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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

शून्यवादी कहता, भले ही अधिष्ठानतत्त्वका बोध न हो, परन्तु प्रत्यक्षादिप्रमित वस्तुगत विचारासहत्व ही बाधक प्रमाण है । इसीके द्वारा प्रपञ्चकी निस्तत्त्वता बोधित हो जायगी । किंतु यह भी ठीक नहीं । क्योंकि विचारासहत्व क्या है यह भी विचार आवश्यक है । क्या विचारासहत्वका यह अभिप्राय है कि 'यद्यपि सत्-असत् आदि पक्षोंमें अन्यतमस्वरूप वस्तु धर्म है तथापि वह विचारासह अथवा विचारा सहत्वरूपसे निस्तत्त्व शून्यरूप है ? पहला पक्ष ठीक नहीं है। क्योंकि सत्-असत् आदिरूप तत्त्व शून्यवादीको मान्य ही नहीं है। फिर जो वस्तु परमार्थतः सत्-असत् • आदि पक्षोंमें ही किसी पक्षकी है तो वह सत्-असत् आदि किसी पक्षमे ही निर्दिष्ट होगी, तब वह विचारासह कैसे ? जो सत् या असत् है वह प्रमाणगोचर होनेसे विचारासह तो है ही ? यदि वह विचारसहन नहीं कर सकती तो सत् असत् आदि पक्षोंमें किसी पक्षकी नहीं हो सकती । यदि किसी पक्षकी है तो विचारासह कैसे ? यदि यह कहा जाय कि निस्तत्त्व ही विचारासहत्व है तो यह भी ठीक नहीं । क्योंकि बिना किसी तत्त्वका व्यवस्थापन किये किसी वस्तुको निस्तत्त्व नहीं कहा जा सकता है । जैसे शुक्तितत्त्वके व्यवस्थापनसे ही रजतकी निस्तत्त्वता कही जाती है वैसे किसी ब्रह्म आदि तत्त्वकी व्यवस्थापनाद्वारा ही प्रपञ्चकी निस्तत्त्वता कही जा सकती है अन्यथा नहीं । यदि कहा जाय कि निस्तत्त्वता ही भावोंका तत्त्व है तो यह भी ठीक नहीं । तब तो तत्त्वाभाव ही निस्तत्त्वता हुई और शून्यवादीके अनुसार तत्त्वाभाव भी तो विचारासह ही होगा ? साथ ही आरोपित पदार्थका ही निषेध होता है और आरोपका अधिष्ठान ही तत्त्व हुआ करता है, यह शुक्ति रजतादिमें दृष्ट है। जब कोई तत्त्व है ही नहीं, तब किसमे किसका आरोप होगा ? इस तरह निष्प्रपञ्चपरमार्थ सद्ब्रह्म ही अनिवार्य प्रपञ्चरूपमें आरोपित होता है, यही मानना उचित है । बाधक प्रमाणद्वारा तत्त्व व्यवस्थापन करके प्रमाणोंका अतात्त्विकत्वरूप व्यावहारिक प्रामाण्य व्यवस्था- पित हो सकता है । अतएव भगवान् भाष्यकारका कहना है कि वैनाशिकमत उपपत्तिका दृष्टिमे जितना देखा जाता है उतना ही बालूके कूपकी तरह ढहता चला जाता है। बाह्यार्थवाद, विज्ञानवाद, शून्यवाद आदि परस्पर विरुद्ध वादोंका उपदेश करते हुए बुद्धने असम्बद्ध प्रलापिता ही ख्यापित की है, अथवा प्रजामें व्यामोह फैलानेके दृष्टिमे ही बुद्धने इस प्रकारका तत्त्वोपदेश किया है, ऐसा ही पुराणोंमें प्रसिद्ध है। इसी तरह नैरात्म्यवाद स्वीकार करना साथ ही समस्त वासनाओंके आधार भूत आलयविज्ञानको अक्षर आत्मा मानना भी परस्पर विरुद्ध है।

जैनियोंके मतानुसार संसारी और मुक्त—ये दो प्रकारके जीव हैं । संसारी भी समनस्क और अमनस्क-भेदसे दो प्रकारके हैं । कोई लोग जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जर और मोक्षरूप तत्त्व मानते हैं । इस तरह पञ्चास्तिकाय भी इन्हींका विस्तार है । उनमें और भी बहुत प्रकारके भेद हैं । वे लोग प्रत्यक्ष और अनुमान—यही दो प्रमाण मानते हैं । सर्वत्र स्यादस्ति, स्यान्नास्ति, स्यादस्ति च नास्ति च, स्यादवक्तव्यः, स्यादस्ति चावक्तव्यः, स्यान्नास्ति, चावक्तव्यः, स्यादस्ति च नास्ति चावक्तव्यः' (सर्वदर्शनस० अर्हत-दर्शन ४७) इस सप्तभङ्गि न्यायको मानते हैं। इसी प्रकार नित्यत्वादिमें भी इसी न्यायको प्रयुक्त करते हैं । वे शरीरपरिमाण ही आत्मा मानते हैं । कर्माष्टक जीवको बद्ध करता है । समस्त क्लेश और तद्विषयिणी वासनाएँ जिसकी विगलित हो चुकी हैं, जिसका ज्ञान आवरणरहित हो गया है और जिसे एकतान सुख प्राप्त हो गया है, ऐसे आत्माके ऊपरके देशमें अवस्थानको कोई मोक्ष कहते हैं । किन्हींके मतानुसार जीव गमनशील है और धर्माधर्मास्तिकायसे वह बद्ध है । उससे छूटनेपर उसका ऊपर जाना ही मोक्ष है।

‘क्षित्यङ्कुरादिकर्तृत्वेन एक ईश्वर सिद्ध नहीं होता' ऐसा किन्हीका कथन है, क्योकि प्रपञ्चमें कार्यत्व सिद्ध नहीं है । यदि सावयवत्वेन कार्यत्वकी सिद्धि कही जाय, तो विकल्पासह होनेसे वैसा नही कहा जा सकता । जैसे कि वह सावयवत्व क्या है, अवयव-संयोगित्व, अवयवसमवायित्व, अवयवजन्यत्व, समवेतद्रव्यत्व या सावयवबुद्धिविषयत्व ? आकाशमें अनैकान्तिक होनेके कारण अवयवसंयोगित्व नहीं कहा जा सकता । सामान्य ( जाति ) आदिमे अनैकान्तिक होनेसे अवयव- समवायित्व भी नहीं कहा जा सकता । साध्यसम होनेसे अवयवजन्यत्व भी साव- यवत्व नहीं हो सकता । विकल्पासह होनेसे समवेतद्रव्यत्वरूप चतुर्थ पक्ष भी ठीक नही । जैसे कि समवायसम्बन्धमात्रवत् द्रव्यत्व समवेतद्रव्यत्व है अथवा अन्यत्र समवेत द्रव्यत्व ? आकाशादिमें व्यभिचार होनेसे प्रथम पक्ष नहीं कहा जा सकता, क्योकि आकाशमें गुणादिसमवायत्व और द्रव्यत्व दोनो सम्भव हैं। साध्यसे अविशिष्ट होनेके कारण दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है । सङ्घीभूत तन्तु ही पट है, अतः तन्तुओमें पटसे अन्यत्व सिद्ध नहीं है, साथ ही समवाय भी असिद्ध है । आत्मा आदिमे अनैकान्तिक होनेके कारण सावयवबुद्धिविषयत्वरूप पाँचवाँ पक्ष भी ग्राह्य नहीं हो सकता; क्योकि सावयवत्वबुद्धिके विषय होनेपर भी आत्मामे कार्यत्व नहीं है ।

फिर, एक कर्ताकी सिद्धि की जा रही है या अनेक कर्त्ताओंकी ? यदि एककी, तो प्रासादादिमें व्यभिचार आता है; क्योकि प्रासादादिका निर्माण एक कर्ताद्वारा निष्पन्न नहीं होता । अनेक कर्ता भी नहीं कहे जा सकते; क्योकि

