मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्रन्थि ही अहंकार है। वही 'अनुभवामि' (मै अनुभव करता हूँ) इस तरह आत्मा- भिन्न आत्मस्वरूप अनुभवका आश्रय होनेसे चिदात्मक कहलाता है। 'अहं कर्ता' (मै करता हूँ) इस तरह जडरूप कर्तृत्वका आश्रय होनेसे अचिदात्मक है। ऐसी स्थितिमें अचित् अन्तःकरणके उपरम होनेपर चिदचित्सवलित (चिजडग्रन्थिरूप) अन्तःकरणका भी उपरम हो जाता है। अन्तःकरण, उसका अधिष्ठान और अन्तः- करणगत चिदाभास—यह तीनों मिलकर अहमर्थ कहलाते हैं। अन्तःकरणका आत्मामें स्वरूपसे ही अध्यास होता है। परन्तु अन्तःकरणमें आत्माका स्वरूप नहीं अध्यस्त होता; किंतु उसका संसर्ग ही अध्यस्त होता है। इसीलिये अन्योन्याध्यास होनेपर भी उभयके साक्षात्कारसे उभयकी निवृत्ति नहीं होती। अतएव शून्यवादपत्ति नहीं होती; क्योकि आत्मस्वरूप अधिष्ठानके साक्षात्कार होनेपर स्वरूपसे अध्यस्त अन्तःकरणकी निवृत्ति होती है। परन्तु आत्माका तो संसर्ग ही अन्तःकरणमें अध्यस्त है, अतः उसीकी निवृत्ति होती है। स्वरूप अध्यस्त नहीं है, अतः उसकी निवृत्ति नहीं होती। इस अन्योन्याध्यास—चिजडग्रन्थिको ही अहमर्थ कहा जाता है, फिर अन्तःकरणकी उपरतिसे उसकी उपरति होनी युक्त ही है। यह उपरति या निवृत्ति भी निरन्वय नाश नहीं है, किंतु कारणरूपसे अवस्थान ही है। अतएव पूर्वापरके अहमर्थमे भेद नहीं है। जैसे एक ही घृतमें कोई भेद नही होता, ठीक वैसे ही वही अन्तःकरण सुषुप्तिकालमें अविद्यात्मना परिणत होता है और जाग्रत्में फिर वही अन्तःकरणरूपमें व्यक्त होता है। इस तरह प्रत्यभिज्ञा और अनुभव-स्मरणका सामानाधिकरण्य, कर्मफलभोग वैयधिकरण्या- भाव, अकृताभ्यागम, कृतविप्रणाशादि दोष भी नही होंगे, 'अथातोऽहंकारादेशः, अथात आत्मादेशः' यह श्रुति भी अहंकारसे पृथक् आत्माके होनेमें प्रमाण है। पूर्वपक्षीकी ओरसे कहा जाता है कि वेदान्तोंके मतसे तो जैसे 'स एवाधस्तात् स एवोपरिष्टात्' इत्यादि वचनोंसे भूमा ब्रह्मके साथ आत्माका अभेद बतलाया गया है, वैसे ही आत्माका अहमर्थके साथ भी अभेद बतलाया जा सकता है। अतः जैसे आत्मस्वरूप होनेपर भी भूमाका पृथक् उपदेश है, वैसे ही 'अहमेवाध- स्तादहमेवोपरिष्टात्' इत्यादि वचनोंसे अहमर्थका पृथक् उपदेश होना सम्भव हो सकता है। तब फिर भेदबोधन कैसा ? यदि कहा जाय कि 'भूमा और आत्मा तो भिन्नत्वेन प्रत्यक्षसे प्रसिद्ध हे, अतः उनका पृथक् उपदेश एकता प्रतिपादनके लिये ही उपयुक्त है। जब कि दो सर्वात्मा नहीं हो सकते और भूमा तथा आत्मा- दोनोंको सर्वात्मता कही गयी है, तब दोनोंकी एकता अर्थात् अभिन्नता सिद्ध हो जाती है। अहंकारकी तो आत्माके साथ एकता प्रत्यक्ष सिद्ध है। अतः आत्मासे पृथक् अहंकारका उपदेश आत्मासे भेद ही सिद्ध करनेके लिये है।' पर यह असङ्गत है, क्योकि यदि अहमर्थसे अन्य आत्माकी भूमा ब्रह्मसे भिन्नता प्रत्यक्षद्वारा असिद्ध