भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 550, कुल 866 में से

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मार्क्स और आत्मा ७९१ सर्वस्वरूपताका उपचार कहा जाता है । यदि अधिष्ठान या उपादान होनेमें वास्तविक सर्वस्वरूपता होती, तब तो कथंचित् अहंकाररहित केवल चैतन्यमें अहंशब्द- का भी तात्पर्य समझा जाता । वाच्यत्व, ज्ञेयत्व आदिके समान सर्वगतत्व भी अनेकोंमें हो सकता है । यदि जीव और ब्रह्मकी एकता ही श्रुतियोंका तात्पर्य हो, तब तो भूमा और आत्माके उपदेशसे ही अभीष्ट सिद्ध हो जाता, फिर अह- कारादेशकी व्यर्थता स्पष्ट ही है । परंतु, यह सब कथन अयुक्त है, क्योंकि उपर्युक्त युक्तियोंके अनुसार 'स एवाधस्तात्' इत्यादि वाक्योंका तात्पर्य ब्रह्मात्मैक्यमें ही है, सर्वगतत्व प्रतिपादनमें नहीं । वस्तुतः जो उपादान या अधिष्ठान होता है, उसी- की सर्वगतता भी सम्पन्न होती है । पृथिव्यादि सर्वप्रपञ्चका कारण होनेसे ही आकाश आदिकी भी व्यापकता है । अतएव 'सर्वकारणरूपसे आप सर्वत्र व्यापक हैं, इसीलिये आप सर्वरूप हैं,' इस तरह 'सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वं.' इस स्मृतिका भी तात्पर्य सर्वात्मतामें ही है । परिभूः, स्वयम्भूः—इन दो पदोंसे व्यापकता और सर्वरूपता सिद्ध की जाती है ।' 'परि-उपरि-सर्वतो वा भवतीति परिभूः' ऊपर या चारों ओर होनेवालेको 'परिभूः' कहा जाता है । 'यस्योपरि भवति यश्चोपरि भवति स सर्वः स्वयमेव भवतीति स्वयम्भूः' जिसके ऊपर और जो ऊपर होता है, उस सब कुछ अपने-आप होनेवालेको 'स्वयम्भूः' कहा जाता है । ठीक उसी तरह 'स एवाधस्तात्' इत्यादि वचनोंसे सर्वव्यापकता कहकर 'स एवेदं सर्वं' इत्यादि वचनोंसे उसीकी सर्वरूपता प्रतिपादित की गयी है । अतः उपक्रम- उपसंहारमें ऐक्यरूप्य ही है । इसके सिवा यह भी विचार करना चाहिये कि 'स भगव. कस्मिन् प्रति- ष्ठितः'—भगवन् ! वह भूमा किसमें प्रतिष्ठित है ? इस प्रश्नमें क्या भूमाका कहीं अवस्थानमात्र पूछा गया है अथवा भूमा परमार्थतः किसमें प्रतिष्ठित है, यह पूछा गया है ? यदि पहला पक्ष है तब तो उसका यह उत्तर है कि 'स्वे महिम्नि' अर्थात् अपने प्रपञ्चरूप महिमामें ही स्थित है । यद्यपि कहा जा सकता है कि 'यदि भूमा अपनी महिमामें स्थित है, तब तो जैसे राजा अपनी महिमासे गज, अश्व आदिमें स्थित होता है, यहाँ 'भोग-साधन' मे 'महिम' शब्दका प्रयोग हुआ है और वह भी राजाकी समान सत्तावाला है, अर्थात् जैसे राजा सत्य है, वैसे ही उसके भोग-साधन गजादि भी सत्य हैं, वैसे ही प्रपञ्चको भी ब्रह्मके समान ही सत्य होना चाहिये । ऐसी स्थितिमें वस्तुपरिच्छेद होनेसे भूमामें परिच्छिन्नता अनिवार्य होगी, तथापि यहाँ महिमा शब्दका अर्थ अपनी समान सत्तावाला भोगसाधन नहीं विवक्षित है, किंतु 'स्व' शब्द अपनेमें अध्यस्तरूप 'स्वीय' या 'आत्मीय' का बोधक है । कोई संकोचक प्रमाण न होनेसे सभी अध्यस्त दृश्य-प्रपञ्च 'स्वे महिम्नि' के 'स्व' शब्दका अर्थ है और महिमा शब्द उत्कर्षका बोधक है । राजसम्बन्धी होनेसे राजकीय गो, गजादिमें जैसे उत्कर्ष है,

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