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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

[Header] मार्क्स और आत्मा ७७७

रूपका बाध इष्ट ही है । अतएव वेदप्रामाण्य मानना ही आस्तिकता कहा गया है, वेदकी सत्यता स्वीकार करना आस्तिकता नहीं बतलाया गया । इसीलिये वर्णात्मक वेदकी सत्यता माननेवाले भी चार्वाक आदिको नास्तिक कहा गया है। पूर्वोक्त नित्यत्वबोधक वचनोंका विरोध होनेके कारण 'ऋग्वेदोऽग्निरजायत' इत्यादिसे भी वेदकी उत्पत्ति बोधित नहीं होती, अपितु अधीत पूर्वकत्वीय एवं सुप्तप्रतिबुद्ध- न्यायसे सम्भृत वेदका सम्प्रदायप्रवर्तकत्व ही माना जाता है और उसीके अनुसार मन्त्रद्रष्टृत्वात् ऋषित्व भी मान्य है !

प्रत्यक्ष तथा अनुमानसे उपपन्नार्थत्वात् जो लोग वेदका प्रामाण्य अङ्गीकार करते हैं, उनके मतसे प्रमाणान्तरसे गतार्थ हो जाने और अनुवादक हो जानेके कारण वेदकी अनावश्यकता और अप्रमाणता स्पष्ट है । जिन प्रमाणोसे वेदार्थकी उपपन्नार्थता विज्ञात होती है, उन्हींसे वेदार्थका भी ज्ञान हो सकता है, अतः आगमरूप प्रमाणान्तर मानना व्यर्थ ही है । अभिप्राय यह कि प्रथमोच्चरितत्व या पूर्वानुपूर्वीनिरपेक्ष उच्चरितत्व पौरुषेयत्व है । पुरुषोच्चरित होनेपर भी वेद प्रथमो- च्चरित या पूर्वानुपूर्वीनिरपेक्ष उच्चरित न होनेसे पौरुषेय नहीं है । गुरुच्चारणानु- चारण वेदका होता है, अतः पूर्वानुपूर्वीनिरपेक्ष उच्चरित नहीं होते । एवं च प्रथमो च्चरितत्व भी वेदोंमें न होनेसे प्रमाणान्तरेण अर्थमुपलभ्य विरचितत्व भी उनमें नहीं है, अतः उनका अपौरुषेयत्व सिद्ध है । 'वाचा विरूपनित्यया' इत्यादि पूर्वोद्धृत श्रुति-स्मृतिवचनोंसे विरोध होनेके कारण 'तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे' (शु०यजु० ३१।७) । इत्यादि श्रुतियोंसे वेदोंकी पौरुषेयताका साधन नहीं किया जा सकता । 'अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितम्' (छा० उप०) इस तरह निःश्वासवत् वेदोंका आविर्भाव श्रुत होनेसे उनकी बुद्धि प्रयत्ननिरपेक्षतया अकृत्रिमता भी कही जाती है । 'यो वै ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै' (श्वेता० उप० ६ । १८) इस श्रुतिमें ब्रह्माका निर्माण बतलाया गया है, पर वेदोंका तो प्रेषणमात्र ही बतलाया गया है, निर्माण नहीं, क्योंकि 'विदधाति' और 'प्रहिणोति' का अर्थ वैसा ही है । ब्रह्माका विधाता भी वेदका विधाता नहीं है, अपितु ब्रह्माके हृदयमें वह केवल नित्यसिद्ध वेदोंकी प्रेरणा करता है । अतः वेदकी अपौरुषेयता सिद्ध है ।

'मैंने कुछ नहीं जाना' ऐसा जागनेपर लोगोंको स्मरण होता है, अतः आत्माकी चिदात्मता और अनुभूतिके बिना स्मृति बन नहीं सकती, अतः आत्मा- की चिदात्मता भी ज्ञात होती है । इसलिये प्रकाशाप्रकाशात्मक खद्योत (जुगनू) के समान आत्मा चिज्जडरूप है । नित्य, निरतिशय सुखकी अभिव्यक्ति मुक्ति है ।

७७८ मार्क्सवाद और रामराज्य और भी अन्य नैयायिकादिसम्मत तथा स्वमतसे अविरुद्ध पदार्थ भाट्टलोगोंको स्वीकृत ही हैं। प्रभाकर और नैयायिक द्रव्यरूप होनेके कारण आकाशवत् आत्मा- को भी अचित् एवं चैतन्यगुणवाला मानते हैं। चैतन्यकी ही तरह इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, सुख, दुःख और संस्कारको भी आत्माके गुण ही मानते हैं। अदृष्टवशात् आत्मा और मनका संयोग होनेपर उक्त गुण आत्मामें उत्पन्न होते और उनका वियोग होनेपर नष्ट हो जाते हैं। चैतन्ययुक्त होनेसे ही आत्माको चेतन भी कह दिया जाता है। वही कर्त्ता-भोक्ता है। कर्मवशात् ही इस लोकके देहके समान लोकान्तरमें भी सुख-दुःखादि होते हैं। इसी प्रकार सर्वगत होनेपर भी आत्माके गमनागमनादिकी व्यवस्था भी बन जाती है। सांख्योंका कहना है कि निरंशकी उभयरूपता नहीं बन सकती, अतः आत्मा चिद्रूप ही है। जाड्यांश प्रकृतिका है। चित्के भोग तथा अपवर्गके लिये प्रकृतिकी प्रवृत्ति होती है। मूल प्रकृति, सात प्रकृतिके विकार (महत्, अहंकार और पञ्चतन्मात्राएँ) और सोलह विकार मानते हैं। आत्माको कूटस्थ, असङ्ग, चेतनस्वरूप व्यापक और अनन्त मानते हैं। सत्त्व और पुरुषकी अन्यताख्यातिसे द्रष्टा आत्माका स्वरूपमें अवस्थान मुक्ति है। बछड़ेकी विवृद्धिके लिये पयःप्रवृत्तिके समान अचेतन भी प्रकृतिकी भोगापवर्गरूप पुरुषार्थके सम्पादनार्थ प्रवृत्ति होती है। 'क्लेश, कर्म, विपाक और आशयसे अपरामृष्ट पुरुषरूप ईश्वरसे प्रेरित हुई प्रकृति प्रवृत्त होती है', ऐसा पातञ्जलो (योगियो) का मत है। 'अनादिनिधन, शब्दरूप अक्षर ब्रह्म ही प्रपञ्चरूपसे विवर्तित होता है', ऐसा वैयाकरणोंका सिद्धान्त है। किन्हींके मतानुसार द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, विशिष्ट, अंशी, शक्ति, सादृश्य और अभाव—ये दस पदार्थ हैं। इनमें परमात्मा, लक्ष्मी, जीव, अव्याकृताकाश, प्रकृति, गुणत्रय, महत्तत्त्व, अहंतत्त्व, बुद्धि, मन, इन्द्रिय, मात्रा, भूत, ब्रह्माण्ड, अविद्या, अर्णव, अन्धकार, वासना, काल और प्रतिबिम्बभेदसे बीस द्रव्य, रूपरसादि अनेक गुण, विहित-निषिद्ध-उदासीनभेदसे तीन प्रकारके कर्म आदि हैं। इस मतमें जीव-ईश्वरका अत्यन्त भेद मान्य है। अभेदवादिनी श्रुतियोंको वे सर्वथा औपचारिक मानते हैं। कुछ लोग प्रमाण और प्रमेयरूप दो ही तत्त्व मानते हैं। प्रत्यक्ष, अनुमान और आगमभेदसे वे तीन प्रमाण तथा द्रव्य, गुण और सामान्यभेदसे तीन प्रमेय मानते हैं। ईश्वर, जीव, नित्यविभूति, ज्ञान, प्रकृति और काल—ये छः द्रव्य हैं।

[Header] मार्क्स और आत्मा ७७९

सत्त्व, रज, तम, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, संयोग और शक्ति—ये दस गुण हैं। द्रव्य और गुण उभयरूप सामान्य है। प्रकृतिका परिणाम प्रपञ्च है। पर, व्यूह, विभव, अन्तर्यामी और अर्चावतारभेदसे परमेश्वरके पाँच प्रकार हैं। उसके परतन्त्र, बद्ध, मुक्त और नित्यभेदसे तीन प्रकारका जीव है। संसारी बद्ध हैं। श्रीमन्नारायणकी उपासनासे वैकुण्ठलोकको प्राप्त जीव मुक्त हं। कभी भी जिन्हें संसारका स्पर्श नहीं हुआ, ऐसे अनन्त, गरुड़ आदि नित्यमुक्त हं। शुद्ध और मिश्रभेदसे सत्त्व दो प्रकारका है। नित्यविभूतिमें शुद्ध और प्रकृतिमें मिश्र सत्त्व हे। ‘अन्तर्यामिब्राह्मण’ द्वारा चिदचिच्छरीरक परब्रह्म ही चिदचिद्विशिष्ट है, जो दूसरा है। आत्मा ज्ञानगुणक होते हुए ज्ञानस्वरूप है। परमेश्वर विभु है, परंतु चित् वाण- रूप जीव अणुपरिमाणपरिमित हे। प्राकृत और अप्राकृतभेदसे दो प्रकारका अचेतन काल है। चित्-अचिद्रूपसे परमेश्वरका भेदव्यपदेश होनेके कारण भेद हे और अभेदव्यपदेशके कारण अभेद भी है। इस तरह भेदाभेदवादी सभी प्रकारके श्रुति- वचन स्वार्थमें अनुपचरितार्थक ही समझते हैं। इन्हींमें कोई सोपाधिक भेदाभेद- वादी हैं। कोई अचिन्त्यभेदाभेदवादी हं। कोई शुद्धाद्वैत ही तत्त्व बतलाते हैं। यहाँ शुद्धाद्वैत' का समास इस प्रकार है—‘शुद्धं च तद् अद्वैतं शुद्धाद्वैतम्’ और ‘शुद्धयोः मायासम्बन्धरहितयोः अद्वैतं शुद्धाद्वैतम् ।’ इयत्तासे अनवच्छिन्न ब्रह्म ही अनवगाह्य महामहिमाशाली होने और सकल विरुद्ध धर्मोंका आश्रय होनेके कारण कामधेनु, कल्पवृक्ष एवं चिन्तामणि आदिके समान स्वयं अविकृत रहकर ही अघटितघटनापटीयान्, स्वाभाविक स्वात्मयोगसे क्रीडार्थ पूर्णानन्दको तिरोभूत करके जीवरूपको ग्रहण करता है, चिदानन्दांशोंको तिरोहित करके सर्वभवनसमर्थ सदंशाश्रित मायाशक्तिसे जगद्रूप धारण करता है, आनन्दांशको किंचित्तिरोहित करके अक्षरब्रह्मरूप ग्रहण करता है और पूर्णानन्दाशका तिरोधान बिना किये ही पुरुषोत्तमरूपसे प्रादुर्भूत होता है। इसी प्रकार कोई कार्य, कारण, योग, विधि और दुःख—ये पाँच पदार्थ मानते हैं। कोई पति, पशु और पाश—ये तीन पदार्थ ही मानते हैं। इनके मतानुसार शिव पति, जीव पशु और मल, कर्म, माया तथा रोधशक्ति पाश हैं। प्रत्यभिज्ञावादीके अनुसार जीव तथा परमात्माका ऐक्य है। जड पूर्ववत् है, किंतु आत्मामें वह भिन्न भी है और अभिन्न भी और सब पूर्ववत् है।

