भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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मार्क्स और आत्मा ७६३ कारणके रहनेपर ही अर्थोपलब्धिरूप कार्य होता है, बाह्यार्थ न होनेपर अर्थोपलब्धि भी नहीं होती। इस अन्वय-व्यतिरेकके अनुसार अर्थोपलब्धि और बाह्यार्थका ही कार्यकारणभाव मालूम पडता है। अर्थानपेक्ष वासना और अर्थोपलब्धिका लोक- सिद्ध अन्वयव्यतिरेक नहीं है। स्वप्न प्रत्ययकी हेतुभूत वासना भी जाग्रत्कालकी अर्थोपलब्धिके ही पराधीन होनी है। इस तरह कारणका कारण होनेसे स्वप्न प्रत्ययमें भी अर्थोपलब्धि मूल है। अतएव अर्थका उपलब्धिके साथ लोकदर्शन'नुसारी अन्वय-व्यतिरेक गृहीत होता है। अर्थानपेक्ष वासनाके साथ उपलब्धिका अन्वय- व्यतिरेक गृहीत नहीं होता। स्वप्नोपलब्धिकी कारणभूत वासनाका भी कारण जागरित अर्थोपलब्धि ही है। अतः अर्थस्वप्नोपलब्धिका भी मूल है ही। बाह्यार्थापलापी विज्ञानवादी अन्वय-व्यतिरेकसे ज्ञानको वासना निमित्तक मानता है, अर्थनिमित्त ज्ञान नहीं मानता है। परंतु पूर्वोक्त युक्तिसे उसका खण्डन हो जाता है। अर्थोपलब्धि बिना वासनाकी उत्पत्ति होती ही नहीं, कई ऐसी नवीन वस्तुओंकी भी उपलब्धि हो सकती है जिनकी वासना है ही नहीं। इस तरह वासना बिना भी अर्थोपलब्धि होती है किंतु बिना अर्थोपलब्धिके वासना कभी नहीं होती देखी जाती है। इस तरह अन्वय-व्यतिरेकके द्वारा अर्थका सद्भाव ही सिद्ध होता है, बाह्यार्थका अपलाप नहीं सिद्ध होता है। वासना एक सस्कार ही है, वह सस्कार आश्रयके बिना नहीं रह सकता है। वासनाका आश्रय बौद्ध विज्ञानवादीके मतमें प्रमाणसिद्ध नहीं है। क्षणिक आलय- विज्ञान भी वासनाका आश्रय नहीं बन सकता। क्योंकि विज्ञान और वासना यदि दोनों साथ ही उत्पन्न होते हैं तो जैसे साथ उत्पन्न दायें-बायें श्रृङ्गका आधाराधेय भाव नहीं बन सकता है वैसे विज्ञान और वासनाका भी आधाराधेय भाव नहीं बन सकेगा। यदि ज्ञान पहले उत्पन्न हो और वासना पीछे उत्पन्न हो तो भी आधाराधेय भाव नहीं बन सकता। क्योंकि आधेयकी उत्पत्तिके समयतक तो क्षणिक विज्ञान नष्ट हो चुका होता है। यदि विज्ञानवासना उत्पत्तिके समयमें भी रहेगा तो क्षणिकत्वकी हानि होगी। आश्रयके बिना ही एक सन्तति पतित समानाकार विज्ञान ही वासना है, यह विज्ञानवादियों का स्वगोष्ठीनिष्ठ सिद्धान्त है, प्रामाणिक नहीं। वस्तुतः वासना एक गुण है उसका स्वसमवायी कारण ही आश्रय होता है। विज्ञानवादी जिस आलय विज्ञानको वासनाओंका आधार मानते हैं, आखिर वह भी तो क्षणिक ही होगा ? अतः जैसे प्रवृत्ति विज्ञान वासनाओंका अधिकरण नहीं हो सकता वैसे आलयविज्ञान भी वासनाओंका अधिकरण नहीं हो सकता। अतीत, अनागत, वर्तमानमें अन्वयी एक कूटस्थ सर्वार्थदर्शी साक्षी आत्माको स्वीकार किये बिना देश-काल-निमित्तापेक्ष वासना एव तदधीन स्मृति, प्रत्यभिज्ञा