद्धिभासित पटमें तद्देशत्व अतद्देशत्वादि विरुद्धधर्म संसर्ग प्रसक्त न होगे; क्योकि ज्ञानके विषय परमाणु ही होगे उनमें तद्देशत्व-अतद्देशत्वादिका कोई प्रसङ्ग ही नही होगा। परंतु वह भी कथन ठीक नही है, कारण कि यहाँ विचारना होगा कि ज्ञान-ज्ञेयका अभेद क्या है। ज्ञान ज्ञेयमात्र है या ज्ञेय ज्ञानमात्र है। पहला पक्ष ठीक नही; क्योकि यदि अनेक नीलपरमाणुओका आलम्बन करनेवाला ज्ञानज्ञेयमात्र है तो ज्ञेय नानात्वके समान ही एक नीलज्ञानमें भी नानात्वापत्ति होगी। यदि ज्ञेय ज्ञानमात्र माना जाय तो आकारोका ज्ञानसे अभेद होनेसे अनेक आकारोंमे एकत्वापत्ति- दोष होगा। यह भी नही कहा जा सकता है कि जितने आकार हैं उतने ही ज्ञान हैं; क्योकि इस तरह नानापरमाणुओको आलम्बन करनेवाले अनेक ज्ञानोके परस्पर वार्तानभिज्ञ होनेसे उनमें स्थूल वस्तुका अनुभव असम्भव ही होगा। यह भी नहीं कहा जा सकता कि एक-एक ज्ञानसे संगृहीत नाना परमाणुओका परामर्शरूप एक विकल्प ज्ञान ही स्थूलालम्बन है। क्योकि वह ज्ञान भी साकार ही होगा। उसके आकार नाना परमाणुओका भी ज्ञानसे अभेद ही होगा। यदि ज्ञान ज्ञेयमात्र होगा तो ज्ञेयभेदसे ज्ञानमें भेदापत्ति होगी। यदि आकार ज्ञानमात्र होगा तो भी आकारोमें एकत्वापत्ति होगी, इसलिये स्थूलालम्बन एक ज्ञान असम्भव ही होगा। जैसा कि धर्मकीर्तिका कहना है कि--- “तस्मान्नार्थे न च ज्ञाने स्थूलाभासस्तदात्मनः । एकत्त्वं प्रतिषिद्धत्वाद्वहुष्वपि न सम्भवः ॥”

अर्थात् वृत्ति विकल्पादि पूर्वोक्त तर्कोंसे बाह्य परमाणु समूहात्मक तथा ज्ञानात्मक आन्तरविषय माना जाय तब भी स्थूलाभास प्रत्यय नहीं बन सकता, क्योकि पूर्ववर्णित पद्धतिसे ही नाना परमाणुओंका आलम्बन करनेवाले एक ज्ञानमें जैसे स्थूलविषयता नहीं बन सकती उसी तरह परमाणुगोचर नाना ज्ञान हो तो परस्पर वार्तानभिज्ञ होनेके कारण स्थूलाभास प्रत्यय नहीं हो सकता । अतः ज्ञानाकार स्थूलताके समर्थन करनेवाले विज्ञानवादीको भी प्रमाणकी प्रवृत्ति एवं अप्रवृत्तिके आधारपर ही सम्भव-असम्भवकी व्यवस्था माननी पड़ेगी । तथाच प्रमाण- प्रवृत्तिबलसे ही ज्ञानभिन्न इदन्तास्पद बाह्यार्थका अपह्नव नहीं किया जा सकता । जो ज्ञानकी प्रतिविषय व्यवस्थाके लिये ज्ञानमें विषयसारूप्य माना जाता है उससे भी विषयका अपलाप नहीं हो सकता । क्योंकि यदि अर्थ है ही नहीं तो ज्ञानमें किसकी सरूपता होगी ? और विषय न होनेपर प्रतिविषय-ज्ञानव्यवस्थाका भी क्या अर्थ रह जाता है । सुस्पष्टरूपसे बाह्यार्थका उपलम्भ होता है अतः उसका अस्तित्व मानना अनिवार्य है । सहोपलम्भ नियमपर भी यह विचारणीय है कि क्या ज्ञान और अर्थ- का साहित्येन ( साथ-साथ ) उपलम्भ ही होना सहोपलम्भ है ? यदि हाँ, तो सहोपा- लम्भ हेतु विरुद्ध हैं इसके द्वारा अभेदकी सिद्धि नहीं हो सकेगी। साहित्येन उपलम्भ तभी बन सकता है जब ज्ञान और अर्थ दो वस्तु हो । अतः भेदगर्भित हेतुसे अभेदसिद्धि असम्भव है । साहित्य अभेदविरुद्ध भेदव्याप्य होता है । जहाँ साहित्य होगा वहाँ भेदका होना अनिवार्य होता है । यदि एकोपलम्भ नियम अर्थात् एक उपलम्भसे ज्ञान और अर्थका ग्रहण होना ही सहो- पलम्भ है तो यह भी असंगत है । क्योंकि सहोपलम्भमें सहशब्द एकत्वका वाचक नहीं है फिर सहोपलम्भका एकोपलम्भ कैसे हो जायगा। यदि कहा जाय कि अर्थैको- पलम्भ ही हेतु समझ लेना चाहिये फिर भी यह विचारणीय होगा कि एकत्वेन उपलम्भ एकोपलम्भ है अथवा ज्ञान और अर्थका एक उपलम्भ होना ही एकोपलम्भ है ? पहला पक्ष ठीक नही क्योकि ज्ञान और अर्थका एकत्वेन ग्रहण नहीं होता, ज्ञान आन्तररूपसे गृहीत होता है ओर अर्थ बाह्यरूपसे । आगे बताया जायगा कि कही ज्ञानका नानात्व होनेपर भी विषयका एकत्व रहता है, कहीं विषय नानात्व रहनेपर भी ज्ञानका एकत्व रहता है, एकत्वेन उपलम्भ कहाँ है ! दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं क्योंकि वह तो उपायोपेयभावके कारण उत्पन्न हो जाता है उससे अभेदकी सिद्धि नही हो सकती । अतएव सहोपलम्भ नियम भी ज्ञान और विषयके उपायोपेयभावके कारण उपपन्न है, अभेदके कारण नहीं । जिस प्रकार मनुष्योंको सभी बुद्धि बोध्य चाक्षुषरूपादि पदार्थ प्रभाके रूपसे अनुबुद्धि ही गृहीत होते हैं प्रभाके साथ ही नील-पीतादिरूपका उपलम्भ होता है तो भी इस सहोपलम्भसे यह नहीं कहा जा सकता कि प्रभा और रूप अभिन्न हैं किंतु यही

७५२ मार्क्सवाद और रामराज्य कहना पड़ेगा कि प्रभा रूपोपलम्भका उपाय है। इसलिये सहोपलम्भ नियम होता है, इसी तरह अर्थोपलम्भका आत्मसाक्षिक अनुभव ही उपाय है। इसलिये ज्ञेयज्ञात- का सहोपलम्भ नियम होता है इस तरह सहोपलम्भ नियम अभेदका साधक नहीं होता । जहाँपर घट-पटादि अनेक पदार्थ एक ज्ञानगोचर होते हैं वहाँ सभी समझदार समझते हैं कि ज्ञेय अर्थका भेद है और ज्ञानका अभेद होता है। यदि ज्ञान और ज्ञेयका अभेद ही हो तो ज्ञानके एक होनेसे विषयको भी एक होना चाहिये । वैसे भी घटज्ञान, पटज्ञान आदिमें घट-पट आदि विशेषणोंका ही भेद है, विशेष ज्ञान तो एक ही है। जैसे "शुक्ल गौ कृष्ण गौ" इत्यादि स्थलोंमें गोत्वका अभेद रहनेपर भी कृष्णता-गौरता आदिका ही भेद रहता है। दोसे एकका एकसे दोका भेद प्रसिद्ध ही है। इस तरह जैसे अनेक शुक्लता कृष्णतासे एक गोत्वका भेद होता है उसी तरह अनेक घट-पटादि विषयोंसे एक ज्ञानका भी भेद ही समझना चाहिये। इसलिये ज्ञान और ज्ञेयका भेद ही सम्यक् है। इसी तरह अर्थ अभेद रहनेपर भी ज्ञानमें भेद होता है। घटका दर्शन घट स्मरण आदि स्थलोंमें विशेष्य दर्शन एव स्मरणमें भेद है, घट विशेषणका अभेद है। जैसे क्षीरगन्ध क्षीररस यहाँ विशेष्य गन्धरसका भेद है, विशेषण क्षीरका अभेद होता है इस तरह भी ज्ञान-ज्ञेयका भेद सिद्ध होता है। पूर्वोत्तरवर्ती दो विज्ञान स्वसंवेदनसे ही उपक्षीण हो जाते हैं। उनमें परस्पर ग्राह्य-ग्राहकभाव नहीं बन सकता। फिर भेद ही कैसे सिद्ध होगा अर्थात् स्वरूप- मात्रमें पर्यवसित ज्ञान एक दूसरे ज्ञानको जान ही नहीं सकता फिर जिन दोनोंका भेद होता है वे ही जब अगृहीत हैं तो तद्गतभेद सुतरां असिद्ध ही होगा। क्योंकि भेदज्ञानके लिये अनुयोगी—प्रतियोगीका ज्ञान अपेक्षित होता है। इसी तरह सब क्षणिक हैं, सब शून्य हैं तथा सब अनात्मा हैं इत्यादि अनेक प्रतिज्ञाएँ हेतु- दृष्टान्त ये सभी ज्ञानभेदसे ही साध्य हैं। यही दशा स्वलक्षण, सामान्यलक्षण, वास्य वासक, अविद्योपप्लव, सद्- सद्धर्म, बन्ध-मोक्षादि प्रतिज्ञाओका भी है। अन्यसे व्यावृत्त अपना असाधारणरूप ही स्वलक्षण होता है। जो व्यावृत्त होता है और जिनसे व्यावृत्त होता है, उन सबका अनेक ज्ञानोंसे ही बोध सम्भव है। इसी तरह विधिरूप या अन्यापोह रूप सामान्य लक्षण भी अनेक ज्ञान गम्य ही होता है। वास्य-वासक भाव भी अनेक ज्ञान साध्य है। उत्तर ज्ञानमें नीलाद्याकार समर्पण करनेकी उपयुक्त शक्ति पूर्वज्ञानमें होती है। अतः पूर्व ज्ञान गमक है और उत्तरज्ञान वास्य होता है। अविद्योपप्लवमें वास्य- वासकत्व हेतु है। अविद्योपप्लव सदसद्धर्मोंमें हेतु होता है। जैसे नीलादिसद्धर्म है नर-विषाणादि असद्धर्म है।