मार्क्स और आत्मा ७६९ बहुतोंमें कर्तृत्व माननेपर परस्पर मतभेदकी सम्भावना अनिवार्य होनेसे सामञ्जस्य नहीं बन सकता। सभीका सामर्थ्य यदि समान माने, तो एकसे ही कार्यसिद्धि भी हो जायगी, फिर अन्योंका वैयर्थ्य सुतरां सिद्ध है, अतः अनेक कर्ता माननेसे भी लाभ क्या ? तथाच आगम-सर्वज्ञपरम्परा अनादि होनेके कारण सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रसे आवरणक्षय होनेसे सर्वज्ञता होती है। यह सब कथन आपातरमणीय है। सत्त्व और असत्त्वके परस्परविरुद्ध होने- से उनका समुच्चय न हो सकनेके कारण विकल्प होता है, किंतु वस्तुमें विकल्प सम्भव नहीं है। समस्त वस्तुओंमें निरङ्कुश अनेकान्तत्वकी प्रतिज्ञा करनेवालेके मतमें निर्द्धारण भी एक वस्तु ही तो मानना पड़ेगा। स्यादस्ति और स्यान्नास्ति इन विकल्पोंका उपनिपात होनेसे अनिर्द्धारणात्मकता ही होगी। जीवको शरीर- परिमाण माननेपर उसे परिच्छिन्न मानना पड़ेगा, अतः आत्माकी अनित्यता भी स्वीकृत करनी पड़ेगी। शरीरोंका परिमाण भी अनवस्थित होनेसे एक मनुष्यजीव मनुष्यपरिमाणका होकर फिर कर्मवशात् जब उसे हाथीका जन्म प्राप्त होगा, तब वह समूचे हाथीके शरीरमें व्याप्त न हो सकेगा। यदि उसे चींटीका शरीर प्राप्त हुआ, तो वह उस चींटीके शरीरमें सम्पूर्णतया समाविष्ट न हो सकेगा। एक जन्ममें भी कौमार, यौवन, वृद्धावस्थाओंमें भी उक्त दोष अनिवार्य होंगे। जीवको वे अनन्त अवयवयुक्त भी मानते हैं। ऐसी दशामें छोटा शरीर प्राप्त होनेपर उन अवयवोंका सङ्कुचित होना और बड़ा देह मिलनेपर विकसित होना भी मानना पड़ेगा। यह भी विचार करनेपर सङ्गत प्रतीत नहीं होता। अनन्त अवयवोंकी समानदेशता प्रतिहत होगी या नहीं ? यदि प्रतिहत होगी, तो वे अनन्त अवयव परिच्छिन्नमें समाविष्ट न हो सकेंगे। यदि न होगी तो सबको एक देशमें ही अवस्थित मानना पड़ेगा। ऐसी दशामें उनमें स्थूलताका अभाव होनेसे जीव अणुपरिमाणपरिमित हो जायगा। शरीरमात्रमें परिच्छिन्नकी अनन्तता भी नहीं बन सकती। अवयवोंके आगम-अपगमसे उनकी छोटे-बड़े शरीरकी परिमाणताकी कल्पना भी असङ्गत है; क्योंकि अवयवोंके उपचय अपचयवाला होनेपर उसे विकारवान् मानना पड़ेगा। अवयवोंमें भी प्रत्येक चेतयिता है या उनका समुदाय ? इसपर लोकायतिकमतके निराकरणप्रसङ्गमें कही हुई आपत्तियाँ अनिवार्य हैं। बन्ध-मोक्षव्यवस्था भी उनसे सम्मत प्रत्यक्ष-अनुमानसे अवगत नहीं हो सकती। वैशेषिक तथा नैयायिक परमेश्वरकी भी सिद्धि करते ही हैं। प्रपञ्चके सावयव होनेसे उसकी कार्यता सिद्ध करके उस प्रपञ्चके कर्ता ईश्वरको सिद्ध करते हैं। 'पूर्वोक्त विकल्पासह होनेके कारण सावयवत्व असिद्ध है' यह नहीं कहा जा सकता, मा० आ० ४९—

७९० मार्क्सवाद और रामराज्य

क्योंकि 'समवेतद्रव्यत्व सावयवत्व है' ऐसा लक्षण करनेपर उक्त दोष प्रसक्त नहीं होते । आकाशके निरवयव होनेसे उसमें व्यभिचार सम्भव नहीं है। अवान्तर महत्त्वरूप हेतुसे भी कार्यत्वका अनुमान सुकर है । शरीरसे जन्य न होनेसे आकाशकी तरह क्षित्यङ्कुरादि अकर्तृक हैं—ऐसा सत्प्रतिपक्ष अनुमान नहीं हो सकता, क्योंकि शरीर विशेषण व्यर्थ है । केवल अजन्यत्वकी भी हेतुता नहीं कही जा सकती, क्योंकि वह असिद्ध है । यदि कहा जाय कि शरीराजन्यत्व रहनेपर भी कर्तृजन्यता न रहे, तो क्या हानि है, तो इसका कोई उत्तर नहीं हो सकता । सोपाधिकत्वकी शङ्का भी नहीं की जा सकती, क्योंकि यदि अकर्तृक होगा, तो कार्य भी न होगा, ऐसा अनुकूल तर्क हो सकता है । यदि इतरकारकोंसे अप्रयोज्य होते हुए सकल कारकोंका जो प्रयोक्ता है, वह कर्ता होता है अथवा ज्ञान- चिकीर्षा प्रयत्नोंका जो आधार है, वह कर्ता है—ऐसा कर्तृलक्षण कहा जाय, तो कर्ताकी व्यावृत्ति होनेपर तदुपहित समस्त कारकोंकी व्यावृत्ति होनेसे कारणके बिना कार्योत्पत्तिका प्रसङ्ग उपस्थित होगा । यदि ईश्वर कर्ता हो, तो वह शरीरी होगा, ऐसा प्रतिकूल तर्क भी न कहा जा सकता, क्योंकि सिद्धि-असिद्धि दोनो अवस्थाओमें व्याघात होगा । यदि ईश्वर असिद्ध होगा, तो आश्रयासिद्धि होगी और यदि आगमसिद्ध होगा, तो उसीसे उसकी कर्तृत्वसिद्धि भी हो जायगी । अवाप्तसमस्तकाम उस परमेश्वरकी करुणावशात् विश्वसृष्टिमें प्रवृत्ति माननेमें कोई आपत्ति नहीं हो सकती । वैसी दशामें 'सुखमय ही सृष्टिकी प्रसक्ति होगी' यह भो नही कहा जा सकता, क्योंकि सृज्यप्राणिकृत सुकृत-दुष्कृतके परिपाकविशेषसे सृष्टिवैषम्य उपपन्न है । कार्य होते हुए विलक्षण होनेके कारण शय्या, प्रासाद आदिके समान भूत, भौतिक पदार्थ स्वोपादानगोचर अपरोक्षज्ञानवान्से जन्य हैं, इस अनुमानसे तथा प्रपञ्चके निमि- त्तोपादान होनेके कारण प्रपञ्चाधारत्व, शाशकत्व, प्रकाशकत्व आदिसे परमेश्वर सिद्ध होता है । वैशेषिक लोग द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय और अभाव— ये सात पदार्थ मानते हैं । नैयायिक लोग प्रमाण, प्रमेय, सशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान—ये सोलह पदार्थ मानते हैं । वे आत्माको ज्ञानादिगुणवान्, नित्य और व्यापक मानते हैं । जीवात्मा और परमात्मा भेदसे आत्मा दो प्रकारका मानते हैं । जीवात्माओको अनन्त और परमात्माको एक मानते हैं । नित्यज्ञानादिगुणवान् परमेश्वर सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् है यह तर्क तथा आगमसे सिद्ध होता है, यह बतलाया जा चुका है । इनके मतानुसार अन्धकार तेजोऽभावरूप है । दुःख, जन्म, प्रवृत्ति,

दोष और मिथ्याज्ञानमें उत्तर-उत्तरका तत्त्वज्ञानसे नाश होनेपर पूर्व-पूर्वका नाश होनेसे अपवर्ग होता है । प्रमाणके विषयमें—चार्वाक लोग जैसे इन्द्रियजन्य ही ज्ञानको प्रमाण मानते हैं, वैसे ही उनके मनसे श्रोत्रेन्द्रिय शब्दका ही बोधन करता है, शब्दार्थको भी नहीं। शब्दार्थ सत्य है या असत्य—इसका निर्णय नहीं किया जा सकता । अनुमान व्याप्ति- ज्ञानसापेक्ष होता है और व्याप्ति 'जहाँ जहाँ धूम है, वहाँ-वहाँ अग्नि होता है' इस प्रकार समस्त जगत्में अतीत, अनागत धूम-अग्नियोंको उपस्थापित करती है । कादाचित्क द्रष्टाको प्रत्यक्षद्वारा समस्त धूम एवं अग्नियोंका ज्ञान सम्भव नहीं है । अनुमानसे भी इनका ज्ञान सम्भव नहीं, क्योंकि अनुमान व्याप्तिज्ञानसापेक्ष हुआ करता है । वारवार सहचारदर्शनसे भी व्याप्तिज्ञान नहीं हो सकता; क्योंकि 'अग्निके अभावमें भी कदाचित् धूम हो सकता है' ऐसी व्यभिचार शङ्काका समस्त धूम तथा अग्नियोंका ज्ञान हुए बिना निराकरण नहीं हो सकता । बौद्ध, जैन, वैशेषिक अनुमानको भी मानते हैं । उनका आशय यह है कि अन्वय- व्यतिरेकद्वारा धूम तथा अग्निके कार्य-कारणभावका निश्चय होनेपर व्यभिचार- शङ्काकी निवृत्ति हो जानेसे व्याप्तिज्ञान हो जायगा । उनके मतमें यद्यपि शब्द समादरणीय है तथापि प्रत्यक्ष, अनुमानसे सिद्ध पदार्थका बोधक होनेसे उसका प्रामाण्य माना जाता है, उसका स्वतन्त्र प्रामाण्य नहीं माना जाता । वैशेषिकके मतानुसार भी शब्द सर्वत्र प्रमाण नहीं है; क्योंकि उन्मत्तप्रलपितादिमें उसका अप्रामाण्य स्पष्ट है । वैशेषिक प्रमाणभूत ईश्वर या अन्य आप्तपुरुषद्वारा उच्चरित शब्दको ही प्रमाण मानते हैं । तथा च वक्ताके प्रामाण्यसे शब्दके प्रामाण्यका अनुमान होता है, अतः शब्दप्रामाण्य अनुमान- प्रामाण्यके अधीन होनेसे अनुमानसे पृथक् उसका प्रामाण्य नहीं है । अनुमान और शब्द—दोनो परोक्षसामान्यविषयक हैं, अतः उनकी प्रवृत्ति सम्बन्धग्रहाधीन है । साथ ही विशेष अनन्त होनेके कारण उनका सम्बन्ध दुरवगम है । अतः धूमको देखकर जैसे अग्निका अनुमान किया जाता है, वैसे ही शब्द सुनकर उसका अर्थ अवगत होता है । यहाँ भी लिङ्गकी ही तरह अन्वयव्यतिरेक होते हैं । जो शब्द जिस अर्थमें प्रयुक्त देखा जाता है, वह उस अर्थका वाचक होता है । धूमके वह्निमत्त्वके समान शब्दका अर्थवत्त्व है, अतः शब्दको अनुमानके अन्तर्गत ही मानना चाहिये । यथेष्ट विनियोज्यता हस्तादि, सञ्ज्ञादि लिङ्गमें भी दिखायी पड़ती है । दृष्टान्त-निरपेक्षता भी समभ्यस्त अनुमानमें स्पष्ट है । अनभ्यस्त होनेपर तो अनु- मान और शब्द दोनोंमें सम्बन्धस्मृतिकी सापेक्षता होती है ।