७८० मार्क्सवाद और रामराज्य अहमर्थ और आत्मा देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदिसे आत्मा पृथक् है, प्रायेण यह बात अधिक दार्शनिकोंको मान्य है । परंतु अहमर्थ ( मै ) आत्मा है या नहीं, इस विषयमें प्रायः विप्रतिपत्ति है । अधिकाधिक दार्शनिकोंका कहना है कि 'अहमर्थ ( मै ) ही आत्मा है, उसमे ही मै कर्त्ता, मै भोक्ता, मै दुखी, मै सुखी, मैं शोक-मोहसे व्याकुल, मै शान्त, मै धीर, मै मूढ इत्यादि रूपसे जिसको अनुभव होता है, वही आत्मा है । अहमर्थ ही अनन्त उपद्रवोसे उपद्रुत बद्ध अज्ञानी होता है । वह कर्म, धर्म, उपासना, ज्ञान आदिद्वारा ज्ञानी होकर मुक्त होता है । जागर, स्वप्न, सुषुप्ति- तीनो अवस्थाओसे बन्ध और मोक्षकालमें एकरस अन्वयी अहमर्थ ही आत्मा है । यदि अह अह इत्याकारेण अनुभूयमान अहमर्थका मोक्षमें उच्छेद हो जाय, तब तो कोई भी मोक्षके लिये प्रयत्नशील न होगा, प्रत्युत मोक्षकी कथाहीसे भागेगा ।' परंतु अद्वैतवादी वेदान्तीका इसके विपरीत यह कहना है कि अहमर्थ मुख्य आत्मा नही है, किंतु चिज्जडकी ग्रन्थि ही 'मै' या अहरूपसे भासमान होती है । दूसरे शब्दोमें कहा जाय तो अधिष्ठान, बुद्धि और चिदाभास—ये ही तीनों मिलकर औपाधिक जीव या 'मै' आदि पदोसे व्यपदिष्ट होते हैं । बुद्धि-आत्मा, जड- चेतन, अनात्मा-आत्माका अन्योन्याध्यास ही 'मै' पदार्थ है । जैसे किसी साधारण पुरुषको शरीर, इन्द्रिय, बुद्धि आदिमें ही आत्मबुद्धि हो जाती है और वह देहादिके नाशमें ही आत्मनाश मानने लगता है, वैसे ही अनात्मरूप अहमर्थमें भी भ्रान्तिसे ही आत्मबुद्धि होती है । मै जो कभी कर्ता, कभी भोक्ता, कभी सुखी, कभी दुखी, कभी शान्त, कभी घोर एव कभी मूढ है, कभी हृष्ट पुष्ट, प्रसन्न, कभी शोक-मोह-परिश्रुत होकर प्रतीत होता है, उसे एकरस शुद्ध स्व- प्रकाश आत्मा कैसे कहा जाय ? वस्तुतः इस अनेकरूप अहमर्थका जो एकरस- भासक अखण्ड भानरूप नित्य बोध है, वही आत्मा है । जैसे स्वर्गादि सुख-प्राप्तिके लिये देहद्वारा प्रयत्नशील ही अग्निकुण्डमें देहकी आहुति कर सकता है, वैसे ही अहमर्थद्वारा प्रयत्नशील सोपाधिक आत्मा निरुपाधिक पदप्राप्तिके लिये सोपाधिक स्वरूपके उच्छेदमें प्रयत्नशील होता है । इसके सिवा यदि अहमर्थ ही आत्मा होता, तो उसका तीनो ही अवस्थाओमें प्रकाश होना उचित था; क्योकि आत्मा स्वप्रकाश है । अहकार, अहबुद्धिका विषय है । आत्मा अहबुद्धिका भी भासक साक्षीरूप है । कुछ लोगोका कहना है कि “सुखमहमस्वाप्सम्, न किंचिदमवेदिषम्'—'सुखपूर्वक मैं सो रहा था, मैं कुछ भी नहीं जानता था, इस तरह सुषुप्तिसे ( सोकर ) जागनेपर सौषुप्त सुखके

अज्ञानकी स्मृति होती है, उसीके साथ अहम्‌अर्थ 'मैं' की भी स्मृति होती है। स्मृति बिना अनुभवके नहीं हो सकती; अतः 'मैं'का भी सुषुप्तिमें अनुभव होना ही चाहिये; परन्तु उनका यह कहना उचित नहीं जान पड़ता, क्योंकि सोऽहमर्थः सदा ही इच्छादि गुणोंमें विशिष्ट ही उपलब्ध होता है। परन्तु जब कि सुषुप्तिमें इच्छादिका उपलब्ध होता ही नहीं; तब केवल अहम्‌अर्थका उपलब्ध कैसे माना जाय ? गुणरहित केवल गुणीका उपलब्ध असम्भव है। जैसे रूपाविरहित घटका ज्ञान नहीं हो सकता, वैसे ही इच्छा-द्वेषादि गुणरहित अहम्‌अर्थका ज्ञान नहीं हो सकता। गुणीका ग्रहण गुण- ग्रहण बिना नहीं हो सकता। यदि कहा जाय कि एकदेश सत्त्वानन्द गुणसे युक्त ही अहम्‌अर्थका सुषुप्तिमें अनुभव होता है तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि सुषुप्तिमें विशिष्ट बुद्धि अङ्गीकार करनेपर उसके सुषुप्तित्त्वका ही भङ्ग हो जायगा। इसके सिवा गुणि-ग्रहणमें विशेषगुणग्रहण हेतु होता है। अतः रूपादि विशेष गुणग्रहण बिना घटादिका ग्रहण नहीं होता। यदि कहा जाय कि रूपाविरहित घटादि होते ही नहीं;

शास्त्रगम्य है । यह सब कथन पूर्वोक्त पक्षके विरुद्ध नही है; क्योंकि मोक्षावस्थाथी आत्मा केवल शास्त्रसे ही अवगत होता है । इसलिये वचनसे ही यह कहा गया कि उपाधिमात्रविरही निष्कलङ्क चेतनमे प्रत्यभिज्ञाका निषेध किया गया है । अन्तःकरण पद उपाधिमात्रमें तात्पर्य रखता है । तथा च सुषुप्तिमें अज्ञानोपहित आत्मा भी प्रत्यभिज्ञानार्ह ( पहचानने योग्य ) है । इसके सिवा अन्तःकरणराहित्य दशामें विवरणवाक्यद्वारा प्रत्यभिज्ञाका ही निषेध है, अभिज्ञाका नही । देखी हुई वस्तुके फिर देखनेपर 'यह वही है' ऐसा पहचाननेको 'प्रत्यभिज्ञा' कहा जाता है और केवल ज्ञानको 'अभिज्ञा' कहा जाता है। सुषुप्ति दशामें अन्तःकरण न होनेसे प्रत्यभिज्ञाके न होनेपर भी यहीं अविद्योपहित चेतनकी ज्ञानरूप अभिज्ञामें कोई बाधा नही है । अतः सुषुप्तिमें अहंकाररहित आत्माके अनुभवमें कोई भी आपत्ति नही उठायी जा सकती । जो यह कहा जाता है कि यदि सुषुप्तिमें अहमर्थका ग्रहण न होता, तब तो इतने समयतक मै सोता था या अन्य कोई—'एतावन्तं कालं सुप्तोऽहमन्यो वा' ऐसा संशय होना चाहिये, 'मै ही सोया था' ऐसा निश्चय न होना चाहिये । पर वह भी ठीक नहीं, क्योंकि सुषुप्तिकालमें अनुभूत आत्मामें ही अहंकारका ऐक्याध्यास होनेसे 'मै ही सोता था' ऐसा निश्चित प्रत्यय होता है । वास्तवमें 'अहमज्ञः' इत्यादि स्थलोमें भी अज्ञान अहमर्थके आश्रित नहीं, किंतु अहंकारके अधिष्ठानभूत चैतन्यमे ही रहता है । इस तरह अज्ञान और अहंकार एक अधिकरणमें रहते हैं, अतः सामानाधिकरण्य या एकाश्रयाश्रितत्व होनेके कारण अज्ञानमें अहमर्थाश्रयत्वकी प्रतीति होती है, जैसे सामान्य, समवाय आदि और सत्ता—दोनोंहीका समान द्रव्यादि आश्रय होनेके कारण ही 'सामान्यं सत्, समवायः सन्' इत्यादि व्यवहार होता है, वैसे ही 'अहमज्ञः' इत्यादि व्यवहार होते हैं । ऐसी स्थितिमें जैसे कोई पहले दिन चैत्रभिन्न देवदत्तको भ्रान्तिसे चैत्र मानकर, दूसरे दिन 'सोऽयं चैत्रः' ऐसा प्रत्यभिज्ञान ( पहचान ) करता हे, वैसे ही भ्रान्तिसे अज्ञानाश्रय चित्को भ्रान्तिसे अहमर्थ मानकर दूसरे दिन अज्ञानाश्रयत्वेन अहमर्थका प्रत्यभिज्ञान करता है । इसके सिवा निश्चय होनेपर सशय न होनेका नियम तो है, किंतु निश्चय न होनेपर सशय होनेका नियम नहीं है । अतएव कहा गया है कि 'सत्यारोपे निमित्तानु- सरणं न तु निमित्तमस्तीत्यारोपः' अर्थात् आरोप होनेपर उसके निमित्तका अन्वेषण होता है, यह नही कि निमित्तवशात् आरोप हो । जैसे कही जल-दर्पणादि प्रतिबिम्ब-निमित्तके रहनेपर भी प्रतिबिम्ब नही होता, वैसे ही निश्चयाभाव रहने- पर भी संशय नहीं होता । इसीलिये 'अहमन्यो वा' ऐसा सदेह नही होता । फिर भी यह सदेह होता है कि 'जब इतने समयतक मैं स्वप्न देखता था, इतने समय- तक मैं जागता था—'एतावन्तं कालमहं स्वप्नं पश्यन्नासमहं जाग्रदासम्' इत्यादि प्रतीतियोके समान ही 'अहमस्वाप्सम्' मै सोता था, ऐसी प्रतीति भी होती है, तब प्फिर क्या कारण है कि पहली दो प्रतीतियोमें अहमर्थकी स्मृति मानी जाय और

