भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 520

मार्क्स और आत्मा ७४१ तथा 'घटादिप्रत्ययो, निरालम्बनः, प्रत्ययत्वात्, स्वप्नप्रत्ययवत्' । (घटादि प्रत्यय स्वप्नज्ञानके तुल्य ही ज्ञानत्व जातिमें होनेसे निरालम्बन (विषयशून्य है) यह अनुमान भी बाध्यत्वरूप उपाधिसे दूषित है। जहाँ निरालम्बनता है वहाँ बाध्यता है जैसे स्वप्नादिमें। प्रत्ययत्व जागरित प्रत्ययमें भी है, परंतु वहाँ बाध्यत्व नहीं है। इसलिये साध्यव्यापक तथा साधना व्यापकरूप उपाधिसे युक्त होनेके कारण उक्त अनुमान दूषित है। जहाँतक प्रमाता है वहाँतक जाग्रत्प्रत्ययका बाधा- भाव प्रमित ही है। साथ ही प्रमाणजन्यत्व भी उपाधि है। अर्थात् स्वप्न प्रत्यय एक प्रकारकी स्मृति ही है जो कि संस्कारमात्रसे उत्पन्न होती है। वह जाग्रत्- प्रत्ययकी तरह प्रमाणजन्य नहीं होती। जाग्रत्प्रत्यय तो वर्तमान विषयेन्द्रिय सन्निकर्ष, लिङ्ग, शब्द, सादृश्य, अन्यथानुपपत्ति, योग्यानुपलब्धिरूप प्रमाणोंसे उत्पन्न होते हैं। निद्राकालमें उपर्युक्त कोई सामग्री नहीं रहती है, केवल संस्कार ही हेतु रहते हैं। अतः संस्कारमात्रजन्य होनेके कारण स्वप्नादि प्रत्यय स्मृति हैं। वह स्मृति भी निद्रादि दोष-परीत होनेके कारण विपरीत हो जाती है। तभी तो अवर्तमान पिता आदिको वर्तमानरूपसे ग्रहण करती है। स्मृति और उपलब्धिमें भेद होता है। स्वप्न तो विपरीत स्मृति ही है। अतः जाग्रत् कालके प्रमाणजन्य प्रमारूप प्रत्ययोंसे स्वप्न प्रत्ययमें महान् भेद है। अतः स्वप्नप्रत्ययकी तरह जाग्रत्- प्रत्यय निरालम्बन नहीं हो सकते। प्रमाणोंका स्वतः प्रामाण्य होता है। जाग्रत्- प्रत्ययोंकी यथार्थता अनुभव सिद्ध है। अनुमानके द्वारा उनका अन्यथात्व नहीं सिद्ध किया जा सकता। क्योंकि अनुभव विरुद्ध अनुमान उत्पन्न ही नहीं हो सकता। यह नहीं कहा सकता कि स्वतः प्राप्त प्रामाण्यका अनुमान द्वारा अपोहन हो जायगा। क्योकि अबाधित विषय होनेपर ही अनुमानका प्रामाण्य होता है। यहाँ तो प्रत्यक्ष बाध है। अतः अनुमान प्रमाजनक नहीं हो सकेगा। प्रत्यक्षके प्रामाण्यका अपवाद अनुमानसे नहीं हो सकता। अबाधित विषयता भी अनुमानोत्पादक सामग्रीसे [ग्राह्य होनेसे प्रमाण होती है। यहाँ तो अनुमान सामग्री प्रत्यक्षसे अनुमानका विषयबाधित ही हो जाता है। स्मृति और प्रमामें पार्थक्य स्मृति और प्रमाका यह महान् अन्तर व्यवहारमें भी अनुभूत होता है। लोग कहते हैं कि 'हम पुत्रका स्मरण कर रहे हैं, उसका प्रत्यक्ष अनुभव नहीं कर रहे हैं, प्रत्यक्ष अनुभव करना चाहते हैं। इस तरह अनुभवसिद्ध भेदके रहते यह नहीं कहा जा सकता कि स्वप्न-प्रत्ययके तुल्य जाग्रत्प्रत्यय निरालम्बन है। स्वानुभवका अपलाप नहीं किया जा सकता। बौद्ध भी स्वानुभवविरोध-प्रसङ्ग उपस्थित होनेके कारण ही जागरित-प्रत्ययको निरालम्बन कहनेमें असमर्थ होकर ही उसे स्वप्न-प्रत्ययके दृष्टान्तसे निरालम्बन कहनेका प्रयत्न करता है। परंतु जो