७७२ मार्क्सवाद और रामराज्य कोई प्रत्यक्ष और शब्द—इन्ही दोको प्रमाण मानते है । उनके मतमें अनुमान यद्यपि प्रमाण माना जाता है, तथापि वह यदि प्रमाण भूत शब्दसे प्रतिपादित अर्थका अवबोधक हो, तभी प्रमाण होता है, अन्यथा नहीं । अन्य लोग प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द—ये तीन प्रमाण मानते हैं । उनके मतमें न तो शब्द अनुमानकी अपेक्षा करता है और न अनुमान शब्दकी । वाक्यात्मक शब्द अनवगत सम्बन्धका ही बोधक होता है । नवीन विरचित श्लोकादिका श्रवण होनेपर अधिगत पद तथा उनके अर्थोंका वाक्यार्थ अवगत होता देखा जाता है । तथा च सम्बन्धाधिगममूलक प्रवृत्तिवाले अनुमानसे शब्दका साम्य नहीं है । पदात्मक शब्द यद्यपि सम्बन्धाधिगमसापेक्ष होता है, तथापि सामग्रीभेद और विषय-भेदसे उसकी अनुमानसे भिन्नता है । पद 'और लिङ्गका विषय भी भिन्न है । पदार्थमात्र पदका अर्थ होता है और अनुमान 'अग्निमान् पर्वतः' इत्यादि रीतिसे वाक्यार्थविषयक होता है । धर्मविशिष्ट धर्मी साध्य होता है, अतः पर्वतादि- विशेष्यक प्रतिपत्तिपूर्विका पावकादिविशेषणावगति लिङ्गसे उत्पन्न होती है, जब कि पदसे विशेषणावगतिपूर्वक विशेष्यावगति होती है, इस तरह दोनोका विषय- भेद स्पष्ट है । कहा गया था कि 'अनुमानमें जैसे धर्मविशिष्ट धर्मी साध्य है, वैसे ही अर्थविशिष्ट शब्द साध्य हो' तो यह ठीक नहीं; क्योंकि हेतु होनेके कारण शब्दकी हेतुता अनुपपन्न है । साथ ही अर्थधर्म होनेसे यदि शब्दकी पक्षधर्मता हो, तो अनवगत धूमाग्निसम्बन्ध भी जैसे अर्थधर्मताको ग्रहण करता ही है, वैसे ही अनवगत शब्दार्थ सम्बन्धको भी शब्दकी अर्थधर्मताका ग्रहण करना चाहिये, परंतु ग्रहण नहीं करता, अतः शब्दकी पक्षधर्मता नहीं कही जा सकती । शब्द और अर्थका देश तथा कालसे सामानाधिकरण्यका व्यभिचार भी है, अतः अन्वय- व्यतिरेकका उपपादन दुष्कर है । नैयायिक लोग शब्दको स्वतन्त्र प्रमाण मानते हुए ईश्वररचितत्वेन वेदका प्रामाण्य अङ्गीकार करते हैं । धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको पुरुषार्थ मानते हैं । शब्दप्रमाणके बिना मूक व्यक्तिसे वाग्मी पुरुषकी विशेषता निर्णीत नही की जा सकती । शब्दके बिना माता-पिताका ज्ञान भी होना कठिन है । प्रत्यक्ष या अनुमान- से न तो माता-पिताका निर्णय हो सकता है और न उनके धनका पुत्रको अधिकार ही प्राप्त हो सकता है । एवं च शब्दप्रमाण माने बिना लोकव्यवहार समुच्छिन्न हो जायगा । इसीलिये कहा गया है— 'मत्तयो यत्र गच्छन्ति तत्र गच्छन्ति वानराः । शास्त्राणि यत्र गच्छन्ति तत्र गच्छन्ति ते नराः ॥'

मार्क्स और आत्मा ७७३ सांख्य, योगी और कुछ नैयायिक प्रत्यक्ष, अनुमान तथा शब्द—ये तीन प्रमाण मानते हैं । नैयायिक उनके अतिरिक्त उपमान प्रमाण भी मानते हैं । अर्थापत्ति को मिलाकर पाँच प्रमाण प्राभाकर मानते हैं । अनुपलब्धिसहित छः प्रमाण भाट्टों एव अद्वैतियोंको सम्मत ह । सम्भव और ऐतिह्य मिलाकर आठ प्रमाण पौराणिक मानते हैं । इनमें वैशेषिक लोग शब्दप्रमाणसे साधित अर्थको तो सत्य ही मानते हैं, पर उसे शब्दमूलक नहीं अपितु अनुमानमूलक ही बतलाते हैं । मीमांसक लोग जैसे अर्थापत्तिसे साधित अर्थको अनुमानसे साबित करके उसीमें अन्तर्भूत करते हैं, वैसे ही नैयायिक लोग भी मानते हं उनका कथन है कि परमेश्वरनिर्मित होनेके कारण वेद अपौरुषेय हें और आप्तोक्त होनेसे उनका प्रामाण्य है । पौरुषेयत्ववादियोंका कहना है कि 'तस्य ह वा एतस्य महतो भूतस्य निःश्व- सितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः' इस श्रुतिसे ही वेदकी उत्पत्ति परमेश्वरसे निःश्वासवत् बतलायी गयी है । जिस प्रकार बिना आयासके निःश्वास उत्पन्न होता है, वैसे ही आयास एव बुद्धिसे निरपेक्ष ही वेदोंकी उत्पत्ति उक्त श्रुतिमें बतलायी गयी है । वेद यद्यपि स्थूल-सूक्ष्म, सन्निकृष्ट-विप्रकृष्ट, मूर्त-अमूर्त, चेतन-अचेतन—सर्वविध अर्थोंका अवभासक है, तथापि अचिन्त्यशक्तिसम्पन्न होनेसे परमेश्वरका अनायास वेदकर्तृत्व तो सम्भव है, किंतु बुद्धिनिरपेक्षता उपपन्न नहीं हो सकती । कुछ लोग बुद्धिनिरपेक्षताकी उपपत्तिके लिये कहते हैं कि वेद परमेश्वरसे केवल प्रकाशित हुए हैं। कोई निःश्वसितन्यायका अनायासमात्रमें तात्पर्य मानते हैं । 'बुद्धिसापेक्ष वाक्य- रचनामें लेशमात्र भी आयास नहीं है,' यह कहना ठीक नहीं, क्योकि निःश्वासमें भी प्रयत्नलेशकी आवश्यकता तो रहती ही है । अपौरुषेयत्ववादियोंका इसपर यह कथन ह कि सुप्त, प्रमत्त, अनवहित एव अन्यमनस्क व्यक्तियोंका भी निःश्वास देखा जाता है, अतः निःश्वासको अवश्य ही बुद्धिप्रयत्नसे निरपेक्ष मानना चाहिये । एव च सहज होनेसे निःश्वास जैसे अकृत्रिम होता है, वैसे ही निःश्वासवत् आविर्भूत वेदोंकी भी सहज होनेके कारण अकृत्रिमता माननी चाहिये और उस दशामें अपौरुषेय होनेके कारण पुरुषाश्रित भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा, करणापाटवादि दूषणोंसे असंस्पृष्ट होनेके कारण समस्त- पुंदोषशङ्काकलङ्कके अग्रास्त होनेसे वेदका स्वतःप्रामाण्य है । यहाँ अनुमानका स्वरूप इस प्रकार समझना चाहिये—सम्प्रदायाविच्छेद होते हुए कर्ता अस्मर्यमाण होनेसे आत्माके समान वेद अपौरुषेय हैं । व्यतिरेकमें—जो सम्प्रदायाविच्छेदे मति अस्मर्यमाणकर्तृक नहीं होता, वह अपौरुषेय भी नहीं होता, जैसे 'महाभारत' यह अनुमान है । पौरुषेयवादियोंका कथन है कि प्रलयमें सम्प्रदायका विच्छेद हो जाता है, अतः लक्षणमें विशेषण असिद्ध है । साथ ही अस्मर्यमाणकर्तृत्वका अर्थ क्या