'अहमस्वाप्सम्' इस प्रतीतिमें उसकी स्मृति न मानी जाय।' पर यह भी ठीक नहीं; क्योंकि सर्वत्र स्मर्यमाण आत्माके साथ अभेदारोप होनेके कारण ही अहम्भावमें स्मृतित्वका अभिमान होता है। अतः सुषुप्तिमें अहमर्थका अनुभव माननेका कोई भी स्थिर आधार नहीं। यदि कहा जाय कि अपरामर्श-परामर्शभिन्नमें परामर्शत्वका आरोप कहीं नहीं देखा जाता अर्थात् स्मृतिसे भिन्नमें स्मृतित्वका आरोप नहीं देखा जाता तो वह भी ठीक नहीं; क्योंकि स्मर्यमाणरूपसे अनुभूयमान स्मर्यमाणभिन्नमें परा- मर्शत्वका आरोप होता ही है। अतएव इस कथनका भी कोई महत्त्व नहीं रह जाता कि यदि अहमर्थ आत्मासे भिन्न हो तब तो 'जो पहले दुःखी था, वही अब सुखी हुआ' इस प्रतीतिके समान 'जो पहले मेरेसे भिन्न सोता था, वही अब मैं उत्पन्न हुआ हूँ' ऐसा अनुभव होना चाहिये। क्योंकि जैसे दुःखीरूपसे आत्माका पहले ज्ञान होता है, वैसे 'मुझसे अन्य पहले सोया था', ऐसा प्रथम विज्ञान ही नहीं होता। सुषुप्तिमें जैसे अहमर्थका प्रकाश नहीं होता, वैसे ही मदन्यता (मेरेसे भिन्नता) का भी प्रकाश नहीं होता। सुषुप्तिमें अहमर्थके असत्त्वका ज्ञान नहीं होता। जागने- पर अनुभूयमान अहङ्कारमें सोनेके पहले कालमें गृहीत अहङ्कारसे अभिन्नता ही गृह्यमाण होती है। अतः अहङ्कारकी उत्पत्तिका बोध नहीं होता। यदि विपक्षियों को ऐसी बुद्धि होती हो, तो इष्ट ही है। उन्हें तो यह ज्ञान होना ही चाहिये कि सुषुप्तिमें अहमर्थ नहीं था। प्रबोध होनेपर सुषुप्तिके अधिष्ठान चैतन्यमें ही अहमर्थ- का अध्यास होता है। उसीमें सोनेसे पहलेके अहमर्थका अभेद प्रतीत होता है। इस- पर कुछ लोगोंका कहना है कि 'जब अहमर्थमें आत्मासे भिन्न सिद्ध हो जाय, तभी स्मर्यमाण आत्मामें अहमर्थके ऐक्यका आरोप होगा और जब वैसा आरोप सिद्ध हो जायगा, तब सुषुप्तिमें अहमर्थके अप्रकाश होनेसे उसकी आत्मासे भिन्नता सिद्ध होगी। इस तरह अन्योन्याश्रय-दोष अनिवार्य होगा।' पर यह ठीक नहीं, क्योंकि आत्मासे भिन्नता-सिद्धिके पहले ही सुषुप्तिमें अहमर्थका अप्रकाश सिद्ध हो जाता है। 'अहमस्वाप्सम्' इसीको आत्मपरामर्श मान लेनेसे दृष्टहान और अदृष्टकी कल्पना भी नहीं करनी पड़ेगी। अह शब्दका गौणार्थ देहादि है। मुख्यार्थ अन्तःकरण और आत्माका अन्योन्याध्यासरूप चिज्जडग्रन्थि है और लक्ष्यार्थ आत्मा है। यदि सुषुप्तिमें अहमर्थका ग्रहण होता तब तो उसका भी उसी तरह स्मरण होता, जैसे गतदिनके अहमर्थका स्मरण होता है। इसे इष्टापत्ति नहीं कहा जा सकता; क्योंकि पूर्व दिनमें जैसे इच्छादिविशिष्ट आत्मा गृहीत हुआ है, वैसे ही सौषुप्त आत्माका भी परामर्श होना चाहिये था। यदि सुषुप्तिमें अहमर्थका प्रकाश होता तो 'इतने समयतक मैं अभिमन्यमान था' इस तरह परामर्श अवश्य होता। कहा जाता है कि अहमर्थके एकदेशमें अभिमानवान् अन्तःकरण तो लीन होगया

७८४ मार्क्सवाद और रामराज्य में कटि-चालनके समान है; परंतु वह ठीक नहीं; क्योकि अहमर्थकी अपेक्षासे ही प्रकाश और अभिमान--दोनो ही होते हैं, अतः एकके प्रकाशसे दूसरेका आपादन युक्त ही है । यदि कहा जाय कि सुषुप्तिमें आत्माके प्रकाशमान होनेपर भी 'आत्नेत्यभिमन्यमान आसम्' इतने कालतक आत्मा ऐसा अभिमन्यमान था— ऐसा अभिमान होना चाहिये, वह भी अनुचित है, क्योकि अभिमानमें अहमर्थ ही कारण है, आत्मा नही । मनकी स्थूलावस्थासे उपहित चिद्रूप अहमर्थकी अपेक्षासे ही अहमाकारवृत्तिरूप अभिमान व्यक्त हो जाता है। वृत्तिरूप होनेपर भी उसके लिये प्रमाण व्यापारकी आवश्यकता नही होती । अहमर्थका प्रकाश भी अहमर्था- वच्छिन्न साक्षीरूप हो है, अतः उसे भी अहमर्थसे भिन्न किसीकी अपेक्षा नहीं है । यदि अभिमान साक्षीमात्रसे ही प्रकाशित होता है। यदि सुषुप्तिमे अहमर्थ हो- तब तो अवश्य ही उसका प्रकाश और अभिमान होना चाहिये । कुछ लोग कहते हैं कि 'सुषुप्तिमें अहमर्थका प्रकाश होता ही है।' ' न किंचिदहमवेदिषम्'—'मैंने कुछ भी नहीं जाना' इस अज्ञानपरामर्शका विषय अहमर्थके अज्ञानसे भिन्न ही विषय है । जैसे वेदान्तीके मतमें चिद्रूपांशमें अज्ञान अमान्य है; क्योकि वह भासमान है, अतः पूर्णानन्दांशमे ही अज्ञान मान्य है, वैसे ही अहमर्थांशमें भी अज्ञान अमान्य है, अन्यथा अहमर्थके भानका विरोध स्पष्ट ही होगा।' परतु यह कथन असगत ही है; क्योकि साक्षिरूप ज्ञान-अज्ञानका विरोधी नहीं हुआ करता । अतएव अज्ञानका भी साक्षीसे प्रकाश होता है। जैसे मेघसे आच्छादित सूर्यद्वारा ही मेघ- का प्रकाश होता है, वैसे ही अज्ञानोपहित चैतन्यरूप साक्षीसे ही अज्ञानका प्रकाश होता है । विरोध होनेपर प्रकाश्यप्रकाशकभाव कथमपि उपपन्न नहीं हो सकता था । इसके सिवा यह कहा ही जा चुका कि सुषुप्तिमें अहमर्थ (मै ) का प्रकाश नही होता । अतएव सुषुप्तिका वर्णन करनेवाली श्रुति भी सुषुप्तिमें अहमर्थ- के अज्ञानको सिद्ध करती है । 'न विजानात्ययमहमस्मि' अर्थात् सुषुप्तिमे 'मैं यह हूँ' इस तरह जीवको ज्ञान नहीं होता। कुछ लोग कहते हैं कि 'नात्मानं न परांश्चैव न सत्यं नापि चानृतम् । प्राज्ञ. किंचन संवेत्ति तुरीयं सर्वदृक् सदा ॥' सुषुप्ति-अवस्था- भिमानी प्राज्ञ अपनेको, न दूसरेको, न सत्यको, न अनृतको—किसी भी तत्त्वको नही जानता; इत्यादि श्रुतिवचनके समान आत्मादिके विशेषाज्ञान प्रतिपादनमें ही उक्त श्रुति भी तात्पर्य रखती है, परतु यह कथन ठीक नहीं है। 'अहरहर्ब्रह्म गच्छन्ति सम्पद्य न विन्दुरमृतेन प्रत्यूढाः', इस आत्मबोधक श्रुतिविरोधके कारण उपर्युक्त श्रुतिका विशेषाज्ञान प्रतिपादनम तात्पर्य माना जाता है। परंतु 'न विजाना- त्ययमहमस्मि' इस श्रुतिके साथ किसी श्रुतिका विरोध नही है, अतः यह श्रुति तो अहमर्थके अज्ञानमें भी पर्यवसित होती है। जो कहा जाता है कि 'अहमर्थ स्मर्ता (स्मरण करनेवाला ) है यह तो अवश्य ही मान्य है'; इसपर अब विचारना यह है कि वह अविद्यावच्छिन्न चैतन्य है अथवा अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य । यदि प्रथम

