मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७९० मार्क्सवाद और रामराज्य सर्वात्मा नहीं हो सकते, तब अर्थात् ही दोनोंकी एकता समझी जाती है, जिससे अपरोक्ष जीवात्मासे अभिन्न भूमाकी अपरोक्षता एवं आधाराधेय भावादिसे विवर्जितता सिद्ध हो जाती है। परंतु इतनेपर भी यह गड़बड़ी पड़ती थी कि अविवेकी लोग 'मै' या 'अहं' का प्रयोग व्यापक शुद्ध चिदात्मामें न करके चिज्जड- ग्रन्थि या कार्यकारण-संघातमें ही करते हैं । इससे कहीं यह न समझ लिया जाय कि परिच्छिन्न, जड़ कार्यकारणसंघात ही भूमा ब्रह्म है, अतः अहंकाररहित शुद्ध आत्माकी सर्वात्मता बतलाकर सर्वोपद्रव-प्रपंचभेदशून्य, स्वप्रकाश भूमा ब्रह्मकी सर्वात्मताका समर्थन किया गया और अहंशब्द-वाच्यार्थ जड़ अहमर्थसे भिन्न अह- शब्दके लक्ष्यभूत अहमर्थ-साक्षीको मुख्य आत्मा कहा गया है । इसी अर्थको सिद्ध करनेमें भूमादेश, अहंकारादेश, आत्मादेश करनेवाली श्रुतियोंका तात्पर्य है । अतः यहाँ बिम्ब-प्रतिबिम्ब आदि कल्पनाका अवकाश नहीं था । यदि अविद्यामें प्रति- बिम्बित जीवको अहंकारशब्दसे कहनेपर भी प्रसक्त-भेदका वारण और आत्मा- देशद्वारा शुद्ध-आत्मासे अहंकारका भेद कहना सङ्गत हो, तो भी अविद्योपाधिक जीवको अहंकार-शब्दसे 'स्थूलारुन्धतीन्याय' से कहा जाता । जैसे अरुन्धतीके निकट रहनेवाले स्थूलताराको ही पहले दिखलाकर बादमें तन्निकटस्थ अरुन्धतीको दिखलाकर पूर्ववाक्यका भी तात्पर्य अरुन्धतीके प्रदर्शनमें ही माना जाता है, साथ ही स्थूल, सूक्ष्म, दोनों ही ताराओमे भेद स्वतः सिद्ध हो जाता है, वैसे ही 'अहंकार' शब्दसे पहले अविद्याप्रतिबिम्ब अहंकाराश्रय चैतन्य कहा जा सकता है । लोकमें अपरोक्ष चैतन्य- का 'मै' या 'अहं' शब्दसे ही व्यवहार होता है, 'अविद्याप्रतिबिम्ब' आदि शब्द अलौकिक है, अतः उनसे व्यवहार नही होता । पश्चात् 'आत्मादेशवाक्य' से 'अहंकारादेशवाक्य' का भी शुद्ध आत्माके ही सर्वात्म्य-निश्चयमें तात्पर्य विदित होता है । फिर अह शब्दवाच्यका और शुद्ध-आत्माका भेद सुतरा सिद्ध हो जाता है । अहमर्थको आत्मा माननेवाले बहुत से महानुभाव आत्माको अणु मानते हैं फिर अणु आत्माकी 'सर्वात्मता' कैसे हो सकती है ? जब अणु आत्मा ही अनन्त है और जगत्, ईश्वर आदि सब सत्य ही है तब एक अणुरूप जीव ही सब कुछ है यह कथन सङ्गत ही कैसे हो सकता है ? कुछ लोगोंका कहना है कि 'स एवाधस्तादहमेवाधस्तादात्मैवाधस्तात्' इत्यादि उपक्रम वाक्यो और 'सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः' इत्यादि स्मृतियोसे 'स एवेदं सर्वम्, अहमेवेदं सर्वम्, आत्मैवेदं सर्वम्' इत्यादि उपसंहार वाक्योका तात्पर्य सर्वात्मता ( सर्वस्वरूपता ) के प्रतिपादनमें नहीं, किंतु सर्वगतत्व या व्यापकत्वके प्रतिपादनमें ही है । अतएव 'सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः' यह स्मृति स्पष्ट कहती है कि आप सर्वव्यापक हैं अतः सर्वस्वरूप हैं । इसी तरह भूमा, अहमर्थ और आत्मा सभी सर्वगत, सर्वव्यापक हैं, अतः उनकी