अमूर्त सदसद्धर्म है, क्योकि शशविषाणको भी अमूर्त कह सकते हैं। यही बात बौद्धकारिकामें कही गयी है— अनादिवासनोद्भूतविकल्पपरिनिष्ठितः । शब्दार्थस्त्रिविधो धर्मो भावाभावोभयाश्रयः ॥ भाव यह है कि अनादिवासनाजन्य सविकल्प प्रत्यय स्वरूपज्ञानसे परिनिष्ठित अर्थात् विषयीकृत शब्दार्थ तीन प्रकारका होता है। जैसे भाव—नीलत्वादि, अभाव—नर- विषाणत्वादिरुभया भय, अमूर्तत्वादि। इसी तरह मोक्षप्रतिज्ञा भी भेदसाध्य ही है। जो मुक्त होता है, जिससे मुक्त होता है, जिस साधनसे मुक्त होता है और जो प्रतिपादन करता है, ये सब अनेक ज्ञान-साध्य हैं। पूर्वोक्त युक्तिसे जब ज्ञानभेद ही असिद्ध है, तब इन सबमें अपेक्षित भेद कैसे सिद्ध होगा ! अतः अनेक अर्थोका प्रति संधान करनेवाले एक प्रतिसन्धाता, प्रत्यभिज्ञाताके बिना यह असम्भव है। विज्ञानसे भिन्न उसका आलम्बन न होकर अगर स्वांश ही विज्ञानका आलम्बन हो तो उक्त व्यवस्था कथमपि न बन सकेगी। कर्म फलभाव एवं ज्ञान-ज्ञेयभाव भी भेदमें ही सम्भव होता है। अभिन्न ज्ञानमें ही ग्राह्य-ग्राहक भाव कैसे सम्भव होगा ? छिदि क्रियाके द्वारा तद्भिन्न काष्ठ आदि छिन्न होता है, स्वयं छिदि ही छिदिसे छिन्न होती नहीं देखी जाती । इसी तरह पाक क्रिया ही नहीं पकती, अपितु पाक क्रियासे तण्डुल पकते हैं। उसी तरह यहाँ भी ज्ञान ही स्वांशसे ज्ञेय नहीं होता है, क्योकि अपनेमें ही अपनी वृत्ति विरुद्ध है। जैसे पाकसे अतिरिक्त तण्डुल, छिदिसे पृथक् छेद्य काष्ठ होता है, वैसे ज्ञानसे अति- रिक्त ज्ञेय होता है। अतः ज्ञानज्ञेयका भेद ही है। इसके अतिरिक्त यह बात भी विचारणीय है कि जब घटविज्ञान, पटविज्ञान आदि अनुभवोंके अनुसार जैसे विज्ञानको स्वीकार किया जाता है वैसे घट-पटादि बाह्यार्थोंको अङ्गीकार क्यों न किया जाय ? यदि कहा जाय कि विज्ञानका अनुभव होता है, तो उसी तरह बाह्यार्थ घटादिका भी अनुभव होता ही है। यदि कहा जाय कि विज्ञान प्रकाशात्मक होनेसे प्रदीपवत् स्वयं अनुभूत होता है। बाह्यार्थ इस प्रकार नहीं अनुभूत होता तो यह भी ठीक नहीं । क्योकि जैसे 'अग्नि अपनेको जलाता है', यह कहना अत्यन्त विरुद्ध है, वैसे विज्ञान अपनेको जानता है, प्रकाशित करता है। यह कहना भी अत्यन्त विरुद्ध है। यह कहा ही जा चुका है कि पाक अपनेको नहीं पकाता है । फिर बाह्यार्थ स्वव्यतिरिक्त विज्ञानसे प्रकाशित होता है यह लोकप्रसिद्ध तथा अविरुद्ध ही है । अप्रसिद्ध एव विरुद्ध बातको मानना और अविरुद्ध एव लोकप्रसिद्ध बातको न मानना यह विज्ञानवादी बौद्धोका कैसा पाण्डित्य है ? अतः यह कहना सर्वथा निराधार है कि विज्ञेयसे अभिन्न विज्ञान स्वयं ही अनुभूत होता है। क्योकि स्वसे स्वक्रियाका होना विरुद्ध है। गा० रा० ४८-

फिर भी विज्ञानवादी बौद्ध कहते हैं कि 'यदि विज्ञान स्वभिन्न विज्ञानसे ग्राह्य होगा तो वह विज्ञान भी अन्य विज्ञानसे ग्राह्य होगा और इसी तरह अन्य ज्ञान भी इस प्रकार अनवस्था दोष होगा। साथ ही प्रदीपके समान ही विज्ञान भी अवभासात्मक ही है । जैसे प्रदीपका प्रदीपान्तरसे प्रकाश नहीं होता, क्योकि दोनो ही समानरूपसे अवभासात्मक हैं, वैसे एक ज्ञानका ज्ञानान्तर मानना भी व्यर्थ होगा । क्योकि समान होनेसे उनमें ग्राह्य-ग्राहकभाव सम्भव नहीं होगा । इसी दृष्टिसे यदि ज्ञान स्वातिरिक्त अर्थको ग्रहण करेगा तो वह स्वयं अप्रत्यक्ष रहकर अर्थको प्रत्यक्ष न करा सकेगा। चक्षु इन्द्रियके समान स्वयं विलीन, अतएव अप्रत्यक्ष ज्ञान अर्थभेदमें प्राकट्य आदि किसी भी विशेषताका आधान करनेमें समर्थ नहीं हो सकता । यदि चक्षुके समान अप्रकाशमान ही ज्ञान अर्थका बोधक होगा तो जैसे चक्षु ज्ञानोत्पादन- द्वारा अर्थ प्रकाशक होता है वैसे ही ज्ञान भी ज्ञानान्तरोत्पादनद्वारा वस्तुज्ञापक होगा । फिर इसी तरह ज्ञानजन्य ज्ञानकी भी ज्ञानान्तरोत्पादनद्वारा ही ज्ञापकता माननी होगी तथा च अनवस्था दोष होगा । अतः कहना पड़ेगा कि ज्ञानकी प्रत्यक्षता ही अर्थप्रत्यक्षता है । ज्ञानको ज्ञानान्तरोत्पादनकी आवश्यकता नहीं होती । वह ज्ञान भी यदि अन्य ज्ञानसे प्रत्यक्ष होगा तो अनवस्था दोष होगा । यदि वह स्वयं अप्रत्यक्ष होगा तो उससे अर्थका प्रत्यक्ष कैसे होगा ? इसीलिये कहा गया है कि— "अप्रत्यक्षोपलम्भस्यनार्थदृष्टिः प्रसिद्ध्यति" अर्थात् ज्ञानके अप्रत्यक्ष होनेपर अर्थज्ञान ही नही हो सकता है। यदि चक्षुके समान अप्रत्यक्ष ज्ञानसे ही अर्थ प्रत्यक्ष माना जायगा तब तो चक्षुके समान ज्ञानको अजन्य कहना पड़ेगा ? इसलिये अनावस्था दोषकी अपेक्षा स्वात्मवृत्तिका मान लेना अच्छा है। जैसे प्रदीप प्रदीपान्तरकी अपेक्षा नहीं करता वैसे ही ज्ञान भी ज्ञानान्तरकी अपेक्षा नहीं करता है" । उपर्युक्त विज्ञानवादी बौद्धका मत असंगत है । क्योकि विज्ञानग्राहक साक्षीको स्वीकार कर लेनेपर अनवस्था, आत्मवृत्तित्ता आदि समस्त दोषोका निराकरण हो जाता है । साक्षी और ज्ञान दोनोका चेतनत्व और जडत्वरूप स्वभाव विषम है। अतः उनमे उपलब्धृत्व तथा उपलभ्यत्व बन सकता है। साक्षी स्वयं सिद्ध होनेसे सर्वथा अप्रत्याख्येय है । ठीक है कि अप्रत्यक्ष ज्ञानसे अर्थप्रकाश नहीं बन सकता, परन्तु अन्तःकरण वृत्तिरूप ज्ञानका साक्षीके द्वारा प्रकाश मान्य है। तथा च आत्मचैतन्य साक्षीके द्वारा प्रकाशित वृत्तिरूप ज्ञानसे विषय प्रकाश सम्भव है । अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य ही उपलब्धा होता है । अन्तःकरण और विषयाकार वृत्ति तथा विषय सभी उसीसे प्रकाशित होते हैं । उपलब्धा उपलब्धिके द्वारा विषयका उपलम्भ या प्रकाश करता है । इन्द्रिय सन्निकर्षसे अन्तःकरणविकार विशेष वृत्ति उत्पन्न होती है । वृत्तिके उत्पन्न होते ही वृत्ति और उसका विषय दोनों ही उपलब्धाको प्रत्यक्ष होते हैं । विषय अप्रकाश स्वभाव होनेके कारण प्रमाताके