७७४ मार्क्सवाद और रामराज्य अप्रमीयमाणकर्तृकत्व समझा जाय या स्मरणागोचरकर्तृकत्व ? अप्रमीयमाणकर्तृकत्व नहीं कहा जा सकता, क्योंकि परमेश्वररूप कर्ता प्रमीयमाण है 'तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ॥' ( शु०यजु०३१।७) यह श्रुति परमेश्वरसे वेदोंकी उत्पत्ति स्पष्ट बतला रही है । विकल्पासह होनेसे स्मरणा- गोचरकर्तृकत्व भी नहीं कहा जा सकता । जैसा कि प्रश्न उठता है कि क्या एकसे स्मरण वा सबसे ? निश्चितपुरुषकर्तृकमें भी कर्ताका स्मरण न होनेमात्रसे किसी वस्तुकी अपौरुषेयत्वप्रसक्ति होगी, अतः प्रथम पक्ष सङ्गत नहीं । सबसे अस्मरणको बिना सर्वज्ञके अन्य कोई जान नही सकता, अतः दूसरा पक्ष भी उपपन्न नहीं है । साथ ही—वाक्य होनेके कारण 'रघुवंश' वाक्यकी तरह वेदवाक्य पौरुष हैं और प्रमाणभूत होते हुए वाक्यस्वरूप होनेके कारण मन्वादिवाक्यके समान वेदवाक्य आप्तप्रणीत हैं, इत्यादि अनुमानोंसे वेदोंके कर्ताका निश्चय भी प्रमाणित हो रहा है । यह नहीं कहा जा सकता कि 'वेदस्याऽध्ययनं सर्वं गुर्वध्ययनपूर्वकम् । वेदाध्ययनसामान्यादधुनाध्ययनं यथा ॥' ( सर्वदर्शनसंग्रह, जैमिनीय दर्शन १९ ) इससे उक्त अनुमान सत्प्रतिपक्षति है, क्योंकि 'भारताध्ययनं सर्वं गुर्वध्ययनपूर्वकम् । भारताध्ययनत्वेन साम्प्रताध्ययनं यथा ॥' ( सर्वदर्शन सं० १२ । १९ ) इस प्रकार दोनों ओर समान योग-क्षेम है । 'को ह्यन्यः पुण्डरीकाक्षान्महाभारतकृद् भवेत्' ( सर्व० जैमि० २० ) इस वचनसे भारतका तो व्यासकर्तृकत्व समर्थित हो रहा है, यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि 'ऋचः सामानि जज्ञिरे' (शु० य० ३१ । ७) इत्यादिसे वेदकी भी परमेश्वरकर्तृकता श्रुत है । सामान्यवत्त्वे सति बाह्येन्द्रियग्राह्य होनेसे घटादिकी तरह शब्द भी अनित्य है । 'वही यह गकार है' इस प्रत्यभिज्ञाबलसे शब्दकी नित्यता नहीं कही जा सकती, क्योंकि 'वही ये केश हैं' इत्यादिके समान वह प्रत्यभिज्ञा नित्यतानिबन्धन नहीं, किंतु सादृश्यनिबन्धन है । अशरीरी होते हुए भी परमेश्वरकी भक्तानुग्रहार्थ लीलाविग्रह-धारणकी उपपत्तिसे कण्ठताल्वादिसापेक्ष वर्णोच्चारण भी सम्भव है, अतः वेदोंको पौरुषेय माननेमें कोई भी अनुपपत्ति नहीं है । किंतु तात्पर्य न समझ सकनेके कारण उक्त सब बाते कही जाती हैं, अतः वे सब अविचारित- रमणीय हैं । उक्त पौरुषेयत्व क्या है ? क्या पुरुषोच्चरितत्वमात्र अथवा प्रमाणान्तरसे अर्थको जानकर विरचितत्व ? पुरुषोच्चरितत्वमात्र ही यदि पौरुषेयत्व है, तो हमें इष्टापत्ति है । नित्य एवं व्यापक वर्णोंकी देश-काल-पौर्वापर्यंरूप आनुपूर्वी असम्भव होनेसे वर्णव्यक्तियोंकी ही कालपौर्वापर्यलक्षण आनुपूर्वी कहनी चाहिये । वर्णव्यक्तियाँ कण्ठ-ताल्वादि अभिघातजन्य ध्वन्यभिव्यक्तिवाली हैं । तथा च नियत वर्णोंकी नियत

मार्क्स और आत्मा ७७५ आनुपूर्वीरूप वेदका पुरुषोच्चरितत्व सुतरा इष्ट ही है । प्रतिदिन अध्येताओंद्वाग उच्चार्यमाण वेदका पुरुषोच्चरितत्वमात्ररूप पौरुषेयत्व तो सिद्ध ही है, अतः उसकी सिद्धिका आयास व्यर्थ है । यदि प्रमाणान्तरेण अर्थज्ञानपूर्वक रचितत्वरूप पौरुषे- यत्व कहे, तो विकल्पासह होनेसे वह ठीक नहीं, क्योकि उसकी सिद्धि अनुमानसे की जायगी या आगमसे ? आगमबलसे नहीं कहा जा सकता, क्योकि प्रमाणन्तरसे जिसका अर्थ अनुपलब्ध है, ऐसे कविकल्पित वाक्यमें वाक्यत्वरूप हेतु व्यभिचरित हो जायगा । यदि 'प्रमाणत्वे सति' इस पदका निवेश करके अप्रमाण कविकल्पित वाक्यमें हेतुव्यभिचारका वरण किया जाय, तो भी प्रमाणान्तरके अविषयीभूत अर्थवाले वेदवाक्यमें प्रमाणान्तरेण अर्थका उपलब्ध करके विरचितत्वकी सिद्धि करना 'मेरे मुँहमें जिह्वा नहीं है' इस कथनके समान व्याहत है । प्रमाणान्तरसे उपलब्ध अर्थवाला होनेपर तो अनुवादक हो जायगा, जिससे अनधिगतका बोधक न होनेसे वेदका अप्रामाण्य ही सिद्ध होगा । चक्षुरादि इन्द्रियोंसे अनुपलब्ध शब्द- की अवगतिके लिये ही श्रोत्रप्रमाणकी जैसे सार्थकता है, वैसे ही प्रत्यक्ष, अनुमान- से अनधिगत धर्म आदिके अधिगमक होनेसे ही आगमप्रमाणकी सार्थकता है, अन्यथा व्यर्थ ही है—'प्रत्यक्षेणानुमित्या वा यस्तूपायो न बुद्ध्यते । एनं विदन्ति वेदेन तस्माद्वेदस्य वेदता ॥' से यह स्पष्ट है । लीलाविग्रहधारी परमेश्वरकी भी चक्षुरादि इन्द्रियाँ अतीन्द्रिय देश, काल, स्वभाव, विप्रकृष्ट-अर्थका ग्रहण नहीं कर सकतीं, क्योंकि दृष्टानुसार ही कल्पनाका आश्रयण किया जा सकता है, जैसा कि कहा गया है — 'यत्राप्यतिशयो दृष्टः स स्वार्था- नतिलङ्घनात् । दूरसूक्ष्मादिदृष्टौ स्यान्न रूपे श्रोत्रवृत्तिता ॥' (सर्वदर्शनसं० १०।२३) सर्वज्ञको भी घ्राणशक्तिसे ही गन्धग्रहणका जैसे नियम है, वैसे ही वेदशक्तिसे ही वेदार्थ ग्रहणका नियम होनेपर सर्वज्ञत्वकी हानि नहीं होती । इसलिये दूसरा पक्ष भी सङ्गत नहीं है । काठक, कालाप, तैत्तिरीय इत्यादि समाख्याएँ अध्ययनसम्प्रदायप्रवर्त्तकविषयक हैं । 'तेन प्रोक्तम्' में प्रोक्तम्' का 'कृतम्' यह अर्थ नहीं होता, क्योकि वह तो 'कृते ग्रन्थे' से ही गतार्थ है, किंतु स्वय या अन्यद्वारा कृत अध्यापन या अर्थान्वा- ख्यानसे प्रकाशित करना ही 'प्रोक्त' का अर्थ है । निःश्वासवत् वेदाविर्भावका श्रवण परमेशितृकारणकत्वका ही बोधन करता है, प्रमाणान्तरसे अर्थोपलम्भनका भी बोधन नहीं करता । जिनका यह कहना है कि प्रत्यक्षद्वारा अर्थको उपलब्ध करके अखिल वेद का ईश्वरने निर्माण किया है, उन्हे भी कहना पड़ेगा कि ईश्वरको सभी पदार्थ प्रत्यक्ष हैं, प्रत्यक्षगम्य ही नहीं, अपितु अनुमानगम्य भी । तथा च लाघवात् यही सिद्ध होगा कि अनुमानसिद्ध अर्थमूलक वेदरचना है । अपि च ईश्वरनिर्मित होनेसे

