मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदि कुछ भी नहीं बन सकते। यदि आलयविज्ञानको स्थिर माना जायगा तो विज्ञानवादीके सिद्धान्तकी हानि होगी। बाह्यार्थवादीकी तरह विज्ञानवादी भी क्षणिकवादी है। अतः बाह्यार्थवादके सम्बन्धमें कहे गये दूषण भी उसमें लागू होगे ही। शून्यवादीका कहना है "यदि साकारज्ञान सम्भव नहीं है और बाह्यार्थ भी न सूक्ष्म हो सकता है न स्थूल, तब तो क्या अर्थ, क्या ज्ञान सभी वस्तु विचारासह ठहरते हैं। ज्ञान और अर्थ दोनो ही बाधित हो जाते हैं। अतः वे सत् नहीं कहे जा सकते। असत् भी नहीं हो सकते, क्योकि असत् होनेपर उनका भान नहीं होना चाहिये। सत्-असत् उभयरूप भी नही कहे जा सकते, क्योकि उनका परस्पर विरोध होता है। अनुभवरूप भी नहीं कहे जा सकते, क्योकि सत्-असत् इस प्रकारके होते हैं कि एकका निषेध करेंगे तो दूसरेका विधान अनिवार्य हो जायगा। अतः विचारासहत्व ही वस्तुओका रूप है। अतः शून्यवादीयोने कहा है— इदं वस्तुबलायातं यद्वदन्ति विपश्चितः । यथा यथाऽर्थाश्चिन्त्यन्ते विविच्यन्ते तथा तथा ॥ अर्थात् 'वस्तुओके स्वभावसे ही यह बात आ जाती है कि पदार्थोंका जैसे-जैसे विचार किया जाता है वैसे-वैसे वे पृथक्-पृथक् विशीर्ण होते जाते हैं, सत्-असत् आदि किसी पक्षमें व्यवस्थित नहीं हो पाते। अतः शून्यता ही तत्त्व है।'” शून्यवादियोका यह पक्ष भी ठीक नहीं है। क्योकि यह सर्वप्रमाण विरुद्ध है। प्रमाणप्रसिद्ध लोक-व्यवहार अधिष्ठानभूत ब्रह्मतत्त्व साक्षात्कार बिना बाधित नही हो सकता। अपवादके बिना उत्सर्गकी स्थिति स्वाभाविक होती है। लौकिक-प्रमाण अपने-अपने विषय-सत् असत्का बोधन करते हैं। उन्ही प्रमाणोके आधारपर सद्रूपसे यथाभूत अविपरीततत्त्वकी व्यवस्थापना होती है। इसी तरह असत्-असत् इस रूपसे यथाभूत अविपरीत तत्त्वकी व्यवस्थापना होती है। सत्-असत्को विचारा- सह कहनेवाले शून्यवादीका पक्ष सर्वप्रमाण विरुद्ध है। कहा जाता है कि 'इस विचारसे प्रमाणोके तात्त्विक प्रामाण्यका ही खण्डन किया जाता है साव्यावहारिक प्रामाण्यका खण्डन नही किया जाता। तथा च भिन्नविषयक होनेसे प्रमाण विप्रतिषेध नहीं होगा किंतु यह ठीक नही। क्योकि प्रमाण स्वविषयमें प्रवर्त्तमान होते हुए 'यह तत्त्व है' इस रूपसे ही प्रवृत्त होते हैं। बाधकज्ञानसे ही उनके विषयकी विपरीतता दिखाकर अतात्त्विकता सिद्ध की जाती है। जैसे यह शुक्ति है रजत नहीं, सूर्यकिरण है जल नहीं, एक चन्द्र है दो नहीं, इत्यादि स्थलोमे बाधका अधिष्ठान ज्ञानोसे यह रजत है यह जल है इत्यादि ज्ञानोके विषयोकी विपरीतता दिखलाकर अतात्त्विकता सिद्ध की जाती है। वैसे बाधकज्ञानके