भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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जैनियोंके मतानुसार संसारी और मुक्त—ये दो प्रकारके जीव हैं । संसारी भी समनस्क और अमनस्क-भेदसे दो प्रकारके हैं । कोई लोग जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जर और मोक्षरूप तत्त्व मानते हैं । इस तरह पञ्चास्तिकाय भी इन्हींका विस्तार है । उनमें और भी बहुत प्रकारके भेद हैं । वे लोग प्रत्यक्ष और अनुमान—यही दो प्रमाण मानते हैं । सर्वत्र स्यादस्ति, स्यान्नास्ति, स्यादस्ति च नास्ति च, स्यादवक्तव्यः, स्यादस्ति चावक्तव्यः, स्यान्नास्ति, चावक्तव्यः, स्यादस्ति च नास्ति चावक्तव्यः' (सर्वदर्शनस० अर्हत-दर्शन ४७) इस सप्तभङ्गि न्यायको मानते हैं। इसी प्रकार नित्यत्वादिमें भी इसी न्यायको प्रयुक्त करते हैं । वे शरीरपरिमाण ही आत्मा मानते हैं । कर्माष्टक जीवको बद्ध करता है । समस्त क्लेश और तद्विषयिणी वासनाएँ जिसकी विगलित हो चुकी हैं, जिसका ज्ञान आवरणरहित हो गया है और जिसे एकतान सुख प्राप्त हो गया है, ऐसे आत्माके ऊपरके देशमें अवस्थानको कोई मोक्ष कहते हैं । किन्हींके मतानुसार जीव गमनशील है और धर्माधर्मास्तिकायसे वह बद्ध है । उससे छूटनेपर उसका ऊपर जाना ही मोक्ष है।

‘क्षित्यङ्कुरादिकर्तृत्वेन एक ईश्वर सिद्ध नहीं होता' ऐसा किन्हीका कथन है, क्योकि प्रपञ्चमें कार्यत्व सिद्ध नहीं है । यदि सावयवत्वेन कार्यत्वकी सिद्धि कही जाय, तो विकल्पासह होनेसे वैसा नही कहा जा सकता । जैसे कि वह सावयवत्व क्या है, अवयव-संयोगित्व, अवयवसमवायित्व, अवयवजन्यत्व, समवेतद्रव्यत्व या सावयवबुद्धिविषयत्व ? आकाशमें अनैकान्तिक होनेके कारण अवयवसंयोगित्व नहीं कहा जा सकता । सामान्य ( जाति ) आदिमे अनैकान्तिक होनेसे अवयव- समवायित्व भी नहीं कहा जा सकता । साध्यसम होनेसे अवयवजन्यत्व भी साव- यवत्व नहीं हो सकता । विकल्पासह होनेसे समवेतद्रव्यत्वरूप चतुर्थ पक्ष भी ठीक नही । जैसे कि समवायसम्बन्धमात्रवत् द्रव्यत्व समवेतद्रव्यत्व है अथवा अन्यत्र समवेत द्रव्यत्व ? आकाशादिमें व्यभिचार होनेसे प्रथम पक्ष नहीं कहा जा सकता, क्योकि आकाशमें गुणादिसमवायत्व और द्रव्यत्व दोनो सम्भव हैं। साध्यसे अविशिष्ट होनेके कारण दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है । सङ्घीभूत तन्तु ही पट है, अतः तन्तुओमें पटसे अन्यत्व सिद्ध नहीं है, साथ ही समवाय भी असिद्ध है । आत्मा आदिमे अनैकान्तिक होनेके कारण सावयवबुद्धिविषयत्वरूप पाँचवाँ पक्ष भी ग्राह्य नहीं हो सकता; क्योकि सावयवत्वबुद्धिके विषय होनेपर भी आत्मामे कार्यत्व नहीं है ।

फिर, एक कर्ताकी सिद्धि की जा रही है या अनेक कर्त्ताओंकी ? यदि एककी, तो प्रासादादिमें व्यभिचार आता है; क्योकि प्रासादादिका निर्माण एक कर्ताद्वारा निष्पन्न नहीं होता । अनेक कर्ता भी नहीं कहे जा सकते; क्योकि