७७६ मार्क्सवाद और रामराज्य वेदके प्रामाण्यकी सिद्धि और उसके सिद्ध हो जानेपर वेदप्रतिपाद्यत्वेन ईश्वरसिद्धि माननेपर अन्योन्याश्रयदोष अनिवार्य है। ‘क्षित्यङ्कुरादिकं सकर्तृकं कार्यत्वात् घटादिवत्’ इस अनुमानसे यदि ईश्वरसिद्धि इष्ट हो, तो भी धूमसे जिस प्रकार वह्निसामान्यका अनुमान होता है, वैसे कार्यत्वहेतुसे ईश्वरसामान्यकी ही सिद्धि होगी, ईश्वरविशेषकी नहीं। वेदकर्ता तो ईश्वरविशेष है, अतः अनुमानसे उसकी सिद्धि किस तरह होगी ? जिन-जिन युक्तियोसे नैयायिक लोग वेदरचयिताका ईश्वरत्व सिद्ध करना चाहेंगे, उन्ही-उन्हीं युक्तियोंसे बाइड्विल, कुरान आदि ग्रन्थोके निर्माताका भी परमेश्वरत्व—उन-उन ग्रन्थोंके अनुयायी — सिद्ध कर सकते हैं। तथाच इतरग्रन्थ साधारण होनेसे वेदमें पुरुषाश्रित पुदोषसम्पर्ककी शङ्का प्राप्त होनेसे उसका प्रामाण्य सिद्ध न हो सकेगा, अतः पूर्वोक्त रीतिसे वेदका अपौरुषेयत्व ही मानना चाहिये । यदि कहा जाय कि वेदमें इन्द्र आदि व्यक्तियोका श्रवण है, अतः उनकी उत्पत्तिके अनन्तर वेदका निर्माण होना युक्त है, तो यह ठीक नही; क्योंकि सृष्टि शब्दपूर्वक ही होती है, जैसा कि ‘वेदशब्देभ्य एवादौ निर्मिमिते स ईश्वरः’ (महा० शां० २३२।१६४) इत्यादि स्मृतियोमे बतलाया गया है। ‘शब्द इति चेन्नातःप्रभवात् प्रत्यक्षानु- मानाभ्याम्’ (वेदान्तदर्शन, १।३।२८)। इत्यादि न्यायमें भी यह सिद्ध किया गया है। वाक्यत्व हेतुसे महाभारतादिवत् वेदके पौरुषेयत्वका जो अनुमान किया गया था, वह भी ठीक नहीं क्योकि स्मर्यमाणकर्तृकत्वरूप उपाधि विद्यमान है। वेदमें वाक्यत्वरूप हेतुके रहनेपर भी स्मर्यमाणकर्तृकत्व नही है, अतः साधनाव्यापकता है। ‘वाचा विरूपनित्यया’, (तैत्ति० सं० २।६।११) ‘अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा’, (महा० शा० २३२।२५)। ‘अतएव च नित्यत्वम्’ (वेदान्त दर्श० १।३।२९) इत्यादि श्रुतिस्मृति-वचनोसे वेदका नित्यत्व अवगत हो रहा है, अतः वेदकी स्मर्यमाणकर्तृकता या प्रमीयमाणकर्तृकता नहीं कही जा सकती । इसीलिये ‘न कदाचिदनीदृशं जगत्’ इत्यादि जरन्मीमासकमतानुसार ‘सम्प्रदाया- विच्छेदे सति’ इस विशेषणकी असिद्धि भी नहीं कही जा सकती। ब्रह्ममीमासक- मतानुसार भी नित्यसिद्ध वेदका सम्प्रदायप्रवर्तकत्वेन निःश्वासवत् परमेश्वरसे प्रादुर्भाव होनेपर भी ‘प्रमाणान्तरेण अर्थमुपलभ्य विरचितत्व’ न होनेसे पूर्वकल्पीय ही वेद- का आविर्भाव हुआ करता है। एतावता अद्वैतकी व्याहृति नही कही जा सकती, क्योकि जीवोंकी तरह वेदका नित्यत्व आपेक्षिक अभिमत होनेसे अद्वैतका बाध नही होता । ब्रह्मातिरिक्त समस्त पदार्थोंका अद्वैतसिद्धान्तानुसार मिथ्यात्व मान्य है, अतः वेदमें भी मिथ्यात्व प्रसक्त हो गया, यह नहीं कहा जा सकता; क्योंकि ‘अत्र वेदा अवेदा भवन्ति’ (बृहदा० उप०)। इत्यादि प्रमाणोसे कारणभावकी अवगति होनेपर पृथक् नाम-

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रूपका बाध इष्ट ही है । अतएव वेदप्रामाण्य मानना ही आस्तिकता कहा गया है, वेदकी सत्यता स्वीकार करना आस्तिकता नहीं बतलाया गया । इसीलिये वर्णात्मक वेदकी सत्यता माननेवाले भी चार्वाक आदिको नास्तिक कहा गया है। पूर्वोक्त नित्यत्वबोधक वचनोंका विरोध होनेके कारण 'ऋग्वेदोऽग्निरजायत' इत्यादिसे भी वेदकी उत्पत्ति बोधित नहीं होती, अपितु अधीत पूर्वकत्वीय एवं सुप्तप्रतिबुद्ध- न्यायसे सम्भृत वेदका सम्प्रदायप्रवर्तकत्व ही माना जाता है और उसीके अनुसार मन्त्रद्रष्टृत्वात् ऋषित्व भी मान्य है !

प्रत्यक्ष तथा अनुमानसे उपपन्नार्थत्वात् जो लोग वेदका प्रामाण्य अङ्गीकार करते हैं, उनके मतसे प्रमाणान्तरसे गतार्थ हो जाने और अनुवादक हो जानेके कारण वेदकी अनावश्यकता और अप्रमाणता स्पष्ट है । जिन प्रमाणोसे वेदार्थकी उपपन्नार्थता विज्ञात होती है, उन्हींसे वेदार्थका भी ज्ञान हो सकता है, अतः आगमरूप प्रमाणान्तर मानना व्यर्थ ही है । अभिप्राय यह कि प्रथमोच्चरितत्व या पूर्वानुपूर्वीनिरपेक्ष उच्चरितत्व पौरुषेयत्व है । पुरुषोच्चरित होनेपर भी वेद प्रथमो- च्चरित या पूर्वानुपूर्वीनिरपेक्ष उच्चरित न होनेसे पौरुषेय नहीं है । गुरुच्चारणानु- चारण वेदका होता है, अतः पूर्वानुपूर्वीनिरपेक्ष उच्चरित नहीं होते । एवं च प्रथमो च्चरितत्व भी वेदोंमें न होनेसे प्रमाणान्तरेण अर्थमुपलभ्य विरचितत्व भी उनमें नहीं है, अतः उनका अपौरुषेयत्व सिद्ध है । 'वाचा विरूपनित्यया' इत्यादि पूर्वोद्धृत श्रुति-स्मृतिवचनोंसे विरोध होनेके कारण 'तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे' (शु०यजु० ३१।७) । इत्यादि श्रुतियोंसे वेदोंकी पौरुषेयताका साधन नहीं किया जा सकता । 'अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितम्' (छा० उप०) इस तरह निःश्वासवत् वेदोंका आविर्भाव श्रुत होनेसे उनकी बुद्धि प्रयत्ननिरपेक्षतया अकृत्रिमता भी कही जाती है । 'यो वै ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै' (श्वेता० उप० ६ । १८) इस श्रुतिमें ब्रह्माका निर्माण बतलाया गया है, पर वेदोंका तो प्रेषणमात्र ही बतलाया गया है, निर्माण नहीं, क्योंकि 'विदधाति' और 'प्रहिणोति' का अर्थ वैसा ही है । ब्रह्माका विधाता भी वेदका विधाता नहीं है, अपितु ब्रह्माके हृदयमें वह केवल नित्यसिद्ध वेदोंकी प्रेरणा करता है । अतः वेदकी अपौरुषेयता सिद्ध है ।

'मैंने कुछ नहीं जाना' ऐसा जागनेपर लोगोंको स्मरण होता है, अतः आत्माकी चिदात्मता और अनुभूतिके बिना स्मृति बन नहीं सकती, अतः आत्मा- की चिदात्मता भी ज्ञात होती है । इसलिये प्रकाशाप्रकाशात्मक खद्योत (जुगनू) के समान आत्मा चिज्जडरूप है । नित्य, निरतिशय सुखकी अभिव्यक्ति मुक्ति है ।

७७८ मार्क्सवाद और रामराज्य और भी अन्य नैयायिकादिसम्मत तथा स्वमतसे अविरुद्ध पदार्थ भाट्टलोगोंको स्वीकृत ही हैं। प्रभाकर और नैयायिक द्रव्यरूप होनेके कारण आकाशवत् आत्मा- को भी अचित् एवं चैतन्यगुणवाला मानते हैं। चैतन्यकी ही तरह इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, सुख, दुःख और संस्कारको भी आत्माके गुण ही मानते हैं। अदृष्टवशात् आत्मा और मनका संयोग होनेपर उक्त गुण आत्मामें उत्पन्न होते और उनका वियोग होनेपर नष्ट हो जाते हैं। चैतन्ययुक्त होनेसे ही आत्माको चेतन भी कह दिया जाता है। वही कर्त्ता-भोक्ता है। कर्मवशात् ही इस लोकके देहके समान लोकान्तरमें भी सुख-दुःखादि होते हैं। इसी प्रकार सर्वगत होनेपर भी आत्माके गमनागमनादिकी व्यवस्था भी बन जाती है। सांख्योंका कहना है कि निरंशकी उभयरूपता नहीं बन सकती, अतः आत्मा चिद्रूप ही है। जाड्यांश प्रकृतिका है। चित्के भोग तथा अपवर्गके लिये प्रकृतिकी प्रवृत्ति होती है। मूल प्रकृति, सात प्रकृतिके विकार (महत्, अहंकार और पञ्चतन्मात्राएँ) और सोलह विकार मानते हैं। आत्माको कूटस्थ, असङ्ग, चेतनस्वरूप व्यापक और अनन्त मानते हैं। सत्त्व और पुरुषकी अन्यताख्यातिसे द्रष्टा आत्माका स्वरूपमें अवस्थान मुक्ति है। बछड़ेकी विवृद्धिके लिये पयःप्रवृत्तिके समान अचेतन भी प्रकृतिकी भोगापवर्गरूप पुरुषार्थके सम्पादनार्थ प्रवृत्ति होती है। 'क्लेश, कर्म, विपाक और आशयसे अपरामृष्ट पुरुषरूप ईश्वरसे प्रेरित हुई प्रकृति प्रवृत्त होती है', ऐसा पातञ्जलो (योगियो) का मत है। 'अनादिनिधन, शब्दरूप अक्षर ब्रह्म ही प्रपञ्चरूपसे विवर्तित होता है', ऐसा वैयाकरणोंका सिद्धान्त है। किन्हींके मतानुसार द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, विशिष्ट, अंशी, शक्ति, सादृश्य और अभाव—ये दस पदार्थ हैं। इनमें परमात्मा, लक्ष्मी, जीव, अव्याकृताकाश, प्रकृति, गुणत्रय, महत्तत्त्व, अहंतत्त्व, बुद्धि, मन, इन्द्रिय, मात्रा, भूत, ब्रह्माण्ड, अविद्या, अर्णव, अन्धकार, वासना, काल और प्रतिबिम्बभेदसे बीस द्रव्य, रूपरसादि अनेक गुण, विहित-निषिद्ध-उदासीनभेदसे तीन प्रकारके कर्म आदि हैं। इस मतमें जीव-ईश्वरका अत्यन्त भेद मान्य है। अभेदवादिनी श्रुतियोंको वे सर्वथा औपचारिक मानते हैं। कुछ लोग प्रमाण और प्रमेयरूप दो ही तत्त्व मानते हैं। प्रत्यक्ष, अनुमान और आगमभेदसे वे तीन प्रमाण तथा द्रव्य, गुण और सामान्यभेदसे तीन प्रमेय मानते हैं। ईश्वर, जीव, नित्यविभूति, ज्ञान, प्रकृति और काल—ये छः द्रव्य हैं।