७८५ मार्क्स और आत्मा पक्ष मान्य हो, तब तो 'योऽहमकार्षं सोऽहं सौषुप्तिकाज्ञानादि स्मरामि' अर्थात् जो मै कर्मोंका कर्ता था, वही मे सुषुप्तिके अज्ञानका स्मरण करता हूँ, इस अनुभव- से विरोध होगा, क्योकि कर्तृत्व अविद्यावच्छिन्न चैतन्यमें कथमपि नही बन सकता । यदि अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यको ही स्मर्ता माना जाय, तब तो अहमर्थ- को ही अनुभव करनेवाला भी मानना होगा; क्योकि एकाश्रयमे रहनेसे ही स्मृति, सस्कार एवं अनुभवमें कार्यकारणभाव बनता है । इसीसे जो मै अनुभव करनेवाला था, वही मै स्मरण कर रहा हूँ, इस तरह प्रत्यभिज्ञा (पहचान) होती है।' परतु यह सब कथन निरर्थक है, क्योंकि यह कहा जा चुका कि अविद्यावच्छिन्न चैतन्य अज्ञानका अनुभव करनेवाला है और वही जाग्रत्-कालमें अन्तःकरणावच्छिन्न होकर स्मर्ता होता है। इसलिये चैतन्यके अभेदसे अनुभव और स्मरणकी एका- श्रयतामें कोई भी अनुपपत्ति नहीं है। कहा जाता है कि अन्तःकरणरूप उपाधिके भेदसे अविद्यावच्छिन्न चैतन्यके साथ ऐक्य नही हो सकता, यह भी ठीक नहीं है। अविद्यावच्छिन्न चैतन्य ही अन्तःकरणावच्छिन्न होता है, अतः भेदकल्पना असङ्गत है। फिर भी कहा जाता है कि अविद्या और अन्तःकरणरूप उपाधिका भेद होनेसे मठाकाश और मठाकाशान्तर्गत घटाकाशके समान दोनों उपहितोंका अर्थात् अविद्योपहित और अन्तःकरणोपहितका भेद अवश्य होना चाहिये। परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि यहाँ दृष्टान्त ही अप्रतिपन्न है। वही उपाधियाँ परस्पर उपहितकी भेदक होती हैं, जो एक दूसरीसे अनुपहितकी उपधायक होती हैं। अन्यथा कम्बु-अवच्छिन्न आकाश, ग्रीवावच्छिन्न आकाशसे पृथक् ही समझा जाना चाहिये। इस दृष्टिसे यद्यपि मठबहिर्भूत घटसे अवच्छिन्न आकाश मठा- वच्छिन्न आकाशसे भिन्न कहा जा सकता है, क्योंकि वे दोनों उपाधियाँ एक दूसरेसे अनुपहित आकाशको ही उपहित बनाती हैं, तथापि मठान्तर्गत घट तो मठापहित मठाकाशको ही घटोपहित घटाकाश बनाता है, अतः इन दोनोंका परस्पर भेद नहीं कहा जा सकता । इस तरह अविद्यान्तर्गत अन्तःकरण, अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यको अविद्यावच्छिन्न चैतन्यसे भिन्न नहीं बन सकता । कहा जाता है कि यदि सुषुप्तिमें अहमर्थ न होता तो 'मै निर्दुःख होऊँ' इस इच्छासे प्राणियोंकी सुषुप्तिके लिये प्रवृत्ति न होनी चाहिये। परंतु यह भी ठीक नहीं। जैसे 'मै दुबला हूँ, मोटा हो जाऊँ' इस बुद्धिसे इच्छासे स्थौल्य- सम्पादनमें प्रवृत्ति होती है, यहाँ स्थौल्य दशामें कार्यके न रहनेपर भी कृशकी स्थौल्य-सम्पादनार्थ प्रवृत्ति होती है। वैसे ही निर्दुःख सुषुप्ति-दशामें अहमर्थके न होनेपर भी अहमर्थकी निर्दुःख होनेकी इच्छासे सुषुप्तिमें प्रवृत्ति हो जाती है। यदि कहा जाय कि कार्श्यादिसे विविक्त (पृथक्) शरीरमें ही स्थूलताकी इच्छा होती है, तब प्रकृतमें भी यही कहा जा सकता है कि अन्तःकरण निष्कृष्ट केवल साक्षी मा० रा० ५९—

मात्रकी निर्दुःखताके लिये ही सुषुप्तिमें प्रवृत्ति होती है । 'मै निर्दुःख होऊँ' इस अनुभवमें अहमंश तो अवर्जनीयतया उपस्थित होता है, जैसे 'दूसरेका ग्राम मेरा हो जाय' यहाँपर सम्बन्धांशको इच्छाविषयता होती है । यदि कहा जाय कि चिन्मात्र निर्दुःख हो ऐसी इच्छा होनी चाहिये, तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि चिन्मात्ररूपसे विज्ञान न होनेसे ही ऐसा अनुभव नहीं होता । निर्दुःखका अनुभव है, ऐसी इच्छा होती ही है । कहा जाता है कि जो 'मैं' सोया था, वही मै जागता हूँ, जो 'मैं' पूर्व दिवसमें करता था, वही मैं आज कर रहा हूँ, इस तरहके प्रत्यभिज्ञान अहमर्थके भेदमे नहीं हो सकते । इसके सिवा कृतहानि (किये हुए कर्मोंका बिना फल दिये ही नाश) और अकृताभ्यागम (बिना कर्म किये ही फलका आगम) मानना पड़ेगा । जब प्रतिदिन सुषुप्तिमें अहमर्थका नाश और जागरमें फिर उसकी उत्पत्ति मानी जायगी, तब पूर्वोक्त दूषण अनिवार्य हो जायेंगे । कर्ता अहमर्थ और भोक्ता अहमर्थमें भेद होनेसे कर्म और फलभोगमे भी वैयधिकरण्यापत्ति होगी । [L1

ग्रन्थि ही अहंकार है। वही 'अनुभवामि' (मै अनुभव करता हूँ) इस तरह आत्मा- भिन्न आत्मस्वरूप अनुभवका आश्रय होनेसे चिदात्मक कहलाता है। 'अहं कर्ता' (मै करता हूँ) इस तरह जडरूप कर्तृत्वका आश्रय होनेसे अचिदात्मक है। ऐसी स्थितिमें अचित् अन्तःकरणके उपरम होनेपर चिदचित्सवलित (चिजडग्रन्थिरूप) अन्तःकरणका भी उपरम हो जाता है। अन्तःकरण, उसका अधिष्ठान और अन्तः- करणगत चिदाभास—यह तीनों मिलकर अहमर्थ कहलाते हैं। अन्तःकरणका आत्मामें स्वरूपसे ही अध्यास होता है। परन्तु अन्तःकरणमें आत्माका स्वरूप नहीं अध्यस्त होता; किंतु उसका संसर्ग ही अध्यस्त होता है। इसीलिये अन्योन्याध्यास होनेपर भी उभयके साक्षात्कारसे उभयकी निवृत्ति नहीं होती। अतएव शून्यवादपत्ति नहीं होती; क्योकि आत्मस्वरूप अधिष्ठानके साक्षात्कार होनेपर स्वरूपसे अध्यस्त अन्तःकरणकी निवृत्ति होती है। परन्तु आत्माका तो संसर्ग ही अन्तःकरणमें अध्यस्त है, अतः उसीकी निवृत्ति होती है। स्वरूप अध्यस्त नहीं है, अतः उसकी निवृत्ति नहीं होती। इस अन्योन्याध्यास—चिजडग्रन्थिको ही अहमर्थ कहा जाता है, फिर अन्तःकरणकी उपरतिसे उसकी उपरति होनी युक्त ही है। यह उपरति या निवृत्ति भी निरन्वय नाश नहीं है, किंतु कारणरूपसे अवस्थान ही है। अतएव पूर्वापरके अहमर्थमे भेद नहीं है। जैसे एक ही घृतमें कोई भेद नही होता, ठीक वैसे ही वही अन्तःकरण सुषुप्तिकालमें अविद्यात्मना परिणत होता है और जाग्रत्में फिर वही अन्तःकरणरूपमें व्यक्त होता है। इस तरह प्रत्यभिज्ञा और अनुभव-स्मरणका सामानाधिकरण्य, कर्मफलभोग वैयधिकरण्या- भाव, अकृताभ्यागम, कृतविप्रणाशादि दोष भी नही होंगे, 'अथातोऽहंकारादेशः, अथात आत्मादेशः' यह श्रुति भी अहंकारसे पृथक् आत्माके होनेमें प्रमाण है। पूर्वपक्षीकी ओरसे कहा जाता है कि वेदान्तोंके मतसे तो जैसे 'स एवाधस्तात् स एवोपरिष्टात्' इत्यादि वचनोंसे भूमा ब्रह्मके साथ आत्माका अभेद बतलाया गया है, वैसे ही आत्माका अहमर्थके साथ भी अभेद बतलाया जा सकता है। अतः जैसे आत्मस्वरूप होनेपर भी भूमाका पृथक् उपदेश है, वैसे ही 'अहमेवाध- स्तादहमेवोपरिष्टात्' इत्यादि वचनोंसे अहमर्थका पृथक् उपदेश होना सम्भव हो सकता है। तब फिर भेदबोधन कैसा ? यदि कहा जाय कि 'भूमा और आत्मा तो भिन्नत्वेन प्रत्यक्षसे प्रसिद्ध हे, अतः उनका पृथक् उपदेश एकता प्रतिपादनके लिये ही उपयुक्त है। जब कि दो सर्वात्मा नहीं हो सकते और भूमा तथा आत्मा- दोनोंको सर्वात्मता कही गयी है, तब दोनोंकी एकता अर्थात् अभिन्नता सिद्ध हो जाती है। अहंकारकी तो आत्माके साथ एकता प्रत्यक्ष सिद्ध है। अतः आत्मासे पृथक् अहंकारका उपदेश आत्मासे भेद ही सिद्ध करनेके लिये है।' पर यह असङ्गत है, क्योकि यदि अहमर्थसे अन्य आत्माकी भूमा ब्रह्मसे भिन्नता प्रत्यक्षद्वारा असिद्ध

