भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 536, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 536

[Header] मार्क्स और आत्मा ७७७

रूपका बाध इष्ट ही है । अतएव वेदप्रामाण्य मानना ही आस्तिकता कहा गया है, वेदकी सत्यता स्वीकार करना आस्तिकता नहीं बतलाया गया । इसीलिये वर्णात्मक वेदकी सत्यता माननेवाले भी चार्वाक आदिको नास्तिक कहा गया है। पूर्वोक्त नित्यत्वबोधक वचनोंका विरोध होनेके कारण 'ऋग्वेदोऽग्निरजायत' इत्यादिसे भी वेदकी उत्पत्ति बोधित नहीं होती, अपितु अधीत पूर्वकत्वीय एवं सुप्तप्रतिबुद्ध- न्यायसे सम्भृत वेदका सम्प्रदायप्रवर्तकत्व ही माना जाता है और उसीके अनुसार मन्त्रद्रष्टृत्वात् ऋषित्व भी मान्य है !

प्रत्यक्ष तथा अनुमानसे उपपन्नार्थत्वात् जो लोग वेदका प्रामाण्य अङ्गीकार करते हैं, उनके मतसे प्रमाणान्तरसे गतार्थ हो जाने और अनुवादक हो जानेके कारण वेदकी अनावश्यकता और अप्रमाणता स्पष्ट है । जिन प्रमाणोसे वेदार्थकी उपपन्नार्थता विज्ञात होती है, उन्हींसे वेदार्थका भी ज्ञान हो सकता है, अतः आगमरूप प्रमाणान्तर मानना व्यर्थ ही है । अभिप्राय यह कि प्रथमोच्चरितत्व या पूर्वानुपूर्वीनिरपेक्ष उच्चरितत्व पौरुषेयत्व है । पुरुषोच्चरित होनेपर भी वेद प्रथमो- च्चरित या पूर्वानुपूर्वीनिरपेक्ष उच्चरित न होनेसे पौरुषेय नहीं है । गुरुच्चारणानु- चारण वेदका होता है, अतः पूर्वानुपूर्वीनिरपेक्ष उच्चरित नहीं होते । एवं च प्रथमो च्चरितत्व भी वेदोंमें न होनेसे प्रमाणान्तरेण अर्थमुपलभ्य विरचितत्व भी उनमें नहीं है, अतः उनका अपौरुषेयत्व सिद्ध है । 'वाचा विरूपनित्यया' इत्यादि पूर्वोद्धृत श्रुति-स्मृतिवचनोंसे विरोध होनेके कारण 'तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे' (शु०यजु० ३१।७) । इत्यादि श्रुतियोंसे वेदोंकी पौरुषेयताका साधन नहीं किया जा सकता । 'अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितम्' (छा० उप०) इस तरह निःश्वासवत् वेदोंका आविर्भाव श्रुत होनेसे उनकी बुद्धि प्रयत्ननिरपेक्षतया अकृत्रिमता भी कही जाती है । 'यो वै ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै' (श्वेता० उप० ६ । १८) इस श्रुतिमें ब्रह्माका निर्माण बतलाया गया है, पर वेदोंका तो प्रेषणमात्र ही बतलाया गया है, निर्माण नहीं, क्योंकि 'विदधाति' और 'प्रहिणोति' का अर्थ वैसा ही है । ब्रह्माका विधाता भी वेदका विधाता नहीं है, अपितु ब्रह्माके हृदयमें वह केवल नित्यसिद्ध वेदोंकी प्रेरणा करता है । अतः वेदकी अपौरुषेयता सिद्ध है ।

'मैंने कुछ नहीं जाना' ऐसा जागनेपर लोगोंको स्मरण होता है, अतः आत्माकी चिदात्मता और अनुभूतिके बिना स्मृति बन नहीं सकती, अतः आत्मा- की चिदात्मता भी ज्ञात होती है । इसलिये प्रकाशाप्रकाशात्मक खद्योत (जुगनू) के समान आत्मा चिज्जडरूप है । नित्य, निरतिशय सुखकी अभिव्यक्ति मुक्ति है ।