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सत्त्व, रज, तम, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, संयोग और शक्ति—ये दस गुण हैं। द्रव्य और गुण उभयरूप सामान्य है। प्रकृतिका परिणाम प्रपञ्च है। पर, व्यूह, विभव, अन्तर्यामी और अर्चावतारभेदसे परमेश्वरके पाँच प्रकार हैं। उसके परतन्त्र, बद्ध, मुक्त और नित्यभेदसे तीन प्रकारका जीव है। संसारी बद्ध हैं। श्रीमन्नारायणकी उपासनासे वैकुण्ठलोकको प्राप्त जीव मुक्त हं। कभी भी जिन्हें संसारका स्पर्श नहीं हुआ, ऐसे अनन्त, गरुड़ आदि नित्यमुक्त हं। शुद्ध और मिश्रभेदसे सत्त्व दो प्रकारका है। नित्यविभूतिमें शुद्ध और प्रकृतिमें मिश्र सत्त्व हे। ‘अन्तर्यामिब्राह्मण’ द्वारा चिदचिच्छरीरक परब्रह्म ही चिदचिद्विशिष्ट है, जो दूसरा है। आत्मा ज्ञानगुणक होते हुए ज्ञानस्वरूप है। परमेश्वर विभु है, परंतु चित् वाण- रूप जीव अणुपरिमाणपरिमित हे। प्राकृत और अप्राकृतभेदसे दो प्रकारका अचेतन काल है। चित्-अचिद्रूपसे परमेश्वरका भेदव्यपदेश होनेके कारण भेद हे और अभेदव्यपदेशके कारण अभेद भी है। इस तरह भेदाभेदवादी सभी प्रकारके श्रुति- वचन स्वार्थमें अनुपचरितार्थक ही समझते हैं। इन्हींमें कोई सोपाधिक भेदाभेद- वादी हैं। कोई अचिन्त्यभेदाभेदवादी हं। कोई शुद्धाद्वैत ही तत्त्व बतलाते हैं। यहाँ शुद्धाद्वैत' का समास इस प्रकार है—‘शुद्धं च तद् अद्वैतं शुद्धाद्वैतम्’ और ‘शुद्धयोः मायासम्बन्धरहितयोः अद्वैतं शुद्धाद्वैतम् ।’ इयत्तासे अनवच्छिन्न ब्रह्म ही अनवगाह्य महामहिमाशाली होने और सकल विरुद्ध धर्मोंका आश्रय होनेके कारण कामधेनु, कल्पवृक्ष एवं चिन्तामणि आदिके समान स्वयं अविकृत रहकर ही अघटितघटनापटीयान्, स्वाभाविक स्वात्मयोगसे क्रीडार्थ पूर्णानन्दको तिरोभूत करके जीवरूपको ग्रहण करता है, चिदानन्दांशोंको तिरोहित करके सर्वभवनसमर्थ सदंशाश्रित मायाशक्तिसे जगद्रूप धारण करता है, आनन्दांशको किंचित्तिरोहित करके अक्षरब्रह्मरूप ग्रहण करता है और पूर्णानन्दाशका तिरोधान बिना किये ही पुरुषोत्तमरूपसे प्रादुर्भूत होता है। इसी प्रकार कोई कार्य, कारण, योग, विधि और दुःख—ये पाँच पदार्थ मानते हैं। कोई पति, पशु और पाश—ये तीन पदार्थ ही मानते हैं। इनके मतानुसार शिव पति, जीव पशु और मल, कर्म, माया तथा रोधशक्ति पाश हैं। प्रत्यभिज्ञावादीके अनुसार जीव तथा परमात्माका ऐक्य है। जड पूर्ववत् है, किंतु आत्मामें वह भिन्न भी है और अभिन्न भी और सब पूर्ववत् है।

७८० मार्क्सवाद और रामराज्य अहमर्थ और आत्मा देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदिसे आत्मा पृथक् है, प्रायेण यह बात अधिक दार्शनिकोंको मान्य है । परंतु अहमर्थ ( मै ) आत्मा है या नहीं, इस विषयमें प्रायः विप्रतिपत्ति है । अधिकाधिक दार्शनिकोंका कहना है कि 'अहमर्थ ( मै ) ही आत्मा है, उसमे ही मै कर्त्ता, मै भोक्ता, मै दुखी, मै सुखी, मैं शोक-मोहसे व्याकुल, मै शान्त, मै धीर, मै मूढ इत्यादि रूपसे जिसको अनुभव होता है, वही आत्मा है । अहमर्थ ही अनन्त उपद्रवोसे उपद्रुत बद्ध अज्ञानी होता है । वह कर्म, धर्म, उपासना, ज्ञान आदिद्वारा ज्ञानी होकर मुक्त होता है । जागर, स्वप्न, सुषुप्ति- तीनो अवस्थाओसे बन्ध और मोक्षकालमें एकरस अन्वयी अहमर्थ ही आत्मा है । यदि अह अह इत्याकारेण अनुभूयमान अहमर्थका मोक्षमें उच्छेद हो जाय, तब तो कोई भी मोक्षके लिये प्रयत्नशील न होगा, प्रत्युत मोक्षकी कथाहीसे भागेगा ।' परंतु अद्वैतवादी वेदान्तीका इसके विपरीत यह कहना है कि अहमर्थ मुख्य आत्मा नही है, किंतु चिज्जडकी ग्रन्थि ही 'मै' या अहरूपसे भासमान होती है । दूसरे शब्दोमें कहा जाय तो अधिष्ठान, बुद्धि और चिदाभास—ये ही तीनों मिलकर औपाधिक जीव या 'मै' आदि पदोसे व्यपदिष्ट होते हैं । बुद्धि-आत्मा, जड- चेतन, अनात्मा-आत्माका अन्योन्याध्यास ही 'मै' पदार्थ है । जैसे किसी साधारण पुरुषको शरीर, इन्द्रिय, बुद्धि आदिमें ही आत्मबुद्धि हो जाती है और वह देहादिके नाशमें ही आत्मनाश मानने लगता है, वैसे ही अनात्मरूप अहमर्थमें भी भ्रान्तिसे ही आत्मबुद्धि होती है । मै जो कभी कर्ता, कभी भोक्ता, कभी सुखी, कभी दुखी, कभी शान्त, कभी घोर एव कभी मूढ है, कभी हृष्ट पुष्ट, प्रसन्न, कभी शोक-मोह-परिश्रुत होकर प्रतीत होता है, उसे एकरस शुद्ध स्व- प्रकाश आत्मा कैसे कहा जाय ? वस्तुतः इस अनेकरूप अहमर्थका जो एकरस- भासक अखण्ड भानरूप नित्य बोध है, वही आत्मा है । जैसे स्वर्गादि सुख-प्राप्तिके लिये देहद्वारा प्रयत्नशील ही अग्निकुण्डमें देहकी आहुति कर सकता है, वैसे ही अहमर्थद्वारा प्रयत्नशील सोपाधिक आत्मा निरुपाधिक पदप्राप्तिके लिये सोपाधिक स्वरूपके उच्छेदमें प्रयत्नशील होता है । इसके सिवा यदि अहमर्थ ही आत्मा होता, तो उसका तीनो ही अवस्थाओमें प्रकाश होना उचित था; क्योकि आत्मा स्वप्रकाश है । अहकार, अहबुद्धिका विषय है । आत्मा अहबुद्धिका भी भासक साक्षीरूप है । कुछ लोगोका कहना है कि “सुखमहमस्वाप्सम्, न किंचिदमवेदिषम्'—'सुखपूर्वक मैं सो रहा था, मैं कुछ भी नहीं जानता था, इस तरह सुषुप्तिसे ( सोकर ) जागनेपर सौषुप्त सुखके

अज्ञानकी स्मृति होती है, उसीके साथ अहम्‌अर्थ 'मैं' की भी स्मृति होती है। स्मृति बिना अनुभवके नहीं हो सकती; अतः 'मैं'का भी सुषुप्तिमें अनुभव होना ही चाहिये; परन्तु उनका यह कहना उचित नहीं जान पड़ता, क्योंकि सोऽहमर्थः सदा ही इच्छादि गुणोंमें विशिष्ट ही उपलब्ध होता है। परन्तु जब कि सुषुप्तिमें इच्छादिका उपलब्ध होता ही नहीं; तब केवल अहम्‌अर्थका उपलब्ध कैसे माना जाय ? गुणरहित केवल गुणीका उपलब्ध असम्भव है। जैसे रूपाविरहित घटका ज्ञान नहीं हो सकता, वैसे ही इच्छा-द्वेषादि गुणरहित अहम्‌अर्थका ज्ञान नहीं हो सकता। गुणीका ग्रहण गुण- ग्रहण बिना नहीं हो सकता। यदि कहा जाय कि एकदेश सत्त्वानन्द गुणसे युक्त ही अहम्‌अर्थका सुषुप्तिमें अनुभव होता है तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि सुषुप्तिमें विशिष्ट बुद्धि अङ्गीकार करनेपर उसके सुषुप्तित्त्वका ही भङ्ग हो जायगा। इसके सिवा गुणि-ग्रहणमें विशेषगुणग्रहण हेतु होता है। अतः रूपादि विशेष गुणग्रहण बिना घटादिका ग्रहण नहीं होता। यदि कहा जाय कि रूपाविरहित घटादि होते ही नहीं;

