भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 538

[Header] मार्क्स और आत्मा ७७९

सत्त्व, रज, तम, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, संयोग और शक्ति—ये दस गुण हैं। द्रव्य और गुण उभयरूप सामान्य है। प्रकृतिका परिणाम प्रपञ्च है। पर, व्यूह, विभव, अन्तर्यामी और अर्चावतारभेदसे परमेश्वरके पाँच प्रकार हैं। उसके परतन्त्र, बद्ध, मुक्त और नित्यभेदसे तीन प्रकारका जीव है। संसारी बद्ध हैं। श्रीमन्नारायणकी उपासनासे वैकुण्ठलोकको प्राप्त जीव मुक्त हं। कभी भी जिन्हें संसारका स्पर्श नहीं हुआ, ऐसे अनन्त, गरुड़ आदि नित्यमुक्त हं। शुद्ध और मिश्रभेदसे सत्त्व दो प्रकारका है। नित्यविभूतिमें शुद्ध और प्रकृतिमें मिश्र सत्त्व हे। ‘अन्तर्यामिब्राह्मण’ द्वारा चिदचिच्छरीरक परब्रह्म ही चिदचिद्विशिष्ट है, जो दूसरा है। आत्मा ज्ञानगुणक होते हुए ज्ञानस्वरूप है। परमेश्वर विभु है, परंतु चित् वाण- रूप जीव अणुपरिमाणपरिमित हे। प्राकृत और अप्राकृतभेदसे दो प्रकारका अचेतन काल है। चित्-अचिद्रूपसे परमेश्वरका भेदव्यपदेश होनेके कारण भेद हे और अभेदव्यपदेशके कारण अभेद भी है। इस तरह भेदाभेदवादी सभी प्रकारके श्रुति- वचन स्वार्थमें अनुपचरितार्थक ही समझते हैं। इन्हींमें कोई सोपाधिक भेदाभेद- वादी हैं। कोई अचिन्त्यभेदाभेदवादी हं। कोई शुद्धाद्वैत ही तत्त्व बतलाते हैं। यहाँ शुद्धाद्वैत' का समास इस प्रकार है—‘शुद्धं च तद् अद्वैतं शुद्धाद्वैतम्’ और ‘शुद्धयोः मायासम्बन्धरहितयोः अद्वैतं शुद्धाद्वैतम् ।’ इयत्तासे अनवच्छिन्न ब्रह्म ही अनवगाह्य महामहिमाशाली होने और सकल विरुद्ध धर्मोंका आश्रय होनेके कारण कामधेनु, कल्पवृक्ष एवं चिन्तामणि आदिके समान स्वयं अविकृत रहकर ही अघटितघटनापटीयान्, स्वाभाविक स्वात्मयोगसे क्रीडार्थ पूर्णानन्दको तिरोभूत करके जीवरूपको ग्रहण करता है, चिदानन्दांशोंको तिरोहित करके सर्वभवनसमर्थ सदंशाश्रित मायाशक्तिसे जगद्रूप धारण करता है, आनन्दांशको किंचित्तिरोहित करके अक्षरब्रह्मरूप ग्रहण करता है और पूर्णानन्दाशका तिरोधान बिना किये ही पुरुषोत्तमरूपसे प्रादुर्भूत होता है। इसी प्रकार कोई कार्य, कारण, योग, विधि और दुःख—ये पाँच पदार्थ मानते हैं। कोई पति, पशु और पाश—ये तीन पदार्थ ही मानते हैं। इनके मतानुसार शिव पति, जीव पशु और मल, कर्म, माया तथा रोधशक्ति पाश हैं। प्रत्यभिज्ञावादीके अनुसार जीव तथा परमात्माका ऐक्य है। जड पूर्ववत् है, किंतु आत्मामें वह भिन्न भी है और अभिन्न भी और सब पूर्ववत् है।