भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 547

७९८ मार्क्सवाद और रामराज्य है तो भेदार्थ ही दोनोंका उपदेश क्यो न माना जाय ? इसके सिवा, जब अहम्अर्थ तो ब्रह्मभिन्नत्वेन रूपेण सिद्ध है, तब उसका उपदेश अभेद-सिद्धिके लिये ही क्यों न मान लिया जाय ? इसी तरह 'अज्ञातज्ञापकत्वेन श्रुतिका प्रामाण्य सिद्ध होगा।' आदि पूर्वपक्ष भी असङ्गत है; क्योकि अहंकारसे भिन्न आत्माकी भूमारूप ब्रह्मसे भिन्नता प्रत्यक्षद्वारा असिद्ध होनेपर भी अभिन्नता भी उसी तरह असिद्ध ही है । परंतु फिर भी दोकी सर्वात्मता बन नहीं सकती, अतः सर्वात्म्योपदेशान्यथा- नुपपत्तिकी सहायतासे अभेदमे ही श्रुतिका तात्पर्य मानना युक्त है । परतु अहम्अर्थ और आत्माका अभेद असम्भव है; क्योंकि जड, चेतनकी एकता नहीं हो सकती, अतः अहम्अर्थका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिका आत्मासे अभेद-प्रतिपादनमे तात्पर्य नहीं हो सकता । सारांश यह है कि भूमा ब्रह्म ही ऊपर-नीचे, पूर्व- पश्चिम-सर्वत्र है, वही सब कुछ है, यह कथन अधिष्ठान बुद्धिसे ही सम्भव है। सर्वाधिष्ठान जो है, वही सब कुछ है । अतः यदि भूमा ब्रह्म ही सर्वदेश, काल, वस्तुका अधिष्ठान है, तब तो वही सब कुछ है, ऐसा कहना सम्भव है, अन्यथा असम्भव है; परंतु, जब कि उसी तरह आत्माके लिये भी कहा जा रहा है कि आत्मा ही नीचे-ऊपर, पूर्व-पश्चिम, वही सर्वत्र और वही सब कुछ है, तभी अधिष्ठान होनेसे ही आत्माकी भी सर्वात्मकता बन सकती है । परतु सर्वप्रपञ्च का दो अधिष्ठान होना असङ्गत है, अतः जबतक आत्मा और भूमा ब्रह्मका अत्यन्त अभेद न ज्ञात हो, तबतक दोनोंकी ही सर्वात्मकताका उपदेश नहीं सङ्गत हो सकता । इसलिये आत्मा और भूमा ब्रह्मकी एकता स्वीकार्य है । यद्यपि इसी तरह 'अहमेवाधस्तात्' मै ही सब कुछ हूँ । इस तरह अहंकारकी भी सर्वरूपता सुनकर पूर्वन्यायसे आत्मा और भूमाके समान ही अहंकार और आत्माका भी अत्यन्त अभेद मानना चाहिये, तथापि अहंकारकी जडता, दृश्यता, प्रत्यक्षता स्पष्ट ही सिद्ध है । अतः चेतन आत्माका उसके साथ अभेद नहीं हो सकता । इसीलिये अहंकारादेशके पश्चात् आत्मादेशका प्रसङ्ग आता है, जिसका आशय यह होता है कि चिदात्मसंवलित (व्यापक अधिष्ठान चैतन्य- मिश्रित) होनेसे ही अहंकारकी सर्वात्मता कही गयी है । वास्तवमे परिच्छिन्न अहंकार सर्वरूप नहीं है, किंतु आत्मा ही सर्वरूप है । कहा जाता है कि 'ऐसी ही स्थिति हे तो अहंकारकी सर्वात्मता न कहकर आत्माकी ही सर्वात्मता कहनी थी, इतनेसे भी आत्मा और ब्रह्मकी एकता सिद्ध हो ही सकती थी, परतु, यह कहना ठीक नहीं है; क्योकि लोकमें आत्मशब्द- का प्रयोग अहम्अर्थमे ही होता है, अतः 'आत्मा' पदसे शुद्ध आत्माकी सर्वात्मता नहीं बतलायी जा सकती थी।' परंतु, यदि अहंकारकी सर्वात्मताके अनन्तर आत्मा- की सर्वात्मता कही जायगी, तब तो इसपर अवश्य ही ध्यान जायगा कि अहंकार और आत्मा इन समानार्थक दो शब्दोका प्रयोग क्यो किया गया ? इस तरह