७९८ मार्क्सवाद और रामराज्य है तो भेदार्थ ही दोनोंका उपदेश क्यो न माना जाय ? इसके सिवा, जब अहम्अर्थ तो ब्रह्मभिन्नत्वेन रूपेण सिद्ध है, तब उसका उपदेश अभेद-सिद्धिके लिये ही क्यों न मान लिया जाय ? इसी तरह 'अज्ञातज्ञापकत्वेन श्रुतिका प्रामाण्य सिद्ध होगा।' आदि पूर्वपक्ष भी असङ्गत है; क्योकि अहंकारसे भिन्न आत्माकी भूमारूप ब्रह्मसे भिन्नता प्रत्यक्षद्वारा असिद्ध होनेपर भी अभिन्नता भी उसी तरह असिद्ध ही है । परंतु फिर भी दोकी सर्वात्मता बन नहीं सकती, अतः सर्वात्म्योपदेशान्यथा- नुपपत्तिकी सहायतासे अभेदमे ही श्रुतिका तात्पर्य मानना युक्त है । परतु अहम्अर्थ और आत्माका अभेद असम्भव है; क्योंकि जड, चेतनकी एकता नहीं हो सकती, अतः अहम्अर्थका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिका आत्मासे अभेद-प्रतिपादनमे तात्पर्य नहीं हो सकता । सारांश यह है कि भूमा ब्रह्म ही ऊपर-नीचे, पूर्व- पश्चिम-सर्वत्र है, वही सब कुछ है, यह कथन अधिष्ठान बुद्धिसे ही सम्भव है। सर्वाधिष्ठान जो है, वही सब कुछ है । अतः यदि भूमा ब्रह्म ही सर्वदेश, काल, वस्तुका अधिष्ठान है, तब तो वही सब कुछ है, ऐसा कहना सम्भव है, अन्यथा असम्भव है; परंतु, जब कि उसी तरह आत्माके लिये भी कहा जा रहा है कि आत्मा ही नीचे-ऊपर, पूर्व-पश्चिम, वही सर्वत्र और वही सब कुछ है, तभी अधिष्ठान होनेसे ही आत्माकी भी सर्वात्मकता बन सकती है । परतु सर्वप्रपञ्च का दो अधिष्ठान होना असङ्गत है, अतः जबतक आत्मा और भूमा ब्रह्मका अत्यन्त अभेद न ज्ञात हो, तबतक दोनोंकी ही सर्वात्मकताका उपदेश नहीं सङ्गत हो सकता । इसलिये आत्मा और भूमा ब्रह्मकी एकता स्वीकार्य है । यद्यपि इसी तरह 'अहमेवाधस्तात्' मै ही सब कुछ हूँ । इस तरह अहंकारकी भी सर्वरूपता सुनकर पूर्वन्यायसे आत्मा और भूमाके समान ही अहंकार और आत्माका भी अत्यन्त अभेद मानना चाहिये, तथापि अहंकारकी जडता, दृश्यता, प्रत्यक्षता स्पष्ट ही सिद्ध है । अतः चेतन आत्माका उसके साथ अभेद नहीं हो सकता । इसीलिये अहंकारादेशके पश्चात् आत्मादेशका प्रसङ्ग आता है, जिसका आशय यह होता है कि चिदात्मसंवलित (व्यापक अधिष्ठान चैतन्य- मिश्रित) होनेसे ही अहंकारकी सर्वात्मता कही गयी है । वास्तवमे परिच्छिन्न अहंकार सर्वरूप नहीं है, किंतु आत्मा ही सर्वरूप है । कहा जाता है कि 'ऐसी ही स्थिति हे तो अहंकारकी सर्वात्मता न कहकर आत्माकी ही सर्वात्मता कहनी थी, इतनेसे भी आत्मा और ब्रह्मकी एकता सिद्ध हो ही सकती थी, परतु, यह कहना ठीक नहीं है; क्योकि लोकमें आत्मशब्द- का प्रयोग अहम्अर्थमे ही होता है, अतः 'आत्मा' पदसे शुद्ध आत्माकी सर्वात्मता नहीं बतलायी जा सकती थी।' परंतु, यदि अहंकारकी सर्वात्मताके अनन्तर आत्मा- की सर्वात्मता कही जायगी, तब तो इसपर अवश्य ही ध्यान जायगा कि अहंकार और आत्मा इन समानार्थक दो शब्दोका प्रयोग क्यो किया गया ? इस तरह

ध्यानसे विवेचन करनेपर निश्चय होगा कि आत्मशब्दसे शुद्ध आत्मा विवक्षित है। अतः उसीकी मुख्य सर्वात्मता है। अहंकारकी तो आत्मयुक्त होनेसे ही सर्वात्मता है। इस तरह आत्मशब्दका अहंकारसे अतिरिक्त शुद्ध आत्मामें पार्थक्य निर्णय करानेके लिये ही अहंकारका पृथक् उपदेश आवश्यक है। अर्थात् अहंकार- का पृथक् उपदेश आत्मासे भेद ही सिद्ध करनेके लिये है। कुछ महानुभावोंका तो ऐसा कहना है कि यहाँ सञ्चारिभावका वर्णन है। प्रेमके उद्रेकमें भावुक सभी विश्वको भूमा ब्रह्मरूपसे देखता है, उसीमें स्व-पर- विस्मृतिसे वह अपने-आपको ही भगवान् समझने लगता है। 'असावहं त्वित्यबला- स्तदात्मिका न्यवेदिषुः कृष्णविहारविभ्रमाः।' (श्रीमद्भा० १०।३०।३) अर्थात् जैसे गोपाङ्गनाएँ कृष्ण प्रेमोन्मादमें विह्वल होकर अपने-आपको कृष्ण समझने लगी थीं, वैसे ही साधक अपने-आपको ही भूमा मानकर 'मैं ही सब कुछ हूँ' ऐसा कहता है। परन्तु यह वस्तुस्थिति नहीं, संचारिभाव है, स्थायी नहीं है। अतएव फिर इस भावके मिटनेपर भूमारूप आत्माकी ही सर्वात्मताका अनुभव होता है।' इस मतमें भी अहमर्थसे आत्मशब्दार्थ भिन्न ही माना जाता है। यह दूसरी बात है कि इस मतमें आत्मा और भूमा-इन दोनों शब्दोंका परमेश्वर ही अर्थ है और अहं का अर्थ जीवात्मा है। परंतु यहाँ वस्तुके याथात्म्यका प्रतिपादन करनेवाली श्रुति सञ्चारि- भावका वर्णन कर रही है या तत्त्वके भेद-अभेद आदिका, यह चिन्त्य है। 'कुछ लोगोंका यह भी कहना है कि 'वेदान्तीके मतमें भूमा, अहंकार और आत्मा— यह तीनों बिम्ब, प्रतिबिम्ब और मुखके समान हैं, अतः औपाधिक ब्रह्म भूमा है, जीव अहमर्थ है और निरुपाधिक चिन्मात्र ब्रह्म आत्मा है। इस दृष्टिसे तो जब वेदान्तीके मतमें भी जीवात्मासे अहंकारकी भिन्नता नहीं सिद्ध होती, तब अहमर्थ- की अनात्मता कैसे सिद्ध हो सकती है?' परंतु यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि उसका तात्पर्य यह है कि पहले भूमाका स्वरूप इस तरह बतलाया गया कि 'यत्र नान्यत्पश्यति, नान्यच्छृणोति, नान्यद्विजानाति' (छा० ७०) जहाँ न दूसरेको देखता है, न सुनता है, न जानता है, वही भूमा है। 'स एवाधस्तात्' वही ऊपर-नीचे, वही सब कुछ है। इस उक्तिमें 'यत्र' शब्दसे आधार-आधेयभावकी प्रतीति और 'सः' इस शब्दसे उसकी परोक्षता, अप्रत्यक्षता प्रतीत होती थी और इसीसे भूमामें आत्मासे भिन्नता भी प्रसक्त थी। ऐसी स्थितिमें सर्वभेदशून्य, अपरोक्ष, स्वप्रकाश, ब्रह्मके ज्ञानमें बाधा उपस्थित हो जाती, इसीलिये 'अहमेवाधस्तात्' 'मैं ही ऊपर-नीचे सब कुछ हूँ' इस उक्ति की आवश्यकता हुई। इससे सिद्ध किया गया कि पूर्वोक्त भूमा, जिसकी सर्वात्मता बतलायी गयी, वह अहमर्थरूप है, जीवसे अभिन्न ही है। एतावता 'सः' शब्दसे प्रतीत भूमाकी परोक्षताका वारण हुआ और जीवात्मा परमात्माका भेद एव आधाराधेयभाव आदि भी वारित हुआ। जैसे भूमा सर्वात्मा है, वैसे ही अहमर्थ या जीवात्मा भी सर्वात्मा है। जब दो

