मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअर्थात् वृत्ति विकल्पादि पूर्वोक्त तर्कोंसे बाह्य परमाणु समूहात्मक तथा ज्ञानात्मक आन्तरविषय माना जाय तब भी स्थूलाभास प्रत्यय नहीं बन सकता, क्योकि पूर्ववर्णित पद्धतिसे ही नाना परमाणुओंका आलम्बन करनेवाले एक ज्ञानमें जैसे स्थूलविषयता नहीं बन सकती उसी तरह परमाणुगोचर नाना ज्ञान हो तो परस्पर वार्तानभिज्ञ होनेके कारण स्थूलाभास प्रत्यय नहीं हो सकता । अतः ज्ञानाकार स्थूलताके समर्थन करनेवाले विज्ञानवादीको भी प्रमाणकी प्रवृत्ति एवं अप्रवृत्तिके आधारपर ही सम्भव-असम्भवकी व्यवस्था माननी पड़ेगी । तथाच प्रमाण- प्रवृत्तिबलसे ही ज्ञानभिन्न इदन्तास्पद बाह्यार्थका अपह्नव नहीं किया जा सकता । जो ज्ञानकी प्रतिविषय व्यवस्थाके लिये ज्ञानमें विषयसारूप्य माना जाता है उससे भी विषयका अपलाप नहीं हो सकता । क्योंकि यदि अर्थ है ही नहीं तो ज्ञानमें किसकी सरूपता होगी ? और विषय न होनेपर प्रतिविषय-ज्ञानव्यवस्थाका भी क्या अर्थ रह जाता है । सुस्पष्टरूपसे बाह्यार्थका उपलम्भ होता है अतः उसका अस्तित्व मानना अनिवार्य है । सहोपलम्भ नियमपर भी यह विचारणीय है कि क्या ज्ञान और अर्थ- का साहित्येन ( साथ-साथ ) उपलम्भ ही होना सहोपलम्भ है ? यदि हाँ, तो सहोपा- लम्भ हेतु विरुद्ध हैं इसके द्वारा अभेदकी सिद्धि नहीं हो सकेगी। साहित्येन उपलम्भ तभी बन सकता है जब ज्ञान और अर्थ दो वस्तु हो । अतः भेदगर्भित हेतुसे अभेदसिद्धि असम्भव है । साहित्य अभेदविरुद्ध भेदव्याप्य होता है । जहाँ साहित्य होगा वहाँ भेदका होना अनिवार्य होता है । यदि एकोपलम्भ नियम अर्थात् एक उपलम्भसे ज्ञान और अर्थका ग्रहण होना ही सहो- पलम्भ है तो यह भी असंगत है । क्योंकि सहोपलम्भमें सहशब्द एकत्वका वाचक नहीं है फिर सहोपलम्भका एकोपलम्भ कैसे हो जायगा। यदि कहा जाय कि अर्थैको- पलम्भ ही हेतु समझ लेना चाहिये फिर भी यह विचारणीय होगा कि एकत्वेन उपलम्भ एकोपलम्भ है अथवा ज्ञान और अर्थका एक उपलम्भ होना ही एकोपलम्भ है ? पहला पक्ष ठीक नही क्योकि ज्ञान और अर्थका एकत्वेन ग्रहण नहीं होता, ज्ञान आन्तररूपसे गृहीत होता है ओर अर्थ बाह्यरूपसे । आगे बताया जायगा कि कही ज्ञानका नानात्व होनेपर भी विषयका एकत्व रहता है, कहीं विषय नानात्व रहनेपर भी ज्ञानका एकत्व रहता है, एकत्वेन उपलम्भ कहाँ है ! दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं क्योंकि वह तो उपायोपेयभावके कारण उत्पन्न हो जाता है उससे अभेदकी सिद्धि नही हो सकती । अतएव सहोपलम्भ नियम भी ज्ञान और विषयके उपायोपेयभावके कारण उपपन्न है, अभेदके कारण नहीं । जिस प्रकार मनुष्योंको सभी बुद्धि बोध्य चाक्षुषरूपादि पदार्थ प्रभाके रूपसे अनुबुद्धि ही गृहीत होते हैं प्रभाके साथ ही नील-पीतादिरूपका उपलम्भ होता है तो भी इस सहोपलम्भसे यह नहीं कहा जा सकता कि प्रभा और रूप अभिन्न हैं किंतु यही