शास्त्रगम्य है । यह सब कथन पूर्वोक्त पक्षके विरुद्ध नही है; क्योंकि मोक्षावस्थाथी आत्मा केवल शास्त्रसे ही अवगत होता है । इसलिये वचनसे ही यह कहा गया कि उपाधिमात्रविरही निष्कलङ्क चेतनमे प्रत्यभिज्ञाका निषेध किया गया है । अन्तःकरण पद उपाधिमात्रमें तात्पर्य रखता है । तथा च सुषुप्तिमें अज्ञानोपहित आत्मा भी प्रत्यभिज्ञानार्ह ( पहचानने योग्य ) है । इसके सिवा अन्तःकरणराहित्य दशामें विवरणवाक्यद्वारा प्रत्यभिज्ञाका ही निषेध है, अभिज्ञाका नही । देखी हुई वस्तुके फिर देखनेपर 'यह वही है' ऐसा पहचाननेको 'प्रत्यभिज्ञा' कहा जाता है और केवल ज्ञानको 'अभिज्ञा' कहा जाता है। सुषुप्ति दशामें अन्तःकरण न होनेसे प्रत्यभिज्ञाके न होनेपर भी यहीं अविद्योपहित चेतनकी ज्ञानरूप अभिज्ञामें कोई बाधा नही है । अतः सुषुप्तिमें अहंकाररहित आत्माके अनुभवमें कोई भी आपत्ति नही उठायी जा सकती । जो यह कहा जाता है कि यदि सुषुप्तिमें अहमर्थका ग्रहण न होता, तब तो इतने समयतक मै सोता था या अन्य कोई—'एतावन्तं कालं सुप्तोऽहमन्यो वा' ऐसा संशय होना चाहिये, 'मै ही सोया था' ऐसा निश्चय न होना चाहिये । पर वह भी ठीक नहीं, क्योंकि सुषुप्तिकालमें अनुभूत आत्मामें ही अहंकारका ऐक्याध्यास होनेसे 'मै ही सोता था' ऐसा निश्चित प्रत्यय होता है । वास्तवमें 'अहमज्ञः' इत्यादि स्थलोमें भी अज्ञान अहमर्थके आश्रित नहीं, किंतु अहंकारके अधिष्ठानभूत चैतन्यमे ही रहता है । इस तरह अज्ञान और अहंकार एक अधिकरणमें रहते हैं, अतः सामानाधिकरण्य या एकाश्रयाश्रितत्व होनेके कारण अज्ञानमें अहमर्थाश्रयत्वकी प्रतीति होती है, जैसे सामान्य, समवाय आदि और सत्ता—दोनोंहीका समान द्रव्यादि आश्रय होनेके कारण ही 'सामान्यं सत्, समवायः सन्' इत्यादि व्यवहार होता है, वैसे ही 'अहमज्ञः' इत्यादि व्यवहार होते हैं । ऐसी स्थितिमें जैसे कोई पहले दिन चैत्रभिन्न देवदत्तको भ्रान्तिसे चैत्र मानकर, दूसरे दिन 'सोऽयं चैत्रः' ऐसा प्रत्यभिज्ञान ( पहचान ) करता हे, वैसे ही भ्रान्तिसे अज्ञानाश्रय चित्को भ्रान्तिसे अहमर्थ मानकर दूसरे दिन अज्ञानाश्रयत्वेन अहमर्थका प्रत्यभिज्ञान करता है । इसके सिवा निश्चय होनेपर सशय न होनेका नियम तो है, किंतु निश्चय न होनेपर सशय होनेका नियम नहीं है । अतएव कहा गया है कि 'सत्यारोपे निमित्तानु- सरणं न तु निमित्तमस्तीत्यारोपः' अर्थात् आरोप होनेपर उसके निमित्तका अन्वेषण होता है, यह नही कि निमित्तवशात् आरोप हो । जैसे कही जल-दर्पणादि प्रतिबिम्ब-निमित्तके रहनेपर भी प्रतिबिम्ब नही होता, वैसे ही निश्चयाभाव रहने- पर भी संशय नहीं होता । इसीलिये 'अहमन्यो वा' ऐसा सदेह नही होता । फिर भी यह सदेह होता है कि 'जब इतने समयतक मैं स्वप्न देखता था, इतने समय- तक मैं जागता था—'एतावन्तं कालमहं स्वप्नं पश्यन्नासमहं जाग्रदासम्' इत्यादि प्रतीतियोके समान ही 'अहमस्वाप्सम्' मै सोता था, ऐसी प्रतीति भी होती है, तब प्फिर क्या कारण है कि पहली दो प्रतीतियोमें अहमर्थकी स्मृति मानी जाय और

'अहमस्वाप्सम्' इस प्रतीतिमें उसकी स्मृति न मानी जाय।' पर यह भी ठीक नहीं; क्योंकि सर्वत्र स्मर्यमाण आत्माके साथ अभेदारोप होनेके कारण ही अहम्भावमें स्मृतित्वका अभिमान होता है। अतः सुषुप्तिमें अहमर्थका अनुभव माननेका कोई भी स्थिर आधार नहीं। यदि कहा जाय कि अपरामर्श-परामर्शभिन्नमें परामर्शत्वका आरोप कहीं नहीं देखा जाता अर्थात् स्मृतिसे भिन्नमें स्मृतित्वका आरोप नहीं देखा जाता तो वह भी ठीक नहीं; क्योंकि स्मर्यमाणरूपसे अनुभूयमान स्मर्यमाणभिन्नमें परा- मर्शत्वका आरोप होता ही है। अतएव इस कथनका भी कोई महत्त्व नहीं रह जाता कि यदि अहमर्थ आत्मासे भिन्न हो तब तो 'जो पहले दुःखी था, वही अब सुखी हुआ' इस प्रतीतिके समान 'जो पहले मेरेसे भिन्न सोता था, वही अब मैं उत्पन्न हुआ हूँ' ऐसा अनुभव होना चाहिये। क्योंकि जैसे दुःखीरूपसे आत्माका पहले ज्ञान होता है, वैसे 'मुझसे अन्य पहले सोया था', ऐसा प्रथम विज्ञान ही नहीं होता। सुषुप्तिमें जैसे अहमर्थका प्रकाश नहीं होता, वैसे ही मदन्यता (मेरेसे भिन्नता) का भी प्रकाश नहीं होता। सुषुप्तिमें अहमर्थके असत्त्वका ज्ञान नहीं होता। जागने- पर अनुभूयमान अहङ्कारमें सोनेके पहले कालमें गृहीत अहङ्कारसे अभिन्नता ही गृह्यमाण होती है। अतः अहङ्कारकी उत्पत्तिका बोध नहीं होता। यदि विपक्षियों को ऐसी बुद्धि होती हो, तो इष्ट ही है। उन्हें तो यह ज्ञान होना ही चाहिये कि सुषुप्तिमें अहमर्थ नहीं था। प्रबोध होनेपर सुषुप्तिके अधिष्ठान चैतन्यमें ही अहमर्थ- का अध्यास होता है। उसीमें सोनेसे पहलेके अहमर्थका अभेद प्रतीत होता है। इस- पर कुछ लोगोंका कहना है कि 'जब अहमर्थमें आत्मासे भिन्न सिद्ध हो जाय, तभी स्मर्यमाण आत्मामें अहमर्थके ऐक्यका आरोप होगा और जब वैसा आरोप सिद्ध हो जायगा, तब सुषुप्तिमें अहमर्थके अप्रकाश होनेसे उसकी आत्मासे भिन्नता सिद्ध होगी। इस तरह अन्योन्याश्रय-दोष अनिवार्य होगा।' पर यह ठीक नहीं, क्योंकि आत्मासे भिन्नता-सिद्धिके पहले ही सुषुप्तिमें अहमर्थका अप्रकाश सिद्ध हो जाता है। 'अहमस्वाप्सम्' इसीको आत्मपरामर्श मान लेनेसे दृष्टहान और अदृष्टकी कल्पना भी नहीं करनी पड़ेगी। अह शब्दका गौणार्थ देहादि है। मुख्यार्थ अन्तःकरण और आत्माका अन्योन्याध्यासरूप चिज्जडग्रन्थि है और लक्ष्यार्थ आत्मा है। यदि सुषुप्तिमें अहमर्थका ग्रहण होता तब तो उसका भी उसी तरह स्मरण होता, जैसे गतदिनके अहमर्थका स्मरण होता है। इसे इष्टापत्ति नहीं कहा जा सकता; क्योंकि पूर्व दिनमें जैसे इच्छादिविशिष्ट आत्मा गृहीत हुआ है, वैसे ही सौषुप्त आत्माका भी परामर्श होना चाहिये था। यदि सुषुप्तिमें अहमर्थका प्रकाश होता तो 'इतने समयतक मैं अभिमन्यमान था' इस तरह परामर्श अवश्य होता। कहा जाता है कि अहमर्थके एकदेशमें अभिमानवान् अन्तःकरण तो लीन होगया