७९० मार्क्सवाद और रामराज्य सर्वात्मा नहीं हो सकते, तब अर्थात् ही दोनोंकी एकता समझी जाती है, जिससे अपरोक्ष जीवात्मासे अभिन्न भूमाकी अपरोक्षता एवं आधाराधेय भावादिसे विवर्जितता सिद्ध हो जाती है। परंतु इतनेपर भी यह गड़बड़ी पड़ती थी कि अविवेकी लोग 'मै' या 'अहं' का प्रयोग व्यापक शुद्ध चिदात्मामें न करके चिज्जड- ग्रन्थि या कार्यकारण-संघातमें ही करते हैं । इससे कहीं यह न समझ लिया जाय कि परिच्छिन्न, जड़ कार्यकारणसंघात ही भूमा ब्रह्म है, अतः अहंकाररहित शुद्ध आत्माकी सर्वात्मता बतलाकर सर्वोपद्रव-प्रपंचभेदशून्य, स्वप्रकाश भूमा ब्रह्मकी सर्वात्मताका समर्थन किया गया और अहंशब्द-वाच्यार्थ जड़ अहमर्थसे भिन्न अह- शब्दके लक्ष्यभूत अहमर्थ-साक्षीको मुख्य आत्मा कहा गया है । इसी अर्थको सिद्ध करनेमें भूमादेश, अहंकारादेश, आत्मादेश करनेवाली श्रुतियोंका तात्पर्य है । अतः यहाँ बिम्ब-प्रतिबिम्ब आदि कल्पनाका अवकाश नहीं था । यदि अविद्यामें प्रति- बिम्बित जीवको अहंकारशब्दसे कहनेपर भी प्रसक्त-भेदका वारण और आत्मा- देशद्वारा शुद्ध-आत्मासे अहंकारका भेद कहना सङ्गत हो, तो भी अविद्योपाधिक जीवको अहंकार-शब्दसे 'स्थूलारुन्धतीन्याय' से कहा जाता । जैसे अरुन्धतीके निकट रहनेवाले स्थूलताराको ही पहले दिखलाकर बादमें तन्निकटस्थ अरुन्धतीको दिखलाकर पूर्ववाक्यका भी तात्पर्य अरुन्धतीके प्रदर्शनमें ही माना जाता है, साथ ही स्थूल, सूक्ष्म, दोनों ही ताराओमे भेद स्वतः सिद्ध हो जाता है, वैसे ही 'अहंकार' शब्दसे पहले अविद्याप्रतिबिम्ब अहंकाराश्रय चैतन्य कहा जा सकता है । लोकमें अपरोक्ष चैतन्य- का 'मै' या 'अहं' शब्दसे ही व्यवहार होता है, 'अविद्याप्रतिबिम्ब' आदि शब्द अलौकिक है, अतः उनसे व्यवहार नही होता । पश्चात् 'आत्मादेशवाक्य' से 'अहंकारादेशवाक्य' का भी शुद्ध आत्माके ही सर्वात्म्य-निश्चयमें तात्पर्य विदित होता है । फिर अह शब्दवाच्यका और शुद्ध-आत्माका भेद सुतरा सिद्ध हो जाता है । अहमर्थको आत्मा माननेवाले बहुत से महानुभाव आत्माको अणु मानते हैं फिर अणु आत्माकी 'सर्वात्मता' कैसे हो सकती है ? जब अणु आत्मा ही अनन्त है और जगत्, ईश्वर आदि सब सत्य ही है तब एक अणुरूप जीव ही सब कुछ है यह कथन सङ्गत ही कैसे हो सकता है ? कुछ लोगोंका कहना है कि 'स एवाधस्तादहमेवाधस्तादात्मैवाधस्तात्' इत्यादि उपक्रम वाक्यो और 'सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः' इत्यादि स्मृतियोसे 'स एवेदं सर्वम्, अहमेवेदं सर्वम्, आत्मैवेदं सर्वम्' इत्यादि उपसंहार वाक्योका तात्पर्य सर्वात्मता ( सर्वस्वरूपता ) के प्रतिपादनमें नहीं, किंतु सर्वगतत्व या व्यापकत्वके प्रतिपादनमें ही है । अतएव 'सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः' यह स्मृति स्पष्ट कहती है कि आप सर्वव्यापक हैं अतः सर्वस्वरूप हैं । इसी तरह भूमा, अहमर्थ और आत्मा सभी सर्वगत, सर्वव्यापक हैं, अतः उनकी

मार्क्स और आत्मा ७९१ सर्वस्वरूपताका उपचार कहा जाता है । यदि अधिष्ठान या उपादान होनेमें वास्तविक सर्वस्वरूपता होती, तब तो कथंचित् अहंकाररहित केवल चैतन्यमें अहंशब्द- का भी तात्पर्य समझा जाता । वाच्यत्व, ज्ञेयत्व आदिके समान सर्वगतत्व भी अनेकोंमें हो सकता है । यदि जीव और ब्रह्मकी एकता ही श्रुतियोंका तात्पर्य हो, तब तो भूमा और आत्माके उपदेशसे ही अभीष्ट सिद्ध हो जाता, फिर अह- कारादेशकी व्यर्थता स्पष्ट ही है । परंतु, यह सब कथन अयुक्त है, क्योंकि उपर्युक्त युक्तियोंके अनुसार 'स एवाधस्तात्' इत्यादि वाक्योंका तात्पर्य ब्रह्मात्मैक्यमें ही है, सर्वगतत्व प्रतिपादनमें नहीं । वस्तुतः जो उपादान या अधिष्ठान होता है, उसी- की सर्वगतता भी सम्पन्न होती है । पृथिव्यादि सर्वप्रपञ्चका कारण होनेसे ही आकाश आदिकी भी व्यापकता है । अतएव 'सर्वकारणरूपसे आप सर्वत्र व्यापक हैं, इसीलिये आप सर्वरूप हैं,' इस तरह 'सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वं.' इस स्मृतिका भी तात्पर्य सर्वात्मतामें ही है । परिभूः, स्वयम्भूः—इन दो पदोंसे व्यापकता और सर्वरूपता सिद्ध की जाती है ।' 'परि-उपरि-सर्वतो वा भवतीति परिभूः' ऊपर या चारों ओर होनेवालेको 'परिभूः' कहा जाता है । 'यस्योपरि भवति यश्चोपरि भवति स सर्वः स्वयमेव भवतीति स्वयम्भूः' जिसके ऊपर और जो ऊपर होता है, उस सब कुछ अपने-आप होनेवालेको 'स्वयम्भूः' कहा जाता है । ठीक उसी तरह 'स एवाधस्तात्' इत्यादि वचनोंसे सर्वव्यापकता कहकर 'स एवेदं सर्वं' इत्यादि वचनोंसे उसीकी सर्वरूपता प्रतिपादित की गयी है । अतः उपक्रम- उपसंहारमें ऐक्यरूप्य ही है । इसके सिवा यह भी विचार करना चाहिये कि 'स भगव. कस्मिन् प्रति- ष्ठितः'—भगवन् ! वह भूमा किसमें प्रतिष्ठित है ? इस प्रश्नमें क्या भूमाका कहीं अवस्थानमात्र पूछा गया है अथवा भूमा परमार्थतः किसमें प्रतिष्ठित है, यह पूछा गया है ? यदि पहला पक्ष है तब तो उसका यह उत्तर है कि 'स्वे महिम्नि' अर्थात् अपने प्रपञ्चरूप महिमामें ही स्थित है । यद्यपि कहा जा सकता है कि 'यदि भूमा अपनी महिमामें स्थित है, तब तो जैसे राजा अपनी महिमासे गज, अश्व आदिमें स्थित होता है, यहाँ 'भोग-साधन' मे 'महिम' शब्दका प्रयोग हुआ है और वह भी राजाकी समान सत्तावाला है, अर्थात् जैसे राजा सत्य है, वैसे ही उसके भोग-साधन गजादि भी सत्य हैं, वैसे ही प्रपञ्चको भी ब्रह्मके समान ही सत्य होना चाहिये । ऐसी स्थितिमें वस्तुपरिच्छेद होनेसे भूमामें परिच्छिन्नता अनिवार्य होगी, तथापि यहाँ महिमा शब्दका अर्थ अपनी समान सत्तावाला भोगसाधन नहीं विवक्षित है, किंतु 'स्व' शब्द अपनेमें अध्यस्तरूप 'स्वीय' या 'आत्मीय' का बोधक है । कोई संकोचक प्रमाण न होनेसे सभी अध्यस्त दृश्य-प्रपञ्च 'स्वे महिम्नि' के 'स्व' शब्दका अर्थ है और महिमा शब्द उत्कर्षका बोधक है । राजसम्बन्धी होनेसे राजकीय गो, गजादिमें जैसे उत्कर्ष है,