मार्क्स और आत्मा ७७५ प्रति स्वप्रत्यक्षताके लिये अन्तःकरण वृत्तिरूप अनुभवकी अपेक्षा रखता है। परन्तु वह अनुभव स्वयं जड़ होते हुए भी स्वच्छ होनेके कारण चैतन्य प्रतिबिम्ब ग्रहण करनेके लिये दूसरे अनुभवकी अपेक्षा नहीं रखता। किन्तु स्वच्छ होनेसे स्वयं चैतन्यके प्रतिबिम्बको ग्रहण कर लेता है और उसीसे स्वयं भी प्रकाशित हो जाता है। अतएव अनवस्था भी न होगी। ऐसा कभी नहीं होता कि अनुभव उत्पन्न हो और प्रमाताको उसका प्रत्यक्ष न हो। किन्तु नीलादि अर्थ ऐसे नहीं होते। वे तो रहते हुए भी जबतक वृत्तिरूप अनुभव न हो तबतक प्रमाताके लिये प्रत्यक्ष नहीं होते। अतः जैसे छेत्ता छिदि क्रियाके द्वारा छेद्य वृक्षादिपर व्याप्त होता है। अन्य छिदिद्वारा छिदिपर ही नहीं व्याप्त होता और यह भी नहीं कि छिदि ही छेत्री हो जाती हो, किन्तु देवदत्तादि छेत्ता ही छिदिक्रियाके द्वारा छेद्यवृक्षादिपर व्याप्त होता है। इसी तरह पक्ता (पाचक) पाकके द्वारा पाक्य तण्डुलादिपर व्याप्त होता है, न कि पाकान्तरसे पाकपर व्याप्त होता है और न पाक ही पक्ता होता है। वैसे प्रमाता प्रमेय नीलादि पदार्थोंपर प्रमाद्वारा व्याप्त होता है न कि प्रमान्तरसे प्रमाण- पर व्याप्त होता है और न प्रमा प्रमात्री होती है। किन्तु स्वतः ही प्रमाता प्रमापर व्यापक होता है। कूटस्थ नित्य चैतन्य स्वरूप प्रमाताके लिये दूसरी प्रमा अपेक्षित नहीं होती है, क्योंकि प्रमाताको अपनी प्रमाके लिये यदि अन्य प्रमाताकी अपेक्षा होगी तब तो अनवस्था दोष अनिवार्य ही रहेगा। अतः यही ठीक है कि विज्ञान ग्रहणमात्रके लिये विज्ञान साक्षी प्रमाता आवश्यक है। कूटस्थ नित्य चैतन्यरूप प्रमाताके ग्रहणकी आकाङ्क्षा ही नहीं उठती। क्योंकि उसमें संशय-विपर्यय अज्ञान है ही नहीं, फिर इनके निवर्तक ज्ञानान्तरोंकी आवश्यकता ही क्या है ? अन्यत्र संशय, विपर्यय करता हुआ भी प्रमाता अपने सम्बन्धमें संशयादि नहीं करता है। जैसे प्रकाशस्वरूप दीपक आदिमें "प्रकाशते" यह व्यवहार स्वतः होता है। अप्रकाशरूप घटादिमें प्रकाश संसर्गसे 'प्रकाशते' यह व्यवहार होता है, वैसे नित्य चैतन्य परम प्रकाश- स्वरूप आत्मामें 'प्रकाशते' यह व्यवहार स्वतः होता है। तद्भिन्न जड़ोंमें आत्माके सम्बन्धसे 'प्रकाशते' ऐसा व्यवहार होता है। आत्मा और अनात्माका आध्यासिक ही सम्बन्ध होता है। उसी सम्बन्धके लिये वृत्तिकी आवश्यकता होती है। कारण साक्षी और वृत्तिरूप साक्षी सम नहीं। जो कहा जाता है—ज्ञान-ज्ञान सम होनेसे दो दीपकोंके समान दो ज्ञानोंमें प्रकाश्य-प्रकाशकभाव नहीं बन सकेगा, उसका भी समाधान इसीसे हो जाता है। कारण साक्षी और वृत्तिरूप प्रत्यय सम नहीं है, किंतु एक जड़ है, दूसरा चित् है। अतः अवभास्य-अवभासक बननेमें कोई बाधा नहीं है। भले ही सम होनेसे ज्ञानोंमें परस्पर ग्राह्य-ग्राहकभाव न बनें परन्तु ज्ञाता और

७५६ मार्क्सवाद और रामराज्य ज्ञानमें वैधर्म्य होनेसे ग्राह्य-ग्राहकभाव संभव है ही । हाँ, ज्ञानमें ग्राह्यता इसलिये नहीं है कि वह ग्राहकनिष्ठ क्रियाजन्य फलशाली नहीं है । ऐसी ग्राह्यता तो बाह्यार्थमें ही होती है । वही प्रमाताकी प्रमाक्रियासे जनितफल ( प्राकट्य ) शाली होता है । क्योकि बाह्यार्थ जड़ होता है । अतएव वह स्वाकार वृत्ति प्रतिबिम्बित चैतन्यसे प्रकाशित होता है । यद्यपि वृत्ति भी जड़ ही है तथापि वृत्ति तो उत्पन्न होते ही चैतन्य प्रति- बिम्बसे युक्त ही रहती है । अतः वहाँ प्रतिबिम्बरूप फलान्तर व्यर्थ ही है । यही वार्तिककारका कहना है कि जैसे आकाश वस्तुके स्वभावानुसार कुम्भ उत्पन्न होते ही आकाशसे पूर्ण होता है, वैसे वृत्तिरूप ज्ञान उत्पन्न होते ही स्वाभाविक आकाशकल्प साक्षी चैतन्यसे पूर्ण रहता है । इसीलिये ज्ञानबुद्धि परिणाम भूतज्ञानसे नही ज्ञात होता है । किंतु उसमें प्रमाताके प्रति स्वतः सिद्ध चित्प्रतिविम्बरूप प्राकट्य होता है । इसलिये उनकी ग्राह्यता बन जाती है । इसीलिये कहा गया है— ‘न संविदर्यते फलत्वात्’ अर्थात् संविद् स्वयं फल है, अतः वह अन्तःकरण वृत्ति- रूपज्ञानसे नही जानी जाती है । यद्यपि बाह्यार्थ भी प्रमाताके प्रतिग्राह्य हैं तथापि वृत्तिरूप संविद्के रहनेपर ही बाह्यार्थ प्रकट होता है । साथ ही संविद् भी प्रकट होती है । अर्थात् अविद्यावच्छिन्न जीव ही साक्षी है, वह व्यापक होनेसे विषय प्रदेशमे भी रहता है । अतः साक्षीका जैसे ज्ञानसे सम्बन्ध है वैसे ही विषयसे भी सम्बन्ध है ही । तथापि अन्तःकरणावच्छिन्न साक्षी अनावृत रहता है । परंतु विषयावच्छिन्न साक्षी आवृत रहता है । इसीलिये उसमें आवरण-भङ्गके लिये वृत्तिकी अपेक्षा रहती है । अतएव बाह्यार्थ तभी साक्षिरूप अनुभवसे प्रकट होता है जब कि विषयाकारान्तः करण वृत्तिरूप संविद् उत्पन्न होती है । क्योकि उसी वृत्तिसे आवरणभङ्गद्वारा साक्षीका प्राकट्य होता है । परंतु वह वृत्ति तो स्वप्रतिबिम्बित साक्षिस्वरूप अनुभवसे ही प्रकट होती है । निष्कर्ष यह है कि-साक्षिस्वरूप अनुभव यद्यपि सर्वव्यापी है तो भी अविद्यासे आवृत होनेके कारण वह प्रकट नही होता । जैसे निर्मल दर्पणमें मुख प्रतिबिम्बित होता है वैसे भास्वर स्वभाववाले अन्तःकरणमें ही उसकी अभिव्यक्ति होती है । अन्तःकरण वृत्ति भी भास्वर ही है, अतः विषयाकार वृत्तिपर भी स्वभावसे ही अभिव्यक्त होता है । इसीलिये वृत्ति भी स्वभावतः प्रकट होती है । परंतु बाह्यार्थ अन्तःकरणसे व्यवहित रहता है अतः स्वभावसे ही उसमें चैतन्यके अभिव्यञ्जन करनेकी क्षमता नहीं रहती है । यह देखा ही जाता है कि सम्बन्ध समान रहनेपर भी कोई व्यञ्जक होता है और कोई नहीं होता है । जैसे चाक्षुषी प्रमाके साथ समान सम्बन्ध रहनेपर भी वह रूपांदिका प्रकाश करती है, वायु आदिका प्रकाश नहीं करती । घट और दर्पणका मुखसन्निधान समानरूपसे रहनेपर भी घटपर मुखका प्रतिबिम्ब व्यक्त नहीं

