भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 509

७५० मार्क्सवाद और रामराज्य यदि परमाणुओमें गुणोपचय न माना जाय तो परमाणुकार्य पृथिव्यादिमें भी गुणोपचय नही दीखना चाहिये। यदि परमाणुको निरंश माना जाय तो द्वयणुकादिमें स्थूलता न बन सकेगी। यदि वह सांश हो गया तो उसमें अनित्यता आदि भी होगी इत्यादि जो दोष वैशेषिकोंके मतमे लागू होते हैं वे सब सौत्रान्तिक एव विज्ञानवादी बौद्धोंके यहाँ भी लागू होगे। जगत्को अनिर्वचनीय माननेवाले वेदान्तीके लिये तो वस्तुओका विचारासहत्व भूषण ही है। किन्तु बौद्धोके यहाँ यह नही कहा जा सकता। बाह्य अस्तित्त्ववादी जैसे पदार्थोंको बाह्य मानता है उसी तरह विज्ञानवादी उन सभी पदार्थोंको अन्तःसत्य मानता है। यदि आन्तर पदार्थ सत्य हैं तो जैसे बाह्यपदार्थोंमे स्थौल्य आदि असम्भव है वैसे ही आन्तर पदार्थोंमे भी स्थौल्य आदि असम्भव ही होगे ऐसी स्थितिमें वैशेषिकोंके पक्षमें कहे गये सभी दोष विज्ञानवादमें भी लागू होगे। यदि कहा जाय कि ज्ञानसे अभिन्न अर्थ माननेपर एक बुद्धिभासित पटमें तद्देशत्व अतद्देशत्वादि विरुद्धधर्म संसर्ग प्रसक्त न होगे; क्योकि ज्ञानके विषय परमाणु ही होगे उनमें तद्देशत्व-अतद्देशत्वादिका कोई प्रसङ्ग ही नही होगा। परंतु वह भी कथन ठीक नही है, कारण कि यहाँ विचारना होगा कि ज्ञान-ज्ञेयका अभेद क्या है। ज्ञान ज्ञेयमात्र है या ज्ञेय ज्ञानमात्र है। पहला पक्ष ठीक नही; क्योकि यदि अनेक नीलपरमाणुओका आलम्बन करनेवाला ज्ञानज्ञेयमात्र है तो ज्ञेय नानात्वके समान ही एक नीलज्ञानमें भी नानात्वापत्ति होगी। यदि ज्ञेय ज्ञानमात्र माना जाय तो आकारोका ज्ञानसे अभेद होनेसे अनेक आकारोंमे एकत्वापत्ति- दोष होगा। यह भी नही कहा जा सकता है कि जितने आकार हैं उतने ही ज्ञान हैं; क्योकि इस तरह नानापरमाणुओको आलम्बन करनेवाले अनेक ज्ञानोके परस्पर वार्तानभिज्ञ होनेसे उनमें स्थूल वस्तुका अनुभव असम्भव ही होगा। यह भी नहीं कहा जा सकता कि एक-एक ज्ञानसे संगृहीत नाना परमाणुओका परामर्शरूप एक विकल्प ज्ञान ही स्थूलालम्बन है। क्योकि वह ज्ञान भी साकार ही होगा। उसके आकार नाना परमाणुओका भी ज्ञानसे अभेद ही होगा। यदि ज्ञान ज्ञेयमात्र होगा तो ज्ञेयभेदसे ज्ञानमें भेदापत्ति होगी। यदि आकार ज्ञानमात्र होगा तो भी आकारोमें एकत्वापत्ति होगी, इसलिये स्थूलालम्बन एक ज्ञान असम्भव ही होगा। जैसा कि धर्मकीर्तिका कहना है कि--- “तस्मान्नार्थे न च ज्ञाने स्थूलाभासस्तदात्मनः । एकत्त्वं प्रतिषिद्धत्वाद्वहुष्वपि न सम्भवः ॥”