भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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७६२ मार्क्सवाद और रामराज्य जिसका स्वतः धर्म नहीं होता वह अन्यके दृष्टान्तसे नहीं सिद्ध होता । जब अग्नि उष्णरूपसे अनुभूयमान रहता है तो जलके दृष्टान्तसे उसे शीत नहीं कहा जा सकता है । जल एवं अग्निके वैधर्म्यके समान ही स्वप्न एवं जागरितका बाध-अबाध आदि वैधर्म्य कहा ही जा चुका है । वस्तुतस्तु स्वप्नादि प्रत्यय भी निरालम्बन नहीं है, अनिर्वचनीय प्रातीतिक पदार्थ स्वप्नादि प्रत्ययोंका भी आलम्बन है ही । उसी तरह व्यावहारिक सत्य पदार्थ जाग्रत् प्रत्ययके आलम्बन होते हैं । वेदान्ती जैसे पारमार्थिक ब्रह्मके अज्ञानसे व्यावहारिक सत्य प्रपञ्चकी सृष्टि मानते हैं, वैसे ही व्यावहारिक रज्जुवादिके अज्ञानसे प्रातिभासिक सत्य सर्पादिकों उत्पत्ति मानते हैं । अतएव जब व्यवहारमें बाधित होनेवाले स्वप्नादि प्रत्यय भी निरालम्बन नहीं हैं तब व्यवहारमें कभी बाधित न होनेवाले जाग्रत् प्रपञ्च प्रत्ययको निरालम्बन कैसे कहा जा सकता है ? परंतु बौद्ध संसारको न तो अज्ञानका कार्य ही मानता है और न अधिष्ठान ज्ञानसे उसका बाध ही मानता है । बौद्धके यहाँ सम्यग्दृष्टि या प्रज्ञापारमितासे अविद्याकी निवृत्ति होती है । परंतु वह अविद्या विश्वका उपादान आदि नहीं है । किंतु असत्, क्षणिक आदिमें सत्, क्षणिक बुद्धि आदि ही अविद्या उन्हे मान्य है । अतएव वासना-वैचित्र्यसे वे विज्ञान-वैचित्र्यका उपपादन करते हैं । जैसे उनके यहाँ ज्ञान सत्य है वैसे ही वासना भी सत्य ही है । वासनाका अधिष्ठान ज्ञानसे बाध नहीं होता है । किंतु सम्यग्दृष्टि, सम्यक् प्रयत्नसे वासना निरोधसाध्य होता है जब कि वेदान्त मतसे ब्रह्मके सम्यक् ज्ञानमात्रसे निवर्त्य अज्ञान होता है । इस तरह वेदान्त सिद्धान्तसे बौद्धमतका अत्यन्त भेद है । जो बौद्धोने कहा है कि अर्थके बिना ही वासना वैचित्र्यसे ज्ञान-वैचित्र्य उपपन्न हो जायगा, वह भी ठीक नही । क्योकि जब विज्ञानवादी बौद्धके मतमें बाह्यार्थकी उपलब्धि ही नही होती तब वासना भी कैसे बनेगी ? विविध अर्थोपलब्धिके अनुसार ही तो नाना प्रकारकी वासनाएँ होती हैं ? जब बाह्यार्थका ज्ञान होता ही नहीं, तब किस आधारपर वासनाएँ बनेंगी ? विज्ञानो और वासनाओको अनादि माननेपर भी अन्ध परम्परान्यायसे वासनाओ और विज्ञानोकी परम्परा अप्रतिष्ठित और अनवस्थित ही रहेगी । यहाँ विज्ञानवादीका कहना है कि अर्थोपलब्धिके अभावसे वासनाओका अभाव नहीं कहा जा सकता है । क्योकि विज्ञानवादमें अर्थ नहीं मान्य है । अतः बाह्यार्थ एव अर्थोपलब्धिकी व्याप्ति निश्चित नही हो सकती । किंतु यह कहना ठीक नही । क्योकि विज्ञानवादीको भी लोकसिद्ध अन्वय-व्यतिरेकके आधारपर ही स्वप्न- की अर्थोपलब्धिको वासनाजन्य मानना पड़ेगा । उसीके दृष्टान्तसे जाग्रत्के घटादि ज्ञानोके भी वासनाजन्य होनेका अनुमान किया जाता है । तथा च बाह्यार्थरूप-