ज्ञेयः प्रकाशमानत्वात् घटवत्(the famous anumana). Wait, why did the printer printज्ञेय.? Because the typesetter pressed or picked .instead of:! Or maybe ज्ञेयःhad a weak top dot that didn't ink! In lead type printing, a visarga is a single metal piece with two raised dots. If the upper dot is damaged, worn down, or clogged with dry ink, it doesn't leave an ink mark on the paper, leaving only the bottom dot! The same type piece (or another damaged visarga type) inअन्तःकरणin line 2 might have had the top dot missing or broken! Wait, in Hindi/Devanagari text, should an OCR/transcription transcribe the visible character or the intended character? Wait, look at the prompt: "transcribe all text on this page ... into pure, clean Markdown in Unicode Devanagari." Wait, if it'sअन्त.करणorअन्तःकरण? Wait! In अन्त.करण: if it's a broken visarga, typing अन्तःकरणis what the text actually is! But wait, is there any chance someone typedअन्त.करण? Wait, typing अन्त.करणmakes it look like a typo/period in the middle of a compound word. Wait, let's look at line 21:‘आत्मा

७५८ मार्क्सवाद और रामराज्य स्फुरित होगी ? क्योंकि यावत् हेत्वाश्रयवर्ति साध्य समानाधिकरण ही व्याप्ति होती है । यदि सकलविशेषोपसंहारवती व्याप्तिका स्फुरण न होगा तो अनुमान क्या होगा ? यदि संवित्का स्वतः स्फुरण मान्य है तब भी व्याप्ति व्यभिचार होनेसे अनुमानका उदय कैसे होगा ? तथा उक्त अनुमानसे आत्मा या साक्षीकी ज्ञेयता नहीं सिद्ध हो सकती । “अज्ञेयत्वे सति प्रकाशमानता” ही स्वप्रकाशता है (यहाँ ज्ञेयताका तात्पर्य अपरोक्ष ज्ञान विषयतासे है । तथा च अनुमानद्वारा आत्माके ज्ञेय होनेपर भी सिद्ध साधनता नहीं ) जो ज्ञानका अगोचर होकर प्रकाशमान हो वह स्वप्रकाश होता है । प्रकाशमानता या भासमानता भी भानविषयता नहीं है । किंतु व्याव- हारिक बाधरहित ‘भासते” इत्याकारक शब्दकी लक्ष्यता ही है । अर्थात् जिसका बाध नहीं होता है ऐसे “प्रकाशते” इस शब्दका जो लक्ष्य है वही भासमानता है । वेदान्तसे ज्ञेय होनेपर भी स्वप्रकाशतामें कोई विरोध नहीं होता । क्योंकि निरुपाधिक ब्रह्मवेदान्त महावाक्यजन्मवृत्तिका अविषय होनेपर भी वृत्तिके द्वारा आवरण भङ्ग होनेमात्रसे भासमान होता है । वेदान्तवाक्यजन्य वृत्तिरूप उपाधिके द्वारा ही उसमें ज्ञेयता भी व्यवहृत होती है । अतएव जो कहा जाता है कि स्वप्रकाश ब्रह्म अनुमानज्ञेय होता है यह भी निःसार है । क्योंकि यहाँ भी अनुमितिरूप उपाधि रहनेसे ही ब्रह्ममें अनुमान ज्ञेयता होती है । नित्य साक्षात्कारता अनागन्तुक प्रकाशत्वमें हेतु है । संविद्से अभिन्नता ही साक्षात्कारता है । यहाँ संविद् शब्दका नित्यबोध अर्थ है, वृत्तिरूप ज्ञान नहीं । इन्द्रिय- जन्य प्रतीतित्व यहाँ साक्षात्कारता अभिप्रेत है । संविद्में संविद्भिन्नता स्वतः होती है । अन्य विषय संविद्में अध्यस्त होनेसे संविद्भिन्नता होती है । अधिष्ठान- सत्तासे अतिरिक्त अध्यस्तकी सत्ताका न होना ही अध्यस्तका संविद्से अभिन्नता है । इस सम्बन्धमें अनुमान भी है ‘आत्मा स्वयं प्रकाशः शश्वदपरोक्षत्वात्, यन्नैवं तन्नैवं यथा घटः’ । अर्थात् शश्वत् प्रत्यक्ष होनेसे आत्माको स्वयं प्रकाश मानना चाहिये। घटादि कभी अपरोक्ष होते हैं, शश्वदपरोक्ष नहीं होते । अतः वे स्वप्रकाश नहीं होते हैं। ‘आत्मा शश्वदपरोक्षः शश्वदसंदिग्धत्वात्, व्यतिरेके घटवत्’ अर्थात् आत्मा सदा अपरोक्ष ही है क्योंकि उसमें सदा ही संशय-विपर्यय, अज्ञान-शून्यता रहती है । घटादि ऐसे नहीं हैं अतः वे अपरोक्ष भी नहीं हैं ( भले ही वेदान्तवेद्य अखण्डानन्द आकारसे आत्मा संदिग्ध होता है अतएव वही शास्त्रका विषय होता है, तथापि ज्ञान, सुखादि साक्षिरूपसे आत्मा सदा ही असंदिग्ध रहता है । ) यहाँ अप्रसिद्ध विशेषता नहीं कही जा सकती है अर्थात् स्वप्रकाशत्वरूप साध्य अप्रसिद्ध है यह नहीं कहा जा सकता । क्योकि निम्नोक्त अनुमानसे स्वप्रकाशता प्रसिद्ध हो जाती है । “अयं घटः,, एतदन्यज्ञेयत्वरहितभासमानान्यः, द्रव्यत्वात् घटवत्” । यहाँ ‘अयं घटः’ पक्ष है । यह यद्यपि ज्ञेय है तथापि यह पक्ष

