मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७५२ मार्क्सवाद और रामराज्य कहना पड़ेगा कि प्रभा रूपोपलम्भका उपाय है। इसलिये सहोपलम्भ नियम होता है, इसी तरह अर्थोपलम्भका आत्मसाक्षिक अनुभव ही उपाय है। इसलिये ज्ञेयज्ञात- का सहोपलम्भ नियम होता है इस तरह सहोपलम्भ नियम अभेदका साधक नहीं होता । जहाँपर घट-पटादि अनेक पदार्थ एक ज्ञानगोचर होते हैं वहाँ सभी समझदार समझते हैं कि ज्ञेय अर्थका भेद है और ज्ञानका अभेद होता है। यदि ज्ञान और ज्ञेयका अभेद ही हो तो ज्ञानके एक होनेसे विषयको भी एक होना चाहिये । वैसे भी घटज्ञान, पटज्ञान आदिमें घट-पट आदि विशेषणोंका ही भेद है, विशेष ज्ञान तो एक ही है। जैसे "शुक्ल गौ कृष्ण गौ" इत्यादि स्थलोंमें गोत्वका अभेद रहनेपर भी कृष्णता-गौरता आदिका ही भेद रहता है। दोसे एकका एकसे दोका भेद प्रसिद्ध ही है। इस तरह जैसे अनेक शुक्लता कृष्णतासे एक गोत्वका भेद होता है उसी तरह अनेक घट-पटादि विषयोंसे एक ज्ञानका भी भेद ही समझना चाहिये। इसलिये ज्ञान और ज्ञेयका भेद ही सम्यक् है। इसी तरह अर्थ अभेद रहनेपर भी ज्ञानमें भेद होता है। घटका दर्शन घट स्मरण आदि स्थलोंमें विशेष्य दर्शन एव स्मरणमें भेद है, घट विशेषणका अभेद है। जैसे क्षीरगन्ध क्षीररस यहाँ विशेष्य गन्धरसका भेद है, विशेषण क्षीरका अभेद होता है इस तरह भी ज्ञान-ज्ञेयका भेद सिद्ध होता है। पूर्वोत्तरवर्ती दो विज्ञान स्वसंवेदनसे ही उपक्षीण हो जाते हैं। उनमें परस्पर ग्राह्य-ग्राहकभाव नहीं बन सकता। फिर भेद ही कैसे सिद्ध होगा अर्थात् स्वरूप- मात्रमें पर्यवसित ज्ञान एक दूसरे ज्ञानको जान ही नहीं सकता फिर जिन दोनोंका भेद होता है वे ही जब अगृहीत हैं तो तद्गतभेद सुतरां असिद्ध ही होगा। क्योंकि भेदज्ञानके लिये अनुयोगी—प्रतियोगीका ज्ञान अपेक्षित होता है। इसी तरह सब क्षणिक हैं, सब शून्य हैं तथा सब अनात्मा हैं इत्यादि अनेक प्रतिज्ञाएँ हेतु- दृष्टान्त ये सभी ज्ञानभेदसे ही साध्य हैं। यही दशा स्वलक्षण, सामान्यलक्षण, वास्य वासक, अविद्योपप्लव, सद्- सद्धर्म, बन्ध-मोक्षादि प्रतिज्ञाओका भी है। अन्यसे व्यावृत्त अपना असाधारणरूप ही स्वलक्षण होता है। जो व्यावृत्त होता है और जिनसे व्यावृत्त होता है, उन सबका अनेक ज्ञानोंसे ही बोध सम्भव है। इसी तरह विधिरूप या अन्यापोह रूप सामान्य लक्षण भी अनेक ज्ञान गम्य ही होता है। वास्य-वासक भाव भी अनेक ज्ञान साध्य है। उत्तर ज्ञानमें नीलाद्याकार समर्पण करनेकी उपयुक्त शक्ति पूर्वज्ञानमें होती है। अतः पूर्व ज्ञान गमक है और उत्तरज्ञान वास्य होता है। अविद्योपप्लवमें वास्य- वासकत्व हेतु है। अविद्योपप्लव सदसद्धर्मोंमें हेतु होता है। जैसे नीलादिसद्धर्म है नर-विषाणादि असद्धर्म है।