७८४ मार्क्सवाद और रामराज्य में कटि-चालनके समान है; परंतु वह ठीक नहीं; क्योकि अहमर्थकी अपेक्षासे ही प्रकाश और अभिमान--दोनो ही होते हैं, अतः एकके प्रकाशसे दूसरेका आपादन युक्त ही है । यदि कहा जाय कि सुषुप्तिमें आत्माके प्रकाशमान होनेपर भी 'आत्नेत्यभिमन्यमान आसम्' इतने कालतक आत्मा ऐसा अभिमन्यमान था— ऐसा अभिमान होना चाहिये, वह भी अनुचित है, क्योकि अभिमानमें अहमर्थ ही कारण है, आत्मा नही । मनकी स्थूलावस्थासे उपहित चिद्रूप अहमर्थकी अपेक्षासे ही अहमाकारवृत्तिरूप अभिमान व्यक्त हो जाता है। वृत्तिरूप होनेपर भी उसके लिये प्रमाण व्यापारकी आवश्यकता नही होती । अहमर्थका प्रकाश भी अहमर्था- वच्छिन्न साक्षीरूप हो है, अतः उसे भी अहमर्थसे भिन्न किसीकी अपेक्षा नहीं है । यदि अभिमान साक्षीमात्रसे ही प्रकाशित होता है। यदि सुषुप्तिमे अहमर्थ हो- तब तो अवश्य ही उसका प्रकाश और अभिमान होना चाहिये । कुछ लोग कहते हैं कि 'सुषुप्तिमें अहमर्थका प्रकाश होता ही है।' ' न किंचिदहमवेदिषम्'—'मैंने कुछ भी नहीं जाना' इस अज्ञानपरामर्शका विषय अहमर्थके अज्ञानसे भिन्न ही विषय है । जैसे वेदान्तीके मतमें चिद्रूपांशमें अज्ञान अमान्य है; क्योकि वह भासमान है, अतः पूर्णानन्दांशमे ही अज्ञान मान्य है, वैसे ही अहमर्थांशमें भी अज्ञान अमान्य है, अन्यथा अहमर्थके भानका विरोध स्पष्ट ही होगा।' परतु यह कथन असगत ही है; क्योकि साक्षिरूप ज्ञान-अज्ञानका विरोधी नहीं हुआ करता । अतएव अज्ञानका भी साक्षीसे प्रकाश होता है। जैसे मेघसे आच्छादित सूर्यद्वारा ही मेघ- का प्रकाश होता है, वैसे ही अज्ञानोपहित चैतन्यरूप साक्षीसे ही अज्ञानका प्रकाश होता है । विरोध होनेपर प्रकाश्यप्रकाशकभाव कथमपि उपपन्न नहीं हो सकता था । इसके सिवा यह कहा ही जा चुका कि सुषुप्तिमें अहमर्थ (मै ) का प्रकाश नही होता । अतएव सुषुप्तिका वर्णन करनेवाली श्रुति भी सुषुप्तिमें अहमर्थ- के अज्ञानको सिद्ध करती है । 'न विजानात्ययमहमस्मि' अर्थात् सुषुप्तिमे 'मैं यह हूँ' इस तरह जीवको ज्ञान नहीं होता। कुछ लोग कहते हैं कि 'नात्मानं न परांश्चैव न सत्यं नापि चानृतम् । प्राज्ञ. किंचन संवेत्ति तुरीयं सर्वदृक् सदा ॥' सुषुप्ति-अवस्था- भिमानी प्राज्ञ अपनेको, न दूसरेको, न सत्यको, न अनृतको—किसी भी तत्त्वको नही जानता; इत्यादि श्रुतिवचनके समान आत्मादिके विशेषाज्ञान प्रतिपादनमें ही उक्त श्रुति भी तात्पर्य रखती है, परतु यह कथन ठीक नहीं है। 'अहरहर्ब्रह्म गच्छन्ति सम्पद्य न विन्दुरमृतेन प्रत्यूढाः', इस आत्मबोधक श्रुतिविरोधके कारण उपर्युक्त श्रुतिका विशेषाज्ञान प्रतिपादनम तात्पर्य माना जाता है। परंतु 'न विजाना- त्ययमहमस्मि' इस श्रुतिके साथ किसी श्रुतिका विरोध नही है, अतः यह श्रुति तो अहमर्थके अज्ञानमें भी पर्यवसित होती है। जो कहा जाता है कि 'अहमर्थ स्मर्ता (स्मरण करनेवाला ) है यह तो अवश्य ही मान्य है'; इसपर अब विचारना यह है कि वह अविद्यावच्छिन्न चैतन्य है अथवा अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य । यदि प्रथम

७८५ मार्क्स और आत्मा पक्ष मान्य हो, तब तो 'योऽहमकार्षं सोऽहं सौषुप्तिकाज्ञानादि स्मरामि' अर्थात् जो मै कर्मोंका कर्ता था, वही मे सुषुप्तिके अज्ञानका स्मरण करता हूँ, इस अनुभव- से विरोध होगा, क्योकि कर्तृत्व अविद्यावच्छिन्न चैतन्यमें कथमपि नही बन सकता । यदि अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यको ही स्मर्ता माना जाय, तब तो अहमर्थ- को ही अनुभव करनेवाला भी मानना होगा; क्योकि एकाश्रयमे रहनेसे ही स्मृति, सस्कार एवं अनुभवमें कार्यकारणभाव बनता है । इसीसे जो मै अनुभव करनेवाला था, वही मै स्मरण कर रहा हूँ, इस तरह प्रत्यभिज्ञा (पहचान) होती है।' परतु यह सब कथन निरर्थक है, क्योंकि यह कहा जा चुका कि अविद्यावच्छिन्न चैतन्य अज्ञानका अनुभव करनेवाला है और वही जाग्रत्-कालमें अन्तःकरणावच्छिन्न होकर स्मर्ता होता है। इसलिये चैतन्यके अभेदसे अनुभव और स्मरणकी एका- श्रयतामें कोई भी अनुपपत्ति नहीं है। कहा जाता है कि अन्तःकरणरूप उपाधिके भेदसे अविद्यावच्छिन्न चैतन्यके साथ ऐक्य नही हो सकता, यह भी ठीक नहीं है। अविद्यावच्छिन्न चैतन्य ही अन्तःकरणावच्छिन्न होता है, अतः भेदकल्पना असङ्गत है। फिर भी कहा जाता है कि अविद्या और अन्तःकरणरूप उपाधिका भेद होनेसे मठाकाश और मठाकाशान्तर्गत घटाकाशके समान दोनों उपहितोंका अर्थात् अविद्योपहित और अन्तःकरणोपहितका भेद अवश्य होना चाहिये। परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि यहाँ दृष्टान्त ही अप्रतिपन्न है। वही उपाधियाँ परस्पर उपहितकी भेदक होती हैं, जो एक दूसरीसे अनुपहितकी उपधायक होती हैं। अन्यथा कम्बु-अवच्छिन्न आकाश, ग्रीवावच्छिन्न आकाशसे पृथक् ही समझा जाना चाहिये। इस दृष्टिसे यद्यपि मठबहिर्भूत घटसे अवच्छिन्न आकाश मठा- वच्छिन्न आकाशसे भिन्न कहा जा सकता है, क्योंकि वे दोनों उपाधियाँ एक दूसरेसे अनुपहित आकाशको ही उपहित बनाती हैं, तथापि मठान्तर्गत घट तो मठापहित मठाकाशको ही घटोपहित घटाकाश बनाता है, अतः इन दोनोंका परस्पर भेद नहीं कहा जा सकता । इस तरह अविद्यान्तर्गत अन्तःकरण, अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यको अविद्यावच्छिन्न चैतन्यसे भिन्न नहीं बन सकता । कहा जाता है कि यदि सुषुप्तिमें अहमर्थ न होता तो 'मै निर्दुःख होऊँ' इस इच्छासे प्राणियोंकी सुषुप्तिके लिये प्रवृत्ति न होनी चाहिये। परंतु यह भी ठीक नहीं। जैसे 'मै दुबला हूँ, मोटा हो जाऊँ' इस बुद्धिसे इच्छासे स्थौल्य- सम्पादनमें प्रवृत्ति होती है, यहाँ स्थौल्य दशामें कार्यके न रहनेपर भी कृशकी स्थौल्य-सम्पादनार्थ प्रवृत्ति होती है। वैसे ही निर्दुःख सुषुप्ति-दशामें अहमर्थके न होनेपर भी अहमर्थकी निर्दुःख होनेकी इच्छासे सुषुप्तिमें प्रवृत्ति हो जाती है। यदि कहा जाय कि कार्श्यादिसे विविक्त (पृथक्) शरीरमें ही स्थूलताकी इच्छा होती है, तब प्रकृतमें भी यही कहा जा सकता है कि अन्तःकरण निष्कृष्ट केवल साक्षी मा० रा० ५९—

मात्रकी निर्दुःखताके लिये ही सुषुप्तिमें प्रवृत्ति होती है । 'मै निर्दुःख होऊँ' इस अनुभवमें अहमंश तो अवर्जनीयतया उपस्थित होता है, जैसे 'दूसरेका ग्राम मेरा हो जाय' यहाँपर सम्बन्धांशको इच्छाविषयता होती है । यदि कहा जाय कि चिन्मात्र निर्दुःख हो ऐसी इच्छा होनी चाहिये, तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि चिन्मात्ररूपसे विज्ञान न होनेसे ही ऐसा अनुभव नहीं होता । निर्दुःखका अनुभव है, ऐसी इच्छा होती ही है । कहा जाता है कि जो 'मैं' सोया था, वही मै जागता हूँ, जो 'मैं' पूर्व दिवसमें करता था, वही मैं आज कर रहा हूँ, इस तरहके प्रत्यभिज्ञान अहमर्थके भेदमे नहीं हो सकते । इसके सिवा कृतहानि (किये हुए कर्मोंका बिना फल दिये ही नाश) और अकृताभ्यागम (बिना कर्म किये ही फलका आगम) मानना पड़ेगा । जब प्रतिदिन सुषुप्तिमें अहमर्थका नाश और जागरमें फिर उसकी उत्पत्ति मानी जायगी, तब पूर्वोक्त दूषण अनिवार्य हो जायेंगे । कर्ता अहमर्थ और भोक्ता अहमर्थमें भेद होनेसे कर्म और फलभोगमे भी वैयधिकरण्यापत्ति होगी । [L1