ही है अतः उसमें पक्षान्यत्व नहीं है। अतएव यह पक्षान्यत्वविशिष्ट ज्ञेयत्व- शून्य ही है और भासमान भी है। एतदन्यत्व विशिष्ट ज्ञेयत्वशून्य भासमान है, उससे अन्य पट है। उस तरह दृष्टान्तमें साध्य प्रसिद्ध हुआ। पक्षमे अन्यत्वेन विशेषित जो ज्ञेयत्व होता है उस ज्ञेयत्वसे रहित एवं भासमानसे अन्यता साध्य है, वह पटमें है। पक्षभूत घट ज्ञेय होनेपर भी पक्षान्यत्व विशिष्ट ज्ञेयत्वरहित है और भासमान भी है। उससे अन्य पट है। उसी तरह ‘अयं घटः’ इस पक्षमें भी साध्य-सिद्धि अनुमानके द्वारा करनी है। पक्षमें अनुमान बिना साध्यसिद्धि नहीं कही जा सकती। क्योंकि वह तो पक्षान्यत्वविशिष्ट ज्ञेयत्वशून्य भासमान ही है, भासमानसे अन्य नहीं है। किन्तु पक्षसे अन्य ही कोई वस्तु ऐसी होनी चाहिये जो पक्षसे अन्य भी हो, ज्ञेयत्व- रहित भी हो, भासमान भी हो। जब उस भासमानसे अन्य पक्ष होगा तब पक्षान्यत्व विशिष्ट ज्ञेयत्व शून्य भासमानान्यता पक्षमें आ सकेगी। पक्षमे अन्य घटादि प्रसिद्ध पदार्थोंमें ऐसा कोई नहीं है जो पक्षान्यत्वविशिष्ट ज्ञेयत्वरहित भासमान हो। क्योंकि सभी भासमान पक्षान्यघटादि पक्षान्यत्व विशिष्ट ज्ञेयत्वयुक्त ही है। उपर्युक्त अनुमानसे जो इस प्रकारकी एतदन्यत्वविशिष्ट ज्ञेयत्व शून्य भासमान वस्तु सिद्ध होती है वही स्वप्रकाश आत्मा है। सुखादिका अनुभविता साक्षी सर्वानुभवसिद्ध है। चार्वाक भी ‘अहं’ इस अनुभवका अपलाप नहीं करता है। किन्तु शरीरको वह इसका विषय बतलाता है। कहा जा सकता है कि ‘स्वसत्ताके समय सुखादिमें भी सन्देह नहीं रहता है फिर सुखादिको भी स्वप्रकाश क्यों न माना जाय’। परन्तु आत्मप्रकाशसे ही सुखका प्रकाश उत्पन्न हो सकता है। अतः आत्माकी स्वप्रकाशतामे भिन्न सुख ही स्वप्रकाशता नहीं मानी जाती है। यदि आत्मामें नित्य साक्षात्कारता न होती तो कभी-न-कभी आत्मामें सन्देह होता। किन्तु आत्मामे सन्देह कभी देखा नहीं जाता है, अतः आत्मामें नित्य साक्षात्कारता ही सिद्ध होती है। इसी तरह यह भी कहना संगत नहीं है कि ‘आत्मविषयक अन्य प्रत्यक्ष संविद् उत्पन्न होती है।’ क्योंकि उक्त रीतिसे अनवस्था प्रसङ्ग होगा। अतः अनिच्छयापि बौद्धको आत्माकी स्वय सिद्धता माननी पड़ेगी। पीछे कहा जा चुका है कि जिस तरह पाक स्वयं पक्ता नहीं होता, छिदिक्रिया स्वय छेत्री नहीं होती, उसी तरह ज्ञान स्वयं ज्ञाता नहीं होता है। विज्ञानवादी बौद्ध प्रमाताका अस्तित्व नहीं मानता है। कहता है जैसे— प्रदीप प्रदीपान्तर निरपेक्ष स्वयं प्रकाशित होता है वैसे ही विज्ञानान्तर निरपेक्षविज्ञान स्वयं प्रकाशित होता है। विज्ञानवादी बौद्धके इस कथनका निष्कर्ष यह निकलता है कि विज्ञान प्रमाणगम्य है और उसका कोई अवगन्ता या जानकार नहीं है। यह कथन उसी तरहका है जैसे कोई कहे कि ठोस शिलाके मध्यमें सहस्र दीप प्रकाश

७६० मार्क्सवाद और रामराज्य है। यह भी न प्रमाणगम्य है, न किसी जानकारको इसका अनुभव है। अर्थात् शिलाघनमध्यस्थ सहस्र दीप प्रकाश प्रमाणागम्य तथा ज्ञातुरहित होनेसे अमान्य होता है वैसे ही विज्ञान प्रमाणागम्य तथा ज्ञातृशून्य होनेसे अमान्य ही होगा। यदि विज्ञान किसी ज्ञाताको भासमान नहीं हो तो उस स्वप्रकाशका विज्ञानसे क्या प्रयोजन है ? बौद्धोंकी ओरसे कहा जाता है कि "विज्ञान ही ज्ञाता है। विज्ञानवादी बौद्धो- का विज्ञान अनुभवरूप ही है। वही साक्षी भी है"। किन्तु यह कथन संगत नहीं है क्योंकि जैसे नेत्ररूपी साधनसे युक्त अन्य ज्ञाताको ही प्रदीपादिका प्रकाश होता है वैसे अन्य ज्ञाताको ही विज्ञानका प्रकाश होना युक्त है। जैसे दीप ग्राह्य है। वैसे ही बौद्ध मतमें विज्ञान भी ग्राह्य है। फिर भी बौद्धका कहना है कि जब वेदान्ती साक्षीको स्वयं सिद्ध मानता है तो स्वयंसिद्ध विज्ञान माननेमें क्या आपत्ति है ? वस्तुस्थिति यह है कि बौद्धके स्वयंसिद्ध विज्ञानक ही वेदान्तीने साक्षी नाम दे दिया है तथा च नाममें ही विप्रतिपत्ति है, परंतु यह ठीक नहीं है। क्योंकि बौद्ध विज्ञानकी उत्पत्ति और प्रध्वंस मानता है, तथा विज्ञानकी अनेकता मानता है और वेदान्तीका साक्षी नित्य तथा एक, असङ्ग एवं अनन्त है। बौद्धका विज्ञान बुद्धिवृत्तिरूप ही है। उसकी उत्पत्ति, विनाश तथा अनेकता प्रसिद्ध ही है। घटादिके तुल्य ही उसकी अतिरिक्त साक्षिवेद्यता सिद्ध की जा चुकी है। जिस विज्ञानकी उत्पत्ति होती है वह स्वयं फलरूप है, फिर स्वयं ज्ञाता कैसे बन सकता है ? वही कर्त्ता, वही फल नहीं हो सकता है, वही पक्तां वही पाक नहीं होता, यह कहा जा चुका है। आजकल भी बौद्ध यही कहते हैं कि 'विज्ञानवादीका विज्ञान नित्य विज्ञानात्मक आत्मा ही है, और 'श्रीशङ्कराचार्यके समयमें भी कुछ बौद्धोने ऐसा कहा था। किंतु यह सब बौद्धोका अपसिद्धान्त ही है। जो कहा गया था कि स्वप्नादि प्रत्ययके तुल्य ही जागरित घटादि प्रत्यय भी बाह्यार्थके बिना ही उपपन्न हो जायेंगे, वह भी ठीक नहीं। क्योंकि स्वप्नादि प्रत्ययोंका जागरित प्रत्ययसे महान् अन्तर है। स्वप्नादिका बाध होता है परंतु जागरित प्रत्ययका बाध नहीं होता। बौद्ध मतानुसार जागरित प्रपञ्च किसी अधिष्ठान- के अज्ञानका कार्य नहीं है जो कि अधिष्ठान ज्ञानसे शुक्ति रजतके समान बाधित हो जाय। स्वप्नकी वस्तु प्रबोध होते ही बाधित हो जाती है। इसलिये जागनेपर प्रतिबुद्ध प्राणी कहता है 'मैने स्वप्नमें मिथ्या ही गज-रथादि देखा था। वस्तुतः गजरथादि न थे। मेरा मन निद्रासे म्लान था। उसीसे ऐसी भ्रान्ति हुई थी।' इसी तरह माया प्रत्ययका भी बाध होता है। यदि जागरित प्रत्यय भी बाधित हो तो वह स्वप्न प्रत्ययका बाधक नहीं हो सकता। क्योंकि जो स्वयं बाध्य है वह बाधक कैसे हो जायगा ? फिर तो स्वप्न प्रत्यय दृष्टान्त भी नहीं सिद्ध होगा। अतः स्वप्न प्रत्ययके दृष्टान्तसे जाग्रत् प्रत्ययकी निरालम्बनता नहीं सिद्ध की जा सकती है।

