मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशून्यवादी कहता, भले ही अधिष्ठानतत्त्वका बोध न हो, परन्तु प्रत्यक्षादिप्रमित वस्तुगत विचारासहत्व ही बाधक प्रमाण है । इसीके द्वारा प्रपञ्चकी निस्तत्त्वता बोधित हो जायगी । किंतु यह भी ठीक नहीं । क्योंकि विचारासहत्व क्या है यह भी विचार आवश्यक है । क्या विचारासहत्वका यह अभिप्राय है कि 'यद्यपि सत्-असत् आदि पक्षोंमें अन्यतमस्वरूप वस्तु धर्म है तथापि वह विचारासह अथवा विचारा सहत्वरूपसे निस्तत्त्व शून्यरूप है ? पहला पक्ष ठीक नहीं है। क्योंकि सत्-असत् आदिरूप तत्त्व शून्यवादीको मान्य ही नहीं है। फिर जो वस्तु परमार्थतः सत्-असत् • आदि पक्षोंमें ही किसी पक्षकी है तो वह सत्-असत् आदि किसी पक्षमे ही निर्दिष्ट होगी, तब वह विचारासह कैसे ? जो सत् या असत् है वह प्रमाणगोचर होनेसे विचारासह तो है ही ? यदि वह विचारसहन नहीं कर सकती तो सत् असत् आदि पक्षोंमें किसी पक्षकी नहीं हो सकती । यदि किसी पक्षकी है तो विचारासह कैसे ? यदि यह कहा जाय कि निस्तत्त्व ही विचारासहत्व है तो यह भी ठीक नहीं । क्योंकि बिना किसी तत्त्वका व्यवस्थापन किये किसी वस्तुको निस्तत्त्व नहीं कहा जा सकता है । जैसे शुक्तितत्त्वके व्यवस्थापनसे ही रजतकी निस्तत्त्वता कही जाती है वैसे किसी ब्रह्म आदि तत्त्वकी व्यवस्थापनाद्वारा ही प्रपञ्चकी निस्तत्त्वता कही जा सकती है अन्यथा नहीं । यदि कहा जाय कि निस्तत्त्वता ही भावोंका तत्त्व है तो यह भी ठीक नहीं । तब तो तत्त्वाभाव ही निस्तत्त्वता हुई और शून्यवादीके अनुसार तत्त्वाभाव भी तो विचारासह ही होगा ? साथ ही आरोपित पदार्थका ही निषेध होता है और आरोपका अधिष्ठान ही तत्त्व हुआ करता है, यह शुक्ति रजतादिमें दृष्ट है। जब कोई तत्त्व है ही नहीं, तब किसमे किसका आरोप होगा ? इस तरह निष्प्रपञ्चपरमार्थ सद्ब्रह्म ही अनिवार्य प्रपञ्चरूपमें आरोपित होता है, यही मानना उचित है । बाधक प्रमाणद्वारा तत्त्व व्यवस्थापन करके प्रमाणोंका अतात्त्विकत्वरूप व्यावहारिक प्रामाण्य व्यवस्था- पित हो सकता है । अतएव भगवान् भाष्यकारका कहना है कि वैनाशिकमत उपपत्तिका दृष्टिमे जितना देखा जाता है उतना ही बालूके कूपकी तरह ढहता चला जाता है। बाह्यार्थवाद, विज्ञानवाद, शून्यवाद आदि परस्पर विरुद्ध वादोंका उपदेश करते हुए बुद्धने असम्बद्ध प्रलापिता ही ख्यापित की है, अथवा प्रजामें व्यामोह फैलानेके दृष्टिमे ही बुद्धने इस प्रकारका तत्त्वोपदेश किया है, ऐसा ही पुराणोंमें प्रसिद्ध है। इसी तरह नैरात्म्यवाद स्वीकार करना साथ ही समस्त वासनाओंके आधार भूत आलयविज्ञानको अक्षर आत्मा मानना भी परस्पर विरुद्ध है।