मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंध्यानसे विवेचन करनेपर निश्चय होगा कि आत्मशब्दसे शुद्ध आत्मा विवक्षित है। अतः उसीकी मुख्य सर्वात्मता है। अहंकारकी तो आत्मयुक्त होनेसे ही सर्वात्मता है। इस तरह आत्मशब्दका अहंकारसे अतिरिक्त शुद्ध आत्मामें पार्थक्य निर्णय करानेके लिये ही अहंकारका पृथक् उपदेश आवश्यक है। अर्थात् अहंकार- का पृथक् उपदेश आत्मासे भेद ही सिद्ध करनेके लिये है। कुछ महानुभावोंका तो ऐसा कहना है कि यहाँ सञ्चारिभावका वर्णन है। प्रेमके उद्रेकमें भावुक सभी विश्वको भूमा ब्रह्मरूपसे देखता है, उसीमें स्व-पर- विस्मृतिसे वह अपने-आपको ही भगवान् समझने लगता है। 'असावहं त्वित्यबला- स्तदात्मिका न्यवेदिषुः कृष्णविहारविभ्रमाः।' (श्रीमद्भा० १०।३०।३) अर्थात् जैसे गोपाङ्गनाएँ कृष्ण प्रेमोन्मादमें विह्वल होकर अपने-आपको कृष्ण समझने लगी थीं, वैसे ही साधक अपने-आपको ही भूमा मानकर 'मैं ही सब कुछ हूँ' ऐसा कहता है। परन्तु यह वस्तुस्थिति नहीं, संचारिभाव है, स्थायी नहीं है। अतएव फिर इस भावके मिटनेपर भूमारूप आत्माकी ही सर्वात्मताका अनुभव होता है।' इस मतमें भी अहमर्थसे आत्मशब्दार्थ भिन्न ही माना जाता है। यह दूसरी बात है कि इस मतमें आत्मा और भूमा-इन दोनों शब्दोंका परमेश्वर ही अर्थ है और अहं का अर्थ जीवात्मा है। परंतु यहाँ वस्तुके याथात्म्यका प्रतिपादन करनेवाली श्रुति सञ्चारि- भावका वर्णन कर रही है या तत्त्वके भेद-अभेद आदिका, यह चिन्त्य है। 'कुछ लोगोंका यह भी कहना है कि 'वेदान्तीके मतमें भूमा, अहंकार और आत्मा— यह तीनों बिम्ब, प्रतिबिम्ब और मुखके समान हैं, अतः औपाधिक ब्रह्म भूमा है, जीव अहमर्थ है और निरुपाधिक चिन्मात्र ब्रह्म आत्मा है। इस दृष्टिसे तो जब वेदान्तीके मतमें भी जीवात्मासे अहंकारकी भिन्नता नहीं सिद्ध होती, तब अहमर्थ- की अनात्मता कैसे सिद्ध हो सकती है?' परंतु यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि उसका तात्पर्य यह है कि पहले भूमाका स्वरूप इस तरह बतलाया गया कि 'यत्र नान्यत्पश्यति, नान्यच्छृणोति, नान्यद्विजानाति' (छा० ७०) जहाँ न दूसरेको देखता है, न सुनता है, न जानता है, वही भूमा है। 'स एवाधस्तात्' वही ऊपर-नीचे, वही सब कुछ है। इस उक्तिमें 'यत्र' शब्दसे आधार-आधेयभावकी प्रतीति और 'सः' इस शब्दसे उसकी परोक्षता, अप्रत्यक्षता प्रतीत होती थी और इसीसे भूमामें आत्मासे भिन्नता भी प्रसक्त थी। ऐसी स्थितिमें सर्वभेदशून्य, अपरोक्ष, स्वप्रकाश, ब्रह्मके ज्ञानमें बाधा उपस्थित हो जाती, इसीलिये 'अहमेवाधस्तात्' 'मैं ही ऊपर-नीचे सब कुछ हूँ' इस उक्ति की आवश्यकता हुई। इससे सिद्ध किया गया कि पूर्वोक्त भूमा, जिसकी सर्वात्मता बतलायी गयी, वह अहमर्थरूप है, जीवसे अभिन्न ही है। एतावता 'सः' शब्दसे प्रतीत भूमाकी परोक्षताका वारण हुआ और जीवात्मा परमात्माका भेद एव आधाराधेयभाव आदि भी वारित हुआ। जैसे भूमा सर्वात्मा है, वैसे ही अहमर्थ या जीवात्मा भी सर्वात्मा है। जब दो