भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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७७६ मार्क्सवाद और रामराज्य वेदके प्रामाण्यकी सिद्धि और उसके सिद्ध हो जानेपर वेदप्रतिपाद्यत्वेन ईश्वरसिद्धि माननेपर अन्योन्याश्रयदोष अनिवार्य है। ‘क्षित्यङ्कुरादिकं सकर्तृकं कार्यत्वात् घटादिवत्’ इस अनुमानसे यदि ईश्वरसिद्धि इष्ट हो, तो भी धूमसे जिस प्रकार वह्निसामान्यका अनुमान होता है, वैसे कार्यत्वहेतुसे ईश्वरसामान्यकी ही सिद्धि होगी, ईश्वरविशेषकी नहीं। वेदकर्ता तो ईश्वरविशेष है, अतः अनुमानसे उसकी सिद्धि किस तरह होगी ? जिन-जिन युक्तियोसे नैयायिक लोग वेदरचयिताका ईश्वरत्व सिद्ध करना चाहेंगे, उन्ही-उन्हीं युक्तियोंसे बाइड्विल, कुरान आदि ग्रन्थोके निर्माताका भी परमेश्वरत्व—उन-उन ग्रन्थोंके अनुयायी — सिद्ध कर सकते हैं। तथाच इतरग्रन्थ साधारण होनेसे वेदमें पुरुषाश्रित पुदोषसम्पर्ककी शङ्का प्राप्त होनेसे उसका प्रामाण्य सिद्ध न हो सकेगा, अतः पूर्वोक्त रीतिसे वेदका अपौरुषेयत्व ही मानना चाहिये । यदि कहा जाय कि वेदमें इन्द्र आदि व्यक्तियोका श्रवण है, अतः उनकी उत्पत्तिके अनन्तर वेदका निर्माण होना युक्त है, तो यह ठीक नही; क्योंकि सृष्टि शब्दपूर्वक ही होती है, जैसा कि ‘वेदशब्देभ्य एवादौ निर्मिमिते स ईश्वरः’ (महा० शां० २३२।१६४) इत्यादि स्मृतियोमे बतलाया गया है। ‘शब्द इति चेन्नातःप्रभवात् प्रत्यक्षानु- मानाभ्याम्’ (वेदान्तदर्शन, १।३।२८)। इत्यादि न्यायमें भी यह सिद्ध किया गया है। वाक्यत्व हेतुसे महाभारतादिवत् वेदके पौरुषेयत्वका जो अनुमान किया गया था, वह भी ठीक नहीं क्योकि स्मर्यमाणकर्तृकत्वरूप उपाधि विद्यमान है। वेदमें वाक्यत्वरूप हेतुके रहनेपर भी स्मर्यमाणकर्तृकत्व नही है, अतः साधनाव्यापकता है। ‘वाचा विरूपनित्यया’, (तैत्ति० सं० २।६।११) ‘अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा’, (महा० शा० २३२।२५)। ‘अतएव च नित्यत्वम्’ (वेदान्त दर्श० १।३।२९) इत्यादि श्रुतिस्मृति-वचनोसे वेदका नित्यत्व अवगत हो रहा है, अतः वेदकी स्मर्यमाणकर्तृकता या प्रमीयमाणकर्तृकता नहीं कही जा सकती । इसीलिये ‘न कदाचिदनीदृशं जगत्’ इत्यादि जरन्मीमासकमतानुसार ‘सम्प्रदाया- विच्छेदे सति’ इस विशेषणकी असिद्धि भी नहीं कही जा सकती। ब्रह्ममीमासक- मतानुसार भी नित्यसिद्ध वेदका सम्प्रदायप्रवर्तकत्वेन निःश्वासवत् परमेश्वरसे प्रादुर्भाव होनेपर भी ‘प्रमाणान्तरेण अर्थमुपलभ्य विरचितत्व’ न होनेसे पूर्वकल्पीय ही वेद- का आविर्भाव हुआ करता है। एतावता अद्वैतकी व्याहृति नही कही जा सकती, क्योकि जीवोंकी तरह वेदका नित्यत्व आपेक्षिक अभिमत होनेसे अद्वैतका बाध नही होता । ब्रह्मातिरिक्त समस्त पदार्थोंका अद्वैतसिद्धान्तानुसार मिथ्यात्व मान्य है, अतः वेदमें भी मिथ्यात्व प्रसक्त हो गया, यह नहीं कहा जा सकता; क्योंकि ‘अत्र वेदा अवेदा भवन्ति’ (बृहदा० उप०)। इत्यादि प्रमाणोसे कारणभावकी अवगति होनेपर पृथक् नाम-