वैसे ही प्रकाशक ब्रह्म-सम्बन्धसे अध्यस्त दृश्यमात्रमें उत्कर्ष है । अतः उसके परमार्थ सत्य होनेकी कोई अपेक्षा नहीं है । अतएव ब्रह्ममें परिच्छिन्नता आदि न आ सकेगी । यदि दूसरे अभिप्रायसे प्रश्न हो कि भूमा परमार्थतः किसमें प्रतिष्ठित है, तब तो 'यदि वा नो महिम्नि'—वह महिमामें प्रतिष्ठित नही है, यही उत्तर है; क्योंकि 'अन्यो ह्यन्यस्मिन् प्रतिष्ठितः'—दूसरा ही दूसरेमें प्रतिष्ठित होता है । जब भूमासे भिन्न परमार्थ सत्य कोई पदार्थ ही नहीं है, तब भूमाकी किसमें प्रतिष्ठा कही जाय ? 'यत्र नान्यत्पश्यति' इत्यादि वाक्यसे अद्वैत ब्रह्म ही भूमा कहा गया है । इस तरह जब पूर्व वाक्यसे ही अद्वितीय ब्रह्मका निश्चय हो गया, तब तो फिर उसके अनुसार ही 'स एवाधस्तात्' इत्यादि वाक्योंका भी सर्वात्मता-प्रतिपादनमे ही तात्पर्य होगा । दो वाक्योंका पृथक् अर्थकल्पना करना निरर्थक है । अतः 'स एवाधस्तात्' इत्यादि वाक्योंका यही तात्पर्य है कि अधर्-ऊर्ध्व, देशकाल आदि सब कुछ भूमा ही है । 'जाति सर्वगता होती है' इस सिद्धान्तके अनुसार व्यापक जातिके समान भूमा अन्यमें अधिष्ठित भी हो सकता है । जैसे घटत्वादि जाति घटादिमें तादात्म्यसम्बन्धसे एव अन्यत्र स्वरूप-सम्बन्धसे रहती है, वैसे ही भूमा अपने कार्योंमें तादात्म्यसम्बन्धसे और अनादि पदार्थोंमें स्वज्ञान-विष- यत्वादिसम्बन्धसे प्रतिष्ठित होता है । 'अहमेवाधस्तात्' इत्यादिके मध्यमें अहंका- रोपदेश भी व्यर्थ नहीं कहा जा सकता; क्योंकि ब्रह्ममें अपरोक्षता, प्रत्यक्चैतन्या- भिन्नता आदिके प्रतिपादनके लिये उसकी सार्थकता पहले ही कह चुके हैं । कहा जाता है कि 'वेदान्त-मतानुसार प्रत्यक्चैतन्य आत्मा ही मुख्यरूपसे अपरोक्ष है । उसके साथ ब्रह्मकी एकता कहनेसे भूमा ब्रह्मकी अपरोक्षता ( प्रत्यक्षता) सिद्ध हो ही जानी, फिर अहंकारकी, जो वस्तुतः सर्वरूप नही है सर्वात्मता क्यो कही गयी ?' परतु इसका उत्तर यही है कि यद्यपि आत्माके सम्बन्धसे ही अहंकारकी भी अपरोक्षता है, अतः आत्माकी एकतासे ही भूमाकी अपरोक्षता सिद्ध हो सकती थी तथापि अहकार (मै) मे अपरोक्षता लोकमें बहुत प्रसिद्ध है, इसलिये उसकी उक्ति सार्थक है । इसके सिवा यदि 'अहं' का अर्थ अणुपरिणाम आत्मा ही मान लिया जाय, तब तो उसमे व्यापकता, सर्वरूपता आदि कुछ भी नहीं बन सकती । कुछ लोग कहते हैं कि 'भूमा नारायणख्यः स्यात् स एवाहंकृतिः स्मृतः। जीवस्थस्त्वनिरुद्धो यः सोऽहंकार इतीरितः ॥ अणुरूपोऽपि भगवान् वासुदेवः परो विभुः । आत्मेत्युक्तः स च व्यापी' इस स्मृतिमें भूमारूप नारायणहीको अहंकृति कहा गया है । एवं जीवमें रहनेवाले अनिरुद्धको ही अहंकार कहा गया है और 'अनिरुद्धो हि लोकेषु महानात्मा परात्परः । योऽसौ व्यक्तत्वमापन्नो निर्ममे च पितामहम् ॥ सोऽहंकार इति प्रोक्तः सर्वतेजोमयो हि सः' इत्यादि स्मृतियोसे व्यक्त-भावको प्राप्त होकर पितामहको रचनेवाला ही अहंकार कहा गया है ।

अतः इन स्मृतियोंके अनुसार ही श्रुतिका अर्थ होना चाहिये।' परन्तु यह ठीक नहीं; क्योंकि सर्वात्मता-प्रतिपादक श्रुति-वचनोंके अनुसार ही स्मृतियोंका अर्थ करना युक्त है। इस दृष्टिसे इन स्मृतियोंका यही अर्थ होता है कि 'नारायण ही भूमा है और वही अहंकृति है' अर्थात् अहंकारोपलक्षित चित्तसे अभिन्न होनेके कारण वही अहंकृति भी कहलाता है। अविद्याप्रतिबिम्बरूप जीवके आश्रित अविद्या, काम, कर्मके अनुसार इहलोक-परलोकमें-कहींपर न रुकनेवाला अहंकार ही 'अनिरुद्ध' है। इसमें और शुद्ध आत्मामें अवश्य ही भेद है। मोक्षधर्मके विवेचनसे यह स्पष्ट हो जाता है 'परमात्मेति यं प्राहुः सांख्ययोगविशारदा । तस्मात्प्रसृतमव्यक्तं प्रधानं तद्विदुर्जनाः ॥' अर्थात् सांख्ययोगविशारद जिसे परमात्मा कहते हैं उसीमे प्रधान या अव्यक्त उत्पन्न होता है। 'अव्यक्ताद् व्यक्तमुत्पन्नं लोकसृष्ट्यर्थमीश्वरात् । अनिरुद्धो हि लोकेषु महानात्मा परात्परः ॥ योऽसौ व्यक्तत्वमापन्नो निर्ममे च पितामहम् । सोऽहंकार इति प्रोक्तः सर्वतेजोमयो हि सः ॥ पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् । अहंकारप्रसूतानि महाभूतानि पञ्च च ॥' (सर्वदर्शनसं०) लोकसृष्ट्यर्थ अव्यक्त (अव्यक्तभावापन्न ईश्वर) से अनिरुद्ध या महान् आत्मा (महत्तत्त्व, समष्टिबुद्धि, सूत्रात्मा या हिरण्यगर्भ) का प्रादुर्भाव हुआ। जिस महान्ने व्यक्तभावापन्न होकर पितामह (विराट्) को रचा है, वही महान् आत्मा (हिरण्यगर्भ) आगे चलकर अहंकार कहलाता है। वह बुद्धिरूप या तेज-(सत्त्व) प्रधान सूक्ष्म शरीरका अभिमानी होनेसे ही तेजोमय है। उसी अहंकारसे फिर पञ्चभूतोंकी रचना हुई। मोक्षधर्मके इन वाक्योंमें सांख्यमतानुसार महत्तत्त्व और अहंकारमें ही 'महान्' और 'अहंकार' शब्दका प्रयोग हुआ है। वेदान्त-मतानुसार वीक्षण और विविकीर्षा (प्रपञ्चरूपसे आविर्भावकी इच्छा) ही उनके अर्थ हैं। 'तदैक्षत' इस श्रुतिसे जो ईक्षण कहा गया है, उसे ही महान् कहा जा सकता है। 'एकोऽहं बहु स्याम्' इत्यादि श्रुतिके अनुसार अनेक होनेकी इच्छा ही अहंकार है, अतएव ईक्षणके पश्चात् ही 'अहं' पदका उल्लेख हुआ है। 'अहंकारश्चाहंकर्त्तव्यञ्च' 'महाभूतान्यहंकार' इत्यादि श्रुति-स्मृतिमें अहंकारकी उत्पत्ति और लय बतलाया गया है। अत उसमें व्यापकता कभी नहीं बन सकती। जहाँ भी कहीं अहमर्थकी व्यापकता कही गयी है सर्वत्र ही अहंकारसे रहित, अहंकारके अधिष्ठानभूत व्यापक चैतन्यमें ही लक्षणासे अहंपदका प्रयोग हुआ है। जैसे 'अहं मनुरभवं सूर्य्यश्च' इस वामदेवकी उक्तिमें यद्यपि आपाततः प्रतीत होता है कि परिच्छिन्न जीवकी ही सर्वरूपता कही जा रही है तथापि सिद्धान्ततः वहाँ लक्षणासे अहंकाररहित व्यापक

शुद्ध चैतन्यमें 'अहं' का प्रयोग निर्णय किया गया है। वैसे ही जहाँ भी अहमर्थकी व्यापकता सुनायी दे, वहाँ व्यापक चैतन्य ही 'अह' का अर्थ समझना चाहिये । कुछ लोग कहते हैं कि 'अहंकारश्चाहं कर्तव्यश्च' इत्यादि स्थलोंमें महत्तत्त्वका कार्य और मन आदिका कारण अहन्तत्त्व लिया गया है । 'महत्तत्त्वाद्धिकुर्वाणाद्भ- गवद्वीर्यसंभवात् । क्रियाशक्तिरहंकारस्त्रिविधः समपद्यत' ( श्रीमद्भा० ३ । २६ । २३ ) इत्यादि वचनोंके अनुसार यह सात्त्विक, राजस, तामस—त्रिविध अहकार आत्मस्वरूप अहमर्थसे सर्वथा भिन्न है । यदि अहमर्थ और अहंकारमें भेद न माना जायगा, तब तो इसी तरह 'बुद्धिरव्यक्तमेव च' ( गीता १३ । ५ ) इस वचनमें भी विवाद खड़ा हो सकेगा । यहाँ 'बुद्धि' पद क्षेत्रान्तर्गत दृश्यविशेषके लिये आया है । परंतु यदि 'बुद्धि' शब्दसे संवित् ( स्वप्रकाश ज्ञानरूप आत्मा ) का बोध हो, तब तो संवित्का भी क्षेत्रकोटिमें ही परिगणन होगा । अतः कहना होगा कि भले ही कहीं 'बुद्धि' और 'ज्ञान' पदसे संवित् या आत्मा कहा जाय, पर 'बुद्धिरव्यक्तमेव च' इस क्षेत्रस्वरूपके निरूपण-प्रसङ्गका 'बुद्धि' शब्द संवित्का बोधक नहीं है । ठीक इसी तरह क्षेत्रमें प्रयुक्त अहंकार शब्दका अर्थ आत्मा नहीं है; किंतु 'अहमात्मा गुडाकेश' ( गीता १० । २० ) इत्यादि स्थलोंका ही 'अह'पद आत्मा- का बोधक है । 'दम्भाहंकारसंयुक्ताः' ( गीता १७ । ५ ) इत्यादि स्थलोंमें 'अह' पदका प्रयोग देहमें, अहंबुद्धि और गर्वमें होता है । 'गर्वोऽभिमानोऽहंकारः' ( अमर० १ । ७ । २१ ) इस कोषसे भी मालूम होता है कि अहंकार शब्द केवल अहम