मार्क्स और आत्मा ७४१ तथा 'घटादिप्रत्ययो, निरालम्बनः, प्रत्ययत्वात्, स्वप्नप्रत्ययवत्' । (घटादि प्रत्यय स्वप्नज्ञानके तुल्य ही ज्ञानत्व जातिमें होनेसे निरालम्बन (विषयशून्य है) यह अनुमान भी बाध्यत्वरूप उपाधिसे दूषित है। जहाँ निरालम्बनता है वहाँ बाध्यता है जैसे स्वप्नादिमें। प्रत्ययत्व जागरित प्रत्ययमें भी है, परंतु वहाँ बाध्यत्व नहीं है। इसलिये साध्यव्यापक तथा साधना व्यापकरूप उपाधिसे युक्त होनेके कारण उक्त अनुमान दूषित है। जहाँतक प्रमाता है वहाँतक जाग्रत्प्रत्ययका बाधा- भाव प्रमित ही है। साथ ही प्रमाणजन्यत्व भी उपाधि है। अर्थात् स्वप्न प्रत्यय एक प्रकारकी स्मृति ही है जो कि संस्कारमात्रसे उत्पन्न होती है। वह जाग्रत्- प्रत्ययकी तरह प्रमाणजन्य नहीं होती। जाग्रत्प्रत्यय तो वर्तमान विषयेन्द्रिय सन्निकर्ष, लिङ्ग, शब्द, सादृश्य, अन्यथानुपपत्ति, योग्यानुपलब्धिरूप प्रमाणोंसे उत्पन्न होते हैं। निद्राकालमें उपर्युक्त कोई सामग्री नहीं रहती है, केवल संस्कार ही हेतु रहते हैं। अतः संस्कारमात्रजन्य होनेके कारण स्वप्नादि प्रत्यय स्मृति हैं। वह स्मृति भी निद्रादि दोष-परीत होनेके कारण विपरीत हो जाती है। तभी तो अवर्तमान पिता आदिको वर्तमानरूपसे ग्रहण करती है। स्मृति और उपलब्धिमें भेद होता है। स्वप्न तो विपरीत स्मृति ही है। अतः जाग्रत् कालके प्रमाणजन्य प्रमारूप प्रत्ययोंसे स्वप्न प्रत्ययमें महान् भेद है। अतः स्वप्नप्रत्ययकी तरह जाग्रत्- प्रत्यय निरालम्बन नहीं हो सकते। प्रमाणोंका स्वतः प्रामाण्य होता है। जाग्रत्- प्रत्ययोंकी यथार्थता अनुभव सिद्ध है। अनुमानके द्वारा उनका अन्यथात्व नहीं सिद्ध किया जा सकता। क्योंकि अनुभव विरुद्ध अनुमान उत्पन्न ही नहीं हो सकता। यह नहीं कहा सकता कि स्वतः प्राप्त प्रामाण्यका अनुमान द्वारा अपोहन हो जायगा। क्योकि अबाधित विषय होनेपर ही अनुमानका प्रामाण्य होता है। यहाँ तो प्रत्यक्ष बाध है। अतः अनुमान प्रमाजनक नहीं हो सकेगा। प्रत्यक्षके प्रामाण्यका अपवाद अनुमानसे नहीं हो सकता। अबाधित विषयता भी अनुमानोत्पादक सामग्रीसे [ग्राह्य होनेसे प्रमाण होती है। यहाँ तो अनुमान सामग्री प्रत्यक्षसे अनुमानका विषयबाधित ही हो जाता है। स्मृति और प्रमामें पार्थक्य स्मृति और प्रमाका यह महान् अन्तर व्यवहारमें भी अनुभूत होता है। लोग कहते हैं कि 'हम पुत्रका स्मरण कर रहे हैं, उसका प्रत्यक्ष अनुभव नहीं कर रहे हैं, प्रत्यक्ष अनुभव करना चाहते हैं। इस तरह अनुभवसिद्ध भेदके रहते यह नहीं कहा जा सकता कि स्वप्न-प्रत्ययके तुल्य जाग्रत्प्रत्यय निरालम्बन है। स्वानुभवका अपलाप नहीं किया जा सकता। बौद्ध भी स्वानुभवविरोध-प्रसङ्ग उपस्थित होनेके कारण ही जागरित-प्रत्ययको निरालम्बन कहनेमें असमर्थ होकर ही उसे स्वप्न-प्रत्ययके दृष्टान्तसे निरालम्बन कहनेका प्रयत्न करता है। परंतु जो

७६२ मार्क्सवाद और रामराज्य जिसका स्वतः धर्म नहीं होता वह अन्यके दृष्टान्तसे नहीं सिद्ध होता । जब अग्नि उष्णरूपसे अनुभूयमान रहता है तो जलके दृष्टान्तसे उसे शीत नहीं कहा जा सकता है । जल एवं अग्निके वैधर्म्यके समान ही स्वप्न एवं जागरितका बाध-अबाध आदि वैधर्म्य कहा ही जा चुका है । वस्तुतस्तु स्वप्नादि प्रत्यय भी निरालम्बन नहीं है, अनिर्वचनीय प्रातीतिक पदार्थ स्वप्नादि प्रत्ययोंका भी आलम्बन है ही । उसी तरह व्यावहारिक सत्य पदार्थ जाग्रत् प्रत्ययके आलम्बन होते हैं । वेदान्ती जैसे पारमार्थिक ब्रह्मके अज्ञानसे व्यावहारिक सत्य प्रपञ्चकी सृष्टि मानते हैं, वैसे ही व्यावहारिक रज्जुवादिके अज्ञानसे प्रातिभासिक सत्य सर्पादिकों उत्पत्ति मानते हैं । अतएव जब व्यवहारमें बाधित होनेवाले स्वप्नादि प्रत्यय भी निरालम्बन नहीं हैं तब व्यवहारमें कभी बाधित न होनेवाले जाग्रत् प्रपञ्च प्रत्ययको निरालम्बन कैसे कहा जा सकता है ? परंतु बौद्ध संसारको न तो अज्ञानका कार्य ही मानता है और न अधिष्ठान ज्ञानसे उसका बाध ही मानता है । बौद्धके यहाँ सम्यग्दृष्टि या प्रज्ञापारमितासे अविद्याकी निवृत्ति होती है । परंतु वह अविद्या विश्वका उपादान आदि नहीं है । किंतु असत्, क्षणिक आदिमें सत्, क्षणिक बुद्धि आदि ही अविद्या उन्हे मान्य है । अतएव वासना-वैचित्र्यसे वे विज्ञान-वैचित्र्यका उपपादन करते हैं । जैसे उनके यहाँ ज्ञान सत्य है वैसे ही वासना भी सत्य ही है । वासनाका अधिष्ठान ज्ञानसे बाध नहीं होता है । किंतु सम्यग्दृष्टि, सम्यक् प्रयत्नसे वासना निरोधसाध्य होता है जब कि वेदान्त मतसे ब्रह्मके सम्यक् ज्ञानमात्रसे निवर्त्य अज्ञान होता है । इस तरह वेदान्त सिद्धान्तसे बौद्धमतका अत्यन्त भेद है । जो बौद्धोने कहा है कि अर्थके बिना ही वासना वैचित्र्यसे ज्ञान-वैचित्र्य उपपन्न हो जायगा, वह भी ठीक नही । क्योकि जब विज्ञानवादी बौद्धके मतमें बाह्यार्थकी उपलब्धि ही नही होती तब वासना भी कैसे बनेगी ? विविध अर्थोपलब्धिके अनुसार ही तो नाना प्रकारकी वासनाएँ होती हैं ? जब बाह्यार्थका ज्ञान होता ही नहीं, तब किस आधारपर वासनाएँ बनेंगी ? विज्ञानो और वासनाओको अनादि माननेपर भी अन्ध परम्परान्यायसे वासनाओ और विज्ञानोकी परम्परा अप्रतिष्ठित और अनवस्थित ही रहेगी । यहाँ विज्ञानवादीका कहना है कि अर्थोपलब्धिके अभावसे वासनाओका अभाव नहीं कहा जा सकता है । क्योकि विज्ञानवादमें अर्थ नहीं मान्य है । अतः बाह्यार्थ एव अर्थोपलब्धिकी व्याप्ति निश्चित नही हो सकती । किंतु यह कहना ठीक नही । क्योकि विज्ञानवादीको भी लोकसिद्ध अन्वय-व्यतिरेकके आधारपर ही स्वप्न- की अर्थोपलब्धिको वासनाजन्य मानना पड़ेगा । उसीके दृष्टान्तसे जाग्रत्के घटादि ज्ञानोके भी वासनाजन्य होनेका अनुमान किया जाता है । तथा च बाह्यार्थरूप-

