भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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द्वारा समस्त प्रमाण-गोचर पदार्थोंके विपरीत तत्त्वान्तरकी व्यवस्थापना करके ही प्रमाणोंकी अतात्त्विकता सिद्ध की जा सकती है। निष्कर्ष यह है कि प्रपञ्चको अतात्त्विक सिद्ध करनेके लिये अधिष्ठान भूत वस्तुतत्त्व आवश्यक है परंतु शून्यवादी तो भ्रमको निरधिष्ठान ही कहता है; क्योंकि उसके अनुसार तो प्रमाणोंके द्वारा तत्त्वकी उपलब्धि होती ही नहीं। इसी अभिप्रायसे भगवान् व्यासने कहा है—'नाभावोऽनुपलब्धेः' अर्थात् अधिष्ठानभूततत्त्व शून्यवादमें सम्भव नहीं है। क्योंकि उसके अनुसार किसी प्रमाणसे तत्त्वका उपलब्ध होता ही नहीं। जो अप्रामाणिक होगा उसे तत्त्व कैसे कहा जा सकता है ? आजकलके बौद्ध-बुद्धके मौनके आधारपर कहते हैं कि "बुद्धको मनोवचना- तीत एक अधिष्ठानतत्त्व अभिमत था। जैसे वैदिकोंके यहाँ कहा जाता है 'अवचनेनैव प्रोवाच ह' अर्थात् आचार्यने अवचनसे ही तत्त्वका उपदेश कर दिया। चित्रं वटतरोर्मूले वृद्धाः शिष्याः गुरुर्युवा । गुरोस्तु मौनं व्याख्यानं शिष्यास्तु छिन्नसंशयाः ॥ अर्थात् 'वटवृक्षके नीचे एक आश्चर्य देखा गया है वहाँ एक युवा गुरु तथा बहुतसे वृद्ध शिष्य बैठे हैं। गुरुके मौन व्याख्यानसे ही शिष्योंके सब संशय दूर हो गये।' वस्तुतः वैदिकोंके इस मौनव्याख्यानका ही बुद्धके मौनके साथ जोड़नेका यत्न किया गया है। किंतु वैदिकोंने सप्रपञ्चपर अपवादतः शून्यवादका निषेध किया है। विश्वकारणरूपसे एवं सर्वाधिष्ठानरूपसे तत्त्वका प्रतिपादन किया है। उसके सविषयत्व एवं मनोवचनगोचरत्वकी शङ्का दूर करनेके लिये ही कहीं भागत्याग- लक्षणा, कहीं नेति-नेति, अस्थूल, 'अनणु आदि अतद्व्यावृत्ति तथा कहीं मौनका अवलम्बन किया गया है। शून्यवादियों एवं बुद्धके उपदेशोंमें तो सबके मूल अधिष्ठान या किसी स्थायी वस्तुका सर्वथा खण्डन ही है। सर्वसाक्षी कोई स्थायी आत्मा भी शून्यवादियोंको मान्य नहीं है। फिर भी अगर बुद्धके मौनसे निर्विशेष- ब्रह्मका बोध हो तो किसी प्रतिवचन दानासमर्थ पराजितवादीके भी मौनसे, अथवा अज्ञमूकके भी मौनसे अधिष्ठानब्रह्मका बोध समझा जा सकेगा। लोकमें भी प्रसङ्गानुसार मौनसे तत्त्वबोध कराया जाता है। जैसे किसी नवोढ़ासे उसके सभामें स्थितपतिको उसकी सखियाँ पूछती हैं। तो विभिन्न व्यक्तियों- पर अंगुलीसे निर्देशकर पूछती हैं कि इनमेंसे तेरे पति कौन हैं ? सखियोंके विभिन्न अंगुली निर्देशपर नवोढ़ा 'नेति नेति' बोलती जाती है। जब ठीक उसके पतिपर ही अंगुली निर्देश होता है तब वह लज्जित होकर मौन हो जाती है। अतः उस मौनसे