कुछ लोग अहमर्थमें आत्मा-अनात्मा—दोनोंका मिश्रण नहीं मानते और कर्तृत्व आदिको मुख्य आत्माका ही धर्म मानते हैं। परन्तु यह असंगत है; क्योंकि असङ्ग, अनन्त आत्मामे कर्तृत्व माननेसे मुक्तिका होना अत्यन्त असम्भव हो जायगा। कहा जाता है कि 'यदि अहङ्कार या अहंशब्द चिज्जड- ग्रन्थिका वाचक हो तब तो दूसरोकी ग्रन्थिमें भी 'अहं' का प्रयोग होना चाहिये।' परन्तु उन्हें यह भी देखना चाहिये कि उनके ही मतमें अहंकार और मान्त अहम्का प्रयोग दूसरोंके अन्तःकरण या क्षेत्रमे क्यों नहीं होता ? यदि उन्हे ऐसा इष्ट हो तो हमें भी इष्ट ही है। भेद यही है कि हमारे यहाँ इन पदो- की अपने उच्चारयितामें शक्ति है। शुद्ध आत्मा उच्चारयिता है नहीं, अतः जैसे वहाँ लक्षणासे प्रयोग होता है, वैसे ही दूसरी ग्रन्थिमें भी होगा। कहा जाता है कि कर्तृत्व आदिके अनात्म-धर्म होनेपर भी उसे अपने आश्रय प्रतीतिके बिना भी आत्मामें वैसे ही प्रतीति होनी चाहिये, जैसे 'गौरोऽहम्' यहाँ गौरवके आश्रय देहकी प्रतीति न होनेपर भी गौरवकी आत्मामें प्रतीति होती है। परन्तु ध्यान देनेपर स्पष्ट प्रतीत होता है कि दृष्टान्तमें भी देहत्वरूपसे देहका भान न होनेपर भी गौरव मनुष्यत्वरूपसे देहका भान अवश्य रहता है। फिर दार्शन्तिक कर्तृत्व आदि आश्रयभूत अहमर्थकी प्रतीतिके बिना कैसे प्रतीत होगे ? सार यह है कि जहाँ आरोप अनुभूयमान होता है, वहाँ या तो प्रतिबिम्बरूपता होती है अथवा धर्मीका अध्यास अवश्य होता है। जब कर्तृत्वादि प्रतिबिम्बरूप नहीं हैं, तब अवश्य ही धर्मीका अध्यास मानना चाहिये। अहं प्रत्ययका विषय होनेसे शरीरके समान अहमर्थ अनात्मा है इत्यादि अनुमानसे भी अहमर्थकी अनात्मता सिद्ध होती है। कहा जाता है कि इस तरह तो अहमर्थके भीतर अधिष्ठानभूत चैतन्य भी अह प्रत्ययका विषय है, फिर उसे भी अनात्मा कहना पड़ेगा। परन्तु इसका उत्तर स्पष्ट है। जिस रूपसे उसे अहंप्रत्यय- विषयता है, उस रूपसे उसकी अनात्मता इष्ट ही है और स्वरूपसे वह सर्वथा अविषय है अतः उसमें अनात्मताकी प्रसक्ति नहीं है। अहमर्थ आत्मासे अन्य है। 'अहं' शब्दका अभिधेय (वाच्य) होनेसे अहंकारशब्द-वाच्यके समान पर्यायता दिखलायी जा चुकी, अतः असिद्धिकी कल्पना नही की जा सकती। कहा जाता है कि वेदान्ती भी तो 'गौरोऽहम्' इस तरह आत्माको गौरवकी कल्पनाका अधिष्ठान मानता है और 'मा न भूवम्, भूयासम्' इत्यादि रूपसे आत्माको ही परप्रेमास्पद मानता है। साथ ही अहमर्थ अपनी सत्तामें प्रकाश (बोध) से रहित नहीं होता, अतः आत्मा- की स्वप्रकाशता भी कही जाती है। यदि अहमर्थ अनात्मा ही हो, तब तो यह सब उपर्युक्त कथन कथमपि सङ्गत न हो सकेगा, क्योकि 'गौरोऽहम्', 'मा न भूवम्' अहमर्थकी प्रकाशाव्यभिचारिता यह सभी अहमर्थसे ही सम्बन्धित है। अतः यदि वह अनात्मा है, तब तो यह अहमर्थसे सम्बन्धित स्वप्रकाशत्वादि अनात्मामें ही

७९६ मार्क्सवाद और रामराज्य पर्यवसित होगे । परंतु यह कथन ठीक नहीं है । गौरत्वादि अनात्माके आरोपका अधिष्ठान अहमर्थ नहीं है, अपितु आत्मा ही है । किंतु जैसे 'इदम्' (पुरोवर्ती शुक्तिकादि) अधिष्ठानका अवच्छेदक होनेसे अधिष्ठान कहलाता है, वैसे ही अहमर्थ भी अधिष्ठानका अवच्छेदक होनेसे अधिष्ठान कहलाता है । वास्तवमें अहमर्थ अनात्माके आरोपका अधिष्ठान नहीं है । आत्मामें अहंकारका ऐक्यारोप (भ्रम) होनेसे ही अहमर्थमें प्रेमास्पदत्वकी प्रतीति होती है । जो कहा जाता है कि 'ऐसा माननेसे अन्योन्याश्रय-दोष होगा', वह भी ठीक नहीं । सुषुप्तिकालमें आत्माका प्रकाश होता है, अहमर्थका प्रकाश नहीं होता । इसीसे उन दोनोका भेद सिद्ध हो जाता है । कहा जाता है कि 'अहमर्थके प्रेमसे भिन्न अन्य प्रेमका अनुभव ही नहीं होता, अतः अहमर्थको ही प्रेमास्पद मानना चाहिये, परंतु यह ठीक नहीं । परामशसे सिद्ध सुषुप्तिमे अहमर्थशून्य आत्माके प्रेमका अनुभव स्पष्ट है, अतः अहमर्थ-प्रेमसे भिन्न भी आत्मप्रेम है ही। यहाँ संदेह होता है कि यद्यपि अहितमें हितबुद्धिसे प्रेम उत्पन्न होता है तथापि जो प्रेमका आस्पद नहीं है, उसमें प्रेमास्पदताका आरोप कहीं भी नहीं देखा गया । अतः यदि अहमर्थ-प्रेमास्पद आत्मा नहीं है, तब इसमें प्रेमास्पदताका आरोप कैसे हो सकता है ?' परंतु इसका समाधान यह है कि अहमर्थमे प्रेमास्पदत्वका आरोप होता है, ऐसा नहीं; किंतु यह कहा जा रहा है कि अहमर्थमें आत्माके ऐक्यका आरोप होनेसे प्रेमास्पदता है, स्वाभाविक नहीं । स्वाभाविक प्रेमका आस्पद आत्मा ही है । इच्छा और प्रेममें भेद है, अतएव सिद्ध वस्तुमे भी स्नेहात्मक-वृत्तिरूप प्रेम होता है । रहा यह कि 'अहमर्थका प्रकाशके साथ व्यभिचार न होनेसे उसे ही आत्मा माना जाय', यह भी ठीक नहीं, क्योकि वह तो अहमर्थ और आत्माके भेदमें भी बन सकता है । परंतु स्वप्रकाश आत्मसम्बन्धके बिना जड अहमर्थका प्रकाशाव्यभिचार नहीं हो सकता । अतएव वह भी अहमर्थ भिन्न आत्मामे प्रमाण है, अर्थात् अहमर्थके प्रकाशाव्यभिचारसे उसकी स्वप्रकाशता नहीं मानी जा सकती, अपितु इससे स्वप्रकाश आत्माका सम्बन्ध ही निश्चित होता है । कहा जाता है कि 'समारोप्यस्य रूपेण विषयो रूपवान् भवेत् । विषयस्य तु रूपेण समारोप्यं न रूपवत् ॥' अर्थात् आरोपितके रूपसे विषय रूपवान् होता है, विषय (अधिष्ठान) के रूपसे समारोपित पदार्थ रूपवान् नहीं होता । इस युक्तिसे आरोपित अहमर्थके अप्रेमास्पदत्वसे ही आत्मामें अप्रेमास्पदत्वकी प्रतीति होनी चाहिये । परंतु यहाँ विचार करना चाहिये कि क्या अधिष्ठानका धर्म आरोपितमें प्रतीत होना चाहिये अथवा आरोप्यगत धर्मका अधिष्ठानमें भान होना चाहिये ? पहला पक्ष तो इसलिये ठीक नहीं है कि अधिष्ठानके जिस धर्मसे विशिष्ट स्वरूपज्ञानसे आरोपितकी निवृत्ति हो जाती है, वह धर्म आरोप्यमें कदापि नहीं प्रतीत होता—ऐसा नियम है । जैसे शुक्तिरजतमें शुक्तिगत इदन्ताकी प्रतीति होनेपर भी शुक्तिगत नीलपृष्ठत्व, त्रिकोणत्व,