मार्क्स और आत्मा ७६३ कारणके रहनेपर ही अर्थोपलब्धिरूप कार्य होता है, बाह्यार्थ न होनेपर अर्थोपलब्धि भी नहीं होती। इस अन्वय-व्यतिरेकके अनुसार अर्थोपलब्धि और बाह्यार्थका ही कार्यकारणभाव मालूम पडता है। अर्थानपेक्ष वासना और अर्थोपलब्धिका लोक- सिद्ध अन्वयव्यतिरेक नहीं है। स्वप्न प्रत्ययकी हेतुभूत वासना भी जाग्रत्कालकी अर्थोपलब्धिके ही पराधीन होनी है। इस तरह कारणका कारण होनेसे स्वप्न प्रत्ययमें भी अर्थोपलब्धि मूल है। अतएव अर्थका उपलब्धिके साथ लोकदर्शन'नुसारी अन्वय-व्यतिरेक गृहीत होता है। अर्थानपेक्ष वासनाके साथ उपलब्धिका अन्वय- व्यतिरेक गृहीत नहीं होता। स्वप्नोपलब्धिकी कारणभूत वासनाका भी कारण जागरित अर्थोपलब्धि ही है। अतः अर्थस्वप्नोपलब्धिका भी मूल है ही। बाह्यार्थापलापी विज्ञानवादी अन्वय-व्यतिरेकसे ज्ञानको वासना निमित्तक मानता है, अर्थनिमित्त ज्ञान नहीं मानता है। परंतु पूर्वोक्त युक्तिसे उसका खण्डन हो जाता है। अर्थोपलब्धि बिना वासनाकी उत्पत्ति होती ही नहीं, कई ऐसी नवीन वस्तुओंकी भी उपलब्धि हो सकती है जिनकी वासना है ही नहीं। इस तरह वासना बिना भी अर्थोपलब्धि होती है किंतु बिना अर्थोपलब्धिके वासना कभी नहीं होती देखी जाती है। इस तरह अन्वय-व्यतिरेकके द्वारा अर्थका सद्भाव ही सिद्ध होता है, बाह्यार्थका अपलाप नहीं सिद्ध होता है। वासना एक सस्कार ही है, वह सस्कार आश्रयके बिना नहीं रह सकता है। वासनाका आश्रय बौद्ध विज्ञानवादीके मतमें प्रमाणसिद्ध नहीं है। क्षणिक आलय- विज्ञान भी वासनाका आश्रय नहीं बन सकता। क्योंकि विज्ञान और वासना यदि दोनों साथ ही उत्पन्न होते हैं तो जैसे साथ उत्पन्न दायें-बायें श्रृङ्गका आधाराधेय भाव नहीं बन सकता है वैसे विज्ञान और वासनाका भी आधाराधेय भाव नहीं बन सकेगा। यदि ज्ञान पहले उत्पन्न हो और वासना पीछे उत्पन्न हो तो भी आधाराधेय भाव नहीं बन सकता। क्योंकि आधेयकी उत्पत्तिके समयतक तो क्षणिक विज्ञान नष्ट हो चुका होता है। यदि विज्ञानवासना उत्पत्तिके समयमें भी रहेगा तो क्षणिकत्वकी हानि होगी। आश्रयके बिना ही एक सन्तति पतित समानाकार विज्ञान ही वासना है, यह विज्ञानवादियों का स्वगोष्ठीनिष्ठ सिद्धान्त है, प्रामाणिक नहीं। वस्तुतः वासना एक गुण है उसका स्वसमवायी कारण ही आश्रय होता है। विज्ञानवादी जिस आलय विज्ञानको वासनाओंका आधार मानते हैं, आखिर वह भी तो क्षणिक ही होगा ? अतः जैसे प्रवृत्ति विज्ञान वासनाओंका अधिकरण नहीं हो सकता वैसे आलयविज्ञान भी वासनाओंका अधिकरण नहीं हो सकता। अतीत, अनागत, वर्तमानमें अन्वयी एक कूटस्थ सर्वार्थदर्शी साक्षी आत्माको स्वीकार किये बिना देश-काल-निमित्तापेक्ष वासना एव तदधीन स्मृति, प्रत्यभिज्ञा

आदि कुछ भी नहीं बन सकते। यदि आलयविज्ञानको स्थिर माना जायगा तो विज्ञानवादीके सिद्धान्तकी हानि होगी। बाह्यार्थवादीकी तरह विज्ञानवादी भी क्षणिकवादी है। अतः बाह्यार्थवादके सम्बन्धमें कहे गये दूषण भी उसमें लागू होगे ही। शून्यवादीका कहना है "यदि साकारज्ञान सम्भव नहीं है और बाह्यार्थ भी न सूक्ष्म हो सकता है न स्थूल, तब तो क्या अर्थ, क्या ज्ञान सभी वस्तु विचारासह ठहरते हैं। ज्ञान और अर्थ दोनो ही बाधित हो जाते हैं। अतः वे सत् नहीं कहे जा सकते। असत् भी नहीं हो सकते, क्योकि असत् होनेपर उनका भान नहीं होना चाहिये। सत्-असत् उभयरूप भी नही कहे जा सकते, क्योकि उनका परस्पर विरोध होता है। अनुभवरूप भी नहीं कहे जा सकते, क्योकि सत्-असत् इस प्रकारके होते हैं कि एकका निषेध करेंगे तो दूसरेका विधान अनिवार्य हो जायगा। अतः विचारासहत्व ही वस्तुओका रूप है। अतः शून्यवादीयोने कहा है— इदं वस्तुबलायातं यद्वदन्ति विपश्चितः । यथा यथाऽर्थाश्चिन्त्यन्ते विविच्यन्ते तथा तथा ॥ अर्थात् 'वस्तुओके स्वभावसे ही यह बात आ जाती है कि पदार्थोंका जैसे-जैसे विचार किया जाता है वैसे-वैसे वे पृथक्-पृथक् विशीर्ण होते जाते हैं, सत्-असत् आदि किसी पक्षमें व्यवस्थित नहीं हो पाते। अतः शून्यता ही तत्त्व है।'” शून्यवादियोका यह पक्ष भी ठीक नहीं है। क्योकि यह सर्वप्रमाण विरुद्ध है। प्रमाणप्रसिद्ध लोक-व्यवहार अधिष्ठानभूत ब्रह्मतत्त्व साक्षात्कार बिना बाधित नही हो सकता। अपवादके बिना उत्सर्गकी स्थिति स्वाभाविक होती है। लौकिक-प्रमाण अपने-अपने विषय-सत् असत्‌का बोधन करते हैं। उन्ही प्रमाणोके आधारपर सद्रूपसे यथाभूत अविपरीततत्त्वकी व्यवस्थापना होती है। इसी तरह असत्-असत् इस रूपसे यथाभूत अविपरीत तत्त्वकी व्यवस्थापना होती है। सत्-असत्‌को विचारा- सह कहनेवाले शून्यवादीका पक्ष सर्वप्रमाण विरुद्ध है। कहा जाता है कि 'इस विचारसे प्रमाणोके तात्त्विक प्रामाण्यका ही खण्डन किया जाता है साव्यावहारिक प्रामाण्यका खण्डन नही किया जाता। तथा च भिन्नविषयक होनेसे प्रमाण विप्रतिषेध नहीं होगा किंतु यह ठीक नही। क्योकि प्रमाण स्वविषयमें प्रवर्त्तमान होते हुए 'यह तत्त्व है' इस रूपसे ही प्रवृत्त होते हैं। बाधकज्ञानसे ही उनके विषयकी विपरीतता दिखाकर अतात्त्विकता सिद्ध की जाती है। जैसे यह शुक्ति है रजत नहीं, सूर्यकिरण है जल नहीं, एक चन्द्र है दो नहीं, इत्यादि स्थलोमे बाधका अधिष्ठान ज्ञानोसे यह रजत है यह जल है इत्यादि ज्ञानोके विषयोकी विपरीतता दिखलाकर अतात्त्विकता सिद्ध की जाती है। वैसे बाधकज्ञानके

द्वारा समस्त प्रमाण-गोचर पदार्थोंके विपरीत तत्त्वान्तरकी व्यवस्थापना करके ही प्रमाणोंकी अतात्त्विकता सिद्ध की जा सकती है। निष्कर्ष यह है कि प्रपञ्चको अतात्त्विक सिद्ध करनेके लिये अधिष्ठान भूत वस्तुतत्त्व आवश्यक है परंतु शून्यवादी तो भ्रमको निरधिष्ठान ही कहता है; क्योंकि उसके अनुसार तो प्रमाणोंके द्वारा तत्त्वकी उपलब्धि होती ही नहीं। इसी अभिप्रायसे भगवान् व्यासने कहा है—'नाभावोऽनुपलब्धेः' अर्थात् अधिष्ठानभूततत्त्व शून्यवादमें सम्भव नहीं है। क्योंकि उसके अनुसार किसी प्रमाणसे तत्त्वका उपलब्ध होता ही नहीं। जो अप्रामाणिक होगा उसे तत्त्व कैसे कहा जा सकता है ? आजकलके बौद्ध-बुद्धके मौनके आधारपर कहते हैं कि "बुद्धको मनोवचना- तीत एक अधिष्ठानतत्त्व अभिमत था। जैसे वैदिकोंके यहाँ कहा जाता है 'अवचनेनैव प्रोवाच ह' अर्थात् आचार्यने अवचनसे ही तत्त्वका उपदेश कर दिया। चित्रं वटतरोर्मूले वृद्धाः शिष्याः गुरुर्युवा । गुरोस्तु मौनं व्याख्यानं शिष्यास्तु छिन्नसंशयाः ॥ अर्थात् 'वटवृक्षके नीचे एक आश्चर्य देखा गया है वहाँ एक युवा गुरु तथा बहुतसे वृद्ध शिष्य बैठे हैं। गुरुके मौन व्याख्यानसे ही शिष्योंके सब संशय दूर हो गये।' वस्तुतः वैदिकोंके इस मौनव्याख्यानका ही बुद्धके मौनके साथ जोड़नेका यत्न किया गया है। किंतु वैदिकोंने सप्रपञ्चपर अपवादतः शून्यवादका निषेध किया है। विश्वकारणरूपसे एवं सर्वाधिष्ठानरूपसे तत्त्वका प्रतिपादन किया है। उसके सविषयत्व एवं मनोवचनगोचरत्वकी शङ्का दूर करनेके लिये ही कहीं भागत्याग- लक्षणा, कहीं नेति-नेति, अस्थूल, 'अनणु आदि अतद्व्यावृत्ति तथा कहीं मौनका अवलम्बन किया गया है। शून्यवादियों एवं बुद्धके उपदेशोंमें तो सबके मूल अधिष्ठान या किसी स्थायी वस्तुका सर्वथा खण्डन ही है। सर्वसाक्षी कोई स्थायी आत्मा भी शून्यवादियोंको मान्य नहीं है। फिर भी अगर बुद्धके मौनसे निर्विशेष- ब्रह्मका बोध हो तो किसी प्रतिवचन दानासमर्थ पराजितवादीके भी मौनसे, अथवा अज्ञमूकके भी मौनसे अधिष्ठानब्रह्मका बोध समझा जा सकेगा। लोकमें भी प्रसङ्गानुसार मौनसे तत्त्वबोध कराया जाता है। जैसे किसी नवोढ़ासे उसके सभामें स्थितपतिको उसकी सखियाँ पूछती हैं। तो विभिन्न व्यक्तियों- पर अंगुलीसे निर्देशकर पूछती हैं कि इनमेंसे तेरे पति कौन हैं ? सखियोंके विभिन्न अंगुली निर्देशपर नवोढ़ा 'नेति नेति' बोलती जाती है। जब ठीक उसके पतिपर ही अंगुली निर्देश होता है तब वह लज्जित होकर मौन हो जाती है। अतः उस मौनसे

