मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८० मार्क्सवाद और रामराज्य अहमर्थ और आत्मा देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदिसे आत्मा पृथक् है, प्रायेण यह बात अधिक दार्शनिकोंको मान्य है । परंतु अहमर्थ ( मै ) आत्मा है या नहीं, इस विषयमें प्रायः विप्रतिपत्ति है । अधिकाधिक दार्शनिकोंका कहना है कि 'अहमर्थ ( मै ) ही आत्मा है, उसमे ही मै कर्त्ता, मै भोक्ता, मै दुखी, मै सुखी, मैं शोक-मोहसे व्याकुल, मै शान्त, मै धीर, मै मूढ इत्यादि रूपसे जिसको अनुभव होता है, वही आत्मा है । अहमर्थ ही अनन्त उपद्रवोसे उपद्रुत बद्ध अज्ञानी होता है । वह कर्म, धर्म, उपासना, ज्ञान आदिद्वारा ज्ञानी होकर मुक्त होता है । जागर, स्वप्न, सुषुप्ति- तीनो अवस्थाओसे बन्ध और मोक्षकालमें एकरस अन्वयी अहमर्थ ही आत्मा है । यदि अह अह इत्याकारेण अनुभूयमान अहमर्थका मोक्षमें उच्छेद हो जाय, तब तो कोई भी मोक्षके लिये प्रयत्नशील न होगा, प्रत्युत मोक्षकी कथाहीसे भागेगा ।' परंतु अद्वैतवादी वेदान्तीका इसके विपरीत यह कहना है कि अहमर्थ मुख्य आत्मा नही है, किंतु चिज्जडकी ग्रन्थि ही 'मै' या अहरूपसे भासमान होती है । दूसरे शब्दोमें कहा जाय तो अधिष्ठान, बुद्धि और चिदाभास—ये ही तीनों मिलकर औपाधिक जीव या 'मै' आदि पदोसे व्यपदिष्ट होते हैं । बुद्धि-आत्मा, जड- चेतन, अनात्मा-आत्माका अन्योन्याध्यास ही 'मै' पदार्थ है । जैसे किसी साधारण पुरुषको शरीर, इन्द्रिय, बुद्धि आदिमें ही आत्मबुद्धि हो जाती है और वह देहादिके नाशमें ही आत्मनाश मानने लगता है, वैसे ही अनात्मरूप अहमर्थमें भी भ्रान्तिसे ही आत्मबुद्धि होती है । मै जो कभी कर्ता, कभी भोक्ता, कभी सुखी, कभी दुखी, कभी शान्त, कभी घोर एव कभी मूढ है, कभी हृष्ट पुष्ट, प्रसन्न, कभी शोक-मोह-परिश्रुत होकर प्रतीत होता है, उसे एकरस शुद्ध स्व- प्रकाश आत्मा कैसे कहा जाय ? वस्तुतः इस अनेकरूप अहमर्थका जो एकरस- भासक अखण्ड भानरूप नित्य बोध है, वही आत्मा है । जैसे स्वर्गादि सुख-प्राप्तिके लिये देहद्वारा प्रयत्नशील ही अग्निकुण्डमें देहकी आहुति कर सकता है, वैसे ही अहमर्थद्वारा प्रयत्नशील सोपाधिक आत्मा निरुपाधिक पदप्राप्तिके लिये सोपाधिक स्वरूपके उच्छेदमें प्रयत्नशील होता है । इसके सिवा यदि अहमर्थ ही आत्मा होता, तो उसका तीनो ही अवस्थाओमें प्रकाश होना उचित था; क्योकि आत्मा स्वप्रकाश है । अहकार, अहबुद्धिका विषय है । आत्मा अहबुद्धिका भी भासक साक्षीरूप है । कुछ लोगोका कहना है कि “सुखमहमस्वाप्सम्, न किंचिदमवेदिषम्'—'सुखपूर्वक मैं सो रहा था, मैं कुछ भी नहीं जानता था, इस तरह सुषुप्तिसे ( सोकर ) जागनेपर सौषुप्त सुखके