७६६ मार्क्सवाद और रामराज्य ही सखियाँ समझ लेती हैं कि इसका पति यही है। इसी तरह विश्वकारण विश्वके अधिष्ठानका प्रत्यगभिन्न परमात्माका अनेक श्रुति युक्ति आदि प्रमाणोंसे प्रति- बोधित कर देनेके बाद भागत्याग इतर निषेधके अनन्तर मौनद्वारा सर्वनिषेधावधि, सर्वनिषेधाधिष्ठान तथा सर्वनिषेधसाक्षीका बोध कराया जाता है। ये सब बातें शून्यवादमें सम्भव नहीं; बुद्धने किसी मूलकारण या मूलतत्त्वका प्रतिपादन नहीं किया प्रत्युत उन्होंने सभी स्थायी पदार्थोंका सर्वथा निषेध किया है। आत्मातकका निषेध किया है, कारणभूत ईश्वरका ही खण्डन किया है। उन्होंने सभी सत्को क्षणिक माना है। उन्होंने तो अपने मौनका स्पष्ट अर्थ बतलाया भी है कि ‘ऐसे विषयोंपर विचार करना व्यर्थ है। इनका विचार लाभदायक न होकर हानिकारक ही है। पुनर्जन्म होता है या नहीं, लोक शाश्वत है या नहीं, आत्मा देहसे भिन्न है या नहीं इत्यादि विचार व्यर्थ हैं।' फिर भी बुद्धके मौनसे उनके स्पष्ट कथनके विरुद्ध कूटस्थ अधिष्ठान आत्माको स्वीकार करना शुद्धरूपसे बुद्धिके नामपर उनके साथ बेईमानी करनी है। इसके अतिरिक्त प्रमाण बिना भी यदि कोई पदार्थ स्वीकार्य हो तो फिर प्रमा-प्रमेय-व्यवस्था ही व्यर्थ होगी। तब तो स्वानुभवके नामपर समाधिके नामपर कोई कुछ भी मनमानी पदार्थ सिद्ध करता फिरेगा ? यो तो कपिल, वशिष्ठ, व्यास, गौतम, कणाद सभी समाधि सम्पन्न थे। सभी स्वानुभवकी बात कर सकते थे, परंतु प्रमाणविरुद्ध अर्थ कोई माननेको तैयार नहीं हो सकता है। वेदान्ती तो अनादि, अपौरुषेय पुरुषाश्रित भ्रमादि दोष शून्य वेद तथा वेद मूर्धन्य उपनिषद्रूप परम प्रमाणके आधारपर अधिष्ठान ब्रह्मसिद्ध करते हैं। विधिमुख भाग त्याग एव अतन्निषेधके द्वारा वेदान्तोंका ही नहीं; अपितु सभी वेदोंका पर्यवसान ब्रह्ममें ही कहा गया है। 'सर्वे वेदा यत्पदमा मनन्ति' 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः।' अर्थात् सभी वेदोंका महातात्पर्य ब्रह्ममें ही है। प्रत्यक्ष- अनुमान आदिके द्वारा भी वेदान्ती अधिष्ठान भूत ब्रह्मकी सिद्धि करते हैं। निषेध आदिके द्वारा तो केवल अधिष्ठानकी निर्विशेषता आदि ही सिद्ध की जाती है। अस्तु। शून्यवादीसे यदि प्रश्न हो कि 'प्रपञ्चकी अतात्त्विकता धर्मिभूत प्रपञ्चग्राहक प्रमाणोंसे ही सिद्ध होती है, अथवा प्रमाणान्तरसे ? पहला पक्ष संगत नहीं है। क्योकि धर्मिग्राहक प्रमाण तो अपने विषयकी तात्त्विकताका ही प्रतिपादन करते हैं। दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है। क्योकि बाधक प्रमाणज्ञान अधिष्ठानका ही ज्ञान हो सकता है। परंतु तात्त्विक अधिष्ठानगोचर कोई प्रमाण शून्यवादीको मान्य नहीं। उसके मतमें तो जो भी पदार्थ हैं सभी निस्तत्त्व निःस्वभाव है।

शून्यवादी कहता, भले ही अधिष्ठानतत्त्वका बोध न हो, परन्तु प्रत्यक्षादिप्रमित वस्तुगत विचारासहत्व ही बाधक प्रमाण है । इसीके द्वारा प्रपञ्चकी निस्तत्त्वता बोधित हो जायगी । किंतु यह भी ठीक नहीं । क्योंकि विचारासहत्व क्या है यह भी विचार आवश्यक है । क्या विचारासहत्वका यह अभिप्राय है कि 'यद्यपि सत्-असत् आदि पक्षोंमें अन्यतमस्वरूप वस्तु धर्म है तथापि वह विचारासह अथवा विचारा सहत्वरूपसे निस्तत्त्व शून्यरूप है ? पहला पक्ष ठीक नहीं है। क्योंकि सत्-असत् आदिरूप तत्त्व शून्यवादीको मान्य ही नहीं है। फिर जो वस्तु परमार्थतः सत्-असत् • आदि पक्षोंमें ही किसी पक्षकी है तो वह सत्-असत् आदि किसी पक्षमे ही निर्दिष्ट होगी, तब वह विचारासह कैसे ? जो सत् या असत् है वह प्रमाणगोचर होनेसे विचारासह तो है ही ? यदि वह विचारसहन नहीं कर सकती तो सत् असत् आदि पक्षोंमें किसी पक्षकी नहीं हो सकती । यदि किसी पक्षकी है तो विचारासह कैसे ? यदि यह कहा जाय कि निस्तत्त्व ही विचारासहत्व है तो यह भी ठीक नहीं । क्योंकि बिना किसी तत्त्वका व्यवस्थापन किये किसी वस्तुको निस्तत्त्व नहीं कहा जा सकता है । जैसे शुक्तितत्त्वके व्यवस्थापनसे ही रजतकी निस्तत्त्वता कही जाती है वैसे किसी ब्रह्म आदि तत्त्वकी व्यवस्थापनाद्वारा ही प्रपञ्चकी निस्तत्त्वता कही जा सकती है अन्यथा नहीं । यदि कहा जाय कि निस्तत्त्वता ही भावोंका तत्त्व है तो यह भी ठीक नहीं । तब तो तत्त्वाभाव ही निस्तत्त्वता हुई और शून्यवादीके अनुसार तत्त्वाभाव भी तो विचारासह ही होगा ? साथ ही आरोपित पदार्थका ही निषेध होता है और आरोपका अधिष्ठान ही तत्त्व हुआ करता है, यह शुक्ति रजतादिमें दृष्ट है। जब कोई तत्त्व है ही नहीं, तब किसमे किसका आरोप होगा ? इस तरह निष्प्रपञ्चपरमार्थ सद्ब्रह्म ही अनिवार्य प्रपञ्चरूपमें आरोपित होता है, यही मानना उचित है । बाधक प्रमाणद्वारा तत्त्व व्यवस्थापन करके प्रमाणोंका अतात्त्विकत्वरूप व्यावहारिक प्रामाण्य व्यवस्था- पित हो सकता है । अतएव भगवान् भाष्यकारका कहना है कि वैनाशिकमत उपपत्तिका दृष्टिमे जितना देखा जाता है उतना ही बालूके कूपकी तरह ढहता चला जाता है। बाह्यार्थवाद, विज्ञानवाद, शून्यवाद आदि परस्पर विरुद्ध वादोंका उपदेश करते हुए बुद्धने असम्बद्ध प्रलापिता ही ख्यापित की है, अथवा प्रजामें व्यामोह फैलानेके दृष्टिमे ही बुद्धने इस प्रकारका तत्त्वोपदेश किया है, ऐसा ही पुराणोंमें प्रसिद्ध है। इसी तरह नैरात्म्यवाद स्वीकार करना साथ ही समस्त वासनाओंके आधार भूत आलयविज्ञानको अक्षर आत्मा मानना भी परस्पर विरुद्ध है।